लघु कथा: कोशिश

- रीना पारीक

शोधार्थी, महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर (राजस्थान)


रीना पारीक
पानी का गिलास आगे करते हुए मानसी बोली, "आप कितने बजे तक घर
आ जायेंगे?"

"ओह देवीजी जाने से पहले ही आने के लिए पूछ रही है। सुबह-सुबह दिमाग ख़राब करने वाले ही सवाल पूछती रहती हो, और तो कोई
काम बचा नहीं है।"

"ठीक है, आपका जब मन हो तब आ जाइये। मुझे आपके आने जाने से क्या मतलब है। आप तो मशीन की तरह पूरे दिन काम में लगे रहते हो, कम से कम अपनी बेटी के लिए तो वक़्त निकाल लिया करो। लेकिन प्रशांत एक बार फिर से याद कर लो, शायद कुछ भूल रहे हो। दौलत कमाने में ही तुम्हारी सारी जिंदगी बीत जाएगी। भगवान ने एक ही बेटी दी है तुम्हे और वो भी... यह जानते हुए भी कि हमारी बेटी को ल्यूकेमिया है।"

"मानसी, मेरा बैग वापस रूम में रख दो। मुझे सब पता है... हमेशा याद रहता है कि मेरी मनु अब... बस इसीलिए चाहता हूँ कि मै इतना बिजी रहूँ कि मनु ना भी रहे तो कम से कम खुद को संभाल तो पाऊँ। मानसी तुम तो बस अपनी बहस में ही लगी रहती हो। आज शाम को हमारी मुंबई की ट्रेन है तो तैयार रहना... इसीलिए तुम मुझे शाम को घर आने का टाइम पूछ रही थी।"

"लेकिन प्रशांत डॉक्टर ने तो साफ कह दिया है फिर?"

"अरे मानसी आख़िरी कोशिश है, फिर तो हमारे हाथ कुछ नहीं है। मनस्विता को भी जल्दी ही तैयार कर लेना और आज उसे बाहर खेलने मत जाने देना। आख़िरी कोशिश का यह जिम्मा भी कल पूरा हो ही जायेगा।"

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