भारत का सामाजिक परिप्रेक्ष्य और हिंदी नवजागरण

प्रियंका शर्मा

शोधार्थी, हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग, म. गां. अं. हिं. वि. वर्धा, महाराष्ट्र। 
‘जनकृति’ एवं ‘हिंदुस्तान अकादमी’ पत्रिकाओं में शोधपत्र प्रकाशित।


बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से ही भारत के संदर्भ में एक मुहावरा अक्सर दोहराया जा रहा था – भारत राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है –‘INDIA IS IN THE PROCESS OF BECOMING A NATION’ या भारत के एक राष्ट्र में कई राष्ट्र हैं –‘NATION WITHIN NATION’ सर जॉन स्ट्रेची, अपनी ‘इण्डिया’ नामक पुस्तक में कुछ इन्हीं संदर्भो में अपनी बातों को रखते हुए दिखायी देते है - “हिंदुस्तान महज एक सुविधाजनक नाम था, यह एक विशाल क्षेत्र का नाम था जिसमें कई राष्ट्र साथ-साथ रह रहे थे।”1 उनके अनुसार यूरोप के देशों में आपसी फर्क जितना ज्यादा नहीं था उससे कहीं ज्यादा फर्क हिंदुस्तान के इलाकों के बीच था। स्ट्रेची ने कहा था कि, “पंजाब और बंगाल की तुलना में स्काटलैंड और स्पेन ज्यादा नजदीक हैं।”2 अतः हम कह सकते है कि चाहे पंजाब हो या बंगाल, महाराष्ट्र हो या मद्रास इन्हें एक राष्ट्र अर्थात् भारत को भारत बनने की प्रक्रिया में कई चरणों से होकर गुजरना पड़ा होगा और उत्पन्न परिस्थितियों के परिणामस्वरूप यहाँ सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक उथल-पुथल और परिवर्तन की एक लहर निरंतर एवं निर्बाद्ध रूप से चलती रही होगी जो आज 21वीं सदी में भी प्रवाहमान है।

सर्व-विदित है कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अपने घृणित व्यापारवाद की आड़ में न केवल भारतीय व्यापार एवं उद्योगों को नष्ट किया बल्कि धीरे-धीरे भारत को गुलामी की जंजीरों में जकड़ दिया। धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, क्षेत्रीयता के नाम पर, लिंग भेद के नाम पर जितनी राजनीति सम्भव हो सकती थी, वह सब ब्रिटिश काल में हुई। परिणामतः अंग्रेजों के निरंकुश शासन, नाजायज तौर-तरीकों, छल-बल, भारतीयों पर ढाए गए जुल्मो-सितम एवं फूट डालो राज्य करो जैसी कुत्सित नीतियों ने वर्षों से सोये यहाँ के बुद्धिजीवी वर्ग को झकझोर दिया, उन्हें देश की दशा और पराधीनता के संदर्भ में सोचने पर विवश कर दिया। अंततः भारतीय समाज सुधारकों, चिंतको, नवशिक्षितों, साहित्यकारों, सेनानियों, पत्रकारों आदि ने भारतीय जनता को उपनिवेशवादी सत्ता के वास्तविक इरादों से अवगत कराया। यह वह दौर था जब भारतीय जनमानस देश की अस्मिता और गौरवशाली संस्कृति के लिए चिंतित हो उठा था। अब भारतीय जनता, अंग्रेजों द्वारा भारत के आर्थिक शोषण, दमनकारी नीतियों, पाश्चात्य संस्कृति के अवांछनीय प्रभावों, भारतीय समाज की रूढ़िग्रस्त, अंधविश्वास, गतिहीनता और इन सबके परिणामस्वरूप भारत को गुलाम बनाएं रखने की मानसिकता को महसूस कर उनके ख़िलाफ एकजुट हो चुकी थी। भारतीय समाज में बदलाव की यह ‘नयी चेतना’ ब्रिटश शासन के शोषण और दमनकारी प्रतिक्रिया से उत्पन्न सांस्कृतिक टकराहट का ही परिणाम थी, जिसे भारतीय इतिहास में ‘1857 की क्रांति’ नाम से जाना जाता है। 1857 के इस प्रथम संग्राम में भारतीय जनता अपना सारा मतभेद दरकिनार कर देश की स्वाधीनता के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद का ‘स्क्रू’ ढीला करने को तत्पर हो उठी। 1857 के संघर्ष से पैदा हुई इस नवीन चेतना को रामविलास शर्मा ने भारतीय-नवजागरण का गोमुख माना था। क्योंकि देखा जाए तो 1857 में घटित, स्वाधीनता संग्राम ने न केवल अंग्रेजी राज को देखने का नजरिया बदल दिया, बल्कि जनता में उत्पन्न इस नवीन चेतना को एक विशिष्ट चरित्र भी प्रदान किया।

