संयोग साहित्य पत्रिका की भूमिका

डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ल
उमेश चन्द्र शुक्ल

हिन्दी पत्रकारिता के क्षरण के इस दौर में किसी साहित्यिक पत्रिका का लगातार दो दशकों तक प्रकाशन अपने आप में बड़ी घटना है। साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के बीच मुंबई से प्रकाशित हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में संयोग साहित्य का अपना विशेष स्थान है। अपने स्थापना वर्ष 1995 से लेकर आज तक अनवरत रूप से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका संयोग साहित्य के अंक नियमित रूप से साहित्य कोश की श्री वृद्धि करता रहा। सीमित संसाधनों के साथ देना बैंक में सहायक के रूप में नौकरी करने वाले साहित्यिक रुझान के पं. मुरलीधर पाण्डेय की दृढ़ इच्छा शक्ति एवं अनवरत साधना का परिणाम है। साहित्य साधना के जुनून ने पाण्डेय जी को बैंक की नौकरी से पूर्व सेवानिवृत्ति के लिए मजबूर किया। बैंक और पत्रिका दोनों का साथ-साथ चलना चुनौती भरा पथ था। पाण्डेय जी ने संयोग साहित्य पत्रिका के स्वामित्व और संपादन को स्वीकार किया और बैंक की सेवा से मुक्त हुए। पत्रिका का प्रवेशांक 48 पृष्ठ का था। साधन का अभाव पर कुछ कर गुजरने की इच्छा शक्ति बैंक की नौकरी के साथ- साथ पत्रिका का संचालन चुनौती भरा कार्य था। पाण्डेय जी ने पूर्ण समर्पण एवं निष्ठा साथ अपने समय की विसंगतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए संयोग साहित्य का प्रकाशन किया। पत्रकारिता दोधारी तलवार पर चलने सरीखा है। इसका सही उपयोग व्यवस्था की विसंगतियों को काटता है, ज़रा सी असावधानी या लाभ-लोभ, उद्देश्य को भुलाकर विसंगति पैदा करने लगता है मुरलीधर पाण्डेय चुनौतियों के साथ सच के पक्षधर रहे ---
राह खतरों से भरा है पर ठहरता कौन है,
मौत है जीवन का सच तो सच डरता कौन है॥
आना-जाना रात-दिन पीना-पिलाना जिंदगी,
अब हलाहल हो या अमृत उससे डरता कौन है॥ -- उमेश, माटी की आवाज

पत्रिका के अंक समय पर प्रकाशित होते रहे आज तक क्रमशः लगभग 72 साधारण अंक और 09 विशेषांक प्रकाशित हो चुके है। संयोग साहित्य को देश के कई दर्जन ख्यात साहित्यकारों का स्नेह और आशीर्वाद मिलता रहा है। ऐसे दौर में जब एक-एक कर हिन्दी पत्र-पत्रिकाएँ दम तोड़ रही हो, आये-दिन किसी न किसी पत्रिका के बंद होने की खबरें मिलती हों, वहाँ किसी सरकारी एवं गैर सरकारी अनुदान के बिना संयोग साहित्य का के अंक अनवरत प्रकाशित होते जा रहे हैं, यह सम्पादक के त्याग, समर्पण एवं दृढ़ इच्छा शक्ति का सुफल है। सीमित संसाधनों के साथ अकेले एक व्यक्ति का प्रकाशन से जुड़ी सभी जिम्मेदारियों का निर्वहन किसी घटना से कम नहीं है -
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विश्व को उपहार मेरा।
पा जिन्हें धनपति, अकिंचन,
खो जिन्हें सम्राट निर्धन, भावनाओं से भरा है,
आज भी भण्डार मेरा। विश्व को उपहार मेरा" -- संयोग साहित्य के डॉ. हरिवंश राय बच्चन विशेषांक से

