समीरलाल से डॉ. सत्यवीर सिंह की बातचीत

समीर लाल 'समीर'
बैंकिंग पेशा है; लेखन पठन, पाक कला मेरा शौक - समीरलाल
भारत के मध्यप्रदेश प्रांत स्थित जबलपुर शहर में जन्मे तथा वहाँ के गली मुहल्लों की यादों को अपने सीने में चिराग बना कनाडा के टोरोंटो को आलोकित कर रहे हैं भारती के सपूत समीरलाल। विगत 21 वर्षों से कनाडा के निवासी समीरलाल जी बहुचर्चित हिंदी ब्लॉग उड़नतश्तरी और यूएफओ किचन यूट्यूब का निरंतर संचालन कर रहे हैं। बैंकिंग के साथ साहित्य लेखन, पाक कला तथा राजनीति में रुचि रखने वाले समीरलाल जी से उनकी देश से विदेश तक के सफर को जानेंगे साथ ही साहित्य तथा अन्य विषयों पर एक संक्षिप्त तथा सारगर्भित बातचीत पाठकों के समक्ष हैं। अतः  साहित्य, पाककला, ब्लॉग तथा राजनीति के साथ आज हिंदी की वैश्विक स्थिति पर समीरलाल से सत्यवीर सिंह की वार्ता




डॉ. सत्यवीर सिंह
सत्यवीर सिंहः सर नमस्कार। आपके जन्म स्थल, पारिवारिक परिवेश तथा शिक्षा आदि का संक्षिप्त परिचय जानना चाहते हैं।

समीर लालः यूँ तो जन्म स्थल रतलाम मध्य प्रदेश में रहा मगर शायद 8 या 10 माह की आयु में राजस्थान आ गए। पिता जी सरकारी महकमे मे थे अतः उनका स्थानांतरण होता रहता था। जब मैं 9 वर्ष का हुआ, तब से हमेशा जबलपुर में ही रहे। ग्रेजुएशन के बाद 3 वर्षों के लिए मुंबई में रहकर चार्टर्ड अकाउन्टन्सी की और पुनः जबलपुर आकर सीए की प्रेक्टिस करने लगा। सन 1999 में कनाडा आ बसे तो अब कनाडा के ही होकर रह गए हैं।


सत्यवीर सिंहः मध्यप्रदेश (भारत) में जन्म और टोरंटो (कनाडा) में हाल निवास। इस सफ़र की कहानी और आपकी जुबानी

समीर लालः मध्य प्रदेश और खास तौर पर मेरा शहर जबलपुर तो आज भी दिल में बसा है, मैं भारत से निकल आया मगर जबलपुर मुझमें से कभी नहीं निकला। शुरुआती दौर में कनाडा घूमने आते थे। मन करता था कि यहीं बस जाएँ। मगर कोई खास वजह नहीं बन पा रही थी कि अच्छी खासी जमी जमाई प्रेक्टिस, राजनीतिक दखल को छोड़ कर निकलें। दोनों बेटे जब विश्वविद्यालय जाने को तैयार हुए तो वह बहाना बना कि चलो, बच्चों का भविष्य बन जाएगा। बहाना ही था मन तो खुद का ही था आने का। चले आए कनाडा और यहीं के होकर रह गए।

सत्यवीर सिंहः देश से विदेश के इस सफ़र के यादगार लमहे, बातें जिन्हें अपने पाठकों को शेयर करना चाहते हैं, तो बताएँ

समीर लालः बहुत से यादगार लमहे हैं इस सफर से जुड़े। ढेरों मित्रों और शुभचिन्तकों का विदा करने न सिर्फ जबलपुर स्टेशन तक आना बल्कि दिल्ली एयरपोर्ट तक चले आना और फिर टोरंटो पहुंचते ही सिर्फ एक परिवार से पहचान। न कोई जानने वाला, न पहचानने वाला। किन्तु पिछले 21 साल से कनाडा में रहते हुए यहाँ भी एक वृहद मित्रों का दायरा बन गया है।


सत्यवीर सिंहः टोरंटो से भारत कैसा दिखता है?