वास्तव में ‘नवजागरण’ सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवन में व्यापक परिवर्तन और सुधार की एक प्रक्रिया थी। जो भारत में 19वीं सदी के ऐतिहासिक दबावों या यों कहें कि परतंत्रता के कटु यथार्थ से स्वाधीनता की आकांक्षा के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया और ब्रिटिश साम्राज्यवादी मूल्यों पर, उनकी आकांक्षाओं पर अनेकों प्रश्नचिन्ह खड़े करता हुआ, सदियों से जड़ता को प्राप्त भारतीय जन-जीवन के मानस पटल पर, कई तरह के सुंदर सपनों के बीज बिखेर गया।

वस्तुतः देखा जाए तो 19वीं सदी, भारतीय इतिहास का वह काल-खण्ड है, जब भारतीय समाज कई मूल्यों, अनेक आस्थाओं एवं विरोधी प्रतीत होती हुई संस्कृतियों के टकराव से गुजर रहा था, तब समाज सुधार के लिए कृत-संकल्प अनेक बौद्धिक धाराएँ अस्तित्व में आती हैं। अपनी स्वरूपगत भिन्नता के बावजूद इनके मूल में वर्तमान की बदहाली से मुक्ति की आकांक्षा निहित थी। इन आकांक्षाओं से प्रेरित धाराओं को संयुक्त रूप से Renaissance या नवजागरण की संज्ञा से अभिसिंचित किया गया।

