गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में चित्रित समाज एवं संस्कृति का स्वरूप

अनिल कुमार

गोविन्द मिश्र हिंदी के श्रेष्ठतम कथाकारों में से एक हैं। उन्होंने अब तक बारह उपन्यास, बारह कहानी संग्रह एवं यात्रावृत्तांत, निबंध एवं कविताओं का लेखन कार्य किया है। उनके महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में वह अपना चेहरा, धूल पौधों पर, लाल पीली जमीन, पांच आंगनों वाला घर, तुम्हारी रोशनी में, फूल इमारतें और बंदर, धीर समीर, कोहरे में कैद रंग आदि हैं। गोविन्द मिश्र को साहित्य अकादमी, व्यास सम्मान, एवं सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया गया है। भोपाल में रहकर वे अनवरत हिंदी साहित्य की सेवा में संलग्न हैं।
समाज बहुत कुछ धर्माधारित हुआ करता है। अनेक प्रकार की जातियों एवं समाजों के आपसी मेल-मिलाप के प्रभाव से एक नए तरह का समाज और नई तरह की संस्कृति विकसित होती है। व्यक्ति का सम्बन्ध अपने समाज से होता है। जिस समूह में व्यक्ति पला-बढ़ा होता है उस समाज और संस्कृति से उसका जुड़ाव हुआ करता है।
 अपने समूह से बाहर निकलकर जब व्यक्ति अन्य समाजों से अपना परिचय बढ़ाता है या अन्य समाज से उसका साक्षात्कार होता है, तो वह अपने और दूसरे की संस्कृति और समाज की तुलना करता है। अपने समाज की खामियों को दूर करते हुए उससे अच्छाई ग्रहण करता है।
 भारतीय समाज और यहाँ पर गठित विभिन्न समाजों के बारे में ‘भारतीय समाज: संरचना और परिवर्तन’ नामक ग्रन्थ में ए. एल. दोषी, पी. सी. जैन ने समाज को परिभाषित करते हुए लिखा है - “समाज और कुछ न होकर अन्तःक्रियाओं की एक व्यवस्था है। भारतीय समाज की अपनी एक विशिष्टता रही है अपनी इस विशिष्ट व्यवस्था की अन्तः क्रिया बाहरी परम्पराओं की व्यवस्थाओं के साथ हुई है, यह भारत आतंरिक और बाहरी व्यवस्थाओं की अन्तःक्रिया का परिणाम है।”[1]

मध्यवर्गीय समाज का स्वरूप- गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में भारतीय मध्यवर्ग की तस्वीर स्पष्ट देखी जा सकती है। ‘पाँच आंगनों वाला घर’ में भारतीय शहरी मध्यवर्ग के स्वरूप का निरूपण किया गया है। मुंशी राधेलाल का घर समग्र भारत का प्रतीक है, यह घर आज़ादी के लिए तन-मन से समर्पित दिखाया गया है। पाँच आंगनों वाले इस बड़े से घर में भारत की पूरी विशेषता प्रकट हो गयी है “एक घर में फैला पूरे का पूरा संसार। जोगेश्वरी के चारों के चारों लड़के उसी घर में रहते थे। सबसे बड़े मुंशी राधेलाल वकील, जिनके राजन समेत तीन लड़के और एक लड़की। दूसरे नंबर पर घनश्याम जिनकी पत्नी घर में रामनगर वाली कहाती थीं। तीसरी बांके जिनकी पत्नी शिवपुरी वाली। चौथे सन्नी अविवाहित।”[2] 
