बाजार-तन्त्र और हिंदी कथा साहित्य

- शोभा कौर


मानव जीवन और कथा साहित्य समानांतर हैं, जीवन ने कथाओं को जन्म दिया और कथाओं ने जीवन की गति को तीव्र कर दिया। बचपन में स्वप्न लोक में ले जाने वाली कथाएँ उम्र के एक दौर में झकझोर कर जगा देने का उपक्रम भी करती हैं। जीवन बदला और कथाएँ भी। आज बाजारवाद के दौर में कथा साहित्य जिस मोड़ पर पहुंचा है उसके पीछे एक लम्बी यात्रा है – जीवन की भी और कथा साहित्य की भी। ऐतिहासिक दृष्टि से हम सामन्तवाद, पूंजीवाद, उपनिवेशवाद के पड़ावों को पार करते हुए आज नव औपनिवेशिक समय के बीचों बीच खड़े हैं। भूमंडलीकरण की प्रतिक्रिया स्वरूप भारतीय सामाजिक संरचना में आमूलचूल परिवर्तन आये हैं।

भूमंडलीकरण के चलते हमारे सत्ताधीशों ने विदेशी आकाओं के लिए अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोल दिए थे। बड़े शॉपिंग मॉल, प्लाजा और मल्टीप्लेस खुल गए। यह औपनिवेशिक शोषण और लूट खसोट के एक नए युग की शुरुआत थी। कोई प्लासी नहीं, कोई बक्सर नहीं। बड़ी बेशर्मी से नव-निवेशक सत्ताधीशों को बकायदा हमारे आर्थिक और प्राक्रतिक संसाधनों को लूटने के लिए आमंत्रित किया गया। यह भारतीय जनता के लिय एक पीड़ादायक अनुभव था।1 आज के कथा-साहित्य का यथार्थ बहुविध और नानावर्णी है। बाजार के दाव-पेंच को साहित्यकार ठीक ठीक समझ पा रहे हैं। बाजारवाद का सबसे अधिक प्रभाव निम्नमध्य वर्ग या निम्न वर्ग पर सबसे अधिक पड़ रहा है। खेतिहर और दिहाड़ी मजदूरों का एक बड़ा हिस्सा उस विचारधारा से जुड़ा हुआ है, जहाँ शोषित होने के बावजूद वे मजदूर मुक्ति के लिए जन-संघर्षों से जुड़ जाते हैं। विजेंद्र अनिल की कहानी ‘विस्फोट’, मधुकर सिंह की ‘मेरे गावं के लोग’, चन्द्र मोहन की एही ‘नगरिया केहि विध रहना’, अंजना रंजन दाग की ‘मुआवज़ा’, मदन मोहन की ‘बच्चे बड़े हो रहे हैं’, मिथिलेश्वर की ‘मेघना का निर्णय’, संजीव की ‘तिरबेनी का तड़बन्ना’, विक्रम जनबंधु की ‘प्रहरी’, आदि कहानियां खेतिहर और दिहाड़ी मजदूरों पर केन्द्रित कहानियों में कहानीकारों ने खेतिहर और दिहाड़ी मजदूरों की समस्याओं को उठाया है। वास्तव में स्थान परिवर्तन के कारण इनका जीवन चक्र ही ऐसा हो जाता है कि वे अपनी प्रतिकूल स्थिति के खिलाफ कुछ भी करने में असमर्थ महसूस करते हैं। अमितेश्वर ने ‘तीलियों’, ‘धंधा’, सतीश जमाले ने ‘ठाकुर संवाद’, स्वदेश दीपक ने ‘तमाशा’, चित्रा मुद्गल ने ‘जानवर’, पंकज बिष्ट ने ‘टुन्ड्रा प्रदेश’, कर्मेंदु शिशिर ने ‘प्रतीक्षा’, विनोद मिश्र ने ‘देवर के जंगल’, विजयदान देथा ने ‘डायरी का पृष्ठ’, प्रेमपाल शर्मा ने ‘छोटेलाल छोटे खान’, धीरेन्द्र अस्थाना ने ‘बावजूद’, नासिरा शर्मा ने ‘नौ तपा’ आदि कहानियों में स्वरोजगार से जुड़े लोगों की सभी तरह की समस्याओं और अनुभवों को गहराई से उठाया है। 
समकालीन परिदृश्य में नव-औपनिवेशिक मूल्य संकट के विरुद्ध संघर्षरत कथाकारों में अखिलेश, पंकज बिष्ट, उमाशंकर, प्रत्यक्षा, उदय प्रकाश, और रणेन्द्र के नाम उल्लेखनीय हैं। अखिलेश की ‘जलडमरूमध्य और वजूद कहानियाँ’, प्रत्यक्षा की ‘लालपरी’, उमाशंकर की ‘ललमुनिया’, उदय प्रकाश की ‘वारेन हेस्टिंग का सांड और पालगोमरा का स्कूटर’ जैसी कहानियाँ नव-औपनिवेशावादी प्रक्रिया के तहत घटित मूल्य की बखूबी खबर लेती हैं। उपन्यासों में ‘काशी का अस्सी’, ‘रहन पर रग्घू’, और ‘ग्लोबल गाँव का देवता’ ऐसे उपन्यास हैं, जिनमें मूल्यगत संकट को उसकी समग्रता में निरुपित किया गया है। अब तक विराजनीतिकरण राष्ट्र राज्यों के दलाल बन जाने और राजनितिक मूल्यों के पतन की जो विवेचना हुई उसके आलोक में नव-औपनिवेशिक परिदृश्य को प्रस्तुत करने वाली प्रधान रचना ‘ग्लोबल गावं का देवता’ है।2