भारत में नवजागरण की चेतना सर्वप्रथम बंगाल में प्रस्फुटित हुई और देखा जाए तो बंगला नवजागरण ने भारतीय नवजागरण में कुछ उसी तरह भूमिका निभायी जिस तरह यूरोपीय ‘रिनेसाँ’ में इटली ने। किन्तु ऐसा अकारण ही नहीं हुआ इसके पीछे भी तत्कालीन ठोस सामाजिक कारण थे। क्योंकि वास्तव में ब्रिटिश शासन, बुर्जुआ अर्थतंत्र और पश्चिम की आधुनिक संस्कृति के प्रभाव सर्वप्रथम बंगाल में महसूस किये गए अतः एक नवीन चेतना का प्रस्फुटित होना स्वाभाविक था। अपनी पुस्तक ‘बेंगाल रिनेसाँ एंड अदर एसेज’ की शुरुवात में ही सुशोभन सरकार लिखते हैं कि- “बंगाल को ही अंग्रेजी राज, पूंजीवादी अर्थतंत्र और आधुनिक पश्चिमी संस्कृति से संपर्क का पहला अनुभव हुआ। उसने ऐसी जागृति को जन्म दिया, जिसे साधारणतः ‘बंगला रिनेसाँ’ कहते हैं। लगभग एक शताब्दी तक विश्व के नए परिवर्तनों की जितनी सचेत जानकारी बंगाल को थी, देश के दूसरे किसी हिस्से में नहीं थी। इस प्रकार भारत के आधुनिक जागरण में बंगाल की भूमिका यूरोपीय नवजागरण-गाथा में इटली की स्थिति से तुलनीय है।”3 अतः बंगला नवजागरण में सामाजिक रूपांतरण के साथ-साथ बुद्धिवाद की प्रधानता स्वभाविक थी ।क्योंकि बुद्धिवाद नवजागरण का सार्वभौम तत्व है। औपनिवेशिक शिक्षा और यूरोपीय प्राच्य विद्यावाद अर्थात ओरिएण्टलिज्म विचारों से प्रभावित बंगाल के रिनेसाँ की लहर तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याओं जैसे- धर्म, धार्मिक सुधार, अतीत का मिथकीय पुनर्निर्माण, शिक्षा, स्त्री प्रश्न (विधवा विवाह, बाल विवाह, सती प्रथा, स्त्री शिक्षा), आदि से जूझते हुए महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, गुजरात, पंजाब और अंततः हिंदी क्षेत्र में पहुचती अवश्य है, किन्तु क्षेत्रीय व सांस्कृतिक विषमता एवं सभी प्रान्तों की स्थानीय विशिष्टता के साथ घटित इस नवजागरण के भी अपने- अपने अन्तर्विरोध थे, हां एक बात अवश्य है कि समय के साथ-साथ समाज के बदलाव में सभी प्रांत प्रयासरत थे। इन संदर्भों को संभुनाथ जी ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी नवजागरण और संस्कृति’ की भूमिका में और भी स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि- “भारत का नवजागरण बहुवचनात्मक है। किसी समय बंगाल में एक ढंग का, महाराष्ट्र में दूसरे ढंग का और हिंदी पट्टी में एक अन्य ढंग का नवजागरण प्रबल था। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनमें सामान्य खूबियाँ नहीं थीं या वैश्विक सार के प्रति उपेक्षा का भाव था।”4 यहाँ एक बात जो स्पष्ट हो रही है वह यह है कि, भारतीय नवजागरण अपने यहाँ की परिस्थितिओं की सामाजिक-सांस्कृतिक प्रकिया की और साम्राज्यवाद के अंतर्विरोधी चरित्र की उपज अवश्य है, किन्तु भिन्न समाजिक- सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, बहुभाषिकता और क्षेत्रीय विभिन्नताओं के कारण यहाँ चारों तरफ एक ही ढंग का नवजागरण नहीं आ सका या यों कहें कि भारतीय सामाजिक ढाँचे, सामजिक समस्याओं एवं सामाजिक-सांस्कृतिक उद्देश्यों में विभिन्नता के कारण भारतीय नवजागरण में कहीं धर्म तो कहीं स्त्री, तो कहीं किसान तो कहीं दलित, तो कहीं राष्ट्रवाद के आदर्श लोकप्रिय थे। किन्तु साम्राज्यविरोध और राष्ट्रीय आत्मापहचान का संघर्ष सभी के केंद्र में अवश्य विद्यमान था।

यदि हम महाराष्ट्र और बंगला नवजागरण के बरक्स दक्षिण के नवजागरण को खड़ा करे तो स्पष्ट होता है कि दक्षिण में नवजागरण के अन्य स्वर जातीय संघर्ष के सामने गौण पड़ जाते हैं। क्योंकि उस समय दक्षिण का सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश एक बड़े पैमाने पर जातिगत विखंडन से जूझ रहा था। बेशक वहाँ अंग्रेजी हुकूमत का विरोध और आलोचना के साथ-साथ अंग्रेजी शासन में भारतीयों की भागीदारी की मांग भी एक मुद्दा था, किन्तु जातीय संघर्ष दक्षिण नवजागरण की आत्मा थी।