पारिवारिक संतुलन एवं देश के प्रति चिंता मध्यवर्गीय समाज की पहली विशेषता मानी जा सकती है, गोविन्द मिश्र ने इस उपन्यास में लिखा है “तो जमीन से लगाव,माने समय की धारा से जुड़ जाना। मौजूदा वक्त में समय की धारा है–अंग्रेजों के खिलाफ छिड़ी हुयी जंग। अगर गृहस्त आदि होना कर्म है तो आज़ादी की लड़ाई में कूद जाना धर्म है।”[3] इस मध्यवर्ग में मानवीय मूल्यों को बहुत सहेजकर रखा जाता है।
 ‘कोहरे में कैद रंग’ में गोविन्द मिश्र ने मूल्यों का हवाला देते हुए लिखा है- “गलत हैं वे लोग जो रिश्तेनातों को परिवार तक ही सीमित रखते हैं। आसपास लोग आपका कुछ भी बनने को सहज तैयार रहते हैं बराबर! हमारी तंगदिली ही उन्हें हमारे वृत्त में आने से रोकती है।”[4]
 रिश्तों की पहचान एवं परंपराओं का निर्वहण इस मध्यवर्ग की प्रमुखता मानी जाती है। देश की आज़ादी के पूर्व के मध्यवर्ग में आदमियत जिन्दा दिखाई गयी है। आज़ादी मिलने के पूर्व जो मध्यवर्ग देश के बलिदान हेतु सड़कों पर निकला था अब वह दिल्ली की ओर कुर्सी के लिए दौड़ पड़ा था “यह गाँधी की काँग्रेस नहीं है। पहले जेल और लाठी के लिए दौड़ते थे, अब लोग राजधानी की तरफ दौड़ते हैं लपलपाय के– यह पाने या वह पाने।”[5] पीछे रह गयी वो मान्यताएँ, हिदायतें, मूल्य एवं सरोकार जिसके लिए देश के लोगों ने गाँधी जी के नेतृत्त्व में कुर्बानियाँ दी थीं। गाँधी जी की हत्या मूल्यों की हत्या थी “गाँधी की हत्या एक आदमी की हत्या नहीं मूल्यों की हत्या थी।”[6]
 भारत-चीन युद्ध के पश्चात मूल्य और भी तेजी से टूट गए थे, देश के प्रति जो एक प्रेम बचा था पराजयबोध ने वह भी समाप्त कर दिया था। आपातकाल की घोषणा और बहुसंख्यक वर्ग के हितों के लिए गठित मंडलकमीशन की राजनीति के चलते समाज में सवर्ण और अवर्ण के अधिकारों एवं भेदभाव की गहराती खाई के चलते मध्यवर्ग शीतयुद्ध की कगार पर आ खड़ा हुआ था। राजनीति ने समाज में साम्प्रदायिक सौहार्द को विनष्ट कर दिया था। बढ़ती बेरोजगारी और जनसंख्या के सैलाब ने भारत के सम्मुख नयी समस्या खड़ी कर दी थी। मध्यवर्ग के युवाओं के सपनों की सीमा विदेशों तक को छूने लगी थी, वह विदेशी शिक्षा प्राप्त करके कुछ ने देश का नाम रोशन किया तो कुछ देश और समाज को हीन नज़रों से देखने लगे  थे। पुरानी मूल्य और परंपराए उसके सम्मुख अतीत की चीजें रह गयी थीं।   
          ग्रामीण समाज की स्थिति और जटिल होती जा रही है। यहाँ का मध्यवर्ग गुलामी की जकड़न में अभी भी जी रहा है। किसान, मजदूर और स्त्रियों की जिन्दगी में कोई बदलाव नहीं हो पाया है।     