अन्तर्राष्ट्रीय विवाह और प्रवासी हिन्दी कहानी

(महिला कहानीकारों के विशेष संदर्भ में)
मधु संधु

मधु संधु

विवाह मूलत: संस्कृत शब्द है। ‘वि’ का अर्थ है- विशेष रूप से और ‘वाह’ का अर्थ है– वहन करना- यानि विवाह का अर्थ स्त्री-पुरुष द्वारा विशेष रूप से एक दूसरे का उत्तरदायित्व ग्रहण/ वहन करना है। यह प्रतिज्ञा समारोह है, धर्मानुष्ठान है। विवाह को श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना, और सामाजिक कर्तव्य मानते हुये ‘धन्यो गृस्थाश्रम’ कहा गया है। प्रेम, समर्पण, सहनशीलता, आत्मीयता, विश्वास इसका मूल हैं। यह दो आत्माओं का पवित्र बंधन है। शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक पूर्णता का आह्वान है। दो प्राणियों द्वारा स्वछंद अस्तित्व को विलीन कर सम्मिलित इकाई में एकीकृत हो जीने का नाम है। ऋग्वेद के विवाह सूक्त, अथर्ववेद के पाणिग्रहण सूक्त, मनु स्मृति में इसका वर्णन मिलता हैं। ग्रन्थों में विवाह भी अनेक प्रकार के माने गए हैं- ब्रह्म विवाह, दैव विवाह, आर्ष विवाह, प्रजापत्य विवाह, गंधर्व विवाह, असुर विवाह, राक्षस विवाह, पिशाच विवाह आदि। विश्व के प्रत्येक सभ्य देश, धर्म और जाति में विवाह का सर्वोपरि स्थान है। दाम्पत्य में ताजगी भरने एवं सुदृढ़ता लाने के लिए प्रत्येक वर्ष फरवरी के दूसरे सप्ताह के रविवार को ‘विश्व विवाह दिवस’ मनाया जाता है। 

अन्तर्राष्ट्रीय विवाह के परिप्रेक्ष्य में पौराणिक संदर्भों में जाएँ तो महाभारत में धृतराष्ट्र की शादी अफगानिस्तान तक फैले कंधार देश के राजा सांबल की बेटी गांधारी से हुई थी। इतिहास में यूनानी आक्रमणकारी सेल्यूकस की बेटी हेलेना और चन्द्रगुप्त के विवाह का प्रसंग मिलता है। जबकि चाणक्य ने उसे देश की राजनीति से दूर रहने और उसकी संतान को उत्तराधिकार से वंचित करने की शर्त रखी थी। राजीव गांधी और सोनिया अंतर्राष्ट्रीय सफल दाम्पत्य का ज्वलंत उदाहरण हैं। शरीर विज्ञान के अनुसार भी अन्तर्राष्ट्रीय विवाह से उत्पन्न संतति का बौद्धिक, मानसिक, शारीरिक स्तर सामान्य से ऊँचा माना गया है। आज अन्तर्राष्ट्रीय विवाह प्रवासी जीवन की मांग है। उसका अभिन्न अंग है। अपनी धरती से दूर बसे भारतियों की यह जरूरत भी है और उस जीवन का सामान्य अंग भी। 

उषा प्रियम्वदा, सोमवीरा, सुषम बेदी, सुधा ओम ढींगरा, लावण्या दीपक शाह, सुदर्शन प्रियदर्शिनी, अनिल प्रभा कुमार, सुनीता जैन, स्नेह ठाकुर, अर्चना पेन्यूली, उषा वर्मा, दिव्या माथुर, नीना पॉल, अरुणा सबबरवाल, कादम्बरी मेहरा, भावना सक्सेना जैसी प्रवासी महिला कहानीकार अमेरिका, कैनेडा, ब्रिटेन, डेनमार्क, सूरीनाम - यानी विश्व के इस-उस हर कोने से लिखती हुई प्रवासी जीवन के भिन्न पहलुओं से हिन्दी जगत को समृद्ध कर रही हैं। प्रवासी के जीवन का अपना ही अलजबरा, कैमिस्ट्री, फिजिक्स है और अन्तर्राष्ट्रीय विवाह उस जीवन का अभिन्न अंग बनता जा रहा है। 

