गोपाल सिंह नेपाली की कविताओं में प्रकृति चित्रण के विविध आयाम

लल्टू कुमार

शोधार्थी, हिंदी एवं भारतीय भाषा विभाग, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़
चलभाष: +91 9868330823, ईमेल: laltoo.prakash@gmail.com


बिहार के चंपारण जिले में बेतिया नामक स्थान पर 11 अगस्त 1911 को गोपाल बहादुर सिंह का जन्म हुआ था। पिता रामबहादुर सिंह फ़ौज में थे। साधारण परिवार में जन्मे इस बालक की शिक्षा-दीक्षा बेतिया में ही हुई। जन्मजात कविता रचने की प्रतिभा के चलते अपने पहले काव्य संग्रह के प्रकाशन से पूर्व ही वे लोगों के बीच काफी चर्चित हो चुके थे। राष्ट्रप्रेम, प्रकृति प्रेम एवं मानवीय संवेदना के धनी गोपाल बहादुर सिंह बड़ा होकर गोपाल सिंह नेपाली के नाम से साहित्य जगत के साथ-साथ सिनेमा और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाया। वे एक सफल कवि के आलावा सिपाही, खिलाड़ी, गीतकार, फिल्म निर्माता, निर्देशक और पत्रकार थे। पंजाब रेजिमेंटल सेंटर में एक प्रशिक्षक के तौर पर तैनात नेपाली को जब फरवरी 1942 में पदोन्नति करके हवलदार बना दिया गया तो इसके बाद उन्होंने हॉकी, बास्केटबाल, अंतर-रेजिमेंटल, राष्ट्रीय स्तर की चैम्पियनशिप तथा क्रॉस कंट्री रनिंग में अपने रेजिमेंट का प्रतिनिधित्व किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में रतलाम टाइम्स, चित्रपट, सुधा और योगी नामक पत्रिकाओं का संपादन करके एक आदर्श स्थापित किया। चार दर्जन से अधिक फिल्मों के लिए गाने लिखकर, ‘हिमालय फिल्म्स’ और ‘नेपाली पिक्चर्स’ की स्थापना करके, नजराना, सनसनी और खुशबू जैसी चर्चित फिल्मों के निर्माण से सिनेमा के क्षेत्र में भी अपना सहयोग दिया। इसके साथ ही उमंग, पंछी, रागिनी, नीलिमा, पंचमी, सावन, कल्पना, आँचल, नवीन, रिमझिम, हिमालय ने पुकारा और हमारी राष्ट्रवाणी नामक काव्य संग्रहों की रचना करके साहित्य जगत में भी अपना बहुमूल्य योगदान दिया।
कविता के क्षेत्र में नेपाली का आगमन सन् 1930 में हुआ। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का यह वह दौर है जब एक तरफ स्वाधीनता आंदोलन तेज हो रहा था और दूसरी तरफ ब्रिटिश हुकूमत का दमनचक्र बर्बरता की सारी सीमाएं पार कर रहा था। विदेशी सत्ता के दलाल-चाटुकार जमींदारों, रायबहादुरों और अधिकारीयों-कर्मचारियों द्वारा राष्ट्रीय आन्दोलन के सत्याग्रहियों और क्रांतिकारियों के खिलाफ दुष्प्रचार किया जा रहा था। ऐसे राजनीतिक माहौल में प्रकृति प्रेमी नेपाली की कलम से राष्ट्रप्रेम की कविताएं निकलने लगी। क्योंकि देश के तात्कालिक वातवरण का नेपाली पर गहरा असर हुआ और यही कारण है कि उनकी कविताओं में स्वाधीनता-संग्राम के विभिन्न चरणों की गहरी पड़ताल के साथ ही दरिद्र, दास, और दुखी भारत की छवि मौजूद है। नेपाली के उपर 12 अगस्त, 2018 के जनसत्ता में ‘मूल्यांकन: जनमुक्ति का योद्धा कवि’ शीर्षक से प्रकाशित रविवारी में लिखा गया है, -“प्रेमचन्द की भांति उनकी दृष्टि भी मात्र राजनीतिक स्वाधीनता पर केंद्रित न थी, उनकी चेतना के केंद्र में न केवल किसान-मजदूर थे, बल्कि उनकी दृष्टि भारतीय समाज को छिन्न-भिन्न करने वाली, उसे रक्त-रंजित कर निर्बल करने वाली वर्ण-व्यवस्था और सांप्रदायिकता को भी भली-भांति देख-समझ रही थी।”