जीने का प्रश्न (संस्मरणात्मक कहानी)

प्रकाश चंद बैरवा

प्रकाश चंद बैरवा

शोधार्थी: हिंदी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
ईमेल- Prakash.n.4193@gmail.com
संपर्क: +91 817 872 9580

संध्या का समय था। मैं काम से कहीं बाहर गया था। अपना काम निपटा कर अब मैं बाइक पर सवार धीरे-धीरे अपने रूम की ओर बढ़ ही रहा था। तभी मैंने देखा कि सड़क किनारे एक दुबला पतला व्यक्ति अपनी रेड़ी को किसी प्रकार धकेलते हुए आगे बढ़ रहा था। शायद अधेड़ उम्र का था परन्तु भूख और थकान ने उसे असमय ही बूढ़ा बना दिया था। उसकी रेड़ी पर कुछ कपड़े थे, जिन्हें वह बेचने के लिए ही शायद अपने घर से निकला था। वह सड़क से गुजरती हर गाड़ी पर सवार व्यक्ति को पहले से तेज आवाज़ में रोकने की कोशिश कर रहा था। मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा था कि कोई दुकानदार अपनी रेड़ी दौडाते हुए किसी बाइक सवार या किसी कार वाले से तेज आवाज़ में इस प्रकार रुकने का आग्रह कर रहा हो! 
किन्तु यह सच था, वह अपने पास से गुजर रही सभी गाड़ी वालों को चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा था, “रुकिए... रुकिए... रुक जाइए भैया...”
तभी उसके करीब से मैं गुजर ही रहा था कि उसकी वही आवाज़ मेरे कानों में भी पड़ी। तब मैं उससे लगभग सौ कदम ही आगे बढ़ा था। उसकी आवाज़ से लगा जैसे वह मुझे ही रुकने को कह रहा है। बाइक रुकती देख वह अपनी रेड़ी को और तेजी से ढकेलते हुए मेरे पास आ गया। उसके हाव-भाव को देख ऐसा लग रहा था कि वह किसी दिक्कत में है। 
मैंने उस से पूछा, “क्या हुआ? सब ठीक तो है न?”
पर वह दो मिनट तक तो कुछ बोल ही नहीं सका। बस रोने लगा। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था कि ये सब हो क्या रहा है? इस दौरान मेरी नज़र उसकी रेड़ी पर पड़ी, जिसमें कुछ फुटपाथी कपड़े रखे थे। शायद वह वर्षों से इसी काम को करते हुए अपने परिवार की गुजर-बसर करता था!
मैंने उससे दुबारा पूछा, क्या हुआ? 
इस बार उसने धीमे स्वर में कुछ कहा अवश्य किन्तु मुझे उसकी बात अब भी समझ नहीं आई, क्योंकि वह बहुत धीमे स्वर में रोते हुए ही कुछ बोल रहा था। शायद उसके मुँह से आवाज़ ही नहीं निकल रही थी! या वह अन्दर ही अन्दर बहुत कुछ कह रहा था। लेकिन अपनी लड़खड़ाती आवाज़ को बाहर लाना उसके लिए मुश्किल हो रहा था! 
उसकी यह मनोदशा देख मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि उसके साथ आखिर हुआ क्या?
अंततः मैंने जब उससे तीसरी बार पूछा तो उसकी आँखों में समुद्र तैरने लगा। वह अपनी डबडबाई आँखों को पोछते हुए भर्राए गले से कहता है, साहब! आज सुबह से बोहनी नहीं हुई है। मैंने कुछ खाया भी नहीं है। और...
उसके सहज भाव को देखते हुए मेरी जिज्ञासाएँ तीव्र हो गयी। और मैंने अचंभित होकर उससे पूछा, और क्या?
वह बोला, दिन में जब मैं थोड़ी देर के लिए रेड़ी को सड़क किनारे खड़ी कर पेशाब करने गया। तो एक व्यक्ति मेरी रेड़ी पर से टी-शर्ट का एक बंडल लेकर भाग गया। वह यह भी बताने लगा कि उसके घर में कुछ खाने तक को नहीं है। 
मैंने पूछा, "आप कहाँ के रहने वाले हो?" उसने बताया कि वह लगभग दस-पंद्रह किलोमीटर दूर से आ रहा था। 
मैं उसकी बात सुनकर सोच में पड़ गया। वह व्यक्ति सुबह से भूखा होने पर भी अपने परिवार की रोजी-रोटी के लिए कड़कती धूप में इतनी दूर निकल आया। इससे मेरे बचपन की एक स्मृति ताजा हो आई जो मैंने पिताजी से सुनी थी कि पेट की आग को बुझाने के लिए क्या गर्मी, क्या जाड़ा या क्या बरसात...
तभी मेरे दिमाग में अचानक एक और  बात कौंधी कि शायद यह वैश्विक महामारी के कारण हो! जिससे सभी प्रभावित है। न जाने इस महामारी ने कितने ही लोगों की तो रोजी-रोटी छीन ली। ऐसे में लोग अपने और अपने परिवार का पेट भरने के लिए कुछ भी करने को आमादा हैं। 
उनकी पीड़ा का अनुमान लगाकर मैंने सोचा की उसकी कुछ मदद की जाए। और तब मैंने उसकी आर्थिक सहायता करनी चाही, पर उसने बहुत सहजता से पैसे लेने से इनकार कर दिया। 
वह बोला कुछ खरीद लीजिए। 
फिर भी मैं बार-बार उसे पैसे देने का प्रयास करता रहा। पर उसने उन पैसों को हाथ तक नहीं लगाया। उसने कहा कि जब आप कुछ खरीदोगे तभी मैं पैसे लूँगा और वह अपनी रेड़ी को आगे बढ़ाने लगा। भूख और थकान के बावजूद भी उसका स्वाभिमान अब तक जिन्दा था। वर्ना आजकल ऐसे बहुत कम ही व्यक्ति देखने को मिलते हैं जो बिना मेहनत किए एक रुपया भी किसी से न लेते हों! 
हारकर मैंने ही उससे कहा, ठीक है तब आप मुझे कपड़े ही दिखा दीजिए। लेकिन मैंने देखा कि उसकी रेड़ी पर टी-शर्ट, लोअर और बच्चों के ही कपड़े हैं। फिर मैंने उनसे कुछ टी-शर्ट दिखाने को कहा, जिसमें मुझे एक टी-शर्ट पसंद आ गयी। तब मैंने उनसे पूछा, "यह टी-शर्ट कितने की है?" 
उन्होंने कहा, "ढाई सौ।" मैंने अपनी जेब से ढाई सौ रुपये निकाल कर उन्हें दे दिए और वह टी-शर्ट उनसे खरीद कर अपने घर आ गया। किन्तु इस घटना को भूल न सका। मैं आहत था कि चाहकर भी मैं उस व्यक्ति की कोई बड़ी सहायता न कर सका। 
अगले दिन जब मैं अपने रूम से बाहर निकला तब भी वही घटना मेरे जहन में चल रही थी। इसी कारण जब मैंने रोड के किनारे भीख मांग रहे लोगों को, रिक्शा चालकों को, या उस व्यक्ति की तरह और कई रेड़ी वालों को देखा, जिनकी रोजी-रोटी दिन भर में कमाएँ चंद पैसों से ही चलती हैं। तब मुझे उस रेड़ी वाले व्यक्ति की छवि उनमें दिखाई पड़ी। जो लोग सामान्य परिस्थितियों में भी इन्हें देखकर अनदेखा कर देते है वे महामारी के दौर में इनकी समस्याओं से भला क्यों रूबरू होने लगे? 