विदेश के खुले वातावरण में रहने के बाद भारत के संयुक्त परिवार के बंधनों में जीने/बसने की तो युवतियाँ कल्पना ही नहीं कर सकती। सुषम बेदी की ‘बीच की भटकन’ की बेबी अपनी बहन बीना के पास हालैंड की राजधानी हेग में तीन महीने के लिए आती है, किन्तु स्वदेश लौटने का मन ही नहीं होता। कभी बेबी सिटिंग करके, कभी ट्रेड फेयर में लगने वाले पैविलियन में नौकरी करके कुछ न कुछ कमा लेती है। कहती है- “दीदी हिंदुस्तान में क्या रखा है। वहाँ महीना भर नौकरी करके जो मिलता है, यहाँ हफ्ते भर के फेयर की असाइनमेंट में ही मिल जाता है। उसके साथ नए-नए देश घूमों, नए-नए लोगों से मिलो। होटल में रहना, न कोई रोक-टोक, न कोई बंधन। ” हर फेयर से लौटी बेबी कोई न कोई फोन पीछे लगा लेती है। कभी रेस्तरां का बार मैन बिल्लू, कभी कोई स्पेनिश लड़का, कभी जॉन, कभी हमीद। बेबी के अपने विचार है। सोचती है- न पटी तो क्या, कपाट बंद थोड़े ही हो जाएंगे, कोई ओर टक्कर जाएगा। उसे भारत के डॉक्टर इंजीनियर से वहाँ का बारमैन इसलिए पसंद है कि वहाँ संयुक्त परिवार के बंधन और दायित्व नहीं है। 

उषा वर्मा की ‘उसकी ज़मीन’ में एक वर्ष की साबिया को लेकर पिता अशरफ और माँ रौशन इंग्लैंड आ गए थे। इंग्लैंड के खुले वातावरण में पली बढ़ी बेटी दो संस्कृतियो के बीच पिस रही है। न वह पाकिस्तानी विवाह की घुटन के लिए तैयार है और न नील के साथ लिव-इन में रह सकती है। इंग्लैंड में प्रेमी नील उसे पाकिस्तानी होने के ताने मारता है और पाकिस्तान आ जाए तो क्या बंटी अंग्रेज़ होने के ताने नहीं मारेगा। प्रश्न है कि वह समाज, धर्म और घर में सामंजस्य कैसे बिठाये। 

विदेशी से शादी करना और निभाना कोई सरल काम नहीं है। काँटों की शैय्या पर सोने या तलवार की धार पर चलने सा दुष्कर कार्य है। दोनों संस्कृतियों के अन्तर के इलावा पारिवारिक/ सामाजिक अस्वीकृतियां, व्यक्ति को तोड़ देती हैं, निपट अकेलेपन को नियति बना देती हैं। यहाँ और वहाँ - कहीं भी न होने का दर्द उसे कोंचता रहता है। सुषम बेदी की ‘अजेलिया के फूल’ की नायिका ने बीस वर्ष पहले निक से शादी की थी। निक आज कॉलेज का प्रिन्सिपल है। सम्मानित जीवन है, किन्तु नायिका मिसेज मिलर अपने को यहाँ-वहाँ कहीं नहीं पाती। निक के माँ-बाप ने कभी इस शादी को स्वीकार ही नहीं किया। कहता कोई कुछ नहीं, पर सब ऐसे देखते हैं, मानों वह निक की कोई भूल है। 

उनकी ‘जमी बर्फ का कवच’ में दिल्ली की अनीषा ने जर्मन फर्म के असिस्टेंट मेनेजर जामिशेल से वर्षों पहले शादी की थी। अब वह सपरिवार यूरोप के ब्रसल्स शहर के सौ अपार्टमेंटस वाली बिल्डिंग में वर्षों से रह रही है। यह उस मुक्त संस्कृति की कहानी है, जहां अपने को दूसरों से काट कर ही प्रसन्नता महसूस होती है। लोग घरों में ही बंद नहीं होते, सड़क पर घूमते भी मानो अपने में बंद रहते हैं। यही सब अनीषा को अकेला कर जाता है। सुषम की ‘तलाश अपनी’ की धीरा की भी यही स्थिति है। 

