हम और तम

मुरलीधर वैष्णव

- मुरलीधर वैष्णव

पूर्व न्यायाधीश व वरिष्ठ साहित्यकार
चलभाष: +91 946 077 6100
'गोकुल' ए-77, रामेश्वर नगर, बासनी प्रथम, जोधपुर-342005

’तमसो मा ज्योतिर्गमय’, अंधकार से प्रकाश की ओर चलें इस शाश्वत उक्ति के भावार्थ को कौन नहीं जानता कि हमें तमोगुण प्रवृति को त्याग कर सन्मार्ग रूपी प्रकाश की ओर अग्रसर होना चाहिए लेकिन रात के सुरमई अन्धेरे और फिर प्रातः के प्रकाश जैसे प्रकृति के शाश्वत क्रम में आज यदि हम तम अर्थात् अंधेरे के महत्व पर गौर करें तो हम पाते हैं कि हमारा जितना गहरा सम्बन्ध प्रकाश से है उससे कम गहरा सम्बंध अंधेरे से भी नहीं है।

अन्धकार प्रकाश से वरिष्ठ है। प्रकाश की तो उत्पति हुई। अन्धकार तो पहले से था। प्रकाश की अनुपस्थिति ही तो अन्धकार है। अर्थात् जिसे उपस्थित होना होता है उससे पहले उसे उत्पन्न होना आवश्यक है। अन्धकार को उत्पत्ति और उपस्थिति से क्या लेना देना!

अन्धेरा सहज और आरामप्रद है। बच्चे हो चाहे युवा या फिर वृद्ध, सभी अन्धेरे की गोद में सोना चाहते हैं। यदि आँखों पर थोड़ा सा भी प्रकाश पड़ रहा हो तो हमारी नींद में खलल पड़ने लगती है। गर्भ में भ्रूण अन्धेरी तपस्थली में ही समाधिस्थ रहता है। और फिर जन्म के बाद अन्धेरे में ही वह अपनी नन्हीं-नन्हीं आँखें खोलने का प्रयास करता है। आप अपने बैठक कक्ष में किसी व्यक्ति के साथ बैठे हैं और अचानक कुछ देर के लिए बिजली गुल हो जाती है। अन्धेरा हो जाता है और आप आराम से अपने चेहरे और स्नायुतंत्र को शिथिल कर लेते हैं। चेहरे की मुद्रा भी ढीली सी कर सकते हैं। क्योंकि आप आश्वस्त है कि अन्धेरा होने से कोई भी आपको देख नहीं पा रहा है। फिर जब बिजली आती है, आप अपने चेहरे व स्वयं को सावधान कर स्मार्ट दिखने का प्रयास करते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि आराम की स्थिति एवं प्राकृतिक सहजता का आनंद अंधेरे में बेहतर लिया जा सकता है।

अंधेरा आपको अपने आपसे रूबरू होने का सुनहरा अवसर प्रदान करता है। एकाग्रचित होने एवं अंर्तनिरीक्षण के लिए यह प्रकाश से अधिक उपयुक्त है। प्रकाश में कोई वस्तु या दृश्य दिखाई देने से ध्यान बँट जाता है। लेकिन अंधेरे और एकांत में आप अपने आपसे ठीक से वार्तालाप कर सकते हैं, अपने आपसे बेहतर सामना कर सकते हैं।

अंधेरा तासीर में ठंडा होता है। प्रकाश है तो फिर थोड़ा ताप भी होगा। चाहे सूरज की उष्मा हो या विद्युत की गरमी हो। हां, चांदनी इसका अपवाद अवश्य है। और वह भी इसलिए कि रोशनी के नाम पर चांद के पास जो भी है वह सूरज की कृपा से है।

