संस्मरणात्मक कहानी: पारो

बीना जैन

- बीना जैन

वह बिलकुल ततैया था। हमेशा काट खाने को तैयार। लेकिन उसने भी बोलना सीख लिया था। पारो हमेशा सोचती सहर में कमाई करने के लिए जब बुलाया है तो सहर के हिसाब से ही तो रहना पड़ेगा। धोती पहन के,सर ढक के भला कहीं झाड़ू-पोछा का काम हो सकता है। पूछो भला! मलकिन ने इत्ते सुन्दर कुर्ते और चूड़ीदार पजामे दिए हैं तो वह क्यों न पहने। इस चौकीदार को क्यों आग लगती है? 

पारो पति को इसी सम्बोधन के साथ पुकारती थी और अपने को चौकीदार सम्बोधन से बुलाया जाते ही उसके पति सरूपा का तन-बदन सुलग उठता था। उसके मन में पारो के काले गदराये बदन को धमाधम कूटने की इच्छा बल पकड़ती। गालियों के साथ जैसे ही वह मारने को खड़ा होता पारो चंडी रूप धारण कर लेती। पारो मारती तो नहीं लेकिन उसके हाथ में पकड़ा चिमटा देखकर सरूपा मार न पाता। 

पारो ने दबना छोड़ दिया था। उसके तर्क बड़े स्पष्ट थे। चौकीदार सात हज़ार कमाता है तो वह दस। चार घरों का चौका-बर्तन, दो शो-रूम की सफाई के अलावा अपने घर की सफाई, कपड़े धोना, खाना बनाना सब उसी के ही तो जिम्मे है। चोकीदार तो बस बैठे-बैठे बीड़ी फूंकता रहता है और हो जाती है उसकी ड्यूटी। ज़रा सरीर नहीं हिलाना पड़ता। वाकई सरूपा के जिम्मे कोई काम नहीं था। जिस बिल्डिंग की वह चौकीदारी करता था उसका अवैध निर्माण म्युनिसिपल कारपोरेशन ने रोक दिया था। तीन मंजिलों में बनने वाले उस विशालकाय मॉल का निर्माण दो सालों से रुका हुआ था। मालिक के लिए वह वह न उगलते बनता था न निगलते। लिहाज़ा सरूपा की बन आई थी। अभी सिर्फ ढांचा ही खड़ा हुआ था। पर सरूपा के लिए तो वह महल से कम न था। बिजली-पानी मुफ़्त। बड़ा सा हॉल। लैट्रिन-बाथरूम अलग। बस उसने सोच लिया। पारो से मिलने वाले आराम और धन का हिसाब लगा उसने फटाफट उसे गाँव से बुला लिया। 

अपनी दो बेटियों और दो गठरियों के साथ माथे तक घूँघट किये वह खुद गठरी बनी डरी-सहमी पहली बार रेल में बैठी थी। थर्ड क्लास के उस डिब्बे में तिल भर भी जगह न थी। मुँह के आगे भी लोग लदे पड़े थे। बड़ी मुश्किल से जगह बनाकर बीच-बीच में वह अपने ससुर को देख आश्वस्त हो जाती थी। पारो के ससुर बहुत अच्छे थे। पारो के मन को शायद वही सबसे अधिक समझ पाये थे। भरसक ध्यान रखने के साथ ही उसका चेहरा पढ़ पाने में भी वह समर्थ थे। डरी पारो कोअपने होने का अहसास दिलाने के लिए वह थोड़ी-थोड़ी देर में खख़ार देते थे। ससुर के गले से निकलने वाली खख़ार वह खूब पहचानती थी। बावजूद इसके एक अनचाहा सा भय पारो के मन में समा रहा था। मन में कई सवालों ने घेरा डाल रखा था। बेटे को साथ क्यों नहीं आने दिया। जबर्दस्ती उसे गाँव में क्यों रख लिया। कहीं मेरे साथ कोई धोखा तो नहीं हो रहा। अनेक आशंकाओं से घिरी उस सफ़र को ससुर की खख़ार के सहारे पार कर आखिर वह दिल्ली पहुँच गई। 

