'अंधेरे में' की मूल संवेदना

मनीष कुमार

शोधार्थी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नयी दिल्ली; +91 956 088 3358

'अंधेरे में' की मूल संवेदना अंधेरे में तो नहीं मगर विवादास्पद रही है। विवाद हुआ, अच्छा रहा। मुक्तिबोध के जीवनकाल में उनकी अन्य रचनाओं की भांति इस कृति का भी कोई नोटिस नहीं लिया गया था। उनकी मृत्यु के बाद उक्त कविता विचार-विमर्श के केंद्र में आकर यदि अब तक अन्यतम बनी हुई है तो इस संदर्भ में उन विवादों को आभारी हुआ जा सकता है। 'अंधेरे में' एक जटिल कवि की जटिल रचना है। पचास साल से अधिक समय बीत जाने पर भी यह कविता अनेक संदर्भों में नयी कविता की महत्त्वपूर्ण कुंजी बनी हुई है। प्रकारांतर से 'अंधेरे में' की मूल संवेदना पर विमर्श करना नयी कविता की मूल संवेदना पर विचार करने जैसा कहा जा सकता है। कुछ प्रमुख आलोचकों के महत्त्वपूर्ण मत संक्षेप में देखें तो-
इंद्रनाथ मदान ने 'अंधेरे में' को 'एक अधूरी कविता' कहा है। बात कुछ ठीक है पर बहुत सार्थक नहीं। यह तो मुक्तिबोध के सपनों के साथ-साथ उनकी रचना-प्रक्रिया का भी सच है। पूर्णता को व्याख्यायित करने के क्रम में इंद्रनाथ मदान मुक्तिबोध की अज्ञेय से तुलना करते हैं। तुलना का आधार ऐसा होने से ही शायद इंद्रनाथ मदान तथाकथित अधूरेपन की वज़ह और इस अधूरेपन की स्वायत्त पूर्णता को नहीं देख पाते। मुक्तिबोध जटिल यथार्थ को निरूपित करने के क्रम में एक फैंटेसी के भीतर दूसरी फैंटेसी और उसके भी भीतर क्रमानुसार अन्य फैंटेसीज का प्रयोग करते थे, जिससे उनकी कविता 'अपेक्षित पूर्णता' से दूर रहती है। यह बात रही शिल्प के संदर्भ में। वस्तु के परिप्रेक्ष्य में मुक्तिबोध की अभिव्यक्ति यदि अधूरी जान पड़ रही है तो इसका कारण व्यापक समाज के ज़ारी शोषण में देखना चाहिए। मुक्तिबोध की भाषा अनायास ही भविष्यकाल में नहीं बोलती- 'अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे...'
विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार, "रहस्यमय व्यक्ति को अवचेतन के अंधेरे से निकालकर जगत की गलियों में, सड़कों पर लोगों की भीड़ में ले आना ही इस कविता की सिद्धि है। यह सिद्धि केवल मानसिक जगत में घटती है और यह संपूर्ण कविता एक लंबी स्वप्न कथा है।" उन्होंने इस कविता को 'संघर्षपुरुष की स्वप्नकथा' की संज्ञा से अभिहित किया है। विश्वनाथ त्रिपाठी के उक्त कथन के आलोक में इस कविता में चित्रित कथित स्वप्न स्वाभाविकता का भ्रम खड़ा करता है। यह स्वाभाविकता इतिहास-प्रेरित अधिक है, भविष्योन्मुख कम। पाश के शब्दों में, "सपने हर किसी को नहीं आते..."। 'अंधेरे में' कविता को समझने का एक महत्वपूर्ण पहलू यह होना चाहिए कि इस कविता को मुक्तिबोध के समय के भविष्यकाल को ध्यान में रखकर इसकी तहों में प्रवेश किया जाए; सिर्फ़ नेहरू-युगोपरांत साठोत्तरी भारत में व्याप्त विभीषिकाओं हेतु इतिहास को उत्तरापेक्षी बनाने से ही कविता का मर्म पकड़ना बहुत सफल होगा, कहना मुश्किल है। संभवतः मुक्तिबोध भी कविता में इस भविष्य से अधिक जूझ रहे थे, भले ही वे बेशक इतिहास की ज़मीन को बहुत मजबूती से पकड़े हुए थे।
