व्यंग्य: साठोत्तरी साहित्यकारों की प्रवृत्तियाँ

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

अस्वीकरण (डिस्क्लेमर) - यदि आप साठोत्तरी हैं तो आपमें ये प्रवृत्तियाँ बिल्कुल नहीं हैं। फिर भी, इस शोधपत्र को पढ़ें अवश्य, आपके लिए यह जानना सुखद और लाभकारी होगा कि आपके समकालीनों की रुचियाँ कितनी मनोहारी हैं।

कालांतर में भ्रम नहीं रहे इसलिए विषय प्रतिपादन के पूर्व ही साठोत्तरी शब्द की सम्यक परिभाषा हो जाना चाहिए। साठोत्तरी से मेरा तात्पर्य ऐसे साहित्यकार से है जो साठ बसंत पार कर चुका है और अब वह स्थिरप्रज्ञ हो गया है, न उम्र बढ़ रही है, न ज्ञान। हिंदी साहित्य के वीरगाथाकाल से लगाकर भक्तिकाल में ऐसे साहित्यकारों को सठियाया कहा गया है। अति आधुनिककाल में गृह मंत्रालय, ज्ञानपीठें, सृजनपीठें, भाषा परिषदें और अकादमियाँ अस्सी वर्ष की औसत उम्र के साहित्यकारों को सठियाया नहीं  मानतीं। मेरे विचार से, पुरस्कृत हो रहे किसी भी साठोत्तरी साहित्यकार को सठियाया मानना, हमारी परम उपकारी प्रबुद्ध संस्थाओं की सामूहिक बुद्धि का उपहास उड़ाना होगा। इसलिए साठोत्तरी के लाक्षणिक अर्थ 'साठ साल से अधिक की उम्र का साहित्यकार' को पारिभाषिक रूप में हमें साठ से निन्यानबे साल की उम्र का साहित्यकार मानना चाहिए। अथर्ववेद की सुक्ति है जीवेत शरद: शतम्, साठोत्तरी के बाद अगला स्टेशन शतक को माना गया है।

साठोत्तरी हिंदी साहित्य में बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। अधिकांश साहित्यकार इस पड़ाव तक आते-आते शुद्ध साहित्यकार बच गए होते हैं। वे साहित्येतर नौकरियों से सेवानिवृत्त कर दिए गए होते हैं। उन्हें किसी सृजनपीठ या समकक्ष संस्थान का कोना न मिले तो वे अख़बारों के रविवारीय से लगाकर किसी त्रैमासिकी में आसन बिछाने के लिए उपलब्ध होते हैं। उनके शेष जीवन का एकमात्र उद्देश्य अंतिम समय तक हिंदी की सेवा करने का गौरव पाना होता है। लोग उन्हें सेवा करने नहीं देते हैं या वे सेवा कर नहीं पाते यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, भाव महत्त्वपूर्ण है। भाव धारण करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है और वे इसे करके ही रहते हैं।

