कविताएँ: हरिहर झा

हरिहर झा

अनछुई छटपटाती वेदना

अनछुई छटपटाती वेदना
कसमसाता निकल पड़ा बीज
सैंक ले रश्मियों का तगड़ा
झेल कर अंधड़, बिखरे फूल
बवाल से भिड़ंत में झगड़ा
दुर्देव का आना, पकड़ना
गुलाबी पंखुड़ी कुरेदना
सुलझ सुलझ गुत्थी में उलझन
अनछुई छटपटाती वेदना

सृष्टि क्रम में भूल हुई क्या?
मूरत सौंदर्य की ढह गई
हिले हाथ फिसल गई स्याही
तिल बन न पाई लो बह गई
आँसुओं की टपटप बरसात
उमड़ती आँधी को भेदना
उछलना समुद्र के ज्वार में
अनछुई छटपटाती वेदना

रची दुनिया परिकल्पना में
वियोग में ना कोई चारा
याद के तार से जुड़ी हुई
जंजीरें भुगत रही कारा
धागे अधूरे अस्तित्व के
एकाकी शून्य में रौंदना
तन्हाई में स्मृति की धूल
अनछुई छटपटाती वेदना

चिड़िया उड़े, उड़ती जाये

चिड़िया उड़े, उड़ती जाये
दुनिया के विष से अनजान
लिये जाए खतरा ऐसे
रोकेगा कैसे हिमालय
लांघ ले नभ, पल में जैसे
उड़ती घोसले से अपने
चोंच में क्या कुछ समेटती
फुरफुराती दाना लाए।
आँखों से ओझल, दिख जाय
कहीं धवल किरण सी हँसती
जज़्बों में समेटी आँधी
सहज तूफानो में बसती
बिलबिलाती भूख समेटे
व्याकुल दिल, उलझ बच्चों में
खिला दे तब दाना खाए
कलरव क्यों है शांत इतना
ना द्वेष-कलुष, न परनिंदा

सोचे, बिन इंजिन, बिन धुआँ
वायुयान हो कर शर्मिंदा
क्या आन-बान बख़ान करें
पी लेगी पूरा आकाश
पंख फैले, नभ में छाए।

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