आज़ादी इनके लिए कोई मायने नहीं रखती है। मजदूर और किसान निरंतर रोटी-कपड़ा और मकान के लिए सदा से जूझता ही रहा था वह आज भी संघर्ष कर रहा है। भारत के नेताओं के द्वारा तैयार की गयी नीतियाँ इनके गले का फाँस बनती जा रही हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य मध्यवर्गीय परिवार के बस के बाहर होती जा रही है। ‘लाल पीली जमीन’, ‘कोहरे में कैद रंग’, जैसे उपन्यासों में निम्नमध्यवर्ग और मध्यवर्ग के जीवन संघर्ष को दिखाया गया है। ‘आदमी की निगाह में औरत’कृति में राजेन्द्र यादव ने लिखा है कि- “इस समाज में स्त्री की न अपनी कोई जाति है, न नाम और न अपनी इच्छा। हर जाति या नस्ल ने एक-दूसरे की स्त्रियों को लूटा, छीना या अपनाया है, वह आजन्म किसी की पत्नी और किसी की माँ के रूप में ही जानी जाती है। उसी से उसका पद और प्रतिष्ठा बनते हैं, यहाँ तक कि पर्दे के नाम पर उसका चेहरा भी उससे छीन लिया गया है, वह सिर्फ एक बेनाम, बेचेहरा और बेपहचना औरत है।”[7]     
गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में इसी सामंती मानसिकता से युक्त समाज और उसमें संघर्षरत स्त्री की व्यथा-कथा है। मध्यवर्गीय परिवार अभी भी सामंती प्रवृत्ति का शिकार है, वह रूढ़ियों, परंपराओं एवं अंधविश्वासों से ग्रस्त है। भारतीय समाज स्त्रियों के प्रति अभी भी पिछड़ी हुयी गुलाम मानसिकता का बोलबाला है। गोविन्द मिश्र ने अपने उपन्यासों के माध्यम से मध्यवर्गीय समाज के तानेबाने को सामने लाया है।
ग्रामीण मध्यवर्ग- ए. आर. देसाई ने ग्रामीण वर्ग की परिभाषा देते हुए लिखा है कि “प्रत्येक सामाजिक घटना (phenomenon) की भाँति ग्राम भी एक ऐतिहासिक समूह है। मानव जीवन के विकास की किसी स्थिति विशेष में ग्राम का उद्भव होना, मानव इतिहास के परवर्तीकाल में उसका आगे प्रवर्धन तथा विकास होना, इसके सहस्त्रों वर्षों के जीवन में विभिन्न प्रकार के संरचनात्मक परिवर्तन का अनुभव होना, औद्योगिक क्रांति से लेकर अब तक के पिछले डेढ़ सौ वर्षों में उसमें द्रुतगति से मौलिक परिवर्तन होना”[8] ही ग्रामीण मध्यवर्ग के उद्भव का कारण रहा है।   
‘कोहरे में कैद रंग’ उपन्यास में अति-पिछड़े माने जाने वाले बुंदेलखंड के गाँवों का समाज चित्रित किया गया है ‘मैं’ (प्रमुख पात्र) का परिवार बेहद परंपरावादी है साथ ही अतिसय गरीबी और अशिक्षा व्याप्त होने के कारण उनका परिवेश वहाँ की चट्टान की तरह स्थिर है - “भूख! वह बुनियादी चिंता है जो दादा से चलकर पिता तक आयी थी, दोनों ने जीवन में भूख देखी थी इसलिए। चाहे गाँव का वह रसखीर वाला दिन हो या बोर्डिंग हाउस में भेजने वाला दिन, भूख का इन्तजाम करके ही पिता मेरे लिए अपना स्नेह दिखाते थे।”[9] भूख, मध्यवर्ग की पहली चिंता रहती है। बेहद पारम्परिक और अविकसित परिवार और समाज में रहते हुए वहाँ के लोग रिश्तों को पहचानते थे, इसीलिये वहाँ रिश्तों में घनिष्टता पायी जाती है। किन्तु ‘मैं’ का परिवार संयुक्त परिवार होने के कारण और अतीत की अपनी जमींदारी विरासत को संभाले हुए भुखमरी के नजदीक आ ठहरता है। उपन्यास में छोटे-छोटे पात्रों के माध्यम से इस वर्ग की दैनिक हालात का अंकन किया है। ‘मैं’ की नानी भैय्याबाई की आर्थिक स्थिति का विवरण करते हुए कथाकार ने सारे समाज का की तस्वीर खींच दी है - “नाना के न रहने पर वे घर से बाहर काम करने निकलीं, एक वही काम जो उन्हें आता था - रसोई बनाने का। दो तीन घर पकड़ लिए। वे पति पर आश्रित रह सकती थीं, बेटा-बहू पर नहीं। भैय्याबाई कहने वाला चला गया था, अब लोग उन्हें महराजिन कहते थे।”