कहानी: कसक

स्वाति श्वेता

स्वाति श्वेता 


सुबह से शाम हो जाती है और मैं दौड़ती रहती हूँ।

“सलोनी मेरे जूते कहाँ हैं?”
“बाहर कुर्सी के नीचे रख दिये हैं।”
“पर वहाँ नहीं हैं। क्या मैं अँधा हूँ?”

मैं चुपचाप कमरे से बाहर जा, जूते ले आती हूँ, “यहीं तो पड़े हैं।”

“ठीक है, ठीक है। मेरी चाबी तो दे दो।”
“कहाँ रखी थी कल आपने?”
“मुझे पता होता तो तुम से पूछता?”

तभी चुन्नू बीच में आ जाता है, “मम्मी टाई बाँध दो। बंध नहीं रही है।”
“बेटा पापा से बँधवा लो तो। मैं जरा पापा की चाबी ढूँढ़ कर आती हूँ।”
“चाबी तो पापा के कोट की जेब में है।” चुन्नू यकायक बोल पड़ा।
“अच्छा-अच्छा ठीक है माँ के जासूस।” इन्होंने गुस्से में चुन्नू को कहा।
“ला जल्दी दे टाई बाँध दूँ।” मैंने कहा।
“सलोनी, टाई बाद में बाँधना, पहले मेरा बैग ठीक कर दो।”

मैं चुन्नू को ‘अभी आई’ कह इनका बैग ठीक करने चली जाती हूँ। जब तक वापस आती हूँ तब तक चुन्नू बिना खाए, बिना टिफिन लिए जा चुका होता है। टिफिन का डिब्बा वैसा का वैसा टेबल पर पड़ा है पर चुन्नू जा चुका है।
 ये दोनों जा चुके हैं।

घर में एक निगल जाने वाला सन्नाटा है। बेचैन कर देने वाला सन्नाटा। मैं एआईआर एफएम गोल्ड लगा देती हूँ। रेडियो की आवाज़ तेज़ कर मैं अपने लिये चाय बनाती हूँ। कहीं नहीं जाना है यह जानते हुए भी तेज-तेज चाय पीती हूँ और फिर घर के कामों में जुट जाती हूँ। बारह बजे तक नहाने घुसती हूँ और सवा बजे घर के कामों से निश्चिन्त हो कमर सीधा करने बैठती ही हूँ कि कॉल बेल बज उठती है।

“हलो मिसिज सिंह।”
“न-नमस्ते। हलो मैडम।”
“मैं किट्टी पर जा रही थी कि मेरी कार खराब हो गई। तो सोचा कि आपका घर पास ही है, जब तक ड्राइवर कार बनवा कर ले आए तब तक क्यों न आपसे गपशप लड़ा आऊँ?”
“हाँ-हाँ क्यों नहीं मैडम। क्या लीजिएगा मैडम चाय या कॉफी?”
“अरे भाई गर्मी वैसे ही इतनी है। ठण्डा मिलेगा?”

“हाँ-हाँ जरूर।” और मैं अंदर आ जाती हूँ। मैं जानती हूँ कि घर में ठण्डा नहीं है और मेरे पास इस समय दस रुपये भी नहीं हैं। पास में कोई होम डिलिवरी करने की दुकान भी तो नहीं है। उधार पर समान लेने जाऊँगी तो घर किस पर छोड़ कर जाऊ? क्या करूँ? इनके बॉस की पत्नी है । अभी इसी उलझन से बाहर निकलने की कोशिश कर ही रही थी कि  एक बार फिर से कॉल बेल बज उठती है। एक बज कर बीस मिनट हो रहे हैं इससे पहले कि मैं दरवाज़ा खोलने के लिए रसोई से निकलूँ चुन्नू दरवाज़ा खोल अंदर आ जाता है। कपड़ों की सारी क्रीज़ टूट चुकी है। शर्ट पैंट से बाहर है। मिसिज शर्मा चुन्नू को चिड़ियाघर से छूटे किसी पशु की तरह देखती हैं। चुन्नू बैग ड्राइंग रूम के चेस्ट बॉक्स के अपने शेल्फ में रख देता है। मिसिज शर्मा उसे देखती ही जाती हैं। चुन्नू गैलरी में लगे जूते स्टैंड’ पर जूते उतार कर रख देता है। मिसिज शर्मा झीने पर्दे में से उसे देखती चली जाती हैं। चुन्नू वहीं अपनी हाफ पैंट उतार देता है। मिसिज शर्मा एक पल के लिए आँखें बंद कर फिर खोल देखती हैं। तभी चुन्नू की नज़र  मेरी नज़र से टकराती है और वह रसोई में आ जाता है।

