पंकज बिष्ट की कहानियों में बाल जीवन संघर्ष

मोनिका पन्त

पीएच.डी. शोधार्थी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा
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पंकज बिष्ट एक कहानीकार के रूप में जिस समय उभरे वह हमारे समाज में शोषक, शोषित वर्ग दोनों के लिए चुनौतियों का दौर था। एक वर्ग जहाँ दो वक्त की रोटी कठिन मेहनत के बावजूद पाने में असमर्थ था तो दूसरा वर्ग आगे बढ़ने की जद्दोजहद में सामाजिक मूल्यों को भुलाते जा रहा था। इनकी कहानियों का फलक बेहद विस्तृत है, कहीं पर्वतीय जीवन के मनोरम दृश्यों के साथ जटिल जीवन संघर्ष तो कहीं महानगरों में दिखावे के मकड़जाल में घूमता परिदृश्य दिखाई देता है। जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए किसी का बचपन तो किसी की बीमारी को दाँव पर लगाकर गरीबी, बेबसी का सूक्ष्म अवलोकन इनकी कहानियों में दिखाई देता है। पंकज बिष्ट की कहानियों में बाल जीवन संघर्ष के विविध स्वरूप दिखाई देते हैं। बालश्रम की बेबसी, उदासी, मजबूरी, दमन, तड़प इनकी कहानियों में मौजूद है।

 ‘हल’ कहानी में कुमाऊँ के सुदूर क्षेत्र में रहने वाले शिबिया ने कलम पकड़ने की उम्र में हल की मूठ थाम ली थी, क्योंकि घर में अन्न का दाना नहीं, और काम की तलाश में दूर शहर भटक रहा पिता, भले ही शिबिया की कम उम्र हो लेकिन अपने बचे भाई-बहनों में वही सबसे बड़ा है तो जिम्मेदारियों का बोझ तो उसे ढोना ही है। लेकिन अपने बाकी असमय मरे भाई-बहनों की तरह वह भी गरीबी की मार से दम तोड़ देता है। उसका मामा उम्मेदसिंह जब बेहोश पड़े शिबिया के गाल में निशान देखता है तब उसे सारी परिस्थिति समझ आने लगती है कि शिबिया सुबह अपनी आँख मलते हुए बैलों को ले जाते हुए घायल हो गया और शारीरिक कमजोरी के कारण ज्यादा देर सह नहीं पाया। उसे अपनी बहन पर भी बहुत गुस्सा आया और शिबिया के बाप पर भी परंतु आखिर इसमें गलती उन दोनों में से किस की थी? इस सवाल के उधेड़बुन से भी वह निकल नहीं पाया। “शिबिया सुबह हल लगाता था, दिन में घर के दूसरे छोटे-मोटे काम करता, और फिर रात को दो मील दूर जाकर, देर तक रामलीला देखता। ठंड बढ़ने लगी थी। कपड़ों के नाम पर स्काउंटिंग की स्कूली खाकी कमीज और पैंट के अलावा एक कई साल पुराना बाप का उतारा स्वेटर भी था जो उसके शरीर पर सारे साल ऐसे झूलता रहता जैसे चिड़ियों को डराने के लिए बनाए गए बिजूका पर कपड़ा झूलता है। ठंड लगी होगी और छाती पकड़ ली। ऐसे में डबल निमोनिया न होता तो क्या होता।”  शिबिया ने पूरी कोशिश की अपने घर की ज़िम्मेदारी संभालने की परंतु परिस्थितियाँ जटिल होती गई जबकि उसके मामा ने बचपन में ही हल की कलाकारी को देख उसकी माँ से उसकी तारीफ की थी। “भागुली अब अपने दुख के दिन खत्म हो गए। ऐसा होनहार बेटा किसी- किसी के घर पैदा होता है।”  लेकिन यह हाल सिर्फ शिबिया का नहीं यहाँ कई युवावर्ग का हुनर इसी तरह दफन होता जाता है। कठिन श्रम के बावजूद इनकी जिंदगी से निराशा की लहर दूर हटती ही नहीं है।