[10] इस समाज के लोगों के पास रोजगार का जरिया कुछ भी नहीं था, वे खेतों में मजदूरी करने पर विवश थे। ‘मै’के नाना के पास खेती थी किन्तु उपजाऊ नहीं, वे मंडी में पल्लेदारी करने लगे थे, “नाना जिन्हें हम बब्बा और बाकी लोग दद्दा कहते थे, वे हमारे जागने से बहुत पहले जा चुके होते थे। कहाँ, यह तब हमें मालूम नहीं हुआ था। बड़े होने पर पता चला कि वे शहर से तीन मील बाहर एक गाँव निकल जाते, वहीं तालाब में निस्तार-नहान आदि करके दूर गाँवों से आने वाली बैलगाड़ियों का इंतिजार करते, उनसे तय-तवा करके किसी के बैलगाड़ी में बैठ सीधा मंडी पहुँच जाते थे और फिर दिन भर अनाज तौलना, पसेरी के बाट की बराबरी पर एक बार में पाँच किलो अनाज माने कुल दस सेर उठाना।”[11]
“ग्राम का उदय इतिहास में कृषि अर्थव्यवस्था के उदय के साथ जुड़ा हुआ है”[12] ग्रामीण समाज में स्थानीय संस्थाओं और सभाओं के द्वारा बँधा होता है। परिवार संस्था, विवाह संस्था, कृषिसंस्था, संस्कार, जाति व्यवस्था, धार्मिक संस्था, नातेदारी आदि के द्वारा इस समाज में वर्ग का निर्माण होता है। सरकारी संस्थाओं के द्वारा इस समाज में कृषि एवं रोजगार परक सहायता प्राप्त व्यक्तियों का भी योगदान होता है।
 ग्रामीण निम्न मध्यवर्ग में धर्म-कर्म के प्रति अधिक लगाव होता है। ईश्वर रूपी भय उसे सदा प्रताड़ित करता आया है। ग्रामीण परिवेश पर आधारित कृतियों में निम्न मध्यवर्गीय सामजिक व्यवस्था के अंतर्गत पायी जाने वाली जातिव्यवस्था, पंचायती व्यवस्था, आपसी मतभेद, पार्टी बंदी, प्रशासनिक हस्तक्षेप, धार्मिक उन्माद, जमींदारी प्रथा, वर्चस्व की जंग, अंधविश्वास, धार्मिक पाखण्ड, अशिक्षा, बेरोजगारी, गुंडागर्दी, काम-वासना, अधिकारियों के प्रति कुचक्र, नेताओं की राजनीतिक चालबाजियाँ आदि परिस्थितियाँ सामाजिक परिवेश का तानाबाना बुनती हैं। साथ ही वे बड़े से ग्रामीण निम्नमध्यवर्ग की सोच को कुंद भी करती हैं। गाँवों का शहरों की अपेक्षा पिछड़ापन मुख्यतया अशिक्षा और धार्मिक अंधविश्वास एवं सरकारी नीतियों के प्रति अन्याय के कारण है।       

          पारिवारिक व्यवस्था- परिवार, समाज की लघु इकाई है। परिवार व्यवस्था का निर्माण सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने हेतु किया गया है। जेपी सिंह अपनी पुस्तक ‘समाजशास्त्र: अवधारणाएँ एवं सिद्धांत’ में लिखते हैं - “यौन व्यवहार को नियंत्रित करने और बच्चों को सुरक्षा तथा सामाजिक शिक्षा प्रदान करने की मानवीय आवश्यकताओं के लिए परिवार का सृजन हुआ। परिवार सभी सामाजिक समूहों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और व्यापक समूह है। भारत में परिवार जैसे समूह के अभाव में समाज की कल्पना नहीं की जा सकती।”[13]