साठोत्तरी पड़ाव, साहित्यकार के जीवन का मध्य बिंदु है। इसके एक ओर नए-नए वादों, धाराओं और वैचारिकी से लबरेज युवा साहित्यकारों की फौज है। युवा, साहित्य से सारी वर्जनाओं को तोड़कर, अपने घर को छोड़कर शेष सभी घरों, गली-कूचों को उन्मुक्त साहित्य से समृद्ध देखना चाहते हैं। साठोत्तरी के दूसरी और सत्तरोत्तरी, पचहोत्तरी, अस्सीओत्तरी आदि-आदि अनंत ज्ञानवान साहित्यकारों की थकी सेना है जो ललचाई दृष्टि से युवतर साहित्यकारों को घूर रही है। उनसे संवाद करना चाहती है, उन्हें बताना चाहती है कि वे अजायबघर नहीं हैं, वे साहित्य के पहरेदार रहे हैं, उन्होंने भी बहुत लिखा है। उनके मन में प्रेम का अजस्र स्रोत बहता है जो अनुकूल परिस्थितियों में उमड़-उमड़ कर आता है। रीतिकाल को वे रतिकाल का पर्याय मानते हैं। आप मेरे कम लिखे को ज़्यादा समझना और उसकी पूर्णता में समझना, प्रेम प्रसंगों की व्याख्या करना व्यंग्य का विषय नहीं है।
साठोत्तरी की लेखन विधा कुछ भी हो किंतु उनकी ग्रंथियों में कविता सदैव रक्त की तरह प्रवाहित होती है। वे सर्वज्ञाता होते हैं, इसलिए वे जिस भी विषय पर बोलें विषय से परे हट कर धाराप्रवाह बोलते हैं। उनके व्याख्यान का विषय कुछ भी हो उनके अवदान का सारांश वरिष्ठों और समकालीनों की निंदा ही होता है। साहित्यिक निंदा को आलोचना कहना हमारी प्रतिष्ठित परंपरा है। साठोत्तरी, ईश्वर और अपने आसपास के प्रति आसक्ति से भरा होता है। वक़्त-बेवक़्त वह अस्पताल के जीवित यंत्रों के प्रति भी अप्रकटन योग्य आसक्ति व्यक्त कर देता है। प्रेमाभिव्यक्ति को दोहराते हुए वह अनर्गल भी दोहराने लगता है। उसका दिमाग़ यह विश्लेषित नहीं कर पाता कि उसके श्रोता और पाठक उसके मुखारविंद से ये बातें कई बार उद्गारित होते देख चुके हैं।

साठोत्तरी अपने समग्र विवेक में ये मानते हैं कि वे अवसरवादी नहीं है, पर उनके सहगामी उन्हें पक्का अवसरवादी सिद्ध करके ही दम लेते हैं। इसलिए साठोत्तरी अपने खेमे में अधिक से अधिक युवा साहित्यकारों को भरना चाहते हैं। वे युवाओं को बड़े ध्यान से सुनते हैं, उनके रचना कर्म पर बिना माँगे सलाह देते हैं। यदि युवा अब तक एकलव्य जैसा निर्गुटी रहा हो तो वे अपना द्रोणाचार्यत्व उन पर न्योछावर करने सहर्ष तैयार हो जाते हैं। युवा अभी तक पुस्तकाकार नहीं हुआ हो तो साठोत्तरी उसे अपने निधि-रहित संसाधनों के उपयोग का इशारा करते हैं। आगामी क़िताब के लिए दो शब्द, प्राक्कथन, पुरोवाक्, भूमिका आदि-आदि कर्णप्रिय आलंबनों का पिटारा खोल देते हैं। साठोत्तरी की एकमेव चेष्टा होती है कि युवा उसके स्नेह को जाल नहीं वरिष्ठ का उदात्त व्यक्तित्व समझें। उनके कुछ संस्मरण भविष्य में उपयोग के लिए अपनी डायरी में लिख लें। सतर्क युवा, साठोत्तरी को चूका हुआ और आया-गया समझकर उपेक्षा भाव से देखते हैं। उन्हें ज्ञात है कि साठोत्तरी मूलतः कम लिखता है, ख़ुद पर ज़्यादा लिखवाता है। साठोत्तरी मन ही मन कुढ़ता है, अपने युवा-काल को याद करता है और परंपरा पर मुस्कुरा लेता है। नवयुवा लेखक समझ जाता है कि साठोत्तरी घाघ है, भड्डरी है, अपने उद्देश्य के निहितार्थ साँठगाँठ करके ही वह दम लेगा। वह यह समझता है कि सत्ता के इर्द-गिर्द रह कर ही सत्ता का स्पर्श किया जा सकता है। सत्तावान साठोत्तरी पारस है, वह इतना अनुभव समृद्ध तो है ही कि लौह अयस्कों को आकर्षित कर सके।