किसी भी समाज में अस्पृश्यता एक ऐसा कोढ़ है, जो उसे सदैव गुलामी के गर्त में दबाएँ रखती हैं। विडम्बना यह है कि हमारे जड़ हिन्दू समाज ने उसे प्राणपण से बनाये रखा। नवजागरण कालीन दक्षिणी भारतीय समाज में भी अनेक अंतरधाराएँ चल रहीं थी। एक तरफ अंग्रेज विरोधी परंपरा थी, तो दूसरी ओर समाज सुधार गतिविधियाँ भी प्रवाहमान थी। किन्तु वर्णवादी व्यवस्था से मुक्ति की आकांक्षा ने इसमें नए आयाम गढ़ें। दक्षिण में इस आंदोलन के प्रणेताओं में विख्यात तेलुगू विद्वान ‘कंदुकुरी वीरेशलिंगम’ का नाम सर्वाधिक उल्लेखनीय है। ‘राजामुन्द्री सोशल रिफॉर्म एशोसिएशन’ के संस्थापक वीरेशलिंगम ने अनेक सामाजिक बुराईयों के उन्मूलन की वकालत की जिसमें स्त्रियों के दमन और पिछड़ेपन के पाँच कारणों को विशेष रूप से चिन्हित किया। पहला बाल-विवाह, दूसरा विधवाओं की समस्या, तीसरा बहुपत्नीत्व प्रथा, चौथा अशिक्षा और पाँचवाँ सामाजिक स्वीकृति का अभाव। उन्होंने एक सम्पादकीय में लिखा है कि- “शिक्षा से दूर हो, घर की चहारदीवारी में कैद होकर, संसार में कुछ भी न देखकर संसार के बारे में कुछ जाने बिना, अंधविश्वासों में डूबे हुए, रीति-रिवाजों द्वारा पीड़ित की जाती हुई, हमारी महिलाओं के बारे में इस प्रकार बतलाना अत्यंत शर्म की बात है-वे गुलामों से किसी तरह कम नही।।”5 स्पष्ट है विरेशलिंगम जी स्त्री के माध्यम से तत्कालीन सामजिक- सांस्कृतिक परिवेश का एक पूरा खाका प्रस्तुत करते प्रतीत होते हैं। विडम्बना यह है कि आज भी भारतीय समाज में स्त्री के संदर्भ में कोई विशेष परिवर्तन देखने को नहीं मिलता।

दक्षिण में जातिवाद विरोधी आन्दोलन के प्रथम प्रणेता ‘नारायण गुरु’ थे। इन्होंने जातिगत विभेद को नकारकर सभी को ईश्वर की संतान बताया एवं भारतीय समाज में फैले पाखंड और अंधविश्वासों पर करारा प्रहार किया। बकौल कर्मेन्दु शिशिर- वे अपने व्याख्यानों में साफ कहते हैं- “न तो किसी की जाति पूछो, न बताओ, न ही इसके बारे में सोचो।”6 किन्तु गौर करने वाली बात यह है कि दक्षिण भारत में सुधारों को वह व्यापकता नहीं मिलती जो बंगाल व महाराष्ट्र में मिलती है। चार्ल्स एच हिमसाथ के अनुसार “इसके लिए प्रायद्वीपीय भारत की जाति संरचना उत्तरदायी थी जहाँ बहुसंख्यक निम्नजातीय लोगों पर बाह्मणों की स्पष्ट प्रमुखता थी।”7 आगे चलकर ‘रामास्वामी नायकर पेरियार’ ने तत्कालीन भारतीय समाज में, ‘लौह कपाट’ की भाति मौजूद इस ब्राह्मणवादी व्यवस्था से मुक्ति दिलाने में महती भूमिका निभाई। उनके अभियान का मूल स्वर जाति, वर्ण, और शोषण से मुक्त एक समरस समाज की स्थापना थी।वास्तव में दक्षिण के नवजागरण के केंद्र में, तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त जाति-व्यवस्था एवं रीति-रिवाजों का पुनरावलोकन करना था।