उषा प्रियम्वदा की ‘ट्रिप’ की स्त्री पूर्ण स्वावलंबी प्रोफेसर पति से निभाने, अकेलेपन से छुटकारा पाने और तनाव मुक्त होने के लिए ड्रग्स प्रयोग करती है। उनकी ‘सागर पार का संगीत’ की देवयानी अपने घर, परिवार, देश से कटकर कैनेडियन आस्कर से शादी करती है, किन्तु जैसे ही आस्कर अपने काम में व्यस्त होने लगता है, वह इतना अकेलापन महसूस करने लगती है कि उसे मनोविद के पास भी जाना पड़ता है। 

अंतर्देशीय विवाह की सबसे बड़ी त्रासदी असुरक्षा है और कई बार पराई धरती पर सुरक्षा की खोज में अंतर्देशीय विवाह करने का भी निर्णय लेना पड़ता है। लक्ष्मी शुक्ल की ‘अनहिता’ में डॉ मल्होत्रा, उनकी खूबसूरत ईरानी पत्नी अनहिता और बेटा सिद्धार्थ हैं। कई बार अनहिता के रोने या उसके पति के चिल्लाने की आवाजें आती हैं। अनहिता एक बार छत से कूद कर आत्महत्या का असफल प्रयास करती है। फिर उसकी दुर्घटना मृत्यु का ऐलान किया जाता है। डॉ मल्होत्रा कहते हैं कि उसका एक्सीडेंट तेहरान में हुआ और उनकी बहन कहती है कि अमेरिका में। दिव्या माथुर की ‘ख़ल्लास’ इंग्लैंड की सुरक्षित ज़मीन पर रहने वाली असुरक्षित युवती नीरा की कहानी है। यहाँ अंतर्राष्ट्रीय विवाह का कारण सुरक्षा है। नीरा गुंडे बदमाशों के शहर हार्ल्सडन में अपनी माँ के साथ रहती है। एक ओर जॉनी जैसे गुंडों की नज़र उस पर है तो दूसरी ओर जमाइमा फरीद उसे धंधे में धकेलना चाहती है। ऐसे में नीरा गुंडों के बादशाह मार्टिन से शादी करके अपने जीवन को सुरक्षित करने का निर्णय लेती है। 

भारत में शादी एक पारिवारिक सामाजिक अनुष्ठान है, जबकि पश्चिम में यह शादी दूल्हा-दुल्हन का वैयक्तिक मामला है। सुदर्शन प्रियदर्शिनी की ‘देशांतर’ में जॉन आयरिश लड़की जेनी से शादी कर रहा है। वर्षों से दोनों लिव-इन में थे। शादी भारतीय और क्रिश्चियन दोनों विधियों से होगी, लेकिन कार्ड में लड़के के माता-पिता का नाम तक नहीं। कार्ड में लड़की की उस माँ का नाम है, जिसका सरनेम ही दूसरी शादी के कारण भिन्न है। 

व्यक्ति अपने को चाहे जितना भी आधुनिक बना या मान ले, लेकिन मन में बीज की तरह धँसे धार्मिक संस्कारों से मुक्त होना संभव नहीं। यही हमारी सीमा है। बहुत बार वैवाहिक जीवन में दरारें लाने या उसे तहस-नहस करने में यही स्थितियाँ बड़ा रोल निभाती हैं। स्नेह ठाकुर की ‘क्षमा’ के मैं ने किशोरावस्था में जूली से शादी की थी और उसका धर्म अपना कर प्रचारक बन गया था। दो बच्चे भी हुए। ओढ़े हुए धर्म को जैसे ही छोडना चाहा, जूली से भी तलाक लेना पड़ा। सुदर्शन प्रियदर्शिनी की ‘सेंध’ में हिन्दू ऋषभ, ईसाई टीना से शादी करता है। तब माँ और उसके मन में था कि धर्म तो ऊपरी चीज है। जब बच्चा होता है तो एक तरफ से राजू या राजा और दूसरी तरफ से निकोलुस नाम दिया जाता है। बड़ा होने पर पिता उसके मुंडन करवाना चाहता है और माँ बेपटिस्म। 