पर्वतीय अंचल दिखने में तो मनोरम लगता है परंतु उसके भीतर कई त्रासदियाँ भी छुपी हुई हैं जो कभी बादलों की ओट में छिपी रहती हैं तो कभी लगातार बरसती रहती हैं। पहाड़ के कई लोगों का हाल यह है कि उनके जीवन में सुकून के कुछ पल भी उनसे अकसर आँख मिचौली खेलते रहते हैं और बेबसी व अस्थिरता उनके जीवन में खूंटा गाड़कर बैठ जाती है। उम्मेदसिंह पहाड़ के लोगों के बारे में सोचकर दुखी होता है। उसकी खुद की स्थिति भी कुछ खास नहीं लेकिन बहन की हालत को देख उसे बहुत पीड़ा होती है। बिना किसी साधन के कैसे पहाड़ के लोगों का जीवन अकसर अव्यवस्थित सा रहता है। न फसल में उत्पादन, न रोजगार का कोई और जरिया, बस भटकाव, मजबूरन रोजी रोटी के लिए वहाँ से मीलों दूर शहरों में जाकर रोजगार की तलाश के लिए अपने समाज, परिवार से दूर रहने की तड़प यहाँ के समाज में एक सामान्य प्रक्रिया होती जा रही है। इसलिए पंकज बिष्ट उम्मेदसिंह के माध्यम से पहाड़ के लोगों का दुख व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि “बज्जर पड़े इस पहाड़ी खेती को। कितने करतब करो और कितने ही तरह के बीज बोओ, पर ढाक के वही तीन पात! शायद ही कोई ऐसा साल होता हो। जब आराम से चार-पाँच महीने का अनाज निकल पाता हो। हर साल परदेस जाओ, बाल बच्चों से दूर, लोगों की रोटी बनाओ, बर्तन-भांडे मांजो, कपड़े धोओ और फिर भी बच्चे भूखे-नंगे! धिक्कार है ऐसी ज़िंदगी को। इस साली ‘जिम्मेदारी’ से तो गू खाना अच्छा।”  आखिर रात-दिन की कठिन मेहनत के बावजूद उन्हें क्या मिल पाता है। इतना असहाय सा उनका जीवन पीढ़ी दर पीढ़ी तकलीफ़ें भुगतने को मजबूर होता जा रहा है। शिबिया के मरने के बाद अब उसका भाई रघुवा अपने नन्हे हाथों से हल की मूठ पड़ेगा फिर वह भी स्कूल जाने की बजाय खेतों में अपना बचपन भूला जिम्मेदारी उठाने में लग जाएगा। फिर शायद उसका दूसरा भाई नहीं तो कुपोषित सा उसका बालक इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाता रहेगा क्योंकि समाज में गरीबी एक अभिशाप हैं इसे दूर करना चाहिए यह तो सुनने को मिल जाता है परंतु इसके उचित समाधान नदारद से दिखाई पड़ते हैं। कहानी के अंत में भागुली का अपने भाई से अपने दूसरे बेटे को हल चलाना सिखाने के लिए कहना यह दर्शाता है कि पेट की भूख अक्सर ममतामयी माँ को पत्थर दिल बनाने में अग्रसर होती है। “ददा, इस रघुवा को सिखा देना थोड़ा-थोड़ा। अब से सीखने लगेगा तो एक-आध साल बाद ठीक से बैल चलाने आ जाएंगे।”  यह उनकी मजबूरी है कि अपने बच्चों को अच्छा खान-पान व शिक्षा देने की बजाय कठोर जमीन में पसीना बहाने को झोंकना ही पड़ता है। इस संदर्भ में ‘पंकज बिष्ट की कहानियाँ: बहुरेखीय उत्कर्ष का फलक’ में अरविंद कुमार लिखते हैं कि “फिर भी हल चलता रहा था, क्योंकि हल चलाना उनकी मजबूरी थी, जब शिबिया था तो शिबिया, जब नहीं था तो रघुवा। एक कंधे से दूसरे कंधे तक हल का स्थानान्तरित होना वस्तुत: उनका जीवन चक्र था जिससे उबरने की कल्पना तक वे नहीं कर सकते थे।”  कहानी में पहाड़ के बच्चों के जीवन में पहाड़ से टकराने का हौसला तो है परंतु पेट की आग को शांत करना बेहद जटिल दिखाई देता है।

ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ पर्वतीय क्षेत्र के बच्चों के सर पर ज़िम्मेदारी जल्दी आ जाती है। महानगरों में भी यह परिस्थिति मौजूद है बल्कि कई बार तो ज्यादा भयावह दिखाई देती है। पंकज बिष्ट की कहानी ‘टुंड्रा प्रदेश’ में बचपन धूमिल होता दिखाई देता है और असमय ही ज़िम्मेदारी का बोझ बचपने को दबा देता है। एक चौदह - पंद्रह साल का बच्चा कड़कड़ाती हुई ठंड में कुछ फटे-चिथड़े कपड़े पहनकर इसलिए बैठा है ताकि उसके सुबह से कमाए नौ रुपए में ज्यादा नहीं तो एक रुपए की तो बढ़ोतरी हो ही जाए। क्योंकि पूरा हिसाब लगाने के बाद इतने कम पैसों से तो खर्चा नहीं चल पाएगा। इसलिए वह अपने छोटे भाई के घर चलने की जिद्द की तरफ ध्यान नहीं देता है और कड़कड़ाती ठंड में ग्राहक के आने का इंतजार करता है। छोटे को गुस्सा भी है परंतु वह भी अपने भाई की तरह समझदार बनने की जिद्द में लगा हुआ है। अपने भाई के लिए इधर-उधर घूमकर लकड़ी, घास-फूस भी लाता है ताकि आग जलाकर बड़ा भाई ठंड से कुछ समय और मुठभेड़ करने में सफल हो सके। भाई का दिशानिर्देश उसे मन ही मन विरोधी भी लगता है कभी सोचता है कि गाड़ी के इस पहिये को घुमाने के बहाने माँ ने घर से निकलने दिया वरना वह इतनी ठंड में नहीं आता। छोटे का ‘अम्मा ने कहा था जल्दी आ जाना’ और बड़े भाई का ‘बस चलते हैं… तू तब तक बस एक और चक्कर मार आ, फिर चलेंगे’  कुछ इस तरह की पुनरावृत्ति सीमित अंतराल के बाद होती रहती है। लेकिन ग्राहक का आगमन नहीं होता है। बस राह देखना और किसी की तनिक सी आहट से ग्राहक के आने का अंदेशा लगा रहता है। ठंड से बचने का कोई उपाय नहीं मिलता देख बड़े ने छोटे से उसका रबड़ का पहिया जलाकर ठंड दूर करनी चाही। “तू अपना पहिया दे दे, मैं तेरे लिए दूसरा ला दूंगा।”  किसी दूसरे बच्चे के लिए यह सड़क में पड़ा हुआ पहिया भले ही अनावश्यक हो लेकिन छोटे के लिए तो यह उसका प्रिय खिलौना बन गया था जिसको चलाने के जोश में वह ठंड को भी पछाड़ रहा था लेकिन घर की परिस्थिति का ख्याल उसे विरोध नहीं करने देता है। “चक्का अचानक हल्की धप की आवाज करता हुआ, स्वयं ही उसके हाथों से छूट, रथ के टूटे पहिए की तरह जमीन पर जा गिरा। वह पूरे वेग से चीत्कार करना चाहता था। वह झपटकर अपने पहिये को अपनी सुरक्षा के घेरे में लेना चाहता था। पर वह पंगु हो गया था। अशक्त और चेतनाविहीन! स्तब्ध!”  पंकज बिष्ट यह दिखाने में सफल रहे हैं कि गरीबी, भूख असमय ही बच्चों को बड़ा बना देती है। पहिए को जलते देख बड़े भाई का विचलित होकर अधजले पहिए को बाहर निकालकर उसे सिलकर दुबारा चला देने लायक बना देने की बात हो या ठेले में बैठाकर अपने छोटे दुखी भाई को अपनी शारीरिक शक्ति से बाहर उसे घसीटते हुए घर ले जाने पर निकलता हुआ दम हो फिर छोटा भी अपनी जिद छोड़ अपने भाई के साथ परिस्थितियों को समझने की भरपूर कोशिश करता हुआ ठेले से उतर भाई के साथ अपने जीवन की तमाम विडंबनाओं को ढकेलता हुआ घर की तरफ निकल पड़ता है इन सभी स्थितियों का गहनता से समावेश दिखाई देता है। इनके जीवन के आपसी स्नेह, जिजीविषा के सामने गरीबी व ठिठुरन बाधा बनकर भी जीने की राह को रोकने में असफल दिखाई देती है।