बाजारवाद जिन सुविधाओं का प्रलोभन बिखेरता है उसमें अपनी मौलिक जरूरतों के लिए संघर्ष करता मनुष्य निरंतर फँसता चला जाता है। आज जरूरत बाजार तय कर रहा है।रमाकांत की कहानी ‘तेवर’ में एक मामूली सी नौकरी पाते ही एक व्यक्ति का तेवर बदल जाता है। शेखर जोशी की ‘दाज्यू ‘इस परिस्थितियों को व्यक्त करती अन्य कहानी है।

एक अन्य घटना जो बाजार-तन्त्र के दुष्परिणामों को तीव्रता प्रदान करती है वह है सूचना-क्रान्ति का सत्ताधीशों के वर्ग का खिलौना बन जाना। सूचना प्रौद्योगिकी का विस्तार वैज्ञानिक विकास की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। मगर यह उपलब्धि कुछ मुठ्ठीभर लोगों के हितों से जुड़कर उस समझदारी और प्रेरणा से विरक्त हो चुकी है, जो जनता की आवश्यकताओं और क्षमताओं से पैदा होती है। किसानों की आत्महत्या, गरीब वर्गों का शोषण और सत्ता की क्रूरताएँ अब महज खबर भर हैं। विडम्बना यह है कि गहराते सामाजिक अन्तर्विरोधों के बावजूद सम्वेदना का धरातल नदारद है।

बाजारवाद ने गावं और शहर की दूरी को और भी गहरा दिया है। विस्थापन की समस्या को उघाड़ते हुए डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी ठीक ही कहते हैं, “हम लोग अपने पूर्वजों के लिए जो दिल्ली और दूसरे महानगर थे, वहीं अब हमारे लिए न्यूयार्क और अमेरिका बन रहा है। माँ बाप यहाँ रहते हैं और बच्चे अमेरिका में नौकरी करते हैं। हमने तो यहाँ तक देखा है कि पिता की मृत्य पर बेटे ने मुखाग्नि देने के तुरंत बाद ही फ्लाइट पकड़ी और चला गया। शहरी बुजुर्गों के पास पैसे तो हैं लेकिन फिर भी वह अकेले हैं और आये दिन उनके खिलाफ अपराध में बढ़ोतरी हो रही है। लूट या चोरी के इरादे से उनकी हत्या भी हो रही हो रही है।3 

नव-साम्राज्यवाद बाजार के माध्यम से हमारे जीवन-आचरण और मूल्यों को बदल और नष्ट-भ्रष्ट कर रहा है। बाजार हमारे समय का अभिशाप ही नहीं नियति भी बनता जा रहा है। हमारी सामाजिक संरचना जो मूल्य-बोध पर आधारित है, बाजार के कारण निरंतर चरमराती जा रही है। पूंजीवाद की बाजारू संस्कृति हमारे मानवीय सामाजिक पारम्परिक मूल्यों का सफाया करती है; जैसे वह प्रकृति, प्राकृतिक संसाधन स्रोतों, बोलियों, कलाओं का सफाया करती जा रही है।

