काव्य: गिरिजा कुलश्रेष्ठ

गिरिजा कुलश्रेष्ठ

लिखो पत्र फिर से

उन दिनों जब
पत्र हुआ करते थे
महंगाई के दौर में
जैसे सब्जी और राशन
या पहली तारीख को
मिला हुआ वेतन।

पत्र जो हुआ करते थे
तपती धरा पर बादल और बौछार
जैसे अरसे बाद
पूरा हो किसी का इन्तज़ार

पत्रों का मिलना
मिल जाना था
अँधेरे में टटोलते हुए
एक दियासलाई
या कि,
कड़कती सर्दी में
नरम-गरम
कथरी और रजाई

उदासी भरे सन्नाटे में
पोस्टमैन –की गूँज
गूँजती थी
जैसे कोई मीठा सा नगमा
पत्र जो होते थे
कमजोर नजर को
सही नम्बर का चश्मा।

मेल और मैसेज छोड़ो
और लिखो फिर से
तुम वैसे ही पत्र,
जैसे भेजा करते थे
भाव-विभोर होकर
हाथ से लिखकर
हाथों से लिखे टेढ़े-मेढ़े
गोल घुमावदार अक्षर
होते थे एक पूरा महाकाव्य...
लिखो फिर से ऐसे ही पत्र
खूब लम्बे
जिन्हें पढ़ती रहूँ हफ्तों, महीनों, सालों
बहुत जरूरत है उनकी
मुझे, हम सबको
आज कोलाहल भरी खामोशी में
***

लिखो पत्र

पत्र जो हुआ करते थे
सब्जी और राशन
मँहगाई के इस दौर में
पहली तारीख को
मिला हुआ वेतन

पत्र जो हुआ करते थे
जले हुए पर पानी के छींटे
जैसे अरसे बाद किसी का इन्तज़ार बीते

अँधेरे में टटोलते हुए
मिली दियासलाई
पत्र जो हुआ करते थे
कड़कती सर्दी में
कथरी और रजाई

उदासी भरे सन्नाटे में
जैसे कोई मीठा सा नगमा
पत्र जो होते थे
कमजोर नजर को
सही नम्बर का चश्मा

ऐसे पत्र लिखो अब फिर से
बहुत जरूरत है मुझे उनकी
आज कोलाहल भरी खामोशी में
***

निःशब्द

कैसी अजीब बात है कि अब
शब्द खामोश हैं
और ख़ामोशी बोल रही है।
शब्दों ने बेवजह ही थककर
तलाश लिया है कोई अँधेरा,
गुमनाम सा कोना ।
इसलिए अब शोर है सन्नाटे का।
जब जागती हैं खामोशियाँ
तो जाग उठते हैं खंडहर भी।
उड़ते हैं चमगादड़
फड़फड़ाते हैं पुराने दस्तावेज
अनकहे से दर्द।
दहशत, सन्देह, निराशा
ठोकर खाती हैं अनुभूतियाँ।
अँधेरे में पड़ी शिलाओं से
बेजान  हो जाती हैं व्यक्त हुए बिना ही
शब्दों! तुम यूँ खामोश न रहो
करो कोई बात।
कटेगा यह सन्नाटा और अंधेरा
तुम्हारी ही रोशनी से।
***

ग्रीष्म ऋतु के दोहे

सूरज की दादागिरी, सहमे नदिया ताल।
हफ्ता दे देकर हुई हरियाली कंगाल।

तीखे तेवर धूप के हवा दिखाए ताव।
मौसम के आतंक से, कैसे करें बचाव।

चढी धूप तपने लगा भड़भूजे का भाड़।
चित्त चना सा भुन रहा तन हो रहा तिहाड़।

दिन भर चूल्हे पर तपे धरती तवा समान।
रोटी सेंके दुपहरी, 'जेठ' हुआ मेहमान।

चिड़िया बैठी तार पर, मन में लिये मलाल।
कंकरीट के शहर में दिखे न कोई डाल।

अनशन कर मानो खडा पत्र-विहीन बबूल।
बादल बरसेंगे तभी लेगा पत्ते-फूल।

धूप प्रतीक्षा सी चुभे, झुलसा मन का गाँव।
पेड़ कटे उम्मीद के सपना हो गई छाँव।

उड़े बगूले धल बन धरती के अहसास।
उत्तर जाने मेघमय कब देगा आकाश।

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