पंकज बिष्ट की कहानियों में बचपन विविध रूपों में दिखाई देता है कहीं गरीबी से जूझता बचपन तो कहीं मौज-मस्ती, बेपरवाह सा जीवन जीने वाला बचपन दिखाई देता है। ‘मोहनराम (दास)’ कहानी का पात्र मोहन सुदूर पहाड़ी क्षेत्र से नौकरी की तलाश में निकला हुआ अपने परिवार की गरीबी को दूर करने के लिए नौकर बनने को मजबूर है तो लगभग उसकी उम्र के ही टीटू और टिंकी लापरवाह से मस्ती में अपना बचपन जी रहे हैं। मोहन खुद स्कूल नहीं जा सकता लेकिन टीटू और टिंकी को तैयार करना, लाना, पहुँचाना इन सब कामों को बड़ों से भी ज्यादा ज़िम्मेदारी से करता है। टीटू और टिंकी अपने दोस्तों के साथ मिलकर अकसर उसके रहन-सहन का मजाक बनाते रहते और मोहन मन मसोसकर कर चुप रह जाता लेकिन एक दिन जूतों की कीमत देख सुन वह भौचक्का रह गया। बालमन मोहन अपने भीतर के अन्तद्वंद को समझ नहीं पाता कि उसकी चार महीने की तनख्वाह बराबर एक जोड़ी जूता पहनकर क्या वाकई उड़ा जा सकता है। “क्या?... एक हजार रुपए का जूता। किसी और को बेवकूफ बनाना।”  मोहन मानने को तैयार नहीं होता है। टीटू रौब में उसकी गरीबी का मजाक बनाते हुए जवाब देता है कि “अबे एक हजार नहीं,एक हजार पिचानवे। जूते तो बेटा एक हजार नहीं, चार हजार तक के होते हैं, क्या समझे पहाड़िए।”  पूरी रात मोहन इन जूतों की कीमत व इसके अजीबोगरीब फ़ायदों को गुनता रहा। दरअसल जूते की कीमत मोहन के लिए एक रहस्यमयी दिवास्वप्न के साथ जूझती रहती है। उसे अपना घर, गाँव पूरा परिवार इस स्वप्न में विचित्र परिस्थितियों से जूझते दिखाई देता है। पंकज बिष्ट अपनी इस कहानी में जादुई यथार्थवाद की टेकनीक का बखूबी इस्तेमाल करते हैं। यह कहानी है उच्च व निम्न वर्ग के बीच की न भरने वाली उस खाई की जिसमें से निकलने के लिए निम्न वर्ग अपनी पूरी जदोजहद के बावजूद फंसा ही रह जाता है। इसी संदर्भ में चंचल चौहान कहती हैं कि “मोहन की त्रासदी अनेक बच्चों की त्रासदी बन जाती है जो अभावों में पलते और विलीन हो जाते हैं, वे रईस परिवारों के लिए खिलौना भर होते हैं, विलियम ब्लेक के चिमनी स्वीपर बच्चों की तरह शोषित उत्पीड़ित।”  इस कहानी में दो भिन्न सामाजिक छवि दिखाई देती हैं जहाँ कुछ लोगों के पास अथाह संपत्ति है तो वही कुछ ऐसे भी हैं जिनकी जिंदगी दो वक्त की रोजी रोटी की भरपाई को पूरा करने में अपनों से कोसों दूर रहकर भी मूलभूत सुख सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। कुछ ऐसी ही विकट समस्या से इनकी कहानी ‘बच्चे गवाह नहीं हो सकते’ भी जूझती रहती है। जहाँ बच्चों की इच्छाओं को पूरा करने के पीछे एक पिता अपनी गंभीर बीमारी को नजरअंदाज करते हुए, अपनी सामाजिक स्थिति को सुधारने की जिद्द में लगा हुआ है। अपने खानपान, दवाइयों से ज्यादा महत्वपूर्ण एक पिता को घर में अपने बच्चों के लिए किस्तों में पैसे देकर टीवी लाना ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है क्योंकि अकसर बच्चे दूसरों के घरों से मुँह लटकाए, रोते हुए आते हैं। लेकिन फिर भी विज्ञापन में बिस्कुट को देखकर रघुवा के मुँह में पानी आना, साइकिल