ओमप्रकाश पाण्डेय 'नमन' की कविताएँ

ओमप्रकाश पाण्डेय 'नमन'
* 1 *

ज़िंदा कौमें कभी हिम्मत अपनी हारा नहीं करती
ख़ौफ़ से सिर झुका लेना वे गँवारा नहीं करती।
मौत से लड़ने वाले लोग ही उसको हराते हैं
ज़िंदा लाशें कभी दुश्मन को ललकारा नहीं करती।
चलो कोरोना से मिलकर लड़ते हैं हिन्दोस्ताँ वालों
ए महामारी हिन्दू-मुसलमान में बँटवारा नहीं करती।
जिस भी चैनल पर देखो बस ज़ुबानी जंग जारी है
झूठ को बहुत दिन तक जनता स्वीकारा नहीं करती।
निठल्ली हैं ये सरकारें गली से लेकर दिल्ली तक
नाकारा हैं ए भला हमारा-तुम्हारा नहीं करती।

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 * 2 *
                  कोरोना के नाम

तुम आए हो तुम्हें आना ही था पर यूँ न आना था
हमारे फेफड़ों में घुस के न हमको सताना था।
भले तुम चीन से अमरीका तक फैले हुए हो पर
ज़रूरत क्या थी तुमको कि हिंदुस्तान आना था।
अब आए तो चले जाओ हमारी क़सम है तुमको
तुम आए भी थे तो छिप-छिपाकर निकल जाना था।
नहीं तुम जानते क्या गुज़री है हम हिंद वालों पर
जो आए भी थे सीधे रहनुमाओं के घर जाना था।
न दवा है, न टीके हैं , न खाटें अस्पतालों में
मज़हबी मीडिया कम थी जो तुमको भी आना था।
ऐ ‘कोरोना’ तेरा रोना नहीं रोते रहेंगे हम
नहीं हम तुझसे डरते हैं यही तुझको बताना था।

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* 3 *

जिन्होंने सड़क बनायी थी सड़क नाप रहे
भले मज़दूर हैं पर ये सदा निष्पाप रहे।
जिन्होने लूटकर रख ली हैं दौलतें सारी
मेरे मज़दूर भाई श्रम में उनके बाप रहे।
महल में बैठकर जो दे रहे सलाह हमें
ये वही लोग हैं जो देश पर अभिशाप रहे।
तुम्हें पता नहीं है दर्द मुफ़लिसी का दोस्त
वो जो भुगत रहे हैं सब तुम्हारे पाप रहे।

इस कोरोना ने दिखाया है आईना सबको
जिन्हें गुमान था खुद पर अंगूठा छाप रहे ।
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* 4 *

हिंदुस्तान का अवाम
कोरोना से नहीं
सरकार से हारा है
जो कहते थे
नून रोटी खाएंगे
मोदी जी को लाएंगे
उनकी थाली से रोटी ग़ायब है
आँख के आँसू से लेकर
बदन से टपक रहे पसीने तक में
नून ही नून है
केन्द्र सरकार और मीडिया
पाकिस्तानी हिंदुओं के लिए
परेशान है
गली से दिल्ली तक
कोरोना व्याप्त है
यह ज़रूर किसी
मजबूर-मज़लूम का श्राप है
करोड़ों भूखे नंगे
नौजवान बूढ़े और बच्चे
चिलचिलाती धूप में
सड़क पर हैं
देश मुग़ालते में
और सरकार क्वारंटाईन में है
जिनके लिए
रेल उपलब्ध नहीं है
वे रेल से कुचले जा रहे हैं
जो हमारे लिए घर बनाते हैं
वे घर से बेघर हैं
पढ़ा लिखा नौजवान
फ़ेसबुक पर है
मीडिया टीवी पर
और नेताजी ट्विटर पर हैं
कार्यपालिका को लूट की छूट है
सरकार
सुप्रीम कोर्ट में
शपथपूर्वक कह रही है
कोई मज़दूर सड़क पर नहीं है
न्यायपालिका को
सरकार पर पूरा भरोसा है

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