          परंपरागत जीवन पद्धति में विश्वास करने वाले लेखक गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में परिवार व्यवस्था का सूक्ष्म अंकन किया गया है। गोविन्द मिश्र के लगभग सारे उपन्यासों में परिवारों में आये टूटन एवं मूल्य संक्रमण को चित्रित किया गया है। बेहद पिछड़े माने जाते हुए गावों में परिवार का व्यक्ति के जीवन में अहम् योगदान होता है। ‘कोहरे में कैद रंग’ उपन्यास में नैरेटर का पालन-पोषण परिवार में होता है, परिवार उसे जीवन के संघर्षों से लड़ना सिखाता है। ‘मैं’ के पिता के पिता का बड़ा सा परिवार है। गरीबी और अशिक्षा में भी प्रेम की डोर बंधी होती है, पिता के प्रति उनके परिवार का लगाव शुद्ध पारिवारिक लगाव है, जहाँ पुत्र के लिए पिता के मन में अगाध प्रेम है। उसकी हर छोटी से बड़ी समस्याओं के लिए सारा परिवार संबल बन कर खड़ा मिलता है। ‘पांच आंगनों वाला घर’ संयुक्त परिवार का बहुत बड़ा उदाहरण है। इसी तरह ‘लाल पीली जमीन’ उपन्यास में पारिवारिक व्यवस्था का चित्रण किया गया है।   

          वैवाहिक व्यवस्था- विवाह, सामाजिक व्यवस्था को नया स्वरूप देता है। भारतीय समाज परम्परागत विवाह पद्धति में विश्वास करता है। इस पद्धति में बिना स्त्री-पुरुष को जाने समझे एक दूसरे के सुपुर्द कर दिया जाता है। जिससे आने वाले समय में स्त्री अपनी जिन्दगी दूसरे के रहम-ओ-करम पर छोड़ देती है। गोविन्द मिश्र ने ‘कोहरे में कैद रंग’ उपन्यास में भारतीय विवाह पद्धति की आलोचना भी की है, उनके अनुसार “कितने जीवन बिगड़ते हैं इससे। साम, दाम, दंड, भेद सबका इस्तेमाल होगा। निकलोगे कैसे, ब्याह नहीं व्यूह है, हमारा रचा हुआ।”[14] गोविन्द मिश्र ने अनमेल विवाह और उसके दुष्परिणामों की ओर भी संकेत किया है, उनके अनुसार ऐसे जीवन में जब पति-पत्नी का वैचारिक अन्तराल होता तब अवैध संबंधों की स्थिति बनी रहेगी, “मुझे लगता है कि जब तक विवाह नाम की संस्था है, विवाहेतर सम्बन्ध होंगे ही। वैवाहिक जीवन ठीक-ठाक चलता रहे, इसके लिए भी वे जरूरी हैं।”[15] यह समाज की सच्चाई के रूप में सामने आती है।   
 इस वैवाहिक संस्था के द्वारा कई सारे बंधन भी थोपे जाते हैं, उत्तर-भारत में प्रचलित ‘दजेह प्रथा’ इस संस्था की सबसे घृणित प्रथा है। वर पक्ष की ओर से विवाह में धन की ऊँची मांग की जाती है, दहेज़ न दे पाने के चलते ससुराल में स्त्रियों का सबसे ज्यादा शोषण स्त्रियाँ करती हैं, आज के समय में दहेज़ सामाजिक हैसियत से जोड़ कर देखा जाने लगा है।