देश के अन्य भागों में उठने वाली इस लहर से हमारा उत्तर भारत भी अछूता नहीं रह सका। हालाँकि बंगाल व महाराष्ट्र की तुलना में उत्तरी भारत या यों कहें कि ‘हिंदी क्षेत्र’ में नवजागरण की चेतना देर से आयी, क्योंकि न तो हिंदी क्षेत्र में कोई बंदरगाह थे, जिससे व्यापारिक गतिविधियाँ तीव्रता से पनपती, न ही यहाँ मिशनरियों की वैसी सक्रियता थी, जिसकी प्रतिकिया यहाँ के लोगों में कोई प्रेरणा पैदा कर पाती। किन्तु ब्रिटिश साम्राज्यवाद का तीखा और 1857 की राज्यक्रांति का हमलावर प्रतिरोध अकेली ऐसी घटना थी, जिसने इस क्षेत्र को बुरी तरह से आलोड़ित किया था। अतः हिंदी नवजागरण का जो स्वरूप उभरा सामूहिक रूप से उसकी समानता व तुलना बंगाल, महाराष्ट्र व दक्षिण-भारत के नवजागरण से नहीं की जा सकती। बकौल रामविलास शर्मा “हिंदी नवजागरण मूलतः बुद्धिवादी और रहस्यवाद विरोधी रहा है। औद्योगिकीकरण और आधुनिक विज्ञान का विरोध करनेवाली विचारधारा का स्रोत गुजरात है।”8 सर्वविदित है कि बंगला नवजागरण का सारतत्व बुद्धिवाद था, वहीं हिंदी नवजागरण आरम्भ से ही प्रगतिशील एवं साम्राज्यवाद विरोधी था।

विदित है कि हमारे हिंदी समाज में रूढ़िवाद और कलहवाद की जड़ें सबसे ज्यादा गहरी थी। भारतीय समाज घनघोर गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा और पिछड़ेपन में घुट रहा था। उसकी अपनी कोई सांस्कृतिक पहचान नहीं रह गयी थी। उस पर तत्कालीन सामन्ती समाज की व्यवस्था ने धार्मिक रूढ़ियों और जड़ताओं को और भी अधिक पोषित कर ऐसा महीन जाल बुना कि साधारण मनुष्य में नए विचारों का प्रवेश ही बंद हो जाए। वहीं दूसरी ओर अंग्रेजी शासक हिंदी समाज में व्याप्त धर्म के घनघोर अंतर्विरोधों, अलगावों, पिछड़ेपन और पाखंडों का लाभ उठा रहे थे, तो पूरा हिंदी समाज राज्यभक्ति व राष्ट्रभक्ति के द्वन्द्व से जूझ रहा था। विडम्बना यह है कि ऐसी विषम परिस्थितियों में भी बंगाल गुजरात व महाराष्ट्र की तरह हिंदी क्षेत्र में कोई वैचारिक क्रांति नवजागरण को लेकर समाजिक व सांस्कृतिक स्तर पर नहीं हुयी। यह कार्य हिंदी के साहित्यकारों के द्वारा सम्भव हो सका। बकौल नामवर सिंह - “हिंदी-प्रदेश में नवजागरण का कार्य मुख्यतः स्वयं लेखकों और साहित्यकारों को ही करना पड़ा क्योंकि यहाँ बंगाल और महाराष्ट्र की तरह प्रखर समाज-सुधारक अगुआई करने के लिए नहीं मिले।”9 भारतेंदु इस नवजागरण के अग्रदूत थे। दरअसल भारतेंदु जी का सीधा सम्पर्क ईश्वरचंद्र विद्यासागर, केशवचन्द्र सेन, बंकिमचन्द्र, सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी आदि से था अतः बंगला की उस नवीन-विचारधारा का प्रभाव उन पर पड़ना स्वभाविक था।