संयोग साहित्य ने कुल नौ विशेषांक प्रकाशित किए हैं। विशेषांक प्रकाशन की कड़ी में पहला विशेषांक जनवरी-मार्च 1995 अंक डॉ. हरिवंश राय बच्चन विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ है, जिसमें 142 पृष्ठों में कुल 32 समीक्षकों के शोध आलेख प्रकाशित हुए है। इस अंक में बच्चन जी की कुछ कविताएँ तथा पत्र भी प्रकाशित है। डॉ. नगेन्द्र, रमानाथ त्रिपाठी, वीरेंद्र जैन डॉ. गणेशदत्त सारस्वत, अनंत कुमार, विनोद कुमार, बालकवि बैरागी, आदि का साहित्यिक योगदान तथा संपादक की गहन साधना का परिणाम बच्चन विशेषांक अनुसन्धानकर्ताओं के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। बच्चन विशेषांक ने संपादक को नई दृष्टि प्रदान की, जैसे पत्रकारिता का उद्देश्य हाथ लग गया हो। बच्चन जी के शब्दों में -

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अपने से बाहर निकल देख,
है विश्व खड़ा बाँहें पसार
तू एकाकी तो गुनाहगार॥"

 
संयोग साहित्य के विशेषांकों की कड़ी में मुरलीधर पाण्डेय के सम्पादन तथा चाँद शेरी (कोटा) के अतिथि संपादकत्व में "राजस्थानी काव्य विशेषांक " के रूप में जनवरी से मार्च 2008 अंक प्रकाशित होता है। जिसमें कुल 128 पृष्ठों में लगभग 195 रचनाकारों को समाहित किया गया है। राजस्थान की शायरी की मुखर अभिव्यक्ति संपादन की शक्ति और सामर्थ्य है --
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अंगनाई छटपटा रही हैं, वापस आ
घर की चौखट बुला रही है, वापस आ
कपडे लत्ते सूख रहे हैं डौली पर
धूप अकेली नहा रही है वापस आ॥"

यह राजस्थानी कविता की सशक्त प्रस्तुति का दस्तावेजी प्रयास है। जहाँ हम काव्य परम्परा के लगभग तीन पीढ़ियों की काव्य यात्रा का बीज तत्व है।
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तुम्हें अर्पण ये मेरे शेर मेरी कल्पना के हैं
कि जैसे आरती में फूल ये आराधना के हैं॥"

 
आर. पी. शर्मा महरिष के शोध आलेख, अतिथि संपादक चाँद शेरी का कुशल संपादन एवं संपादक पाण्डेय जी का संरक्षण पाकर विशेषांक विशेष बन पड़ा है। गीत, ग़ज़ल, दोहे कविता और काव्य खण्ड को लेकर अंक सराहनीय और संग्रहणीय है। राजस्थान सरकार एवं महामहिम राज्यपाल के हाथों प्रशस्ति पत्र भी मिला।

 
पं. मुरलीधर पाण्डेय के कुशल संपादन और डॉ. प्रतीक मिश्र के अतिथि संपादकत्व में संयोग साहित्य का "उत्तर प्रदेश काव्य विशेषांक " एक बड़ी घटना है। 304 पृष्ठों में संकलित यह विशेषांक करीब 252 रचनाकारों को स्थान प्रदान करता है। उत्तर प्रदेश विशेषांक हिन्दी साहित्य के लिए दिशा निर्देशन का कार्य करता है। विशेषांक सारी विचारधाराओं को अकुंठ भाव से पत्रिका में समान स्थान देता है। अदम गोंडवी, गोपालदास नीरज, चन्द्रशेखर मिश्र, किसन सरोज, मुनीर बख्स आलम, कुँवर बेचैन, सरीखे साहित्यकारों, रचनाकारों को स्थान दिया गया है। उत्तर प्रदेश के लगभग सभी बड़े रचनाकारों को एक प्लेटफार्म पर लाकर खड़ा करने का सारस्वत प्रयास सफल रहा। सभी की प्रायः एक रचना समाहित हो पाई है। प्रकाशनार्थ लगभग 1700 पेज की सामग्री प्रतीक मिश्र के अतिथि सम्पादन में संग्रहित हुई थी। उत्तर प्रदेश विशेषांक संग्रहणीय है।