बहुत बार अंतर्राष्ट्रीय शादी के मूल में ग्रीन कार्ड, अवसरवादिता, फायदे का सौदा अथवा वैयक्तिक स्वार्थ रहता है। ग्रीन कार्ड ने नए उपनिषदों का सृजन किया है। जिनकी संहिताओं में अंतर-देशीय, अंतर-धार्मिक, अंतर-सांस्कृतिक विवाहों की आचार संहिता पर अलिखित हस्ताक्षर भी आते हैं। स्थितियाँ दोनों हैं- भारत से विदेश गए पात्र और विदेश से भारत आए पात्र। भावना सक्सेना की ‘एप्लीक्स’ में मारिशस से भारत आई नायिका एक योग आश्रम के मैनेजर की भारतीयता से प्रभावित हो उससे शादी करती है। वह तो भारतीयता के रंग मे रंग जाती है, लेकिन थोड़े समय में ऊँचाईयाँ छूने की आकांक्षाओं के कारण उसका पति घर-परिवार, स्नेह-विश्वास, सभ्यता-संस्कृति, अपनी भाषा सब भूलने लगता है। जल्दी ही वह जान जाती है कि उसके पति के सारे यत्न ग्रीन कार्ड के लिए थे। आलराइट, डार्लिंग, डोंट वरी जैसे शब्दों का लगातार प्रयोग उसकी गुलाम मानसिकता का परिचायक है। 

विदेश में वीज़ा और नागरिकता की समस्या के कारण बहुत से लोग विशेषत: पंजाबी अपनी और वहाँ की सरकार को धोखा दे शादियाँ रचाते और निभाते है और हजारों अवैध अप्रवासी विदेश बसने के स्वप्न के कारण वहाँ जेलों मे बंद हैं। सुनीता जैन की ‘काफी नहीं’ में विमान यात्रा के दौरान नायिका जानती है कि उसकी सहयात्री का पति विदेश में वीज़ा और नागरिकता के कारण अपने से काफी बड़ी स्त्री का दस साल पति बनकर रहा। अपने ही बेटे को भांजा बताकर गोद लिया और फिर छोटे बेटे के जन्म के बाद पत्नी से कोर्ट मैरिज कर उसे भी कुछ देर के लिए बुला लिया। विदेश जाने के लिए उनके यहाँ लोग फर्जी शादियाँ और तलाक लेते ही रहते हैं। सुधा ओम ढींगरा की ‘फंदा क्यों’ का नायक मेक्सिकन लड़कियों के साथ फर्जी शादी करके ग्रींन कार्ड जुटाता है। अर्चना पेन्यूली की ‘मीरा बनाम सिल्विया’ में सद्भाव और सिल्विया की शादी वीज़ा की समस्या का समाधान मात्र है। 