हिंदी-नवजागरण के सूत्रधार भारतेंदु एवं भारतेंदु मंडल के सहयोगी लेखकों ने अपनी रचनाओं में माध्यम से नवजागरण की चेतना का प्रसार पूरे उत्तर भारत में किया। चूँकि 1857 की क्रांति ने उत्तरी भारत के सामाजिक व सांस्कृतिक परिवेश को गतिशील रूप से सर्वाधिक प्रभावित किया। अतः भारतेंदु और भारतेंदु मंडल के लेखकों ने इस नवीन विचारधारा के अंतर्गत अंग्रेजी राज्य की चुनौतियों को राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक माना। इन सभी साहित्यकारों ने अपनी लेखनी के माध्यम से स्वदेशी वस्तुओं, उद्योग-धंधों एवं स्वदेशी भाषा की वकालत की। एक ओर जहाँ समाज में व्याप्त धार्मिक-रूढ़ियों एवं अंधविश्वासों का विरोध किया। वहीं दूसरी ओर विधवा-विवाह, बाल-विवाह, विदेश-गमन, जातिगत भेदभाव, स्त्री शिक्षा, आदि सामाजिक समस्याओं पर उदारवादी दृष्टिकोण अपनाया। हिंदी नवजागरण का एक अहम बिंदु उसकी संकुचित सांप्रदायिकता है। क्योंकि इसके केंद्र में हिंदी और हिन्दू हैं। नामवर सिंह के आनुसार- “हिंदी प्रदेश के नवजागरण के सम्मुख यह बहुत गंभीर प्रश्न है कि यहाँ का नवजागरण हिन्दू- मुस्लिम दो धाराओं में क्यों विभक्त हो गया? यह प्रश्न इस लिए भी गंभीर है कि बंगाल का नवजागरण इस प्रकार विभक्त नहीं हुआ। हैरानी की बात यह है कि हिंदी-प्रदेश का नवजागरण धर्म, इतिहास, भाषा सभी स्तरों पर, दो टुकड़ों में बँट गया।”10 नामवर जी के उद्धरण से स्पष्ट है कि तत्कालीन उत्तर-भारतीय समाज दो धार्मिक संगठनों में विभाजित होने लगा था, जिसके लिए उत्तरी भारत की तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं। परिणामतः हिंदी प्रदेश में भाषाई द्वंद्व, हिंदी-उर्दू विवाद, नागरी सुधार आंदोलनों का जन्म हुआ। कुछ इन्हीं संदर्भों में भारतेन्दुकालीन परिस्थितियों का हवाला देते हुए डा.संभुनाथ लिखते हैं – “निःसंदेह भारतेंदु युग के वातावरण में राष्ट-राज्य की आवाज नहीं थी। हिन्दू कट्टरतावादी और नव-शिक्षित पश्चिमवादी दोनों एक स्वर में राज-राजेश्वरी की जय-जयकार कर रहे थे।”11