 
संयोग साहित्य के विशेषांकों की श्रृंखला में अक्टूबर से दिसम्बर 2009 अंक बिहार काव्य विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ। अतिथि सम्पादक डॉ. इंदु सिन्हा एवं पत्रिका के सम्पादक मुरलीधर के कुशल सम्पादन में यह भगीरथ प्रयास रहा। लगभग चार वर्षों के अनवरत साधना का सुपरिणाम रहा बिहार काव्य विशेषांक। बिहार काव्य विशेषांक में लगभग 150 रचनाकारों को समाहित किया जा सका है। विशेषांक में तीन पीढ़ियों को एक साथ रखा गया है। जिनमें कुछ नाम प्रमुखता से लिए जा सकते है। डॉ. संजय सहाय, नचिकेता, डॉ. अनिरुद्ध सिन्हा, सत्यनारायण, चन्द्रकान्त, अरुण शीतांश, अनन्त मोहनदास हृदयेश्वर, श्याम सुंदर घोष, शालिग्राम सिंह --
पीपर-पाकड़ को पूछे कौन
गुलमोहर के गाँव हुए मौन
कि अब तो तरुओं के राजा ताड़ हुए॥

बिहार काव्य विशेषांक से ली गई उपरोक्त पंक्तियाँ सब कुछ संकेत में व्यक्त कर जाती है। विद्यापति और गौतम बुद्ध की तप स्थली, हिंदी कविता की उर्वर जमीन जहाँ दिनकर की हुंकार है तो बा नागार्जुन का सघन जनवाद। बिहार काव्य विशेषांक आधुनिक कवियों की कविता का प्रतिनिधित्व करने में कुछ हद तक सफल रहा है।

 
काव्य विशेषांक मध्य प्रदेश की संकल्पना के मूल में बिहार काव्य विशेषांक की सफलता की ऊर्जा कही न कहीं से निहित है। सम्पादक मुरलीधर पाण्डेय की संकल्पना में मध्य प्रदेश काव्य विशेषांक 2008 में ही आने लगा था जब प्रकाशनार्थ सामग्री प्रचुर रूप से आने लगी। सामग्री चयन के लिए संपादक मंडल को जद्दोजहद करनी पड़ती। किस रचना को रखे और किस कवि को निकाल दे। निर्णय गुणवत्ता को ध्यान में रख कर किया जाना निश्चित हुआ। अतिथि सम्पादक की जिम्मेदारी सहर्ष बटुक नाथ चौधरी (भोपाल) ने  स्वीकार कर ली। मध्य प्रदेश काव्य विशेषांक में 210 कवियों को समाहित किया जा सका --
यह घड़ी बिल्कुल नहीं है शान्ति और संतोष की
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सूर्य निष्ठा' सम्पदा होगी गगन के कोष की
यह धरा का मामला है घोर काली रात है
कौन जिम्मेदार है यह सभी को ज्ञात है
रोशनी की खोज में किस सूर्य के घर जाओगे
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दीप निष्ठा' जगाओ अन्यथा मर जाओगे॥ -- बाल कवि बैरागी, मध्य प्रदेश काव्य विशेषांक से

बाल कवि बैरागी, कैलाश चन्द पन्त, डॉ. किशन तिवारी, परशुराम शुक्ल, दिवाकर वर्मा, राम मेश्राम, पूनम चन्द तिवारी < स्वामी राजेंद्र नाथ मल्होत्रा, चन्द्रसेन विराट, प्रदीप चौबे, माणिक वर्मा, सुरेश शर्मा, माताप्रसाद शुक्ल, उमाश्री, सूर्यकांत नागर ब्रह्मजीत गौतम, डॉ. इसाक अश्क डॉ. महेन्द्र भटनागर आदि का विशेष योगदान रहा है -
लफ़्ज़ मैंने ही तराशे हैं, हुनर मेरा है,
यूँ ग़ज़ल तेरी है लहजे में, असर मेरा है॥ -- डॉ. महेन्द्र अग्रवाल, मध्य प्रदेश काव्य विशेषांक से

