कहानी: जिन्न बाबा

जीतेन्द्र भटनागर

- जीतेन्द्र भटनागर

लखनऊ, नवाबों का शहर - अपनी तहज़ीब के लिए मशहूर। गंजिंग के लिए भी। गंजिंग यानी शाम के वक्त हज़रतगंज के एक कोने से दूसरे कोने तक की सैर। यूँ गंज तो लखनऊ में भरी पड़ी हैं लेकिन हज़रतगंज की शान निराली है।
कितने लोग जानते होंगे कि हज़रतगंज की नींव अंग्रेज़ों ने नहीं बल्कि नवाबों ने रखी थी और उसका नाम नवाब अमजद अली शाह, जो अपने तखल्लुस 'हज़रत' से मशहूर थे, के नाम पर हज़रतगंज पड़ गया? वो तो 1857 के बाद जब अवध पर अंग्रेज़ी हुकूमत कायम हो गई, अंग्रेज़ों ने नवाबी इमारतें गिरा कर अपनी मौज-मस्ती के लिए हज़रतगंज को अंग्रेज़ी शक्ल दे दी और हिंदुस्तानियों के आने पर रोक लगा दी। सिर्फ़ अंग्रेज़ ही हज़रतगंज का मज़ा लूट सकते थे। नवाबी लखनऊ की रूह चौक और उसके आस-पास के इलाक़ों में क़ैद हो के रह गई। अब तो खैर, सब के लिए खुली हैं सभी जगह। इसी हज़रतगंज के करीब, अशोक रोड पर (अंग्रेज़ी नाम तो अब भूल चुके हैं), नरही बाज़ार के मुहाने के सामने था इंडियन कॉफी हाउस जो अंग्रेज़ों के जाने के बाद भी कई सालों तक था। पता नहीं अब है या नहीं। इंडियन कॉफी हाउस की, हिन्दुस्तान के किसी भी शहर में हो, एक अलग पहचान है। एक बड़े से हॉल में साधारण सी लकड़ी की मेज़ें और कुर्सियाँ। हर मेज़ पर, अलग-अलग वक्त अलग-अलग किस्म के लोग बैठे मिलते हैं। सबका अपना वक्त और मेज़ें मुक़र्रर होती हैं। दोपहर तक शहर के शायर और लेखक बैठे होते हैं, उसके बाद पड़ोस के इनकम टैक्स औफिस के क्लर्क और वकील, शाम को कॉलेजों और यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स। दीवार पर ‘The loudest whisper is better than a low shout’ (एक ऊँची फुसफुसाहट एक धीरे से चिल्लाने से बेहतर है) लिखा होने के बावजूद हॉल की हर मेज़ से बहस का शोर सुनाई पड़ता है।

कामता प्रसाद न तो शायर थे न लेखक, न क्लर्क, न वकील, न ही स्टूडेंट। लेकिन अपनी यूनिवर्सिटी के दिनों की आदत छोड़ नहीं पाए थे। उनके ज़्यादातर साथी अल्लाह को प्यारे हो चुके थे और जो बचे थे वे अपने बच्चों-पोतों के साथ दूरदराज़ चले गये थे। बिल्कुल अकेले रह जाने पर भी कामता प्रसाद हर रोज़ वक्त पर कॉफी हाउस आते, कोने वाली छोटी सी मेज़ पर बैठे कॉफी पीते रहते। उन्हें देखते ही वेटर कॉफी का प्याला उनकी मेज़ पर रख देते थे। कामता प्रसाद मेज़-कुर्सी की तरह कॉफी हाउस का एक अभिन्न अंग बन चुके थे।

आज भी कामता प्रसाद कोने की मेज़ पर बैठे कॉफी की चुस्कियाँ ले रहे थे कि एक आवाज़ सुनाई पड़ी, "माफ़ कीजिएगा अंकल, क्या मैं आपके साथ बैठ सकता हूँ?"

सिर उठा कर देखा। सामने एक नौजवान खड़ा था। पहली नज़र में ही पता चल गया कि स्टूडेंट है। पूरे हॉल में सिर्फ़ उनके पास एक खाली कुर्सी थी जिसके लिए दरख़्वास्त पेश की गई थी। सिर हिला कर कामता प्रसाद जी ने बैठने की इजाज़त दी। नौजवान खाली कुर्सी पर बैठ गया। मुँह से फिस-फिस की आवाज़ निकाल कर वेटर को बुलाया और मसाला डोसा व कॉफी का ऑर्डर देकर अपनी उंगलियाँ चटकाने लगा। डोसा आते ही नौजवान उस पर टूट पड़ा मानों जन्म-जन्मान्तर से भूखा हो। कामता प्रसाद जी कौतूहलपूर्वक उसे देख रहे थे। कुछ देर बाद उन्होंने पूछा, "अकेले रहते हो, बर्खुरदार?"