पारो जब दिल्ली आई तब मॉल का काम पूरी तरह बन्द नहीं हुआ था। तीसरी मंजिल पर चोरी-छुपे थोड़ा-थोड़ा काम चल रहा था। बाहर से देखने पर कोई नहीं जान सकता था कि अंदर काम भी चल रहा होगा। वह मॉल उसे बड़ा अजीब लगा। लाइट न होने के कारण सब तरफ अँधेरा रहता था। कहीं-कहीं बिजली की अस्थाई फिटिंग की हुई थी और एकाध बल्ब लटका दिए गए थे। नीचे की दोनों मंजिलों पर सन्नाटा पसरा रहता था। चारों ओर लोहा-लंगड़, रेत-गारा-सीमेंट ने गंदगी मचा रखी थी। पारो उस जगह से दूर भाग जाना चाहती थी। गाँव का गोबर से लिपा साफ-सुथरा हवादार घर, आँगन में बंधी गाय, खेत और खुला आसमान उसे शिद्दत से याद आने लगे। पारो के ससुर ने अपना कर्तव्य पूरा किया। मन ही मन निश्चिन्त हो वह एक हफ्ते में गाँव लौट गए। 

उस दिन सरूपा बहुत उत्साहित था। मालिक को जो आना था। सरूपा ने पारो को बुलाया और मालिक से मिलवाया। बाज़ार से कोल्ड-ड्रिंक मंगवाई गई। पारो समझने में असमर्थ थी कि उसे एक पराये मर्द के सामने क्यों बुलाया गया है। सर पर घूंघट आगे को सरक वह कुछ दूर पर बैठ गई। । बहुत देर तक दोनों आपस में गिटर-पिटर करते रहे। जैसे ही मालिक गए,पारो को पता चल गया कि मालिक क्यों आये थे। सरूपा ने उसे बेलदारी का काम दिलवा दिया था। पारो ने मायके में घर और खेतों के काम के अलावा और कोई काम करना न जाना था। ससुराल में भी वह यही काम करती थी। यह बेलदारी का काम! पारो तो सुनते ही हकबका गई। दो दिनों में ही उसे बेलदारी के काम की समझ हो चली थी। 

 चार साल बाद पति के पास जाने और दिल्ली रहने की छलांगों से उछलता मन अचानक बुझ गया। थोड़े ही दिनों में तीसरी मंजिल तक रेत, गारे और ईंटों के टोकरे ढोते-ढोते पारो की कमर में बुरी तरह दर्द रहने लगा। तीन महीनों में ही खाँसी से वह लगातार अधमरी रहने लगी। उसे पहले से ही साँस की थोड़ी तकलीफ रहती थी पर गाँव के बैदजी की दवाई से वह कंट्रोल में थी। रेत गारे की उड़ती धूल से उत्पन्न उसकी खाँसी ने लगभग दमे का रूप ले लिया था। मालिक भी उसकी इस हालत में उससे काम करवाना नहीं चाहते थे। मजबूरन सरूपा को गाँव के बैद जी से दवाई मंगानी पड़ी। ससुर जी खुद दवाई देने आए। इस बार वैद जी की दवाई से पारो को आराम नहीं हुआ। सामने वाली कोठी के एक डॉक्टर सरूपा से यदा-कदा बाहर का कुछ काम करवा लिया करते थे। सरूपा ने उस डॉक्टर से भी पारो को दवा लाकर दी लेकिन पारो को उस डॉक्टरी दवा से भी आराम न मिला। पारो की उस बुरी खाँसी और उतरा -बीमार चेहरा देख उसके ससुर चिंतित हो उठे। पारो को भी सहारा मिल गया। उसने गाँव जाने की रट लगा दी। मजबूरन सरूपा ने उसे सख्त ताक़ीद के साथ गाँव भेज दिया। 