यौन धारणाओं, लक्षमण रेखाओं, वैध-अवैध सीमाओं के कारण भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति में मूल भूत अंतर है। अमेरिकन लड़की से शादी के कारण उषा प्रियम्वदा की ‘चाँदनी में बर्फ पर’ में परिवार ने हेम से सारे संबंध तोड़ लिए हैं। त्रासदी यह है कि विवाहोपरान्त भी पत्नी मेरी पियर और अन्य लड़कों से मिलती है। वह उसे कुछ नहीं कह सकता। एक बार पूछने पर उसने एक ऐसी लड़की की बात की थी, जो विवाहित होने के बावजूद वीकेंड मित्रों के साथ बिताती है। सुदर्शन प्रियदर्शिनी की ‘कुंवारी बहू’ में उदयशंकर शास्त्री अमेरिका की नागरिकता लेने और अपना कद ऊँचा करने के लिए अमेरिकन स्टेफनी से अमेरिकन रीति रिवाज से शादी करता है। स्टेफनी की स्टेपनी बन बच्चों के जन्म पर माँ-बाप को काम-काज के लिए अमेरिका बुलाता है। उनके अमेरिका मे रहने के सारे आर्थिक फायदे भी लेता है, फिर भी वह उसे छोड़ देती है। उनकी ‘आचार संहिता’ में कैथी से विवाह करने पर नाहर ऐसी ही संहिताओं का पालन करने के लिए बाध्य है। जैसे मेहमानों का आना, भारतीय भाषा, संस्कृति आदि बच्चों पर थोपना, भारतीय खाना, भारत जाना, पत्नी को दोस्तों के साथ जाने से रोकना - सब वर्जित है। वह नाहर न रह कर मानों भीगी बिल्ली बन कर रह जाता है। उसे माँ या बहन सरिता से फोन पर बात करने से भी मनाही है। उनके आने पर उन्हें घर से निकाल दिया जाता है। सोमवीरा की ‘खिड़की पर बैठी चिड़िया’ की पवित्रा अपने देश तथा संबंधियों से हटकर फ्रेंच युवक मिशेल से उसकी भारत भ्रमण की कहानियों, कला वस्तुओं के संग्रह और हिन्दी भाषा के प्रति स्नेह से आकर्षित हो विवाह करती है, लेकिन हनीमून से लौटने तक वह जान लेती है कि उनकी दिशाएँ अलग-अलग हैं। उनकी ‘लांड्रोमेट’ में निर्मल मारग्रेट से शादी करने से इसलिए इंकार कर देता है, क्योंकि भाई विमल के पमेला से शादी के बाद परिवार से संबंध छूट गए हैं। मोहभंग की यही स्थिति उनकी ‘डायना की परछाईं’ में है। 

सांस्कृतिक वैभिन्य के दूरगामी प्रभाव अन्तर्राष्ट्रीय विवाह पर देखे जा सकते हैं। सुषम बेदी की ‘अवसान’ की त्रासदी मृत्यु संस्कारों तक फैली हुई है। छप्पन-सत्तावन की उम्र में अमेरिका के एक अस्पताल के सबसे बड़े डॉक्टर दिवाकर की मृत्यु हो जाती है और उसकी मृत्यु पर न भारतीय संस्कार विधि और न किसी भारतीय सगे संबंधी की उपस्थिति। उसके अन्त्येष्टि कार्यक्रम में चर्च में पाँच सौ के आसपास लोग जुटते हैं, पर मित्र शंकर को छोड़ कोई भारतीय नहीं। उसने तीन शादियाँ की थी। पाँच बच्चे हैं। तीनों पत्नियाँ और उनके परिवार हैं, पर उसके पिता परिवार से कोई नहीं। चर्च में बाइबल से मृत्यु संस्कार के प्रवचनों का पाठ किया जाता है, पर गीता, महाभारत, रामायण से कुछ नहीं। यह सब उसके मित्र शंकर से बर्दाश्त नहीं हो पाता, मित्र की आत्मा की शांति के लिए वह डायस पर जा गीता के कुछ श्लोक पढ़, उनका अँग्रेजी अनुवाद करता है। बेटे-भाई की मृत्यु पर माँ या बहन का आना उसकी वर्तमान पत्नी हेलेन को स्वीकार नहीं। 

धर्म, भाषा, देश, सभ्यता-संस्कृति के वैभिन्य के बावजूद आदर्श, नैतिकता और प्रगाढ़ दाम्पत्य की प्रेम कहानियाँ भी बहुत मिलती हैं। अरुणा सब्बरवाल की ‘इंग्लिश रोज़’ में पैंतीस वर्षीय विधि तलाक के बाद अपनी बहन के पास लंदन आती है और वापसी पर हवाई जहाज के आठ घंटे लम्बे सफर में उसकी भेंट साठ वर्षीय रिटायर्ड है, विधुर जॉन से होती है। दक्षिण यात्रा में विधि पर्यटन में उसकी गाइड बनती है। वह लंदन लौटने से पहले विधि के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखता है, लेकिन विधि उम्र, धर्म, भाषा, देश और अलग-अलग सभ्यता- संस्कृति के कारण सोच में पड़ जाती है। लेकिन जॉन से विवाह के बाद लंदन में विधि का हर दिन उत्सव सा बीतने लगता है। 