चौंक कर नौजवान ने उन्हें देखा, "जी।"

"पढ़ते हो?"

"जी।"

"यूनिवर्सिटी में?"

"जी।"

"नये हो लखनऊ में?"

"जी, कुछ महीनों से हूँ यहाँ पर।"

"कहाँ के रहने वाले हो?"

"जी, हापुड़ का।"

"ओह," कह कर कामता प्रसाद जी चुप हो गये। कुछ क्षण शांति रही। अब नौजवान ने चुप्पी तोड़ने की कोशिश की।

"अंकल ... ।"

"अंकल?" कामता प्रसाद बीच में ही बोल पड़े। "आपके परदादा की नहीं तो दादा की उम्र के तो हैं ही हम, बर्खुरदार।"

"सॉरी, अंकल। नहीं ... दादाजी।" नौजवान झेंपते हुए बोला। "आप..." वह चुप हो गया।

" बलिए, बर्खुरदार।" कुछ देर बाद कामता प्रसाद जी बोले। "कुछ पूछना चाहते हैं आप हमसे।"

"आप लखनऊ के ही रहने वाले हैं दादाजी?" नौजवान ने हिम्मत करके पूछ ही लिया।

"नए ज़माने के हैं आप, बर्खुरदार। आप हमें अंकल ही कह सकते हैं। हाँ, हमारी तो पैदाइश ही लखनऊ की है। जिंदगी यहीं बिताई है हमने। बाहर जाने का न कभी इत्तफ़ाक़ हुआ न इरादा। लखनऊ के बाहर हम सिर्फ़ सैर के लिए जाते थे। अब तो वह भी नहीं हो पाता। पर छोड़िए इन बातों को। अपनी सुनाइये। अपना इस्मे-शरीफ तो दीजिए।”

"जी, क्या दूँ मैं अपना?" नौजवान ने विस्मय से पूछा।

"इस्मे-शरीफ, यानि इंट्रोडक्शन।" अंकल ने हँसते हुए बोले।

"जी, अजय।" झेंपते हुए नौजवान ने उत्तर दिया।

"अच्छा अजय, कुछ महीनों से लखनऊ में हैं आप। कुछ दोस्त भी बने होंगे। उनके साथ लखनऊ की सैर भी की होगी आपने। क्या-क्या देखा आपने हमारे शहर में?"

"दोस्त तो मेरे एक-आध ही बने, अंकल। एक छोटे से शहर का मैं, लखनऊ की तहज़ीब से नावाकिफ़, दोस्त बनाने में नाकामयाब ही रहा। ज़्यादातर मेरा मज़ाक ही बनाया जाता है यहाँ।" उदास स्वर में अजय बोला। अंकल भी गंभीर हो गये। बोले, "नये ज़माने की नई फसल है ये। एक सच्चा लखनवी ऐसे बर्ताव कर ही नहीं सकता। धीरज रखो बर्खुरदार। धीरे-धीरे यही लड़के आपके दोस्त बन जाएँगे।" फिर मुस्कुराते हुए बोले, "हमारी लखनवी ज़ुबान सीखने में देर नहीं लगाई आपने। अच्छा तो बड़ा इमामबाड़ा देखा आपने?”

"जी, देखा। बहुत अच्छा लगा। इतना बड़ा हॉल बिना किसी खंबे के बना हुआ। मुझे सबसे ज़्यादा ताज्जुब तो हुआ कि इस हॉल के एक सिरे पर माचिस जलाने की मामूली आवाज़ दूसरे सिरे पर साफ-साफ सुनाई देती है। और भूल-भुलैया अपने आप में हैरान करने वाली चीज़ है। मैं तो खो ही गया था उसमें। वो तो एक गाइड मिल गया जिसने मुझे बाहर निकाला।" उत्तेजना में बोलता चला गया था अजय। अंकल मुस्कुराते हुए उसकी बात सुन रहे थे।

"शुक्र मनाईये कि आपको कोई भूत, जिन्न या आत्मा नहीं मिली।"

"इमामबाड़े में भी भूत हैं, अंकल?"

"भी? आपने क्या कहीं और भूत देखा है?"

"देखा तो नहीं पर लगा कि रेसिडेन्सी में भूत है। पर मेरा वहम होगा। भूत होते थोड़े ही हैं। इन बातों पर कौन यकीन करता है?"