उपरोक्त तथ्यान्वेष्ण से स्पष्ट है कि भारतीय नवजागरण एक ऐसे समय की उपज है, जब भारतीय संस्कृति और समाज, राजनीतिक, सामजिक व सांस्कृतिक दृष्टि से संक्रांति के दौर से गुजर रहा था। यह वह समय था, जब भारतीय मानस मध्यकाल से आधुनिक काल में संक्रमण कर रहा था। संस्कार और विवेक की गहरी कशमकश भारतीय समाज को प्रबुद्ध व आक्रांत किये हुए थी। भारतीय मानस पराधीनता के कठोर अहसास के साथ-साथ एक नयी सभ्यता और संस्कृति के दवाबों व चुनौतियों को विवेकपूर्वक झेलने व स्वीकारने का प्रयास कर रहा था। लेकिन वास्तव में हमारा भारतीय समाज और संस्कृति घनघोर सामन्ती और साम्राज्यवादी शोषण से जर्जर होती जा रही थी। धार्मिक व सामाजिक विघटन लगातार बढ़ता जा रहा था। भारत की इस विषम सामाजिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों के बीच नवजागरण की यह लहर एक परियोजना की भाँति प्रतीत होती है, जिसके अंतर्गत तत्कालीन भारतीय संस्कृति व समाज के प्रमुख अवयव थे - साम्राज्यवादी शोषण और लूट का विरोध, औपनिवेशिक संस्कृति का विरोध, धार्मिक रूढ़ियों-पाखंडों का पर्दाफाश, हिन्दू-मुसलिम एकता, स्त्रियों-दलितों व किसानों का उत्थान, देशी उद्योगों और कारीगरों का उत्थान व पोषण, भारतीय भाषाओं के वर्चस्व का आंदोलन, सार्वजनिक शिक्षा अभियान, सामाजिक व सांस्कृतिक जड़ता के विरुद्ध प्रगतिशील व आधुनिक विचारों का वरण और साथ ही साथ भारतीय इतिहास की गरिमा की प्रतिष्ठा आदि। वैसे गौर करें तो ज्ञात होता है कि इनमें अधिकांश घटक यथा - स्त्री शिक्षा, सती प्रथा, विज्ञान व नयी तकनीक, पाश्चात्य विचारों का वरण आदि का संबंध उच्च भद्रलोक से था, निम्न वर्गों की न तो यह समस्या थी, न तो इसकी कोई समझ। दार्शनिक पक्षों से उनका कोई वास्ता नहीं था। वहीं मध्य वर्ग लगातार दबाव में विघटित होने को अभिशप्त था। चूँकि यह हलचल समाज की उपरी सतह अर्थात सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन तक ही सीमित थी। इसलिए इसके प्रभावों को न तो नजरअंदाज किया जा सकता है और न ही बहुत बढ़ा-चढ़ा के देखा जा सकता है। यह सत्य है कि क्षेत्रगत विभिन्नता के कारण नवजागरणकालीन भारतीय संस्कृति व समाज में अनेक अन्तर्धाराएँ थीं। किन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि विभिन्न भौगोलिक क्षेत्र व स्थानीय विशेषताओं के बावजूद ये सभी धाराएँ पूरे भारत में एक दूसरे के समानांतर चल रही थी।

संदर्भ ग्रंथ सूची:

1. गुहा, रामचंद्र. 2014. भारत: गांधी के बाद. नई दिल्ली. पेंगुइन प्रकाशन, पृ. xi
2. गुहा, रामचंद्र. 2014. भारत: गांधी के बाद. नई दिल्ली. पेंगुइन प्रकाशन, पृ. xi
3. सरकार, सुशोभन, बंगला रिनेसां एंड अदर एसेज, नई दिल्ली, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, पृष्ठ संख्या - 81
4. संभुनाथ, 2004, हिंदी नवजागरण और संस्कृति, कलकत्ता, आनंद प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 9
5. शिशिर, कर्मेंदु, 2013, भारतीय नवजागरण और समकालीन संदर्भ, नई दिल्ली, किताब जीएचआर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-75
6. शिशिर, कर्मेंदु, 2013, भारतीय नवजागरण और समकालीन संदर्भ, नई दिल्ली, किताब घर प्रकाशन पृष्ठ संख्या-81
7. हिमसेथ, एच. चार्ल्स, 1964, इंडियन नेशनलिज्म एंड सोशल रिफार्मर, प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी पृष्ठ संख्या-109
8. शर्मा, रामविलास, 1977, महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण, नई दिल्ली, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 179
9. सिंह, नामवर, संपादकीय, आलोचना, अंक अक्टूबर दिसम्बर 1986, पृष्ठ संख्या- 6
10. सिंह, नामवर, संपादकीय, आलोचना, अंक अक्टूबर-दिसंबर, 1986 पृष्ठ संख्या- 6
11. डा. संभुनाथ, भारतेंदु : डेढ़ सौ साल बाद, आलोचना अंक जनवरी-मार्च 2001 पृष्ठ संख्या -19

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