संयोग साहित्य का काव्य विशेषांक मध्य प्रदेश के समय का ऐसा लेखा-जोखा है जिसके आईने में हम हिन्दी कविता की पुख्ता जमीन और मध्य प्रदेश के बदलते परिवेश, राजनैतिक परिदृश्य एवं सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ कलमकारों के कलम की तासीर को समझ सकते है।

 
हिन्दी गज़ल के सशक्त हस्ताक्षर पिंगलाचार्य आर. पी. शर्मा 'महरिष 'के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित विशेषांक का प्रकाशन जुलाई से सितंबर 2013 में विशेषांक के रूप में हुआ। इसके कुल 148 पृष्ठों में 26 शोध आलेख, , 14 साक्षात्कार, , 09 समीक्षा, एवं 15 पृष्ठों में महरिष जी की ग़ज़लों को स्थान दिया गया है -
इरादा वही जो अटल बन गया है
जहाँ ईंट रख्खी महल बन गया है॥ -- पिंगलाचार्य आर. पी. शर्मा 'महरिष 'के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित विशेषांक से

 
मुरलीधर पाण्डेय के कुशल संपादन में विशेषांक निखर उठा है। विशेषांक हिन्दी ग़ज़ल के अनुसंधान कर्ताओं के लिए मीटर सरीखा है। जिसके आईने में हिन्दी-उर्दू गज़ल का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है। विशेषांक ग़ज़लकार के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का दस्तावेजीकरण है। हिन्दी गज़ल के लिए एक साथ इतनी सामग्री एवं इतनी दृष्टि का सम्पादन विशेष है --
लब कि ढूँढा किए क़ाफ़िये मगर
अश्क आए तो पूरी ग़ज़ल कह गए॥ -- पिंगलाचार्य आर. पी. शर्मा 'महरिष 'के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित विशेषांक से

 
पिंगलाचार्य आर. पी. शर्मा 'महरिष 'के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित विशेषांक हिन्दी ग़ज़लकारों को दशा-दिशा देने में पूर्ण समर्थ है तो दूसरी तरफ उर्दू ग़ज़लगो को यह बताने में पूर्ण समर्थ है कि हिन्दी में अच्छी ग़ज़ल कही जा सकती है बशर्ते हिन्दी गजलकार स्वयं को विधा का विद्यार्थी मानकर किसी गुरु के संरक्षण में रहकर लेखन करे। विशेषांक संग्रहणीय है।

संयोग साहित्य के विशेषांकों की कड़ी में उत्तराखंड काव्य विशेषांक का प्रकाशन 16वें वर्ष के अंक 04 अर्थात अक्टूबर से दिसम्बर 2013 अंक के रूप में हुआ। यह अंक संपादक मुरलीधर पाण्डेय एवं अतिथि संपादक डॉ. दिनेश चमोला 'शैलेश' देहरादून के लिए चुनौती भरा रहा, कारण स्वनामधन्य पूर्व संपादक की अरुचि और असहयोग के कारण अंक लगभग तीन वर्ष बाद प्रकाशित हो पाया। "देवभूमि उत्तराखण्ड के कण-कण में कविता का स्फुरण स्वतः भाव विभोर निरक्षर घसियारियाँ व पशुचारकों के आशुकाव्यों, महाकाव्यों के भावुक सर्गों से प्रकृति का कण-कण लाभान्वित होता रहता है।" उत्तराखण्ड काव्य विशेषांक में देवभूमि के लगभग एक सौ रचनाकारों को समाहित किया जा सका है -
कैनवस में उतरी हुई, चित्र हो तुम,
रिमझिम बरसते हुए, सावन हो तुम,
चाहत को दिया, तुमने नूतन धारा,
मेरे जीवन में, कर दिया उजियारा॥ -- तीव्र अभिलाषा, अजय कुमार मलिक 'तड़प'