नीना पॉल की’खतरा’ भारतीय पत्नी और अंग्रेज़ पति की कहानी है। कहानी बताती है कि प्रत्येक रंग, जाति और देश में परिवारगत मूल्य, दाम्पत्यगत मूल्य, संतानगत मूल्य समान होते हैं। पति माइक पत्नी इशिता के साथ शादी की 15 वीं वर्षगांठ फ़्रांस में मनाना चाहता है। उनकी एक ग्यारह वर्षीय बेटी रोजी है। वय: संधि पर खड़ी बेटी रोजी को एक सप्ताह के लिए कहाँ छोड़ा जाये, इसी बात पर माइक उसे टिपिकल भारतीय पत्नी कहकर झगड़ पड़ता है। स्थिति से अवगत होते ही सास रोहेला बेटे के घर पहुँच पोती की जिम्मेवारी लेती है और बात बन जाती है। 
सुदर्शन प्रियदर्शिनी की ‘इंद्रधनुष’ एक पिता का दर्द लिए है। बेटे रोहण की जैकलीन से शादी पर उसे लगता है कि रिश्ते नदी के दो किनारों या रेल की पटरियो से हो चुके थे, यह वह देश है, जहां बिना इजाजत के बेटे के घर आना भी अपराध सा है। लेकिन उसके आने पर बेटा और उसके बच्चे खुशियों के इन्द्र धनुष बिखेर देते हैं। निर्लिप्तता खून के रिश्तों मे निसंगता नहीं ला सकती। बेटा और उसके बच्चे खुशियों के इन्द्र धनुष बिखेर ही देते हैं। दिव्या माथुर ‘एक शाम भर बातें’ में लिखती हैं कि ब्रिटेन में गोरा दामाद होना प्रवासी भारतियों के लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक माना गया है। रिचर्ड पत्नी और सास को इतना सम्मान देता है कि लोग देखते रह जाते हैं और ऊपर से दहेज का झंझट भी नहीं। सुधा ओम ढींगरा की ‘ऐसी भी होली’ का अभिनव शर्मा अपने साथ पीएच॰ डी॰ करने वाली यहूदी वेनेसा से आर्यसमाजी विधि से विवाह करता हैं। पूरा परिवार नाराज हो जाता है। जैसे ही दादा उन्हें जायदाद से बेदखल करने का ईमेल भेजते हैं, अभिनव आईडी, ईमेल, फोन नम्बर सब बदल उनसे नाता तोड़ लेते हैं। लेकिन वेनेसा उनसे सम्पर्क बनाए रखती है और होली के दिन उसके पूरे परिवार को अमेरिका बुला प्रेम वात्सल्य के रंगों से सभी को सराबोर कर देती है। 

अर्चना पेन्यूली की ‘डेरिक की तीर्थयात्रा’ विखंडित दाम्पत्य की अखंडित प्रेम कथा है। पूर्व पत्नी नीना की बरसी पर पहुँचने के लिए डेरिक को नीना की माँ का फोन आता है और वह 90 किलोमीटर दूर सिद्धि विनायक के मंदिर तक 15 घंटे की पदयात्रा का निर्णय करता है। इस कठिन पदयात्रा द्वारा वह अपनी पूर्व पत्नी के प्रति अपना प्रेम और श्रद्धांजलि अर्पित करता है। 

 आत्मिक और आंतरिक प्रेम गोरे काले में भेद नहीं करता। लावण्या दीपक शाह की ‘मनमीत’ में राजकुमारी रतना के पिता स्विटजरलैंड में शराब के व्यापारी की बेटी स्टेला से शादी कर वहीं बस जाते हैं। कादंबरी मेहरा की ‘रंगो के उस पार’ की आबनूस सी काली गुजराती कैरेन और अंग्रेज़ मार्टिन शादी करके सफल दाम्पत्य की शुरुआत करते हैं। अनिल प्रभा कुमार की ‘जिन की गोद भराई नहीं होती’ में मार्टिन और सूर्या, सुषम बेदी की ‘पड़ोस में’ की यहूदी एमा और अमेरिकन अरविन सफल दंपति हैं। 

