काव्य: अमरेन्द्र सुमन

अमरेन्द्र सुमन

अमरेन्द्र सुमन


प्रेम

प्रेम शिक्षा है,
प्रेम भिक्षा है।

प्रेम सुकुन है,
प्रेम जुनून है।

प्रेम श्रद्धा है,
प्रेम स्पर्धा है।

प्रेम सौगात है,
प्रेम आघात है।

प्रेम शक्ति है,
प्रेम विरक्ति है।

प्रेम आस्था है,
प्रेम मुक्ति का
सुलभ रास्ता है।
=============

घृणा

घृणा उससे
इसलिये नहीं थी
कि वह स्वस्थ, सुन्दर जवान था।

पैरवी में प्रवीण
पैसे से धनवान था।

घृणा इसलिये थी कि
सबकुछ रहते हुए भी
न तो वह ज्ञानवान था
न ही एक अच्छा इंसान था।
====================

खुशनसीब हूँ इसलिये नहीं कि...

खुशनसीब हूँ
इसलिये नहीं कि
तुम सुन्दर हो
सुशील हो
समझदार हो।

आदमी को
समझने-बूझने की
क्षमता है मौजूद तुममें।

खुशनसीब हूँ मैं
इसलिये कि ...

घर की चिंता
घर पर ही छोड़कर
जब-जब भी
होता हूँ दूर घर से
और खो जाता हूँ
दूसरी दुनिया में
बिना विश्राम
नये-नये कंधों का
सहारा लिये।

पल-पल की
चौकसी करती
तुम्हारी आँखें
थाम लेती हैं डगमगा रहे
मेरे कदमों को।

जानती हैं
तुम्हारी आँखें
मेरा वजूद
पहचानती हैं वे
मेरा स्वभाव।
=================

अंतिम खत पिता का 

पिताजी का पत्र पढ़ रहा हूँ
अंतिम मर्तबा उन्होंने जो लिखा था मेरे लिए।

उन्होंने लिखा था -
पता नहीं कब आ जाए ऊपर वाले का बुलावा
पहले भी कई-कई मर्तबा
लिख चुका हूँ
इसे अंतिम ही समझना।

आगे लिखा था
मारा की वजह से बटाईदारों ने
कुल का चार आना ही दिया धान इस वर्ष।

चचेरा भाई मुरली बंटवारा
चाहता है
झगड़ालू पत्नी वेवजह
खरी-खोटी
बकती रहती है उसकी
बलजबरी टांड़ वाली जमीन पर
चला रहा है बलेसरा हल।

कृषि लोन वसूली के लिये बैंक वाले आए थे
कुर्की-जब्ती निकल जाएगी चुकता नहीं किया तो
अगली दफा
पुलिस के साथ आऊंगा
धमका कर चले गए।

लाईव सर्टिफिकेट के लिये देवघर जाना जरुरी है
चल-फिर सकने में लाचार हूँ
पिछले वर्ष एक मुनिस
के साथ गया था
वह भी कोलकाता चला गया काम करने।

अकेले गाँव में रहना
आसान नहीं रह गया
रोज रात में पहरा होता है
चोरी-डकैती के भय से
शाम को ही दरवाजा बंद कर सो जाते हैं लोग।

पता ही होगा, गोर्वधन मोदी
नहीं रहा
बड़ा भला आदमी था बेचारा
जब भी दूकान जाता
मुंशी जी कहकर इलायची ज़रूर थमा देता।

लिखा था कुआँ का पानी
सूख रहा है
पड़ा-पड़ा चापानल का दरख्वास्त सड़ रहा है ब्लॉक में
कोई ईडीओ-बीडीओ
काम करने वाला नहीं
सभी कामचोर हैं।

यूरिक एसिड, गैस व
कब्जियत से
परेशान माँ की हालत ठीक नहीं
बढ़ता ही जा रहा पैर का सूजन
कम नहीं करतीं फिर भी खाना तेल-मसाला।

छुटकी का खत आया था
कह रही थी बाबूजी इनसे
अवश्य मिल लेंगे

शादी के बाद देने में असमर्थ चीजों पर
हर रोज बवाल होता है
अकेले जाने नहीं देते ससुराल वाले मैके।

अंतिम पारा में लिखा था
नौकरी पर दुल्हिन को मत भेजना

माँ कह रही थी
पूर्णिमा के दिन ही
गोलू का खल्ली-हाथ हो जाय
तो ठीक रहेगा।

दमे से हालत ठीक नहीं रहती
रात-रात भर खाँसता रहता हूँ
कोसों दूर हो चुकी है नींद अपनी।

हुल्लड़ करने वाले लंगोटिये यार
इंतजार में नजरें बिछाए खड़े हैं तुम्हारे

फागुन की जमकर चल रही है तैयारी
कहते हैं भोलवा से पाँच हजार लेकर ही रहेंगे।
जैसा उचित समझो, करना

सोचता हूँ जमकर मैं भी
रंग खेल ही लूँ
भगवान मालिक है आगे।

पिताजी नहीं रहे
पिताजी का अंतिम खत
जिन्दा है आज भी।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।