विशेषांक का प्रकाशन संयोग साहित्य परिवार के लिए नयी दिशा देने में सहायक रहा। पहली रचना का कथ्य बहुत कुछ बयाँ कर जाता है। कितना कुछ सीखने के लिए मिला अगर कहना हो तो इसी अंक से राजेश आनन्द के शब्दों में कहे तो --
इस तरह भी दोस्तों अक्सर मजा देते है जख्म,
दास्ताँ दिल की मुकम्मल जब सुना देते हैं जख्म॥ -- ग़ज़ल, राजेश आनन्द

बानगी में इतना कुछ छिपा है अंक बरबस मन मोह लेता है। उत्तराखण्ड की लेखनी में अपने विरासत के प्रति कितनी गहरी आस्था है। नयापन सहज स्वीकार न करके जैसे पीढ़ी से विरासत सजोने की बात करते है। नया स्वागत के योग्य है पर आधार पूर्वजों को सहेजने में है --
बेटा !
बना होगा उत्तरांचल राज्य
तुम्हारे लिए नया-नवेला॥ -- नया उत्तरांचल राज्य, डॉ. दिनेश चमोला 'शैलेश'

विशेषांक उत्तरांचल का प्रतिनिधित्व करने में पूर्ण समर्थ है।

पं. मुरलीधर पाण्डेय सम्पादन में प्रकाशित हिमाचल प्रदेश काव्य विशेषांक की संकल्पना देहरादून में शायर जनाब राशिद आरफ़ी से मिलने के बाद हुई। सामग्री संग्रह में कुल्लू निवासी कवि जयदेव विद्रोही का निर्लिप्त योगदान उल्लेखनीय है। वर्ष 17 के अंक ३&4 जुलाई से दिसम्बर 2014 के संयुक्तांक के रूप में हिमाचल प्रदेश काव्य विशेषांक कुल 280 पृष्ठों के साथ प्रकाशित हुआ। हिमाचल प्रदेश काव्य विशेषांक में कुल 106 कवियों तथा 06 आलेख और 04 समीक्षा प्रकाशित है। विशेषांक प्रदेश के सम्पूर्ण साहित्यिक परिदृश्य का प्रतिनिधित्व करने में लगभग सफल रहा है। अंक में संग्रहित रमेश चन्द्र मस्ताना की पंक्तियाँ जैसे संपादक एवं विशेषांक लिए ही लिखी गई हो --
आया जो खुशबू झौंका, हम देखते ही रह गए,
पाया जो प्यार का मौक़ा, हम देखते ही रह गए॥ -- रमेश चन्द्र मस्ताना

डॉ. प्रेमलाल गौतम 'विद्यार्थी' द्वारा लिखित हिमाचलीय कविता-यात्रा: विहंगावलोकन आलेख विशेषांक में संग्रहित कवियों परिचयात्मक प्रस्तुति अंक की सम्पूर्णता और शक्ति बढ़ा देता है। कोई भी पाठक सहज ही हिमाचल के काव्य परिवेश और हिंदी काव्य की विकास यात्रा से परिचित हो जाता है। अंक हिमाचली काव्य पर अनुसंधानकर्ताओं के लिए सन्दर्भ ग्रन्थ जैसा है --
देखे जो हसीन ख़्वाब केवल आप के लिए
बुने सपने बे-हिसाब, केवल आप के लिए॥ -- केवल आप के लिए, रमेश चन्द्र मस्ताना

 
हिमाचल प्रदेश काव्य विशेषांक की पंक्तियाँ हमसे कुछ अपील करती हुये, सरोकारों को भी रेखांकित करती चलती है। अंक संग्रहणीय है।