1 यहाँ नेपाली की तुलना प्रेमचंद जैसे साहित्य सम्राट से होना किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है। प्रेमचंद से तुलना इनकी रचनाओं में उल्लेखित इनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समझ को उजागर करता है। लेखन की विषयवस्तु को लेकर नेपाली की यह समझ ही उन्हें एक बड़ा रचनाकार बनाता है। इस संदर्भ में डॉ। वीरेंद्र कुमार सिंह लिखते हैं, -“नेपाली के लिए भाषाशैली से अधिक महत्त्वपूर्ण कविता की अंतर्वस्तु है। यही वजह है कि कई बार कविता की शास्त्रीयता का अतिक्रमण कर वे सीधे जनता से जुड़ पाते हैं।”2 उपरोक्त दोनों कथन के सन्दर्भ में ‘चित्र’ कविता की यह पंक्तियाँ देखना समाचीन होगा- “लटक रहा है सुख कितनों का आज खेत के गन्नों में / भूखों के भगवन खड़े हैं दो-दो मुट्ठी अन्नों में / कर जोड़े अपने घरवाले हमसे भिक्षा मांग रहे / किंतु देखते उनकी किस्मत हम पोथी के पन्नों में / जिसका जीवन ही खप जाता अपना दुखड़ा रोने में / छोड़ एक आंसू वह क्या दे और आपको दोने में / छोड़ क्षीरसागर को अब तो रहते हैं प्रभु और कहीं / लेटे छप्पर-हीन कुटी के भीतर, खर पर, कोने में / जिस बर्तन में छेद हो चुका देर न उसके चूने में / इसीलिए थी दौड़-धूप रे इतनी उस दिन पूने में / बिछड़े परिजन मिले, बढ़ाते हाथ प्रेम का मिलाने को / पर जाता सम्मान हमारा उन हरिजन को छूने में।”3  
नेपाली की कविता में प्रकृति शब्द का प्रयोग मनुष्य से इतर समस्त सृष्टि के लिए हुआ है। इसकी परिधि में पशु-पक्षी, वृक्ष, फूल, पर्वत, झरने आदि सब चले आते हैं। वैसे भी प्रकृति शब्द जब हम कहीं सुनते हैं तो झरनों का संगीत हमारे कानों में गूंजने लगता है। कोयल के कूकों की तान मन को मोहने लगती है और विहंगों का कलरव हमें अपनी ओर आकर्षित करने लगता है। कविता और साहित्य में प्रकृति की इसी छँटा का कवियों और रचनाकारों के द्वारा चित्रण किया जाता है तथा इसी चित्रण के आधार पर कवि और रचनाकारों का आलोचकों एवं पाठकों द्वारा मूल्यांकन भी किया जाता है।
गोपाल सिंह नेपाली की प्रारंभिक रचनाओं में प्रकृति से गहरे लगाव का एहसास होता है। इनकी कविताओं में चित्रित प्राकृतिक सौन्दर्य की जो छंटा उभरकर सामने आती है उसे देखकर लगता है कि नेपाली का बचपन से ही प्रकृति के साथ गहरा लगाव रहा है। इस संदर्भ में मुहम्मद तौफ़ीक खां लिखते हैं, -“कविवर पन्त की जन्मभूमि ‘कसौनी’ की तरह कविवर नेपाली की जन्मभूमि भी प्रकृति की क्रीड़ा स्थली ही थी। बचपन से ही वे किसी निर्झर के तीर अनगढ़ शिला पर बैठे घंटों प्रकृति का सौन्दर्य निहारा करते थे और तन्मय होकर गुनगुनाने-गाने लगते थे।”