मार्क्सवाद को आक्सीजन जितना ज़रूरी मानने वाले कवि शमशेर बहादुर सिंह ने 'अंधेरे में' को 'दहकता इस्पाती दस्तावेज़' कहा है। शमशेर ने 'अंधेरे में' को समकालीन संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण कविता माना था। इस्पात पर लिखा वैसे ही अमिट होता है, तिस पर उस दस्तावेज़ का दहकना उसके अक्षरों को सक्रिय सार्वकालिकता प्रदान करता है। यानी शमशेर हर काल में क्रांति की अपरिहार्यता का संकेत करना चाहते हैं। ऐसा संकेत संभवतः 'बात बोलेगी / हम नहीं' लिखने वाला कवि ही कर सकता है।
निर्मला जैन ने 'अंधेरे मेंं' को 'अंतस्तल का पूरा विप्लव' कहा है। कविता के अवलोकन के क्रम में उन्होंने 'फैंटसी' पर पर्याप्त विचार किया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस कविता के विशिष्ट शिल्प को समझे बग़ैर इस कविता को समग्रता में समझना असंभव-सा है, बावजूद इसके सिर्फ़ शिल्प की मदद और साधारण वस्तुपरक अध्ययन से जरूरी नहीं कि यह प्रक्रम कविता को समझने की सही दिशा में ले जाए।
रामविलास शर्मा और नामवर सिंह ने इस कविता पर काफ़ी बहस की। उनके मतों के उपरांत इस कविता का मर्म अधिक उजागर होने की दिशा में पर्याप्त अग्रसर हुआ। हिंदी आलोचना का विकास जिस तरह हुआ है, उसका एक मील का पत्थर मुक्तिबोध के काव्य के आलोचनात्मक अध्ययन में भी सामने आया। अपने समकालीन साहित्य की सटीक व्याख्या करना हिंदी ही नहीं बल्कि किसी भी भाषा-साहित्य के समक्ष एक चुनौती है। छायावाद को आचार्य शुक्ल नहीं परख पाए तो रामविलास शर्मा-नंददुलारे वाजपेयी ने इस स्पेस को भरा; नयी कविता-मुक्तिबोध को रामविलास शर्मा आत्मसात् नहीं कर पाए तो नामवर सिंह ने इसकी पूर्ति की।
रामविलास शर्मा 'अंधेरे में' की व्याख्या करते हुए मुक्तिबोध की मानसिक बुनावट पर आधारित उनकी विशिष्ट अभिव्यक्ति-शैली को मुक्तिबोध के व्यक्तित्व से एकमेव मानते हैं। संभवतः कविता में आए कुछ दृश्यों के आधार पर रामविलास शर्मा मुक्तिबोध को सिजोफ्रेनिया से पीड़ित व्यक्ति बता देते हैं। सिजोफ्रेनिया यानी वह मनुष्य जिसे लग सकता है कि कुछ लोग उसका पीछा कर रहे हैं, यही नहीं, उसे कई बार मार डाला गया है। रामविलास शर्मा ने 'अंधेरे में' की कथात्मकता के संदर्भ में इसके नायक पर काफ़ी विचार किया है। अन्य आलोचकों ने भी इस काव्य के विभिन्न प्रतिनिधि पात्रों पर विचार किया है किन्तु, 'रहस्यमत व्यक्ति' का मुक्तिबोध से कितना संबंध है; यह इस कविता के सबसे महत्त्वपूर्ण विवादों में रहा है। इलियट के 'रिलेटिव डिस्टेंस' को आधार बनाया जाए तो क्या यह मुक्तिबोध की प्रतिबद्धता के साथ पूर्ण न्याय कर पाएगा? ज़रूरी नहीं कि किसी कविता के हर संदर्भ में 'रिलेटिव डिस्टेंस' की थ्योरी ही कविता की मुकम्मल तनक़ीद कर सके। रामविलास शर्मा ने इस बात के लिए मुक्तिबोध को ज़रूर सराहा है, "मुक्तिबोध को इस बात का श्रेय है कि हिंदी के तमाम बुद्धिजीवियों में जिस नये अवसरवाद का विकास हुआ, उसे उन्होंने पहचाना। उन्होंने साम्राज्यवाद से उसके संबंध का उल्लेख एक से अधिक बार किया और उसकी प्रगतिवाद-विरोधी स्थापनाओं का खंडन किया।"