और मैं सोचने लगा... जब भी कहीं कोई महामारी फैलती है, तो वह अपनी लपेट में सबको लेती है। लेकिन रोजमर्रे से जीवनयापन करने वाले दिहाड़ी मजदूर, रेड़ी चालक, रिक्शा चालक, जैसे लोगों पर यह महामारी पहाड़ बनकर टूटती हैं और इनके जीवन को तहस-नहस कर डालती है...

ऐसे में एक तरफ लोगों में महामारी का डर है जिससे बचने के लिये लोग अपने घर से बाहर तक नहीं निकलना चाहते; पर दूसरी तरफ वह वर्ग भी है, जिसमें दैनिक वेतनभोगी लोग हैं, जिनके लिए अपने परिवार के भरण-पोषण की चिंता  महामारी से कहीं अधिक बड़ी है।

6 comments :

  1. कहानी पढ़ लिया बहुत अच्छी लिखे हो बन्धु, बहुत अच्छा लगा आप इसी तरह पढ़ते लिखते RLA का नाम रोशन करते रहो।
    इस दुनिया में बहुत लोग ऐसे है जो स्वाभिमान का जीवन जीना चाहते है किन्तु अपने गरीबी के आगे लाचार, हताश, बेबस, मजबूर है, जिस सरकार को ये सब देखना चाहिए वो भी इन मजदूरों के लिए कुछ नहीं करती है, धनवान और धनवान बनते जा रहे है और गरीब एक वक़्त के रोटी के लिए बेबस, लाचार है।

    ReplyDelete
  2. अद्भुत ....यह एक ऐसी परिस्थिति है जिसने कहीं ना कहीं हर व्यक्ति को प्रभावित किया है।

    ReplyDelete
  3. अद्भुत ..... और यह एक ऐसी परिस्थिति है जिसने कहीं ना कहीं हर व्यक्ति को प्रभावित किया है।

    ReplyDelete
  4. अद्भुत .... और यह एक ऐसी परिस्थिति है जिसने कहीं ना कहीं हर व्यक्ति को प्रभावित किया है।

    ReplyDelete
  5. संवेदना, स्वाभिमान व सहयोग का अनमोल संगम हुआ है आपके द्वारा लिखित इस संस्मरणात्मक कहानी में, आशा करता हूँ कि आप भविष्य में भी अपनी सुंदर लेखनी से हम सभी पाठकों को लाभान्वित करेंगे। बधाई☺️💐👍

    ReplyDelete
  6. इस कहानी में आपने जो तस्वीर खींची है वह किसी सरकारी आकड़े में तो कभी दर्ज़ नहीं होगा किन्तु हर उस इंसान के दिलोदिमाग पर अंकित हो जाएगा जिसके भीतर थोड़ी भी संवेदना बची होगी। ये कलम रुकनी नहीं चाहिए...बधाई।

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।