 रमाकांत श्रीवास्तव की कहानी ‘चैम्पियन’ के सकारात्मक पात्र बाजारू संस्कृति या अपसंस्कृति के प्रतिरोधी पात्र हैं। कहानी वस्तुतः अपसंस्कृति के प्रतिरोध में है। आज हम जीवन के हर क्षेत्र में अवसर बेच रहे हैं। उन लोगों को दे रहे हैं, जो केवल उनका दुरुपयोग करते हैं। शिक्षा, रोजगार, व्यापार, विविध सेवाओं, सभी क्षेत्रों में जिन्हें अवसर की जरूरत है, उन्हें अवसरों से वंचित किया जा रहा है। यह कहानी पूर्णरूपेण पूंजीवादी, कृत्रिम चमक दमक वाली बाजारू अपसंस्कृति की प्रतिरोधी है। इस प्रतिरोध का लक्षण है थोड़े में काम चला लेने की क्षमता। गैर जरूरी चीजों का संचय न करना। बाजार में माल भरा है मालिकों को उसे बेचना है और लाभ कमाना है ‘चैंपियन’ कहानी में एक सकारात्मक पात्र निर्माण की भावना है डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार ‘यह रोमांटिक वृत्ति या सकारात्मक पात्र की तलाश हमारे विषम घोटू बाजारों वातावरण में ऑक्सीजन का काम करती है यात्रा का लक्षण ही है कि वह भविष्य का रास्ता देती है रास्ता वहीं से निकलता है जहाँ हम होते हैं यानी यथार्थ का परस्पर विरोधी हमें मुक्ति का रास्ता उठाता है।4 

बाजारीकरण के चलते निरीहता, बचपना, त्याग, बलिदान जैसी भावनाओं को अनावश्यक समझा जाने लगा है। ‘जलडमरूमध्य’ में एक ऐसा बिखराव है जो न सिर्फ औपन्यासिक बनता है बल्कि अंततः बाजार व्यवस्था, अनात्मीय निस्संगता, स्वार्थान्धता और पारिवारिक मूल्यों के विघटन को भी अपने में जोड़ कर सहाय बाबू के असहायता चक्र को पूरा कर देता है।

ऐसे कठिन समय में भी रचनाकार अपने गुरुगम्भीर दायित्व का वहन करते हुए लगातार साहित्य की रचनात्मक भूमिका निभा रहे हैं- संजीव और अरुण प्रकाश का नाम इस सन्दर्भ में सर्वोपरि है। ‘आरोहण’ कहानी का यह उदाहरण बहुत बड़ी प्रेरणा देता है और अकिंचन को महत्त्व भी। 

“भूप दादा के आरोहण का रूपक है ‘गिद्ध नन्ही चिड़िया से कहता है, मैं तुझे खा जाऊंगा क्योंकि मैं तुझसे ऊँचा उड़ता हूँ, तू मुझसे ऊँचा उड़ नहीं सकती। चिड़िया ने पूछा – ‘अगर मैं तुझसे ऊँचा उड़कर दिखा दूँ तो?’ गिद्ध ने उसके बचकानेपन पर हँसते हुए बोला-‘तो नहीं खाऊंगा।’ चिड़िया ने धीरज नहीं छोड़ा। ऐसे भी मरना है वैसे भी-तो क्यों न मौत से दो-दो हाथ करके मरूँ ... जान पर खेल गई चिड़िया और सारी ताकत लगाकर उड़कर जा बैठी गिद्ध की पीठ पर। गिद्ध अपनी बेहिसाब ताकत के गुरूर में उड़ता रहा, आकाश से भी ऊँचा, लेकिन चिड़िया को अब कोई डर न था। वह हर हाल में उससे ऊँचाई पर थी, मौत की पीठ पर जा बैठी थी वो।” जब मानव उद्योग को, इतिहास को व्यर्थ ही नहीं मृत घोषित कर दिया गया है और कर्म या उद्योग व्यावसायिकता का पर्याय बन गये हों, भूप का चरित्र अंधी क्रूर भागदौड़ के विरोध में स्थिरता लिए है।