नामवर सिंह ने 'अंधेरे में' को 'अस्मिता की खोज' कहा। यद्यपि इस तरह की खोज से उनका आशय किसी प्रकार की आध्यात्मिकता या रहस्यवाद नहीं था, फिर भी यह पद विवाद का कारण ज़रूर बना जो कि इसकी पर्याप्त अस्पष्टता के कारण स्वाभाविक भी था। 'नयी कविता के प्रतिमान' के केंद्र में मुक्तिबोध के होने से भी समकालीन काव्य परिदृश्य में भी पर्याप्त हलचल हुई थी। वैसे, रूपवाद पर रूपवादी तरीक़े से प्रहार ने भी 'नयी कविता के प्रतिमान' को चर्चा का विषय बनाया था। संभव है कि 'अंधेरे में' के संदर्भ में 'अस्मिता की खोज' को भी किसी 'प्रतिमानी' चश्मे से देखा गया हो। बाद में नामवर सिंह ने 'अंधेरे में : पुनश्च' के अंतर्गत इस 'अस्मिता की खोज' के संदर्भ में काफ़ी कुछ स्पष्ट भी किया था। नामवर सिंह के अनुसार, "मार्क्स ने जिसे 'लौस आफ सैल्फ' कहा है, वह अन्य विचारकों द्वारा प्रयुक्त 'लौस आफ आइडेंटिटी' ही है जिसे हिंदी में 'अस्मिता का लोप' कहा जा सकता है।" नामवर सिंह ने मार्क्सवादी टर्मिनोलॉजी में प्रयुक्त 'एलियनेशन' और 'लौस आफ सैल्फ' हेतु हिंदी में अनूदित 'अलगाव' और 'आत्मनिर्वासन' का जिक्र करते हुए 'अंधेरे में' की मूल समस्या को, समकालीन समय की मूल त्रासदी 'व्यक्ति के अस्मिता-संकट' से संबंधित बताया है। किंतु जहां नामवर सिंह की तरह प्रकारांतर से अस्तित्ववाद के हवाले से कुछ हद तक यही बात तो रामविलास शर्मा कर रहे थे। कविता में आए क्रांति-दृश्यों की व्याख्या भी बहुत हद तक 'अस्मिता की खोज' में समाविष्ट नहीं हो पाती।
मुक्तिबोध का निज व्यक्तित्व बाह्य परिस्थितियों से निर्मित एक संवेदनशील कवि के आत्मसंघर्ष की उपज है। इस आत्मसंघर्ष का थोड़ा-बहुत अध्ययन उनके कृतित्व निर्माण में सहायक प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद के हवाले से किया जा सकता है। 'मेरी मां ने मुझे प्रेमचंद का भक्त बनाया' के अंतर्गत मुक्तिबोध की प्रेमचंदीयता को समझा जा सकता है तो 'कामायनी : एक पुनर्विचार' के अंतर्गत उनके प्रसादत्व को। यहां यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि अपने समय में प्रेमचंद और प्रसाद साहित्य के दो धुर थे। एक की प्रगतिशीलता दूसरे के पुनरुत्थान पर पटाक्षेप करती रहती थी तो बदले में उसका पलटवार भी होता था। साहित्य में ही नहीं अपितु ज्ञान के किसी भी अनुशासन में प्राय: प्रतिभाओं की निर्मिति में प्रेरणा या प्रतियोगिता की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। मुक्तिबोध जैसी प्रतिभा के संदर्भ में भी ऐसी भूमिका का अध्ययन उन्हें बेहतर तरीक़े से समझने में हमारी मदद कर सकता है। आश्चर्यजनक नहीं है कि कई संदर्भों में मुक्तिबोध पर प्रेमचंद और प्रसाद की मिश्रित छाप मिलेगी। उदाहरण के लिए- साहित्य में यथार्थ की अभिव्यक्ति को लेकर