समीर लालः मुझे लगता है जो हमारे पास नहीं होता वो और भी प्यारा लगने लगता है। भारत तो मेरा अपना है ही। मगर मन में जो प्यारा सा अपना शहर, उसकी सड़कों पर बचपन में साइकल से बेवजह दूरियाँ नापते हम और हमारे दोस्त। वही सब आज भी जेहन बसा है। आज का जबलपुर बहुत भीड़-भाड़ वाला हो गया है और अब जब भी जाता हूँ तो मेरी नजर उस खाली खाली से सड़कों वाले जबलपुर को खोजती हैं। वही मुझे याद रहता है। मैं विकास और भीड़ भाड़ से परे का शहर ही यहाँ से देखता हूँ यह जानते हुए भी कि अब सब बदल गया है।


सत्यवीर सिंहः वाणिज्य के विलक्षण विद्यार्थी होते हुए आपका साहित्य की तरफ झुकाव कब और कैसे?

समीर लालः बहुत बचपन में एक दो छोटी छोटी सी बाल सुलभ कहानियाँ राजा राक्षस, तोता वगैरह जैसी लिखी, जिसे पिता के एक मित्र ने अपनी पत्रिका मे भी छापा। मगर वो बस वहीं सीमित होकर रहा। फिर हाईस्कूल में स्कूल की कहानी लेखन प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। उसमें अपने सबसे खतरनाक वाले मास्साब की, बिना उनका नाम लिए, ज्यादतियों का जिक्र और बालमन का भयवश किया दिखावा आदि पर दो पन्ने लिख दिये। सौभाग्यवश प्रतियोगिता के जज और मुख्य अतिथि हरिशंकर परसाई जी थे। उन्हें मेरी रचना बहुत पसंद आई और मुझे प्रथम पुरस्कार मिला। उन्होंने ही यह बताया कि जो तुमने लिखा है, उसे व्यंग्य कहते हैं। शायद व्यंग्य से मेरा प्रथम परिचय यही था। बाद में भी परसाई जी से अक्सर मुलाकातें रही। हमेशा पूछा करते थे कि लिखना शुरू किया? मगर जब कनाडा आकर 2006 से नियमित लिखना शुरू किया तो बतलाने के लिए परसाई जी नहीं थे। उनका स्वर्गवास हुए 11 साल बीत चुके थे।

सत्यवीर सिंहः आपके जीवन का वह वाकया, जिसने आपको लेखन की तरफ़ प्रेरित किया?

समीर लालः कनाडा आकर बस गए। नौकरी में दिन भर अंग्रेजी। मित्र ज्यादा थे नहीं शुरू में तो बस हिन्दी बोलने को तरसते थे और वही अवसाद का कारण बनता जा रहा था। यकायक उस दौर में ब्लॉग की दुनिया से परिचय हुआ। कुछ लिखना लिखाना शुरू हुआ और बस, हिन्दी से जुड़े साथी जुड़ते चले गए और नियमित लेखन भी शुरू हो गया। ब्लॉग लेखन ही माध्यम और प्रेरणा दोनों रहा।


सत्यवीर सिंहः आपके शिक्षक, मित्र या अन्य; जिनका आपके जीवन में अविस्मरणीय योगदान रहा। उनके नाम तथा योगदान

समीर लालः हमारे स्कूल के मास्साब जिनकी तरह मैं हो जाना चाहता था वो थे यू. एस. तिवारी सर। खूब पान खाते थे और बहुत बढ़िया प्यार से पढ़ाते थे। उनसे बहुत प्रेरणा मिली। मित्रों की बात ही निराली थी। आज इतने बरसों के बाद भी वही तो हैं, जिनसे मिलकर आज भी आप बचपन में पहुँच जाते हैं। वो मित्र आपको कभी उम्रदराज नहीं होने देते।


सत्यवीर सिंहः आपके लेखन के प्रेरणा स्रोत तथा सृजन की भूमिका-

समीर लालः पद्य की तरफ झुकाव मेरे दादाजी, जो कि बहुत अच्छे कवि थे और मेरे मामा, जिनकी नज़्में और गजल मुझे बहुत पसंद आती थीं और वो फिल्मों के लिए लिखा करते थे। गद्य में परसाई जी का प्रोत्साहन ही काम आया। भले ही देर से मगर लिखना शुरू हुआ। उनको पढ़ा भी खूब।


सत्यवीर सिंहः आप कविता, कहानी और व्यंग्य लेखन में सिद्धहस्त हैं। इस त्रिकोण को कैसे साधते है?