साठोत्तरी जानता है कि अन्य साठोत्तरी और तदोपरी साहित्यकार उसके ख़ास काम के नहीं हैं। वे न ढंग से कलम पकड़ सकते हैं न कंप्यूटर पर टाइप कर सकते हैं। वाटस्ऐप और फेसबुक संस्कृति में उन्हें बधाई लिखने और लाइक करने से ज़्यादा नहीं आता, ट्विटर उनके लिए चिड़िया है। आने वाली नई किताबें उनके लिए बोझ हैं। वे पढ़ नहीं सकते, बस सिर्फ चर सकते हैं, भरा खेत हो तो तेज़ी से चर सकते हैं, खाली खेत हो तो जुगाली कर सकते हैं। वे संवेदना में शोक वक्तव्य भी देते हैं तो दिवंगत का नाम बदल देने के बाद, मृत आत्मा की शांति की कामना तक उनका पाठ एक-सा रहता है। वे इतने घिसेपिटे संस्मरण सुनाते हैं कि ये संस्मरण अप्रकाशित, अप्रसारित एवं मौलिक होने की प्राथमिक शर्त भी पूरी नहीं करते। और जब किसी पुरस्कार के लिए अनुशंसायें भेजना हों तो वरिष्ठ साहित्यकार को उसका नाम तक याद नहीं आता। ऐसे भूलक्कड़ और निरर्थक साहित्यकारों के बीच रहना साठोत्तरी को अपना अवमूल्यन लगता है। 

साठोत्तरी की सबसे बड़ी पीड़ा है उसके शारीरिक वज़न में निरंतर गिरावट। जितनी देर में युवा दो रसमलाई गटक जाता है और गर्मागर्म पकौड़ियाँ हथियाते हुए अपनी प्लेट भरी की भरी रखता है, साठोत्तरी अपनी सीमित भक्षण क्षमता के कारण उतना उदरस्थ नहीं कर पाता। येनकेन वह माल गले के नीचे उतार भी ले तो उसकी कुंठित पाचन ग्रंथियाँ वांछित फल नहीं देतीं। युवा से इस मोर्चे पर पिछड़ना उसे बहुत बुरा लगता है।

साठोत्तरी की साहित्य के अलावा जो दृष्टिगोचर प्रवृत्तियाँ हैं उन्हें लिपिबद्ध करना मुझ जैसे अल्पज्ञानी के लिए कठिन है। समाजशास्त्रीय या व्यवहारशास्त्र के विषय में व्यंग्यकार को टाँग नहीं अड़ाना चाहिए। साठोत्तरी हमेशा चिंतन मुद्रा में रहता है पर चिंतन कभी-कभी ही निसृत हो पाता है। गांधीजी ने अपने चिंतन काल में तीन बंदरों का सृजन किया था। यह विवाद का विषय हो सकता है, पर उनका प्रतिदर्श निश्चित ही साठोत्तरी रहा होगा। वह अकेला ही तीन बंदरों के चिंतन का प्रतिरूप बनने की सामर्थ्य रखता है।

साठोत्तरी साहित्यकार को अपने मौलिक लेखन से अधिक अन्य समकालीनों के अमौलिक लेखन की अधिक चिंता रहती है। अन्य साठोत्तरी जब अमौलिक भी नहीं लिख पा रहे हो तब उसे आत्मशांति मिलती है। वह गर्वोन्मत्त सोचता है कि अपनी पीढ़ी में वह अकेला शेष है जिसका दिमाग़ कुंद नहीं हुआ है। पूरे जीवन में जो अक्षर उसने बोये हैं उनकी फसलें काटने का समय आ गया है। अब फसलों को पुरस्कार के रूप में फलीभूत होना चाहिए, रॉयल्टी के कटोरे में नहीं। उसने चाहें व्यंग्य लिखे हो, उसे पुरस्कार तो निबंध श्रेणी में भी मिल सकते हैं। विद्वतजन उन्हें निबंध नहीं समझें तो आलोचना तो मान ही लें। निर्णायक समिति व्यंग्य को आलोचना भी नहीं समझे तो लानत है उन धूर्त लोगों की बुद्धि पर।

पुरस्कार स्थापकों को लेखक को पुरस्कार सादर देना चाहिए। क्या लिखा, कब लिखा और क्यों लिखा, इसका पुरस्कार से क्या लेना-देना। अपुरस्कृत साठोत्तरी को अपना लेखन कलंक जैसा लगता है। ऐसे में उसके मित्र ही उसे सहारा (पुरस्कार) दे सकते हैं। अपुरस्कृत साठोत्तरी को आत्महत्या का भाव नहीं आता पर परहत्या का भाव उस पर हावी रहता है। 