 अन्तर्राष्ट्रीय विवाह आज का समय सत्य है, स्थान सत्य है, जीवन सत्य है। विदेश के खुले वातावरण के बाद युवतियों के लिए अपने देश के बंधनों और रूढ़ियो की ओर लौटना संभव ही नहीं, जब कि पितृसत्ताक के पुरुष के लिए वहाँ की स्वछंद पत्नी से सामंजस्य बिठाना मुश्किल हो रहा है। एक सच यह भी है कि पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक धारणाओं के कारण अंतर्राष्ट्रीय विवाह बहुत बार व्यक्ति को नितांत अकेला छोड़ जाते हैं। यौन धारणाओं, लक्ष्मण रेखाओं, वैध-अवैध सीमाओं के कारण भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति में मूलभूत अंतर भी है। ऐसे विवाहों के मूल में सुरक्षा और असुरक्षा के तथ्य भी समाये हैं और ग्रीन कार्ड की जरूरत भी। एक सच्चाई यह भी है कि धर्म, भाषा, राष्ट्र, सभ्यता-संस्कृति की सारी लक्ष्मण रेखाओं और वैभिन्य के बावजूद अधिकतर अंतरदेशीय/ अन्तर्राष्ट्रीय विवाह की कहानियाँ प्रगाढ़ एवं सफल दाम्पत्य की कहानियाँ हैं। 


संदर्भ
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  2. सुषम बेदी, बीच की भटकन, चिड़िया और चील, पराग, दिल्ली, 1995. 
  3. उषा वर्मा, उसकी ज़मीन, प्रवासी दुनिया, 21 मई 2011. 
  4. सुषम बेदी, अजेलिया के फूल, चिड़िया और चील, पराग, दिल्ली, 1995.
  5. वही, जमी बर्फ का कवच. . 
  6. वही, तलाश अपनी. 
  7. उषा प्रिंयम्वदा,ट्रिप, कितना बड़ा झूठ, राजकमल, दिल्ली, पाँचवाँ संस्कारण, 1989. 
  8. वही, सागर पार का संगीत. 
  9. वही, लक्ष्मी शुक्ल, अभिव्यक्ति, 9 अक्तूबर, 2013.  
  10. दिव्या माथुर, खल्लास, पंगा और अन्य कहानियाँ, मेघा बुक्स, दिल्ली, 2009.  
  11. सुदर्शन प्रियदर्शिनी, देशान्तर, http://gadyakosh.org/Gk/देशान्तर/-सुदर्शन-प्रियदर्शिनी  
  12. स्नेह ठाकुर, क्षमा, वसुधा-47, जुलाई-सितम्बर 2015. 
  13. सुदर्शन प्रियदर्शिनी, सेंध, अभिव्यक्ति, 7 अप्रैल 2014. 
  14. भावना सक्सेना, एप्लीक्स, गर्भनाल, अप्रैल 2011. 
  15. सुनीता जैन, काफी नहीं, हारिगंधा-241, सितम्बर 2014. 
  16. सुधा ओम ढींगरा, फंदा क्यों, अभिव्यक्ति, 4 जनवरी 2009. 
  17. अर्चना पेन्यूली, मीरा बनाम सिल्विया, आधारशिला-97, दिसम्बर 2011. 
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  20. वही, आचार संहिता, http://gadyakosh.org/Gk/आचार_संहिता/-सुदर्शन-प्रियदर्शिनी
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  22. वही, लांड्रोमेट, दो आँखों वाले चेहरे, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1968. 
  23. वही, डायना की परछाईं 
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  27. सुदर्शन प्रियदर्शिनी, इंद्रधनुष, अनहद कृति-2, 23 जून 2013. 
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  29. सुधा ओम ढींगरा, ऐसी भी होली, अभिव्यक्ति, 1 मार्च 2010. 
  30. अर्चना पेन्यूली, डेरिक की तीर्थयात्रा, हंस, सितंबर 2014.
  31. लावण्या शाह, मनमीत, अधूरे अफसाने, शिवना, सीहोर, म० प्र०, 2016. 
  32. कादम्बरी मेहरा, रंगो के उस पार, जय विजय, 24 नवम्बर 2015. 
  33. अनिल प्रभा कुमार, जिन की गोद भराई नहीं होती, अभिव्यक्ति, 15 नवम्बर, 2016. 

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