“चुन्नू बेटा, जल्दी से घर की पैंट पहन और पास की दुकान से एक बोतल ठण्डा तो ले आ।”
“सच!” वह यकायक बोल उठा। उसकी आखों में अनगिनत चाहतें हिलोरे मार रहीं थीं।
“हाँ ! देख आंटी कब से इंतजार कर रही हैं। जा दौड़ कर उनके लिए ले आ।”
पर चुन्नू के आँखों से अब वह ‘सच’ वाली चमक हट चुकी थी, “पैसे?” उसने बहुत तल्ख आवाज़ में कहा।
“दुकान वाले अंकल से कहना शाम को पापा दे देगें।”
‘नहीं ,पहले पैसे दो तब जाऊँगा। ’
“बेटा जिद मत कर। पैसे होते तो ज़रूर दे देती। पापा शाम को उसे दे देंगे।”
“मैं कुछ भी उधार नहीं ला सकता। अगर इन मोटियों को पिलाने का इतना शौक है तो पैसे रखा करो माँ।”
इतने में एक बार फिर कॉल बेल बजती है। इससे पहले कि मैं दरवाज़ा खोलने को बढ़ूँ चुन्नू मुझे अपनी नज़र से रोक, दरवाज़ा खुद खोलने के लिए चला जाता है।
चुन्नू दरवाजा खोलता है।
“ऐ, मैडम से कहो कार ठीक हो गई है।”
“कहो नहीं, कहिए बोलना सीखो।” और वह दरवाज़ा पूरा खोल मिसिज़ शर्मा की ओर देखता है।
“अच्छा मिसिज सिंह मैं चलती हूँ।” मिसिज शर्मा वहीं से जोर से हाँक लगाती हैं।
“अरे ऐसे कैसे।  फ्रिज़र में ठंडी बोतल नहीं है न इसलिए फोन पर कह मँगवा लिया है। बस वह ले कर आता ही होगा।”
“नहीं बस। ड्राइवर भी आ गया है। फिर किसी दिन। अच्छा बॉय।”
“जी बाय ,नमस्ते। ’
मिसिज शर्मा के जाने के बाद घर में घोर चुप्पी छा जाती है।
“चलो चुन्नू खाना खा लो।”
“मुझे भूख नहीं है।”
“ऐसे कैसे हो सकता है। तुम टिफिन भी नहीं ले गए ,अबतक  कुछ  खाया भी नहीं है। देखो अब डेढ़  बजने को आ रहे हैं। चलो।”

