कविताएँ: ओमप्रकाश पाण्डेय 'नमन'

ओमप्रकाश पांडेय "नमन"

- 1 -

जब भी
वेदना को मिलते हैं स्वर
गढ़ी जाती है
एक कविता
कविता
ह्रदय की भाषा है
आत्मा का
श्रृंगार है कविता
कविता
सिर्फ शब्दों का मायाजाल नहीं है
कविता है
मनुष्य की उत्सवधर्मिता
भविष्य की चेतना
समाज का संघर्ष
कवि
कविता करता नहीं
कविता जीता है अपने अंदर
कवि होना
अच्छा मनुष्य होना है
प्रेम, त्याग ,बलिदान
और राष्ट्रप्रेम की थाती है कविता
कविता करती है आज का मूल्यांकन
कविता देती है कल के लिए संदेश
कविता दोहराती है बीत चुके कल को...
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- 2 -

खबरें रखैल हैं
सत्ताधीशों की
पूंजीपतियों की
भ्रष्ट अफसरों की
रोज-रोज
काला होता है
अखबारों का
मुख (पत्र)
बदनाम
बिकी हुई खबरें
फैलाती हैं सनसनी।
संपादक
बदनाम गली के बाहर तैनात
वह पुलिसिया है
जो मजबूरी में
दूसरी तरफ देखता रहता है
आख़िर
उसका भी पेट है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया
बदनाम गली को
पाँच सितारा होटल तक ले आई है
यहाँ खबरें चमकती हैं
मटकती हैं
बिकती हैं ऊँचे भाव में
इज्जत से।

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- 3 -

100 करोड़ की घूस माँगते हुए
500 और 2000 के नोटों में
चिप्स लगे होने की बात करते हुए
नकली वीडियो दिखाकर
नवजवान छात्रों को देशद्रोही करार देते हुए
सर्जिकल स्ट्राइक के वीडियो दिखाने की बात करते हुए
विधायकों की खरीद फरोख्त का समर्थन करते हुए
नंगे हो जाते हैं वे
और मैं
टीवी बंद कर देता हूँ .....

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- 4 - 

बात मत करो तुम
पेट्रोल के बढ़ते दामों की
मंहगाई की
बेरोजगारी की
सीमा पर शहीद होते जवानों की
खेत में मर रहे किसानों की
सरकारी लूट की
बलात्कार की छूट की
बेईमानी की- झूठ की
प्रधानमंत्री के जुमलों की
प्रजातंत्र पर हो रहे हमलों की
डरो तुम
तुम्हे मुसलमानों से खतरा है...

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- 5 -

मंचों से बकैती
जेबों पर डकैती
शहरों में फिरौती
राजनीती में बपौती
बाबाओं की पनौती
और नेताओं में  छिनरौती आम है
बद अच्छा है
और अच्छा बदनाम है
पापियों का नारा भी
जय श्रीराम है।

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