4 इस कथन से सम्बंधित कवि की यह पंक्ति देखिये – “कंकड़-धुल, फूल-काँटों का / वह वन-देश निराला रे ! / चंचल जल में पाँव डुबोए / खेल रही वनबाला रे ! / आँखों के नन्हें घेरे सी / घेर रही गिरि-माला रे। / निर्झर तीर-शीला पर बैठा / कोई गानेवाला रे ! / मधुर पदध्वनि, मधुर प्रतिध्वनि,  / मुखरित मृदु संगीत परम ! / कुंज-लता की एक आड़ में / जीवन सरल पुनीत परम !”5  यहाँ जो ‘कोई गानेवाला’ है वह कोई और नहीं स्वयं कविवर नेपाली हैं। 
प्रकृति सौन्दर्य के प्रति इसी सहज आकर्षण और तादात्म्य भाव के बल पर कवि ने निर्झर सरिता, धारा, कुंज-लता, पावस आदि के कई मर्मस्पर्शी चित्र खींचे हैं। इन चित्रों में ताजगी और अनछुई मधुरिमा तो है ही, अनुभूति का सजीव संस्पर्श भी है। उदहारण के लिए यह पंक्ति लीजिये- “सुन्दर दर्पण सहज समर्पण / अंजलि में जल छल छल। / सुख में सरला, दुःख में तरला / मीठी वाणी कल-कल !”6 
नेपाली की प्रसिद्ध कृति ‘उमंग’ की भूमिका लिखते समय छायावाद के मील स्तम्भ और प्रकृति के सुकुमार कवि पन्त लिखते हैं, “आपका कवि कंठ, निर्मल, निर्झर के समान, अवश्य ही मंसूरी की तलहटी में फूटा होगा। इसलिए आपकी रचनाओं में जो उन्मुक्त वातावरण एवं स्निग्ध अनिलाताप मिलता है वह पाठक के ह्रदय की खिड़की खोलकर ‘नरम धुप’ बिछी राहों से, विलास की मंसूरी से जंगल की मंसूरी में ले जाकर प्रकृति की मनोरम भूमि में छोड़ देता है, जहाँ जंगल की हरियाली आंचल पसार कर उसका स्वागत करती है।”7  पन्त के इस कथन की पुष्टि हेतु नेपाली की कविता से इन पंक्तियों को देखिये- “फूटा है मेरा कंठ यही रे, निर्मल निर्झर के समान / सीखा है मैंने यही तीर पर सरिता के मृदुल सरलगान / सिखलाया है नित यहीं मुझे पंछी ने उड़ना पांख खोल / है हुआ यही क्रीड़ा निकुंज में मेरे जीवन विहान।”8  
उमंग के प्रकाशन पर महाकवि निराला ने भी अपनी साकारात्मक अभिव्यक्ति देते हुए कहा है, “नवीन तारकों के सदृश जितने कवि हिंदी के काव्याकाश में चमकते हुए मुझे दिख पड़े, सौन्दर्य के सुख-स्पर्श जादू से जिन्होंने मन को वशीभूत कर लिया तथा प्रकाश और तृप्ति दी, गोपाल सिंह नेपाली उन्हीं में से एक है। जिनके काव्य में शक्ति प्रवाह, सौन्दर्यबोध तथा चारू-चित्रण एक विशेषता लिए हुए दिखई पड़ता है”9 
छायावादी परम्परा के कवि होने के बावजूद नेपाली का प्रकृति चित्रण परंपरा की परिधि में सिमटा हुआ नहीं है। वे प्रकृति के उन्मुक्त गायक हैं। उनका सरल एवं स्वाभाविक चित्रण करते हैं और यही कारण है कि इनकी रचनाओं में प्रकृति अपने वास्तविक सौन्दर्य के साथ उपस्थित हुई है।  प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पन्त प्रकृति पर आसक्त हैं, किन्तु नेपाली प्रकृति के साथ घुलमिल गया है, उसका अंग बन गया है। उदाहरण के तौर पर दोनों कवियों की अलग-अलग पंक्तियाँ प्रस्तुत है। पन्त की कविता में जहाँ “छोड़ द्रुमों की मृदुल छाया / तोड़ प्रकृति से भी माया / बाल ! तेरे बाल जाल में / कैसे उलझा दूँ लोचन ?”10 है वहीं नेपाली अपनी कविता में घोषणा करते हैं- “प्रकृति मुखिरित है वीणा एक / और मैं उस वीणा का तार”11