“बैद जी की दवाई करके जल्दी ठीक कर खुद को। वापस आना है जल्दी।"
 पारो अपनी छोटी बेटी को साथ ले गाँव चली गई। ससुर जी पारो को खुद बैद जी के पास दिखाने ले गए। बैद जी ने उसे धूल-मिट्टी से दूर रहने को कहा। पूरी तरह ठीक होने के बाद ही वह शहर लौटी। सरूपा बड़ा आलसी था। घर के खेतों में पैदा होने वाली दाल-चावल वगैरह दिल्ली लाने का भी कष्ट नहीं उठाता था। पर पारो अपने पति से बिलकुल उल्टी थी। उसकी कर्मठता ने ही उसे सास-ससुर का प्यारा बनाया था। उसके विवाह के बाद ही ननद का विवाह तय हुआ था। ससुर के चेहरे पर चिंता की लकीरें देख पारो ने अपने दहेज़ में मिले सारे कपड़े-गहने और बर्तन निकाल कर दे दिए। ससुर उसकी यह उदारता देख भावविह्वल हो उठे। पारो चार बहनें ही थीं। परिवार भी संपन्न था। फिर पारो थोड़ी गिट्टी, गठी और काली थी। वैसे थी तो पक्की सांवली पर हमारा समाज तो दो ही रंगों में मनुष्य को बाँटता है-गोरा और काला। सरूपा था लंबा, पतला और गोरा। कोई मेल न था। घूंघट उठाते ही, ‘बहू तो काली है। अरे! हमारे चाँद से सरूपा का क्या जोड़ ढूंढा! ननद कभी उसे 'लद्दड़' की उपाधि से विभूषित करती तो कभी काम छोड़ने वाली 'आलसन' से। पड़ोसनों, रिश्तेदारों और सबसे बढ़ कर ननद के तानों को भी पारो चुपचाप सह गई।

साल भर बाद पारो का बेटा हो गया। ननद के घर भी ख़ुशी आने वाली थी। ननद ने बेटी को जन्म दिया। सास बड़ी खुश थी। लक्ष्मी-गणेश से दोनों भाई-बहन जब पालने में लेटते तो पारो की ननद जल उठती। पारो का दूध सा गोरा बेटा उसकी तवे -सी काली बेटी के सामने जैसे उसके द्वारा किये गये तमाम व्यंग्यों और उपहासों का स्मरण करा देता। पारो ने दो बेटियो को और जन्म दिया। पर ननद के फिर बेटी ही हुई। 

 ननद का पति भी सरूपा के पास दिल्ली आ गया था। वह खाली पड़े मॉल के आगे अन्नानास बेचने की रेहड़ी लगाता था। ननद अपनी दोनों बेटियों के साथ मायके में ही जम गई थी। ऐसे में पारो को पति का बुलावा बड़ा भला लगा था। पर शहर का जीवन भी दूर के ढोल जैसा सुहावना है, यह पारो ने पहली बार में ही जान लिया था। पति का मुलम्मा भी उतर चुका था। सो पारो ने कमर कस ली थी। पारो ने खेतों में होने वाली दालें, गुड़, तिल, चावल सब बांध लिए। अबकी बार पारो के मामा उसे छोड़ने आये थे। मामा के साथ जाकर उसने सड़क पार के डॉक्टरों के क्वार्टरों में काम की बात की। साफ़-सुथरी पारो को जल्द ही काम मिल गए। कुछ ही दिनों में दीपावली पर एक पुराना स्मार्ट फोन भी मिला और बहुत सारे पुराने पर सुंदर सूट भी। 
अबकी बार पारो ने मामा से सब सीखा। ट्रेन की टिकट बुक करना। अकेले दिल्ली आना। फोन इस्तेमाल करना। मेसेज भेजना। मुझे बहुत ताज्जुब हुआ जब मैंने व्हाट्सएप्प पर पारो की तस्वीर देखी। उसने अपनी और अपनी बेटियों की, उनके आधार-कार्ड की, अपने पति की, सबकी फ़ोटो पेस्ट की। मैं तो अचरज़ से भर उठी। जब पूछा तो बोली, “फोन तो पाँच नम्बर वाली आंटी ने दिया। जीजा को अमरीका फोटू भेज रही थी। गलती से आपका दब गया।" बातों बातों में उसने बताया कि उसके एक जीजा अमेरिका में लेबर का काम करते हैं उन्हीं के पास बच्चों की फोटो भेज रही थी। मुझे तक बहुत समय पश्चात स्मार्ट फोन इस्तेमाल करना आया था। एक बार बेटे ने कॉलेज से फोन किया था उसका एक डॉक्यूमेंट व्हाट्सएप पर भेजना था मेरे हाथ पाँव फूल गए थे। फोन पर सुन-सुनकर और समझ-समझ कर बहुत मुश्किल से ही मैं डॉक्यूमेंट भेजने में सफल हो पाई थी। पारो के नाम से पुकारी जाने वाली वह अनपढ़, आज अपने असली नाम पार्वती की हकदार बन गई थी। पार्वती की कुशलता मेरे लिए गहरे अचरज का विषय बन गई कि कब उसने स्मार्ट फोन इस्तेमाल करना सीखा। आज भी मैं यही सोचती हूँ कि सिर्फ तीसरी कक्षा तक पढ़ी उस पार्वती को अगर मौका मिले तो वह किसी की भी बराबरी कर सकती है। 
 