 
संयोग साहित्य पत्रिका का जनवरी से जून 2016 संयुक्तांक अंक 1 & 2 में हरियाणा काव्य विशेषांक प्रकाशित हुआ। पं. मुरलीधर पाण्डेय के साथ अतिथि संपादक के रूप में डॉ. राम निवास 'मानव ' (हिसार) ने हरियाणा काव्य विशेषांक में अपनी सफल भूमिका का निर्वाह किया। विशेषांक में कुल 85 कवियों के साथ आठ शोध आलेख और 04 समीक्षा प्रकाशित है विशेषांक लगभग तीन वर्षों के अथक परिश्रम का परिणाम है --
रैयत की कमरें झुकी हुई, हुजूर सलाम वही,
पुलिस के मुँह पर साले, नमक-हराम वही,
पी तिरस्कार मैं तो हूँ आज गुलाम वही,
पंजर पर सूखी खाल और काम वही॥ -- दीनू का सपना-नलिन, हरियाणा काव्य विशेषांक से

इस अंक में हरियाणा के तीन पीढ़ियों को एक साथ स्थान देना ऐसी सम्पादकीय चुनौती और ईमानदारी है, जिससे हम सम्पूर्ण कालखंड को रेखांकित सकते है। डॉ. राम निवास 'मानव ' (हिसार) अतिथि संपादन में विशेषांक निखार उठा है। डॉ. सुभाष रस्तोगी द्वारा लिखित शोध आलेख "हरियाणा की समकालीन हिन्दी कविता " हरियाणा के लगभग पाँच दशकों के काव्य परिदृश्य का लेख-जोखा है --
मैं उन घुप अँधियारों में, सूरज की किरणें भर दूंगा,
जिनकी बुझी हुई आँखों में आशा का उजियार है।
शबनम है, श्रृंगार नहीं है॥ -- कवि की कामना, उदय भानु हंस, हरियाणा काव्य विशेषांक से

श्याम वशिष्ठ शाहिद पंक्तियाँ जैसे आज की नयी पीढ़ी का पुरजोर प्रतिनिधित्व करती है। अल्फाज के आगे जज्बात को बल प्रदान करती है।
तुम्हारी चिट्ठियों को जब मैं गंगा में बहा दूंगा,
तो सोचा था की मैं भी आग पानी में लगा दूंगा। -- ग़ज़ल, श्याम वशिष्ठ शाहिद

 
आज संयोग साहित्य अपने 09 विशेषांकों और 72 अंकों से प्रकाशित एक ऐसे दीपसंग्रह का नाम है जो दो दशकों से अँधेरे के खिलाफ दीप जलाने की ज़िद में अंक-दर-अंक आगे बढ़ता जा रहा है। पत्रिका की गत्यात्मकता अपने समय के रचनाकारों को एक मंच, एक स्थान पर उपलब्ध कराने का विशेष कार्य कर रहा है। वैश्विक दौर में राष्ट्रीयता एवं जीवन मूल्यों के साथ खड़ा संपादक प्रान्तीय गौरव, गरिमा और स्थानीय माटी की गंध से महकते विशेषांकों के रूप में माँ भारती की साधना में अपना योग देता जा रहा है --
अब तलक उसूलों पर गुजारी जिंदगी 'उमेश'
उसूलों का मेरी जिंदगी से गहरा नाता है॥ -- उमेश, माटी की आवाज

उपरोक्त पंक्तियाँ पत्रिका की ताकत, सामर्थ्य एवं शक्ति व्यक्त करने में समर्थ है तो दूसरी तरफ पत्रिका के सम्पादक पं. मुरलीधर पाण्डेय की सतत साधना एवं दृढ़ निश्चय, गरिमामय व्यक्तित्व तथा मूल्यों के साथ डटकर खड़े रहने की ज़िद को व्यक्त करती है।

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