प्रेमचंद और प्रसाद का डिबेट महत्व का रहा है। अब मुक्तिबोध के मिश्रित दृष्टिकोण को देखा जाए, "यथार्थवादी शिल्प और यथार्थवादी दृष्टिकोण में अंतर है। यह बहुत ही संभव है कि यथार्थवादी शिल्प के विपरीत, जो भाववादी शिल्प है- उस शिल्प के अंतर्गत, जीवन को समझने की दृष्टि यथार्थवादी रही हो।" यानी मुक्तिबोध प्रेमचंद के यथार्थवादी दृष्टिकोण को तो स्वीकार कर ही रहे हैं किंतु साथ ही प्रसाद से यह भी सीख रहे हैं कि इसके लिए यथार्थवादी शिल्प ही जरूरी नहीं है।
'अंधेरे में' के बारे में कुछ संक्षिप्त टिप्पणियाँ इस प्रकार हैं-
'अंधेरे में' अंधेरे से उजाले की साम्यवादी काव्य-यात्रा है। यह कविता सभ्यता-समीक्षक मुक्तिबोध के निज व्यक्तित्व (जो अपनी निजता में लगभग समूचे देश का प्रतिनिधित्व भी है) का आपरेशन है। क्रमानुसार मुक्तिबोध के व्यक्तित्व का कविता में विस्तार होता है। कविता में खंडित नायक की अवस्थिति वास्तव में आत्ममंथन से उपजी है। यह मध्यमवर्गीय द्वंद्व से संबंधित है। जिस 'ज्ञानात्मक संवेदन' और 'संवेदनात्मक ज्ञान' की बात मुक्तिबोध ने की थी उसकी एक झलक यहां भी दृष्टव्य है। मुक्तिबोध रूमानी मार्क्सवादी कवियों की भांति मध्यमवर्ग की कोरी आलोचना नहीं करते। हर बार ज़रूरी नहीं कि कोई वृहद संवेदना छोटी संवेदनाओं का अतिक्रमण करके ही अपना आकार ले। मुक्तिबोध अपने समाजवादी सपने में पारिवारिक संबंधशीलता को आड़े नहीं आने देना चाहते-
"लोकहित-पिता को घर से निकाल दिया,
जन-मन-करुणा-सी मां को हकाल दिया,
स्वार्थों के टेरियर कुत्तों को पाल लिया..."
कविता के अंत में चित्रित यह सुकोमल भावना भी इसका विस्तार है- "मानो कि उस क्षण/ अतिशय मृदु किन्हीं बांहों ने आकर/ कस लिया था मुझको/ उस स्वप्न-स्पर्श की, चुंबन-घटना की याद आ रही है,/ याद आ रही है!!"
कविता का रहस्यमय व्यक्ति तमाम दृश्यों के माध्यम से काव्य नायक को लगातार आत्मचिंतन हेतु प्रेरित करता है। वह उसे एहसास दिलाता है जीवित रहने का क्या अर्थ जबकि 'मर गया देश...'।
जब मुक्तिबोध लिखते हैं-
"वह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक न पाई गई मेरी अभिव्यक्ति है,
पूर्ण अवस्था वह
निज-संभावनाओं, निहित प्रभाओं, प्रतिभाओं की
मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव,
हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह,
आत्मा की प्रतिमा।"
इस अभिव्यक्ति को बुद्धि विलास या स्वान्त: सुखाय से संबंधित शुद्ध साहित्यिक कृति मानना भूल है। मुक्तिबोध स्वयं साहित्य पर ज़रूरत से अधिक विश्वास करने को मूर्खतापूर्ण मानते थे। ऐसे में इस अभिव्यक्ति के सामाजिक अर्थ को समझे बिना इसकी व्याख्या करना मुक्तिबोध के साथ अन्याय है। अपनी कविता 'भूल गलती' के अंतर्गत मुक्तिबोध ने अपनी इस अभिव्यक्ति को और अधिक स्पष्ट किया है-
"हमारी हार का बदला चुकाने आएगा
संकल्प-धर्मा चेतना का रक्तप्लावित सर्वर
हमारे ही हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर
प्रकट होकर विकट हो जाएगा !!"