समीर लालः मेरे विचार में विधा से ज्यादा महत्वपूर्ण भाव हैं। एक बार भाव उत्पन्न होकर कागज पर उतरना शुरू होते हैं तो सहज ही कभी पद्य तो कभी गद्य का रूप ले लेते हैं। सहज लेखन ही मुझे पसंद भी आता है।


सत्यवीर सिंहः एक लेखक को कलम साधना के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखना होता है।

समीर लालः कलम साधना के लिए सबसे जरूरी है पठन साधना। जितना ज्यादा और जितना अच्छा पढ़ेंगे, उतना ही बेहतर लिख पायेंगे। सबसे आवश्यक पढ़ना है। साथ ही लेखन में भाषा की मर्यादा का सदैव ख्याल रहना चाहिए। मेरा मानना है कि आप आज शायद उम्र के किसी ऐसे दौर में हों जहाँ योगवश कुछ ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर जाएँ जो आगे चलकर आपको ही शर्मिंदा करे। अतः लिखने से पहले इस बात पर जरूर विचार कर लेना चाहिए कि मेरे बाद की पीढ़ी जब मेरा लिखा पढ़ेगी तो उनकी नजर में मेरी क्या छवि बनेगी। आज के समय में सब दर्ज रहता है। आप लाख डिलीट कर लें मगर कहीं न कहीं वह दर्ज रहा ही जाता है।


सत्यवीर सिंहः आज साहित्य और साहित्यकार हाशिये पर हैं? इसके जिम्मेदार कौन हैं, कौनसी शक्तियों का हाथ है?

समीर लालः अव्वल तो मैं इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं होता कि आज साहित्य और साहित्यकार हाशिये पर हैं। यह अवश्य है साधनों की भरमार, इंटरनेट पर सम्पादन वाला बैरियर का न होना, स्वप्रकाशन एवं सशुल्क पुस्तक प्रकाशन आदि ने लेखकों और कवियों की भरमार कर दी है। यह पुस्तक मेला तक सबकी पहुँच भी बना दे रहा है। लेकिन जो अच्छा लिख रहे हैं, वे पूछे भी जा रहे हैं और पढ़े भी जा रहे हैँ।


सत्यवीर सिंहः साहित्य से दीगर, आप यूएफओ किचन यूट्यूब चैनल का भी संचालन कर रहे हैं। इसके बारे में बताएँ

समीर लालः खाना बनाने का शौक भी कनाडा पहुँच कर ही आया। तब खाने वालों से ही पता चला कि अच्छा बना रहे हैं। प्रोत्साहन और लोगों का रेसिपी पूछना ही किसी दिन मुझे प्रेरित कर गया कि क्यूँ न रेसिपी यूट्यूब पर ही डाल कर मित्रों को दे दी जाये और बस, सफर चल पड़ा। अब तो काफी सब्सक्राइबर भी हैं और 250 के आस पास रेसिपी भी चढ़ चुकी हैं। हर बुधवार को एक नई रेसिपी लगा देते हैं।


सत्यवीर सिंहः आपका उड़नतश्तरी ब्लॉग बहुत प्रसिद्ध है? इस पर थोड़ा प्रकाश डालिए

समीर लालः उड़नतश्तरी ब्लॉग, जैसा कि मैंने आपको बताया, मेरे लेखन को प्रोत्साहन देने का साधन बना। खूब लिखने पढ़ने वाले मित्र बने। साथी मिले। सीखने का बहुत मौका मिला और उतना ही नाम भी मिला। 2007 में इंडी ब्लॉगीज़ अवार्ड में विश्व का सर्वाधिक लोकप्रिय हिन्दी का ब्लॉग होने का अवॉर्ड मिला। आज भी उस पर निरंतर लेखन जारी है। हालांकि अब लोग फेसबुक और व्हाटसएप की तरफ रुख कर गए हैं। लेकिन फिर भी दस्तावेजीकरण के हिसाब से ब्लॉग ज्यादा अच्छा रहता है। फेसबुक पर लिखे की शेल्फलाइफ मात्र चंद घंटों की है।


सत्यवीर सिंहः आप बहुविध क्षेत्रों के जानकार हैं। आपको इनमें सबसे रुचिकर क्षेत्र कौन सा लगता है

समीर लालः मुझे अपने सभी क्षेत्र रुचिकर लगते हैं अन्यथा मैं शायद उन क्षेत्रों में न रुकता। अरुचिकर कार्य मैं बहुत समय तक नहीं कर पाता। समय प्रबंधन और स्वयं को व्यस्त रखने में मेरा विश्वास है और बहुत भली भाँति सध भी जा रहा है।