अधिकतर सृजन अंधेरे में ही होता है। कृष्ण जैसे पूर्णावतार का जन्म भी कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आधी रात में कंस की अंधेरी काल कोठरी में ही हुआ था। सूरदास एवं कीट्स जैसे महाकविगण के जीवन में अंधेरा होते हुए भी उन्होंने जो अद्भुत एवं दिव्य काव्य सृजन किया। उसका आलोक हमारे सामने हैं। यहां तक कि जो चक्षुवान कवि या साहित्यकार हैं उन्हें भी श्रेष्ठ सृजन के लिए आंखे बंद कर अन्धेरे से ही अपने विचार, कल्पना और भावनाओं की अभिव्यक्ति को आकार देना होता है।

रात अमावस्या की बहन होती है तो शुक्लपक्ष या पूर्णिमा की रात चांद की सहेली (बकौल गुलजार) हो जाती है। अमावस की रात सितारों की क्या मजाल कि वे गुप्प, अंधेरे को खत्म या कम कर दें। जैसे किसी चित्र की चमक और सौन्दर्य उसके अनुकूल पृष्ठभूमि के रंग के कारण स्पष्ट रूप से उभर आता है ठीक वैसे ही प्रकाश का महत्व गहन अंधेरे को चीरने पर ही प्रकट होता है। दीपावली जैसा दीपोत्सव अमावस्या की गहन रात्रि में अधिक प्रकाशवान लगता है।

अंधेरे की रानी, अमावस्या, का हमारे जीवन में धार्मिक और सामाजिक महत्व है। लक्ष्मी पूजन और विशेष-लक्ष्मी-पूजन तो अमावस्या की आधी रात में ही होता है। लक्ष्मी के ही एक रूद्र रूप काली को तो अमावस्या की रात्रि के रूप में जाना जाता है। फिर दीपावली की अमावस्या रात्रि को तो अनेक तांत्रिक उपासना और सिद्धियों के अनुष्ठान के लिए सर्वाधिक उपयुक्त बेला बतलाई गई है। सोमवती अमावस दान पुण्य के लिए श्रेष्ठ दिन माना गया है। भारत में श्रमिक एवं कामगार वर्ग अमावस को ही अवकाश रखते हैं।

कुछ लोग अंधेरे से काफी डरते हैं- विशेषतः बच्चे और स्त्रियां। वस्तुतः अन्धेरे से डर का कोई सम्बन्ध नहीं है। हां, जहां सावधानी या दुर्घटना टालने के लिए प्रकाश आवश्यक है वहां बात और है। मद्धिम रोशनी में सड़क पर पड़े रस्सी के टुकड़े को यदि हम सांप समझ कर डर जाते हैं तब दोष अंधेरे का नहीं, हमरे दृष्टि विभ्रम का है। रात में किसी पेड़ के पत्तों के बीच अटके पतंग की फड़फड़ाहट सुन उसे कोई भूत की आवाज समझ लें तो इसमें बिचारे अन्धेरे का क्या दोष!

यह सही है कि दुनिया में अधिकतर अपराध अंधेरे में ही किये जाते हैं जिससे कि अपराधी अन्धेरे का लाभ उठाकर भाग जाय या पहचाना नहीं जा सके। लेकिन अपराध तो दिन दहाड़े भी खूब होते हैं। करोड़ों की धोखाधड़ी और साइबर अपराध तो प्रायः दिन में ही होते हैं।

अन्धकार से हम नैराश्य का सम्बन्ध भी जोड़ लेते हैं। किसी को मधुमेह की अधिकता, स्पोंडलाइटिस या मस्तिष्क के स्नायु तंत्र की किसी कमजोरी वश अचानक चक्कर आ जाता है तो वह कहता है कि आँखों के आगे अंधेरा छा गया। इसी प्रकार किसी निकट सम्बन्धी या मित्र की दुर्घटना में मृत्यु का समाचार आपको अचानक मिले तो सदमे के कारण कुछ देर के लिए आपको कुछ भी दिखाई नहीं देता और वहीं चक्कर की स्थिति बन जाती है। आँखों के आगे अन्धेरा सा लगता है। लेकिन वास्तव में यह अन्धेरा बाहर हो जाता है कि अंदर नहीं होता। नैराश्य और सदमे के कारण मन इतना दुखी व हताश हो जाता है कि आखें ठीक होते हुए भी प्रकाश को देख नहीं पाती। अब इसमें बाहरी अंधेरे का क्या दोष!