'अंधेरे में' कविता की जनक्रांति में बहुत बड़े अस्त्र-शस्त्र नहीं हैं फिर भी इससे उनकी आकांक्षा की ऊंचाई का पता तो चलता ही है-
"मकानों के छत से
गाडर कूद पड़े धम से।
घूम उठे खंभे
भयानक वेग से चल पड़े हवा में।
दादा का सोंटा भी करता है दांव-पेंच
नाचता है हवा में
गगन में नाच रही कक्का की लाठी।"
यह कुछ पाठकों को आश्चर्य में डाल सकता है कि 'अंधेरे में' में गांधी और तिलक दोनों ही आए हैं। कविता में शांतिदूत और क्रांतिदूत दोनों के ही प्रसंग मौजूद हैं। गांधी जी द्वारा दिया गया बच्चा फूल बन जाता है तो बाद में वही फूल बंदूक में बदल जाता है। संभवतः मुक्तिबोध 'विरुद्धों के सामंजस्य' के चित्रण के माध्यम से अपने रास्ते के चयन की न्यायसंगतता भी स्पष्ट करना चाहते हैं।
मुक्तिबोध ने अवसरवादियों की आलोचना पूर्ण प्रखरता से की है। उन्हें यह बात बहुत खलती थी कि बौद्धिकता अपनी निष्क्रियता के पक्ष में सौ तर्क दे सकती है किंतु अपनी सक्रियता के पक्ष में साहस का परिचय क्यों नहीं देती! जुलूस के दृश्य में मुक्तिबोध लिखते हैं, "मेरे जाने-बूझे लगते, उनके समाचार पत्रों में छपे थे/ उनके लेख देखे थे/ यहां तक कि कविताएँ पढ़ी थीं।/ भई वाह!/ उनमें कई प्रकांड आलोचक, विचारक, जगमगाते कविगण/ मंत्री भी, उद्योगपति और विद्वान"। मुक्तिबोध ने इस कविता में अन्यत्र भी बौद्धिकों की इस चुप्पी पर रोष-क्रोध व्यक्त किया है- " सब चुप; साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्/चिंतक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं।" यह अनायास नहीं है कि अन्य कविताओं में भी चुप्पों को कठघरे में खड़ा करने का पैटर्न काफ़ी मिलता-जुलता है- (भूल ग़लती) " सब ख़ामोश/ मनसबदार, शाइर और सूफ़ी/ अल गजाली, इब्ने सिन्ना, अल बरूनी/ आलिमोफाजिल, सिपहसालार, सब सरदार/ हैं ख़ामोश!" यही वे 'क्रीतदास' हैं जो अन्याय की औचित्यपूर्णता पर अपनी प्रत्यक्ष-परोक्ष सहमति के माध्यम से यथास्थिति में परिवर्तन नहीं आने देते।
कविता में गांधी जी ने एक बात कही है जो उद्धरण योग्य है- "मिट्टी के लोंदे में किरणीले कण-कण/ गुण हैं,/ जनता के गुणों से ही संभव/ भावी का उद्भव"। मुक्तिबोध ने अनायास ही गांधी के मुख से यह बात नहीं कहलवाई है। स्वाधीनता आंदोलन के इस सबसे बड़े हीरो ने जनता को प्रशिक्षित करके ही मुल्क को आज़ादी दिलाई थी। इस काव्याँश में मुक्तिबोध जनता की शक्ति को रेखांकित करना चाहते हैं। परवर्ती भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य यह है मुक्तिबोध के सपनों वाली राजनीति की जड़ें जनता में नहीं के बराबर हैं। मुक्तिबोध स्पष्टत: मानते थे कि 'मुक्ति अकेले में नहीं होती'। राजनीति के माध्यम से सामूहिक मुक्ति के प्रयास बेहतर तरीके से संभव हैं। 'अंधेरे में' के अंतर्गत भी कवि ने एकाकी मुक्ति पर व्यंग्य किया है-
"विचित्र अनुभव!!