"यकीन करना चाहिए, बर्खुरदार।” अंकल संजीदगी से बोले। “भूत जिन्न वग़ैरह होते हैं। हमने देखे हैं।"

"क्या वाकई, अंकल? आपने खुद अपनी आँखों से देखा है जिन्न को?" अजय आश्चर्यचकित था। "कब, कहाँ, कैसे दिखा आपको भूत?"

कुछ क्षण के लिए कामता प्रसाद जी की आँखें बंद हो गयीं। लगा वो भूत में चले गये हैं। थोड़ी देर इसी प्रकार बैठे रहने के बाद उन्होंने आँखें खोलीं और बोलना शुरू किया।

"बहुत पुरानी, आपके पैदा होने से भी बहुत पहले की बात है ये। हमारे वालेद साहब अमीनाबाद में इत्र का धंधा करते थे। बड़ा नाम था उनकी दुकान का। उनके इंतकाल के बाद उनका साझीदार पूरे धंधे पर क़ाबिज़ हो गया। उसने हमारे पुश्तैनी मकान पर भी, ये कह कर कि हमारे वालिद साहब मरहूम ने उनके पास मकान गिरवी रखा हुआ था, कब्जा कर लिया। हम बेघर हो गये। दाने-दाने को मोहताज हो गये। बड़ी दौड़-भाग की। बड़े-बड़े अफसरों की खुशामद की। पर किसी ने कोई मदद नहीं की। पैसे में बड़ी ताक़त होती है, बर्खुरदार। और पैसा हमारे पास था नहीं। सलाह मिली कि मुक़दमा कर दो। जो थोड़ी बहुत जमा पूंजी थी इकट्ठी करके एक सस्ता सा वकील किया और मुक़दमा शुरू हो गया। वकीलों और अदालतों के बारे में दुनिया जानती है। तारीखें बढ़ती रहीं। मुक़दमा ठहरा रहा। फीस देने के लिए भी पैसे नहीं बचे। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। एक दिन वालेद साहब के जानकार एक बुजुर्ग मिले। शमशाद नाम था उनका। हमारी कहानी शहर में सब जानते ही थे। शमशाद साहब भी। उन्होंने राए दी जिन्न बाबा की शरण में जाने की।

जिन्न बाबा बाराबंकी के पास एक छोटे से गाँव में रहते थे। खेतों के बीच बने एक छोटे से मकान की ऊपर की मंज़िल पर शमशाद साहब हमें ले गये। दरवाज़े पर टाट का फटा हुआ परदा पड़ा था। अंदर से कुछ आवाज़ें आ रही थीं। लगा जिन्न बाबा नमाज़ पढ़ रहे हैं। शमशाद साहब बेतकुल्लफी से टाट उठा कर अंदर चले और हमें पीछे आने का इशारा किया। हम भी दाखिल हो गये। कमरे की इकलौती खिड़की खेत में खुलती थी। पर इस वक्त बंद थी। खिड़की के सामने वाली दीवार पर, छत के नज़दीक रोशनदान था और उसमें से धूप का एक टुकड़ा झाँक कर कमरे को रोशन करने की कोशिश कर रहा था। रोशनी आने का दूसरा रास्ता सिर्फ़ दरवाज़ा था। सफाई के नाम पर कहा जा सकता है कि कमरा गंदा नहीं था।

दरवाज़े के ठीक सामने एक बोरी पर लंबी सफेद दाढ़ी वाले, सिर पर टोपी पहने जो कभी सफेद रही होगी, एक मौलाना साहब घुटनों के बल बैठे थे। मंत्र जैसी आवाज़ें उन्हीं के गले से निकल रही थीं। यही जिन्न बाबा थे। आँखें बंद थीं, शायद इबादत में। शमशाद साहब खिड़की के नीचे पड़ी बोरी पर बैठ गये और हमें जिन्न बाबा के सामने वाली बोरी पर बैठने का इशारा किया। बैठते-बैठते हमने एक बार फिर कमरे का ज़ाएचा लिया। देखा कि हमारे पीछे वाली दीवार में, अंदर आने के दरवाज़े के अलावा एक दरवाज़ा और था जो बंद था। देखते ही अंदाज़ा हो जाता था कि इस दरवाज़े के पीछे एक छोटी सी कोठरी ही हो सकती है। दरवाज़े के अलावा कोठरी में हवा या रोशनी का कोई और ज़रिया नहीं था।