नेपाली के प्रकृति चित्रण में कहीं-कहीं रहस्य भावना भी पाई जाती है। उदाहरण के तौर इन पंक्तियों को लीजिये- “डाली पर श्यामा बैठी है, अनुरागी मन गाता है। / दूर देश से दूती आयी, कोई मुझे बुलाता है / आज अकेले एक वियोगी राह पूछता जाता है / कांटे है कि मनचला राही, चिन्ह पिया का पाता है।”12    
नेपाली के प्रकृति चित्रण में इन विशेषताओं के अतिरिक्त कुछ ऐसी विशेषताएँ भी हैं, जो उन्हें छायावादी कवियों से अलग करती है। उन्होंने प्रकृति को अक्षय भंडार मात्र मानकर चित्रित नहीं किया है, अपितु उसके द्वारा राष्ट्रीयता की भावना की अभिव्यक्ति की है। आलोचकों ने छायावादी काव्य को पलायनवादी काव्य की संज्ञा दी है लेकिन नेपाली की कविताओं पर यह सटीक नहीं बैठता है क्योंकि नेपाली की कविता में प्रयुक्त प्रकृति चित्रण पलायनवाद को प्रश्रय नहीं देता अपितु वह जीवन संघर्ष और कर्मवाद की प्रेरणा देती है। प्रकृति और राष्ट्र प्रेमी इस कवि ने 17 अप्रैल 1963 को अपने चाहनेवालों को अलविदा कह दिया। 

सन्दर्भ सूची: 
1. https://www।jansatta।com/sunday-magazine/gopal-singh-nepali-a-warrior-poet-of-freedom/736117/ 
2. https://www।livehindustan।com/bihar/muzaffarpur/story-gopal-singh-nepali-still-alive-in-lok-kanth-2119684।html 
3. https://www।jansatta।com/sunday-magazine/gopal-singh-nepali-a-warrior-poet-of-freedom/736117/ 
4. छायावादोत्तर गीतिकाव्य परम्परा के विकास में गोपाल सिंह ‘नेपाली’ का योगदान- मुहम्मद तौफ़ीक खाँ, पृष्ठ संख्या -122 
5. रागनी, गोपाल सिंह ‘नेपाली’, वनश्री,  पृष्ठ संख्या - 19 
6. वही, धारा, पृष्ठ सं।- 30
7. छायावादोत्तर गीतिकाव्य परम्परा के विकास में गोपाल सिंह ‘नेपाली’ का योगदान- मुहम्मद तौफ़ीक खाँ, पृष्ठ संख्या -123/ 124 
8. छायावादोत्तर गीतिकाव्य परम्परा के विकास में गोपाल सिंह ‘नेपाली’ का योगदान- मुहम्मद तौफ़ीक खाँ, पृष्ठ संख्या -124 
9. https://www।tribunehindi।com/kavi-gopal-singh-nepali/ 
10. https://kavitakosh।org/kk/%E0%A4%9B%E0%A5%8B%E0%A4%A1%E0%A4%BC_%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A6%E0%A5%81_%E0%A4%9B%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE_/_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A4
11. छायावादोत्तर गीतिकाव्य परम्परा के विकास में गोपाल सिंह ‘नेपाली’ का योगदान- मुहम्मद तौफ़ीक खाँ, पृष्ठ संख्या -124/125  
12. रागिनी, गोपाल सिंह नेपाली, वंदगी, पृष्ठ संख्या -11

सेतु, अक्टूबर 2020

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