यदि हमारी जीवन शैली आसक्ति रहित एवं सम्यक प्रवृति की है तब अवश्य ही हमारा मन इतना दृढ हो सकता है कि नैराश्य को पास फटकने ही न दे। और रही बात सदमे की तो उसे तो कोई वैसे ही जज्ब कर सकता है जैसे एक मजबूत शोकर्स वाली कार झटकों को जज्ब करती है।

एक पौराणिक रोचक प्रसंग के अनुसार एक बार अंधकार के नेतृत्व में राग (आसक्ति), मुग्धता, चंचलता, कुटिलता, कठिनता, क्षीणता एवं मंदगति जैसे दोष एकत्रित होकर ब्रह्माजी के पास गये और बोले कि हमें लोग दुर्गुण मान कर पास नहीं फटकने देते।हे विधाता, हमें भी आपने ही बनाया है। हमारी भी तो कोई शरण स्थली होनी चाहिये। आखिर हम कहाँ जाए?

इस पर ब्रह्माजी ने अन्धकार को सलाह दी कि तुम अपने इन साथियों के साथ श्री राधारानी की शरण में जाओ और उनसे प्रार्थना करो। श्री राधे ही तुम्हारा कल्याण कर तुम्हारी शरण स्थली की व्यवस्था कर सकती है। इस पर वे सभी श्री राधे के पास गये और उनसे अनुनय विनय की।

श्री राधे ने अन्धकार एवं उसके साथियों की पुकार सुन कर सभी को अपनी देह एवं व्यक्तित्व में इस प्रकार से शरण दी कि गहन अन्धकार के काले पन को उन्होंने अपने सुंदर लम्बे केशों में धारण किया। अपनी भौंहों में कुटिलता, अधरों में राग, मुखार्विन्द में मुग्धता, सुनयनों में चंचलता, वक्ष में कठिनता, कमर में क्षीणता तथा अपनी मंद मंद चाल में मंद गति को धारण कर बरसाने वाली ने सभी दोषों पर कृपा बरसाई। संस्कृत में इसका श्लोक इस प्रकार हैः--

केशान् गाढ़तमो भ्रुवोः कुटिलता रागोधरं मुग्धता
चास्यं चंचलता क्षिणि कठिन तोरोजो कटिं क्षीणता।
पादो मंद गतित्व माश्रय दहो दोषास्त्व दंगाश्रया
प्राप्तां सदृणतां गताष्च सुतरां श्री राधिके धन्यताम्।

प्रिय सुधि पाठकगण, दिपावली के प्रकाशोत्सव अवसर पर इस विचारोभिव्यक्ति से मेरा तात्पर्य यह कतई नहीं है कि मैं अन्धेरे की वकालत कर रहा हूँ। नहीं, बिल्कुल नहीं।

हमारे जीवन में जितना भी दुर्गुण रूपी तमस है उसे मिटाकर हम सद्गुण रूपी प्रकाश की ओर निरंतर अग्रसर रहें, यही हमारा ध्येय होना चाहिए और यही दिपावली की वास्तविक सीख है।

लेकिन फिर भी, यह जो अन्धेरा है, वह भी तो प्रकृति का ही एक महत्वपूर्ण अंग है। यह न होगा तो हमारे उल्लु और चमदागड़ जैसे सह-जीवों का क्या होगा? और हां, इसी बहाने हम सहज, एकाग्रचित, सृजनशील, स्वपरिचित और सावधान तो रह पायेंगे।

क्या अब भी अंधेरे से डरने या उससे नफरत करने की आवश्यकता है? क्या हम तम के इस उजले (सकारात्मक) पक्ष को स्वीकार करना चाहेंगे?

सेतु, अक्टूबर 2020

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