अनमेल विवाह की तरह अनमेल रिश्ते सामाजिक बुराई के रूप में आज सामने हैं। शिक्षित समुदाय इस धन-लुटाई में ज्यादा मशगूल दिखाई पड़ता है। गोविन्द मिश्र ने साहित्य के माध्यम से इस पूरी व्यवस्था पर तीख प्रहार किया है–“आप देख रही हैं कि इन पात्रों में करीब करीब सभी का वैवाहिक जीवन खराब है, कुछ का है ही नहीं–राजकुंवर, राजाबेटी के पिता, मूलचंद। देखा जाय तो अपनी समाज व्यवस्था में विवाह, जिसका ढोल पीटते हम नहीं थकते, वह भारतीय समाज की सबसे ज्यादा जान लेवा चीज है। शुरू में ही कुचलकर रख देती है, इसके बाद तो चलती-फिरती लाशों की तरह जीते हैं लोग।”[16]
धन-लोलुपता और गरीबी के कारण समाज में अनेक तरह की बुराइयाँ व्याप्त हो गयी हैं। विधवा विवाह जैसे खात्मे की ओर है। विधवा स्त्री सारी जिन्दगी समाज के बेहया लोगों की वस्तु बनकर रह जाती है इसके बरक्स नाबालिक लड़कियाँ उम्रदराज विधुरों के गले बाँध दी जाती हैं। जिनकी सारी जिन्दगी दुःख सहते ही बीत जाती है। ‘कोहरे में कैद रंग’ में सावित्री का विवाह एक विधुर के साथ कर दिया जाता है जिसकी दो संताने पहले से मौजूद हैं, सावित्री उन संतानों की देख-रेख के लिए अपना जीवन दाँव पर लगा देती है “अपने इन बच्चों का पालन-पोषण इतना अच्छा करूँ जितना उनकी सगी माँ भी नहीं कर सकती थी। उन्हें अपनी माँ की कमी न खटके। मैं भी जानती हूँ यह दुःख कितना बड़ा होता है। अपनी मर्जी से मैंने अपना आपरेशन भी करवा लिया कि मेरे अपने बच्चे न हों”[17] भारतीय सामाज में स्त्रियों की विवाह के सम्बन्ध में कोई अहमियत नहीं दी जाती है वह सर झुकाकर समर्पण के लिए तैयार रहती है - “लड़की के लिए विवाह क्या होता है हमारे देश में-जो मिला उसे सर झुकाकर स्वीकार कर लेना, अपने मन को रोज-रोज, क्षण-क्षण मारते चले जाना। ताजिंदगी कैदी की तरह रहना।”[18] पति-पत्नी के बीच विवाहोपरांत प्रेम का दिखावा किया जाता है, वास्तव में प्रेम होता नहीं है। यह दिखावा सारी जिन्दगी चलता रहता है। गोविन्द मिश्र ने लिखा है कि - “कोशिश करने से क्या प्रेम हो जाता है? उसका ही अपने पति से हो पाया होगा क्या? कौन जाने वह दिखावा करती रही आजीवन एक सफल दिखावा। अधिकांश औरतें कर लेती हैं, किसी को पता नहीं चलता, पति को भी नहीं। विवाह जिस तरह के हमारे यहाँ होते हैं, वहाँ अगर कोई दावा करता है कि पति-पत्नी में प्रेम है तो या तो वह ढोंगी है या प्रेम का मतलब नहीं जानता।”[19]     
गाँवों में जहाँ परंपरागत विवाह पद्धति का निर्वाह किया जाता है, वहीं शहरों में दिखावे का चलन तेज होता जा रहा है। वैसे पाश्चात्य ‘लिवइनरिलेशन’ पद्धति भी अब चलन में आ गयी है। साथ ही तलाक की समस्या भी गहराती जा रही है। इसके पीछे यह कारण हो सकता है कि अपने अधिकारों के प्रति स्त्री-पुरुष की समझदारी। भारतीय सामंती पुरुष के खून में होता है औरतों को दबाना ऐसे में शिक्षित महिला तलाक की ओर बढ़ जाती है। गाँवों में कम शिक्षा होने के कारण पंचायत कानून का सहारा लिया जाता है। जब इन्साफ की उम्मीद नहीं रह जाती है तब आत्महत्या के अलावा कोई अन्य विल्कप स्त्रियों के सामने नहीं रह जता है।   