वर्तमान कथासाहित्य के परिदृश्य को विविधता और विस्तार देने में महिला कहानीकारों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। महिला कथाकारों की सक्रियता नई भूमिका का आह्वान है। विषयगत नवीनता, दृष्टिकोण का साहस और विसंगतियों की पड़ताल कृष्णा सोबती के साथ साथ हमें मन्नू भंडारी, उषा प्रियंवदा, चित्रा मुद्गल, नमिता सिंह, ममता कालिया, में भरपूर मिलती है। कुछ अन्य महिला रचनाकार जिन्होंने हिंदी कहानी को समृद्ध किया है, इस प्रकार हैं- मृणाल पांडेय, मैत्रयी पुष्पा, राजी सेठ, चंद्रकांत, प्रभा खेतान, कमल कुमार, सुषम बेदी, लवलीन, गीतांजलि श्री, मधु कांकरी आदि। महिला लेखिकाओं ने सिर्फ स्त्री-पुरुष संबंधों का ही गहन और सूक्ष्म विश्लेषण नहीं किया अपितु बाजारवाद की विभीषिका पर भी लेखनी चलाई है। कृष्णा सोबती का ‘जिंदगीनामा और समय सरगम’, मन्नू भंडारी का ‘महाभोज’, चित्रा मुद्गल का ‘आवां’, मैत्रयी पुष्पा का ‘चाक’ और अलका सरावगी का ‘कलिकथा वाया बाइपास’ कालजयी उपन्यास हैं। गीतांजलि श्री के तीन उपन्यास- माई’, ‘हमारा शहर उस बरस’ और ‘खाली जगह’, विषयवस्तु और विन्यास के स्तर पर ध्यान खींचते हैं। मधु कांकरिया का उपन्यास पत्ताखोर, अपने सर्वेक्षण, सम्वेदन और सरोकार से हमें एकदम संजीव, स्वयं प्रकाश और अखिलेश की परम्परा का ध्यान करवाता है। कहीं यह उपन्यास युवा दिग्भ्रमित समाज का आख्यान बन जाता है, तो कहीं पारिवारिक संक्रमण चेतना का घोषणापत्र, तो कहीं दलित चेतना का उद्घोषक।

1990 के बाद से दलित लेखन की सुदृढ़ परम्परा देखने को मिलती है। कहानी और उपन्यास दोनों क्षेत्रों में गत वर्षों में दलितों पर हुए अत्याचारों, अन्याय शोषण की गम्भीर परख मिलती है। साथ ही दलितों, मजदूरों तथा अन्य पिछड़ी जातियों ने सामाजिक न्याय के लिए कितना संघर्ष किया उन्हें किस प्रकार से मदद मिली और कैसे और कितनी उपेक्षा का सामना करना पड़ा –इन सबका उल्लेख मिलता है। बाजार के गुणदोषों से ये लेखक परिचित हैं। बाजार ने रिश्तों की ही नहीं जरूरतों को भी पुन: परिभाषित किया है। ओमप्रकाश वाल्मीकि, तुलसीराम, श्योराज सिंह बैचेन, अनीता भारती की उपस्थिति बाजार-तन्त्र के खिलाफ सुदृढ़ रही है। उन्होंने अपने लेखन में बहुमुखी मोर्चा खोला है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि भूमंडलीकरण नव-औपनिवेशवाद का सांस्कृतिक एजेंडा है और भूमंडलीकरण का सांस्कृतिक एजेंडा मुख्य रूप से यह रहा है कि दुनिया के तमाम देशों में मौजूद सांस्कृतिक भूलता को समाप्त करके सारी संस्कृतियों को नष्ट करो। बाजारतन्त्र इसमें माध्यम की भूमिका निभा रहा है। बाजार-तन्त्र का खूबसूरत शिकंजा अनेक निमन्त्रण देता है और मनुष्य कोई न कोई मजबूरी रच कर उसमें फँसने को आतुर है।

भूमंडलीकरण ने विवेक को इतना धुंधला कर दिया है कि समाज का मूल गुण सामाजिकता भी व्यक्ति केन्द्रित हो गई है। मानो सब रिश्तेदार इकठ्ठे बैठे हों और फेसबुक पर संवाद रचा जा रहा हो। ऐसे में हिंदी कथा साहित्य इन कठिन चुनौतियों से जूझते हुए भारतीय समाज के मूलभूत गुणों को बचाने में लगा है। बाजार-तन्त्र के खिलाफ कथा साहित्य हर मोर्चे पर डटा है। 

सन्दर्भ सूत्र: 
1. कथालोचना दृश्य परिदृश्य संपादक हरिमोहन शर्मा, विनोद तिवारी, पृष्ठ 45 
2. कथालोचना: दृश्य-परिदृश्य-संपादक हरिमोहन शर्मा, पृष्ठ 139
3. भूमंडलीकरण और हिंदी उपन्यास –संपादक नीरू अग्रवाल, पृष्ठ 87-88 
4. कहानी के साथ-साथ, विश्वनाथ त्रिपाठी पृष्ठ 137

सेतु, अक्टूबर 2020

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