 उसने अपनी दोनों बेटियो का सरकारी स्कूल में दाखिला कराया। न केवल उनका बैंक में खाता खुला बल्कि यूनिफार्म,जूते, बस्ता सब मिले। नहा-धोकर जब दोनों बेटियाँ स्कूल जाने को तैयार होतीं तो पारो उन्हें देख कर निहाल हो जाती। सरूपा उन्हें पढ़ाने के पक्ष में नहीं था लेकिन उसका स्वार्थी मन अपना फायदा देख चुप रहा। स्कूल में मिलने वाला भोजन और तमाम जिम्मेदारियों से मुक्ति उसके लिए बहुत थी। 

पारो ने समझ लिया था कि ननद के रहते गाँव यदि कुआँ है तो ननदोई और पति के रहते शहर मानो एक खाई है। अपना सलीब खुद ही उठाना है। पारो ने कुछ और काम पकड़ लिए। अब वह अपने मन का खाती और अपने मन का पहनती। सरूपा अंडा नहीं खाता था पर पारो और उसकी बेटियों को आमलेट बहुत अच्छा लगता। पनीर भी खाना उन्हें खासा पसंद था। बाज़ार का सब काम पारो के जिम्मे था। सरूपा के मना करने के बावज़ूद वह सब खाती और ऊपर से धौंस जमाती- कमाते किसलिए हैं? मन का न खाएं तो फायदा क्या। 
 
इसी तरह घूंघट करना भी उसने छोड़ दिया था, “नन्दोई तो छोटे हैं, उनसे क्यों करुँ मैं परदा? ससुर से तो करती हूँ न।” ससुर भी पारो का ही पक्ष लेते। पारो उनके आने पर हमेशा धोती ही पहनती। पारो को दोषी ठहराने का कोई कारण उन्हें नज़र न आता। 
 
सरूपा बेटे को दिल्ली न आने देता। नवें बरस में लगने पर भी उसे तीन तक की गिनती और ब से बैल ही आता था जबकि उससे छोटी दोनों बहनें बहुत कुछ सीख चुकी थीं। पारो कमाएगी और वह मौज करेगा। वह रोटी बनाएगी और खिलाएगी, यही सोच कर उसने पारो को बुलाया था। यूँ पारो सब करती और ख़ुशी-ख़ुशी करती। पर पारो प्यार और इज्ज़त की अपेक्षा करती थी जो हर पत्नी का हक़ होता है। सास-ससुर ने उसे दोनों दिए। उनके लिए पारो जान भी देने को तैयार थी लेकिन उस पति के लिए नहीं जिसने उसे डेंगू होने पर मरने के लिए छोड़ दिया था। लेकिन वह भूल गया था कि मानवता का नाश नहीं हुआ है। जिन घरों में वह काम करती थी, वह अब तक पारो का परिवार बन चुके थे। तेज़ बुखार से तपती लगभग बेहोश पारो ने जब अस्पताल में खुद को दाखिल देखा तो अपनी आँखों में भरे आँसुओं को चुन्नी से पोंछ लिया। 
 
सरूपा को पारो ज़हर-सी लगने लगी थी। “अरे सरूपवा! तेरी बीबी तो बड़ी उड़ने लगी है।”