देखते हुए उठ खड़ा होना परंतु पिता की असमर्थता को समझते हुए खामोश रहना आदि कई छोटी-छोटी इच्छाओं का पुलिंदा उसके सामने ही धराशयी हो गया परंतु वह चाहते हुए भी उसे रोक पाने में असफल रहा। बाजार की गिरफ्त ने उन्हें जकड़ लिया जिससे छूटना लगभग असंभव सा दिखाई देता है। यही इस कहानी का अंजाम भी होता है अपने पिता को वह बचाना चाहता है परंतु उसके सामने फिल्म के शॉट की तरह सब घूमता रहता है। मनुष्य अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए अपने आप को ही धोखे में रखना चाहता है यह बदलते हुए समाज की वास्तविक छवि बनती जा रही है। बदलते परिवेश के साथ ही मनुष्य अपने आपसी संबंधो को भुलाते हुए एक दूसरे से आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा में इतनी तेजी से भागता जा रहा है कि उसके पास ठहरने, सोचने का वक्त कम होता जा रहा है। पंकज बिष्ट की कहानियों में बचपन के विविध स्वरूप जिस तरह से आए हैं वह हमारे समाज की गंभीर त्रासदी है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही है कि अत्यधिक संख्या में देश का भविष्य पेट की लड़ाई से मुठभेड़ करने को मजबूर है। चाहे वह ‘हल’ कहानी के शिबिया, रघुवा दोनों भाई हो, ‘टुंड्रा प्रदेश’ कहानी के दोनों भाई हो, अपनी हमउम्र बच्चों का दोस्त बनने की बजाय उनका नौकर ‘मोहन’। अपनी इच्छाओं को दमित कर अपने परिवार के संरक्षक इन बच्चों की संख्या कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। कई बच्चों का बचपन तंगहाली के जाल से निकलने को छटपटाता रहता है लेकिन इससे निकलने की बजाय उलझता हुआ बचपन कम पैसों में अपने शक्ति से ज्यादा काम करने को मजबूर है। पंकज बिष्ट की कहानियों में बाल जीवन का यह यथार्थ हमें सोचने को मजबूर करता है कि क्या हम वाकई अपने समाज को प्रगतिशील कहने के हकदार हैं? क्या वे अपने नन्हे कंधों पर बोझ उठाने के स्थान पर एक लंबी उड़ान भरने के हकदार नहीं हैं? आदि ऐसे कई सवालों से जूझती समस्याओं को अपनी कहानियों में लाकर बाल जीवन के संघर्ष को नजरअंदाज करने की बजाय इसकी गंभीरता को समझने को झकझोरती हैं।

संदर्भ ग्रंथ सूची 
1. बिष्ट, पंकज. ‘हल’. पंकज बिष्ट संकलित कहानियाँ. दिल्ली: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत. पृ. सं. 42     
2. वही, पृ. सं.  43
3. वही, पृ. सं. 43
4. वही, पृ. सं. 47
5. कुमार, अरविन्द. कथा विमर्श के समकालीन संदर्भ. दिल्ली: प्रकाशन संस्थान. पृ. सं. 131   
6. बिष्ट, पंकज. ‘टुंड्रा प्रदेश’. पंकज बिष्ट संकलित कहानियाँ. दिल्ली: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत. पृ. सं. 130 
7. वही, पृ.सं. 136
8. वही, पृ. सं. 137 
9. बिष्ट, पंकज. ‘मोहनराम (दास)’. पंकज बिष्ट संकलित कहानियाँ. दिल्ली: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत. पृ. सं. 176 
10. वही, पृ. सं. 176 
11. वही, पृ. सं. 14

1 comment :

  1. पंकज बिष्ट पर बढ़िया लिखा है अपने।कोई विशेषांक इन पर आया हो तो बताएं

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