चुन्नू रसोई की स्लैब पर बैठ जाता है और मैं उसे खिला रही हूँ। थोड़ी देर में चुन्नू सब भूल जाता है। पहले तीन-चार निवाले धीरे-धीरे खाने के बाद उसका चेहरा, आँख, नाक, मुँह, दिमाग सब उसे जल्दी-जल्दी खाने के लिए प्रेरित करते हैं।
“माँ!”
“हाँ!”
“आज जानती हो क्या हुआ?”
“नहीं तो ! क्या हुआ?”
“आज मिस ने मुझसे दस क्वेश्चन पूछे और मैंने सभी का सही जवाब दिया।” मैं मुस्कुरा देती हूँ।
कुछ और निवाले खाने के बाद वह फिर बोला।
“मुझे जानती हो इनाम में चॉकलेट और दो ‘एलपेनलीबी’ मिली।” और फिर वह स्लैब से नीचे कूद बैग में से चॉकलेट और एलपेनलीबी उठा लाता है।
मैं एक बार फिर मुस्कुरा देती हूँ।
“माँ यह तुम्हारा हिस्सा।”
“मेरा?” मैं आश्चर्यचकित  हूँ।
“अच्छा चलो पहले खाना खत्म करो।” और मैं चुन्नू को फिर से स्लैब पर बिठा देती हूँ।
“करेला लगा कर बार-बार मत दो माँ। अब चने के साथ दो।”
मेरी  ममतामयी नज़रें भावविभोर हो उठती हैं। चुन्नू सो रहा है। दो घण्टे हो चुके हैं। मैं उसे जल्दी से उठा उसका होमवर्क कराती हूँ। नीचे खेलने जाने से पहले वह शाम को कहीं बाहर घूमने का वायदा मुझसे करवा लेता है।
‘क्यों नहीं? ज़रूर चलेंगे। पापा आ जाए फिर हम तीनों चलेंगे। ’
 बहुत दिन हो गए जब हम सब कहीं बाहर निकले हों। चुन्नू नीचे जा चुका है। मैं चाय का पानी चढ़ा देती हूँ। पाँच से ऊपर हो चुके हैं। ये आते ही होंगे। इन्हें चाय - नाश्ता करवा कहीं बाहर चलने को कहूँगी।
पानी के खौलते बुलबुले मुझे हर बार पलक झपकते ही अलग-अलग आकृति लिए दीखते हैं। वह खौलती आवाजें मुझे कुछ सृजन करने के लिए प्रेरित करती हैं। मेरे अन्दर का कवि मेरे अन्दर का कलाकार व्याकुल हो उठता है तभी इनकी गाड़ी के आने  की आवाज़ सुनाई पड़ती है और मेरे अन्दर का कलाकार, मेरे अन्दर का कवि पुनः अन्दर सिमट जाता है।
“कहाँ हो तुम?”
“यहाँ रसोई में। क्या बात है?” मैं कुछ रुक कर पूछती हूँ।
“क्या तुम सुबह से शाम रसोई में घुसी रहती हो? चलो तैयार हो जाओ।”
“कहीं जाना है?” मैंने उत्सुकता दिखाई।
“एक तो तुम सवाल बहुत करती हो।”
“नहीं ऐसा नहीं है। मेरा वह मतलब नहीं था।”
“अरे जल्दी करो। हमें ‘ओक’ साहब के यहाँ जाना है। वह अब हमारे बॉस हो गए हैं।” और मैं अंदर आ फटाफट नीले रंग की शिफॉन की साड़ी पहन नीचे चुन्नू को आवाज़ देती हूँ।
“चुन्नू बाहर जाना है। जल्दी ऊपर आओ बेटा।”
चुन्नू दौड़ा ऊपर आता है।
“जाओ जल्दी बाथरूम हो आओ और हाँ, मुँह भी धो लो। मैं कपड़े बदल देती हूँ। ठीक है।”
इससे पहले की चुन्नू  कुछ बोलता इनकी आवाज़ मुझ तक पहुँच चुकी थी।
“चुन्नू कहीं नहीं जा रहा है। अरे सिर्फ हम दोनों जा रहे हैं। ओक साहब के घर क्या पूरा कुनबा ले कर जाएँगे। क्या सोचेंगे वे भी?”
“पर आज तक चुन्नू अकेला नहीं रहा। फिर आज कैसे रहेगा?”
“क्यों क्या दूसरे बच्चे अकेले नहीं रहते हैं?” यह कहते ही वह अपने साथ लाए झोले में से चिप्स, बिस्किट, कोक, केक सब लाकर टेबल पर रख देते हैं।
“अब जल्दी चलो कहीं कोई दूसरा पहले न पहुँच जाए।”
मैं देखती हूँ चुन्नू सामने खड़ा है।
“बेटा हम एक-दो घण्टों में आएँगे। तब तक तुम एन्जॉय करो।” इतना कह ये चुन्नू को अन्दर कर मुझे तेज-तेज नीचे ले जाते हैं।
गाड़ी स्टार्ट हो चुकी है। बैठने से पहले मैं ऊपर देखती हूँ। चुन्नू खिड़की पर चुपचाप खड़ा है। वह पलक झपकाता है और मुझे दोपहर का चाकलेट देता उसका मासूम चेहरा दिखाई देता है। वह दूसरी बार पलक छपकाता है और मुझे उससे शाम को बाहर ले जाने के वायदे की गूँज सुनाई देती है। वह अन्तिम बार पलक झपकाता है और मुझे उसकी आँखों में बर्फ की तरह जमती जा रही नफरत दिखाई देती है जो आँसू बन मेरी आँखों से बह, चेहरे से उतरती हुई हाथों की पगडंडियों से होकर उँगलियों से नीचे बह जाती है।
घर्र-घर्र-घर्र। गाड़ी अस्सी  की गति से बहुत तेज़ चल रही है।  हम धीरे-धीरे चुन्नू से दूर होते चले जा रहे हैं।

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