आसपास के लोगों और बहनोई की व्यंग्योक्तियाँ सुन पारो का भर्तार होने, मर्द होने का दम्भ जिस क़दर पददलित हुआ था किसी से छुपा न रहा था। आसपास की कामवालियाँ पारो की हमदर्द बन चुकी थीं। उस खाली पड़े मॉल में सबका जमघट्टा लगा रहता। खाना खाने और आराम करने के लिए कोई और जगह न थी। एक दिन लकड़ी की सीढ़ी से सरूपा गिर गया। नंदोई शराब के नशे में धुत पड़ा था। पारो ने फोन करके मीना के बेटे को बुला लिया और पति को पास के सरकारी अस्पताल ले गई। सक्षम पत्नी ने एक बार फिर उसका गौरव छीन लिया। अहसान मानने की जगह पारो को सज़ा देना सरूपा को लाज़िमी लगने लगा। उसने तय किया कि वह अपना बेटा अपनी बहन के नाम कर देगा और पारो एक बच्चा और पैदा कर लेगी। रात भर नशे में बड़बड़ाता रहा। 

“बड़ी अकड़ती है। बच्चा होगा तो कैसे जायेगी काम पे। देखता हूँ। किसन को पन्नी के नाम कर दूंगा। तब तो करेगी एक बच्चा और। सारी अकड़ निकाल दूंगा साली की।"

 पारो उबल पड़ी। वह इस हमले के लिए कतई तैयार न थी। अगली सुबह पारो कहीं न थी। बेटियाँ डबलरोटी खाकर स्कूल चली गईं। पारो देर शाम को लौटी। सरूपा के बार-बार पूछने पर भी न बताया कि कहाँ थी। सरूपा उबलता रहा। दूसरे दिन वह कहीं न थी। सुबह के छह बजे थे। काम पर वह 9 बजे जाती थी। सरूपा का मन खटक ही रहा था कि गाँव से फोन आ गया। पारो रास्ते में थी। उसने ससुर को अपने आने की सूचना दे दी थी। पर वह ससुराल न जाकर सीधे गाँव के प्रसूति गृह चली गई। और बच्चे पैदा ही न हों, जड़ ही काट दी जाय। पढ़ी-लिखी, उच्च पद पर कार्यरत मैं भी शायद इतनी हिम्मत न दिखा पाती। धीरे-धीरे कदम रखती प्रसूति गृह की सहायिका के साथ थकी पारो को आते देख साइकिल पर आते ससुर रुक गए। सकते में वह भी कम न थे। समझ तो सब गये थे। कहा कुछ नहीं, बस पारो को साइकिल पर बैठा दिया और स्वयं पैदल चलकर उसे घर ले आये। 
 
अचानक माँ को दादा की साइकिल पर बैठा आते देख पारो का बेटा किशन कुछ समझ नहीं पाया। गाँव में हवा की तरह पारो की हठधर्मिता के चर्चे हो रहे थे। पारो की माँ छाती पीट-पीट कर तांडव कर रही थी, “अरे! क्या एक बेटा पैदा कर हमें न दे सकती थी? मूल ही नसा दिया।” सरूपा फोन पर ही बलबला रहा था। सारे कुचक्रों और षडयंत्रो को अपने एक बुलंद निर्णय से धराशायी कर पारो न जाने क्या सोच धीरे से मुस्कराई। जमीन पर बिछी चटाई पर लेटी माँ किशन को कोई अनजान औरत लग रही थी। सास-ससुर की सहमति ने पारो की सारी थकन दूर कर दी थी। अब वह चिकना घड़ा बने लोगों की बातें सुन भर रही थी। कुछ समय बाद चाय पीते हुए बिस्कुट कुतरते हुए पारो ने हौले-से किशन से पूछा, “बहनों के पास चलेगा? वहीं रहना अब?”

 सरूपा सब जान तो चुका ही था। उसकी नाक तले पारो इतना बड़ा क़दम उठा लेगी उसने सोचा न था। पारो ने अपना महल खुद बनाया था, उसके निर्णय और हिम्मत के ईंट-गारे से बना महल। मज़बूत इरादों और तीनों बच्चों के साथ मुस्कुराती पारो जिस नए सफ़र पर चल पड़ी थी वहाँ से उसे कोई वापिस नहीं लौटा सकता था। 

सेतु, अक्टूबर 2020

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