जिन्न बाबा के आँखें खोलने के बाद शमशाद साहब ने उन्हें हमारे बारे में बताया, हमारी तकलीफ़ बयान की, जो बड़े ध्यान से सुनी गई। जिन्न बाबा कुछ देर हमारे सिर के ऊपर से बंद दरवाज़े की तरफ देखते रहे। फिर उनकी आँखें बंद हो गईं। उनके होठ हिलने लगे मानो वो फिर कोई मंत्र पाठ कर रहे हों। कुछ देर बाद बंद दरवाज़े के दूसरी तरफ से बड़े ज़ोर से धम-धम होने लगी। ऐसा लगा कि कोई विशालकाए प्राणी कूद रहा है। साथ ही साएँ-साएँ होने लगी। लगा आंधी चल रही है। पर टाट का परदा हिल तक नहीं रहा था। निगाहें हमारी फर्श पर टिकी थीं। कमरे में अचानक तेज़ बिजली चमकी, फिर कोहरा सा छा गया। एक अजीब सी खुशबू फैल गयी। कमरे में किसी चौथे की मौजूदगी महसूस होने लगी। हिम्मत करके ज़रा सी नज़र उठाई तो अपने ठीक सामने झक्क सफेद कपड़े में दो विशाल टाँगें दिखीं। और ऊपर देखने की हिम्मत नहीं हुई। उन टाँगों के ऊपर ज़रूर एक बहुत बड़ा जिस्म होगा। घिग्घी सी बँध गई हमारी। मारे डर के आँखें खुद-ब-खुद बंद हो गईं। तभी लगा किसी ने सिर पर हाथ फेरा। एक क्षण के लिए हाथ सिर पर ठहरा और चला गया। फिर बिजली चमकी। कोहरा गायब हो गया। धम-धम फिर हुई और एक तेज़ हवा के साथ, जो भी कोई कमरे में दाखिल हुआ था चला गया। न जाने कहाँ। कोठरी का दरवाज़ा जैसे पहले बंद था, वैसे ही बंद रहा। शमशाद साहब की आवाज़ सुनकर नज़र उठाई। उन्होंने बाहर निकलने का इशारा किया। कुछ देर बाद वो भी बाहर आ गये और हम दोनों नीचे उतर गये।
एक अजीब सा सकून महसूस होने लगा था। ऐसा लगा कि इतने ज़माने से हम बेकार ही परेशान हो रहे थे। फ़िक्र की कोई बात ही नहीं है।

तभी शमशाद साहब बोले, "जाओ मियाँ, तुम्हारा काम हो गया।"

"हैं!" हम हैरानी से बोले। "क्या हो गया, शमशाद साहब? ये सब क्या था? हमें तो कुछ समझ आया नहीं।"
उन्होंने हमें ऐसी निगाहों से देखा जैसे हम क़तई नासमझ हों। बोले, "वाह, बर्खुरदार, जिन्न ने आपके सिर पर हाथ रखा और आपको कुछ पता ही नहीं?"

"वो जिन्न था?"

"नहीं", शमशाद साहब खफा हो गये। "वो जिन्न था नहीं। वो जिन्न साहब थे। ज़रा इज़्ज़त से पेश आईए। उन्होंने आपकी अर्ज़ी मंजूर कर ली है। आपके सारे काम बन जाएँगे।"

"आपको कैसे पता?"

" उन्होंने आपके सिर पर हाथ रखा या नहीं?"

"जी, रखा तो था।"

"तो फिर? जिन्न क्या किसी के सिर पर ऐसे ही हाथ रख देते हैं? तभी रखते हैं जब वो उसकी अर्जी कबूल कर लें। आपके सिर पर हाथ रखने से पहले उन्होंने मेरी तरफ देख कर हाथ उठा कर दुआ दी थी। आपकी दरख्वास्त हमने जो लगाई थी। मियाँ, काम आपका बन गया है, इसमें कोई शुबहा नहीं है। शुबहा है तो इस बात का कि आप अपने पुश्तैनी दस्तरख्वान पर हमें शिरकत का मौका देंगे या नहीं।"

"क्या कह रहे हैं, साहब आप? ऐसा हो सकता है कभी!" अपने मन का शक़ छुपाते हुए हमने जवाब दिया।

"फिर क्या हुआ?" अजय ने बेसब्री से पूछा।

"होना क्या था?" कामता प्रसाद जी शैतानी से हँसे। "एक साल के अंदर ही हमें शमशाद साहब की मेहमाननवाज़ी करनी पड़ी।"

2 comments :

  1. मंजुल भटनागरMarch 1, 2020 at 9:40 AM

    बहुत सुंदर। आंखों के सामने तस्वीर बनती रही। लगा मेरे सामने ही सब कुछ घटित हो रहा है। बार बार पढ़ने का दिल कर रहा है।

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  2. Bahut hi sunder rachna hai ,Phupha ji .Aap isi tarah likhte rahe .Aapko dher saari shubhkaamnaaye💐💐💐💐💐💐💐

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