रक्तरंजित पात्रों पर हमारी अहिंसक लेखनी से व्यंग्य समृद्ध हुआ या नहीं, मैंने इसकी पड़ताल करवाई तो ज्ञात हुआ कि हमने जिन-जिन पर व्यंग्य लिखे वे राजनेता, पुलिस, आला अधिकारी आदि सब बहुत समृद्ध हो गए। बस व्यंग्य और व्यंग्यकार अभी भी मंच संचालकों के आगे-पीछे लगे हैं। साहित्य के इन आतंकवादियों का साठोत्तरी रचनाकारों के प्रति कुछ कर्तव्य बनता है कि नहीं। हर साल जितने नए स्मृति पुरस्कार घोषित हो रहे हैं साठोत्तरी को उनके नियम-कायदे, निर्णायक और पुरस्कार राशि सब पता होती है। साठोत्तरी इन पुरस्कारों को अपने रचनाकर्म से सुशोभित कर मान दिला सकता है और पुरस्कार को साहित्य में प्रतिष्ठा दिला सकता है। साठोत्तरी को जो भी पुरस्कार मिले वह उसे सोशल मीडिया से लेकर प्राचीन मीडिया तक में प्रतिष्ठित करवा कर ही दम लेता है। इसके बावजूद साठोत्तरी की मुख्य पीड़ा है हिन्दी वालों को पुरस्कार देर से मिलते हैं। पुरस्कारदाता यह नहीं सोचते कि नौ महीने में आदमी का बच्चा पैदा हो जाता है। यदि रचनाकार को पुरस्कार उसके लेखन शुरू करने के नौ महीने बाद मिल जाता तो वह आज कहाँ होता, उसका लेखन कितना समृद्ध होता, अब तक बड़े-बड़े पुरस्कार उसके नाम होते। कोई नहीं सोचता कि इस चक्कर में हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार बिना नोबेल पाये ही स्वर्ग सिधार गए, गाड़ी स्टेशन पर लेट लगती है तो हर स्टेशन पर लेट ही पहुँचती है। 

पुरस्कृत साठोत्तरियों के पास मुद्रा तो नहीं टिकती पर इतने शाल-दुशाले इकट्ठे हो जाते हैं कि वह किसी ख़ास प्रसंग पर उनसे अपने पूरे परिवार की सफारी सिलवाने की या सेल लगाने की सोचता है। अंतिम समय में तिरंगा नहीं मिला तो एक ही शाल काम आने वाली है। पुरस्कारदाता शाल-वापसी को मुद्रा से जोड़ दें तो वे शाल का पुनः-पनः उपयोग कर सकते हैं और प्रसन्नचित्त हो, साठोत्तरी मुद्रा का। साठोत्तरी अपनी रचनाएँ भूल सकता है पर प्राप्त अभिनंदन पत्रों, प्रशस्ति और मानपत्रों का आलेख उसे कंठस्थ हो जाता है। पदकों से घर की बैठक का रौब बढ़ जाता है। रचित साहित्य का मुखर प्रदर्शन उसे लोग करने नहीं देते पर पदक प्रदर्शन से उसे कौन रोक सकता है।
साठोत्तरी शब्दों के पर्याय और विलोम का महाज्ञाता होता है। आपके सामने वह आपके बारे में इतना उत्तम संभाषण करता है कि आप तत्काल उसे अपने आगामी जन्मदिवस समारोह का मुख्य वक्ता बना लेते हैं। आपकी पीठ के पीछे यह महाप्रशंसक आपके बारे में जो विलोम शब्दावली चुनता है, आपकी इच्छा होती है कि आप उसके लिए किसी को सुपारी दे दें। मेरा एकालाप पढ़ते-पढ़ते आपकी जिज्ञासा यह जानने में भी हुई होगी कि मैं किस उम्र वर्ग का हूँ। मैं समाधान करना चाहता हूँ, महिलाओं और साठोत्तरी जैसे दिखने वाले साहित्यकारों से उनकी उम्र पूछना सामाजिक अपराध है, जिसके लिए आपको गालियाँ पड़ सकती हैं, हिंदी का साठोत्तरी साहित्यकार इसमें महाप्रवीण है।
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