सत्यवीर सिंहः आपकी राजनीति में भी सक्रियता है। कृपया राजनीति गतिविधियों पर संक्षेप में बताएँ

समीर लालः छात्र जीवन से ही राजनीति की तरफ रुझान रहा है। कनाडा आने के बाद कुछ बरस तो खुद को स्थापित करते, स्थितियों को परखते समझते ही बीत गए। पिछले कुछ वर्षों से सक्रियता बढ़ी है। पिछले सिटी के चुनाव में पत्नी ने भागीदारी भी की और राजनैतिक यात्रा की शुरुआत हुई। मैं जिस पार्टी के साथ हूँ, हमारे प्रदेश में उसकी सरकार है। मैं उस पार्टी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में हूँ एवं मेम्बरशिप का संकाय देखता हूँ। टोरंटो विश्वविद्यालय की गवर्निंग काउन्सिल में सरकार का प्रतिनिधित्व करता हूँ। आगे चल कर चुनाव में उतरने का विचार है। देखिए वक्त क्या रुख लेता है मगर सक्रियता बनी हुई है।


सत्यवीर सिंहः कनाडाई समाज, संस्कृति, राजनीति आदि से भारत को क्या सीखना चाहिए

समीर लालः समाज में लोग एक दूसरे की मदद करने को सदैव तत्पर रहते हैं और एक दूसरे पर भरोसा भी। राजनीति में भी एकदम सुलझे हुए लोग हैं। इंसान को इंसान समझना इनके लिए सर्वोपरि है। पार्टी अलग-अलग होने के बावजूद भी सब एक दूसरे से प्यार से मिलते हैं और एक दूसरे के प्रति कोई दुर्भावना नहीं रखते।


सत्यवीर सिंहः काव्य प्रसारण में दृश्य-श्रव्य माध्यमों की भूमिका पर आपके विचार

समीर लालः माध्यम कुछ भी हो- चाहे मंच या अन्य, अच्छा रचनाकार अपने चाहने वालों के बीच पहुँच कर अपना स्थान बना ही लेता है। तुलसीदास, कबीर, रहीम आदि को कब किसी माध्यम की जरूरत रही मगर घर-घर पीढ़ी दर पीढ़ी हाजिर हैं।


सत्यवीर सिंहः बैंकिंग क्षेत्र के साथ साहित्य लेखन। दो विरोधी ध्रुवों में कैसे मेल कर पाते हैं?

समीर लालः बैंकिंग पेशा है और लेखन, पठन, पाक कला मेरा शौक। वर्क लाइफ बैलेंस जीवन को सुखी बनाने के लिए अति आवश्यक है। उचित समय प्रबंधन की वजह से दोनों ध्रुवों को यथोचित समय दे लेता हूँ एवं प्रसन्न भी रह लेता हूँ। शौक पूरा करने के लिए खाली समय के इन्तजार की नहीं, आज के समय प्रबंधन की आवश्यकता है।


सत्यवीर सिंहः आपने अनेक देशों की यात्राएँ की हैं। हिंदी की वास्तविक स्थिति और गति को लेकर आपके अनुभव

समीर लालः बढ़िया है। लोग जागरूक हैं। विदेशों में भी साहित्यिक रुचि रखने वाले बहुत तत्परता से अपने काम में जुटे हैं। यह सतत सिलसिला है। भविष्य की संभावानाओं को लेकर भी मैं आश्वस्त हूँ।


सत्यवीर सिंहः नवोदित, नवांकुर कलमकारों को आपका संदेश?

समीर लालः खूब पढ़े, खूब लिखें। मगर इतना ध्यान रखें कि बिना पढ़े कभी बेहतर लिखना संभव नहीं। फेसबुक आदि पर आई लाइक को सफलता का मानक न मानें। बस अपना कार्य ढेर सारे पठन और संयमित लेखन के साथ करते चलें। पाठक अपने आप जुड़ते जाएँगे। सम्मान आदि के चक्कर में न पड़ें। अच्छा लिखेंगे तो सम्मान और पाठक अपने आप आ जायेंगे।


सत्यवीर सिंहः धन्यवाद सर। आपने बहुमूल्य समय दिया...

समीर लालः साहित्य के निरंतर प्रचार एवं प्रसार में जो भी योगदान बन पड़े, हम सभी करते रहें। आपका स्वागत और अनेक शुभकामनाएँ।

1 comment :

  1. समीरलाल जी से इस रोचक वार्ता के लिये बधाई।

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