जितना मैं लोगों की पांतों को पारकर
बढ़ता हूँ आगे,
उतना ही पीछे मैं रहता हूँ अकेला,
पश्चात-पद हूँ।"
मुक्तिबोध 'पूंजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता' की परिवर्तनशीलता हेतु इस कदर प्रतिबद्ध हैं कि वे 'अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे' में विश्वास व्यक्त करते हैं। कुछ आलोचकों का मानना है कि कविता के अंतिम खंड में क्रांति की परिणति गैर-स्वाभाविक रूप में हुई है। इसे उन आलोचकों की क्रांति संबंधी समझ की विडंबना ही कहा जाना चाहिए। दुनिया की कौन-सी क्रांति भला आहिस्ता घटित होती है। हां, उसकी एक प्रक्रिया अवश्य होती है किन्तु, घटनावधि की भविष्यवाणी लगभग असंभव।
जहां तक बात कविता के शिल्प या रूप से संबंधित है तो जैसे मुक्तिबोध ने कामायनी को (समग्रता में) एक वृहद फैंटेसी के रूप में देखा था वैसे ही 'अंधेरे में' को भी (समग्रता में) एक फैंटेसी माना जा सकता है। कविता की विभिन्न फैंटेसीज मिलकर भी वास्तव में एक वृहद फैंटेसी का ही निर्माण करती हैं। "भागता मैं दम छोड़/ घूम गया कई मोड़।" से लेकर "कहीं आग लग गई,/ कहीं गोली चल गई!!" ये दृश्य परस्पर जुड़े ही नहीं है बल्कि क्रमशः भाव-विस्तार भी करते हैं। यानी फैंटसी अथवा भाववादी शिल्प के प्रयोग के बावजूद मुक्तिबोध ने इससे सामाजिक दाय का ही कार्य लिया है। जार्ज लुकाच ने कहा भी था, "साहित्य में रूप ही मूलतः सामाजिक होता है।" किंतु यहीं मुक्तिबोध की एक सीमा भी उभरकर सामने आती है। इतनी प्रचंडता के बावजूद मुक्तिबोध इतने ही सर्वग्राही क्यों नहीं हुए! क्रांति की ही बात हो तो हिंदी का आम पाठक मुक्तिबोध से अधिक धूमिल को पढ़ना पसंद करता है। जैसे प्रसाद के विषय में कहा जाता है कि वे विश्वविद्यालयों के कवि हैं तो क्या मुक्तिबोध को कुछ हद तक विश्वविद्यालयों तक ही महदूद देखना किसी तरह का सामान्यीकरण है? उनका शब्द-चयन उनकी संप्रेषणीयता में एक अवरोधक है। कविता की समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो ज़रूरी नहीं कि उच्च कथ्य हेतु उच्च भाषिकता एकमात्र रास्ता हो। जो भी हो, यह भी सच है कि सिर्फ़ इस दृष्टि से ही मुक्तिबोध को देखना बहुत ठीक नहीं है।
मुक्तिबोध की प्रासंगिकता हिंदी समाज के लिए कम नहीं हुई है। पर जो उन्हें नापसंद करते हैं उनकेे लिए सद्बुद्धि की दुआ ही की जा सकती है। ऐसे लोगों का वश चले तो 'अंधेरे में' ही नहीं बल्कि उनकी किसी अन्य कविता की भी मूल संवेदना को 'मूल लंपेटना' में बदल सकते हैं। हाल ही में वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार ने मुक्तिबोध की कविता 'सहर्ष स्वीकारा है' (माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम में शामिल) की ईश्वरवादी व्याख्या कराई है। पता नहीं मुक्तिबोध होते तो आज क्या करते... उनकी ये पंक्ति ज़रूर याद आ रही है जो उन्होंने 'अंधेरे में' ही लिखी थीं-
"पथरीली चेहरों की ख़ाकी ये कैसी ड्रैस..."

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