‘लाल पीली जमीन’, ‘धूल पौधों पर’ आदि उपन्यासों में विवाह और उससे उत्पन्न समस्याओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। प्रेम संबंधों एवं 'लिव इनरिलेशनसिप' की बढ़ती आवश्कता भी आधुनिक समय की एक बड़ी समस्या हो गयी है। उपन्यासकार ने कई दृष्टिकोण से इन पक्षों की आलोचना की है। 
    
          संस्कृति का स्वरूप- संस्कृति का अर्थ व्यापक तौर यह यह लगाया जा सकता है कि व्यक्ति एवं समूह की गतिविधियों को धर्म एवं नैतिकता सम्मत कार्य सम्पादन का हेतु है। गोविन्द मिश्र ‘तुम्हारी रोशनी में’ उपन्यास में लिखते हैं - “साइंस का उलटा जो कुछ है, वह कल्चर है।”[20] संस्कृति का पूरा आशय मनुष्य की संवेदनात्मक लगाव से होता है, संस्कृतियाँ समाजों के भीतर पाए जाने वाले उस बिंदु को स्पर्श करने का कार्य करती हैं, जिससे सामाजिक जुड़ाव बना रहे।
          प्रेमचंद के शब्दों में - “मानव संस्कृति का विकास ही इसीलिये हुआ है कि मनुष्य अपने को समझे।”[21] सच्चिदानंद सिन्हा के शब्दों में कहा जाय तो “संस्कृतियों की संरचना का तानाबाना भी मनुष्यों के पारस्परिक सम्प्रेषण पर पूरी तरह निर्भर है, और अगर संप्रेषण बाधित हो जाय तो इसका अस्तित्त्व भी खतरे में पड़ जाएगा।”[22]
          भारतीय संस्कृति अब धर्म की आगोश में आकर विचित्र प्रकार की हरकत कर रही है। धर्म के तांडव के सम्मुख संस्कृति दब सी गयी है आज के दौर में खान-पान, वेशभूषा, रहन-सहन, मिलना-जुलना, बात-व्यवहार, भाषा, बोलचाल सब आयातित होता जा रहा है, इनका आना स्वागत योग्य है किन्तु इनकी अधिकता से भारतीय संस्कृति के अस्तित्त्व पर संकट जैसा है। वह संस्कृति जहाँ पर गाँवों में फ़ैली दूर-दूर तक सरसों के खेतों की वसंती बयार, त्योहारों में सभी गिले-शिकवे भूल जाने की चाहत, हिलमिल कर हिन्दुस्तान को नयी राह पर ले जाने की मंशा आज गायब होती जा रही है।
          रिश्तों में दिनों दिन बाजार हावी होता जा रहा है गाँवों-घरों से दूर बैठा व्यक्ति आज अपने संबंधों से परे हो गया है वह त्यौहार, संस्कार या रिश्ते-नातों को भूलता जा रहा है। इसका असर भी संस्कृति पर पड़ता है, धीरे-धीरे उसकी प्रकृति किसी नयी तरह की जीवन शैली की ओर बढ़ती जाती है वही आगे चलकर एक नई संस्कृति का निर्माण करती है जिसमें सब कुछ होते हुए भी प्राणतत्त्व नहीं पाया जाता।

          धर्म- धर्म को परिभाषित करते हुए अरुण माहेश्वरी ने मार्क्स को याद किया है, उन्होंने लिखा है “धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह, ह्रदय विहीन विश्व का ह्रदय, आत्मविहीन परिवेश की आत्मा है। यह जनता की अफीम है।”[23]  
‘धीरसमीरे’ उपन्यास में सुनंदा के माध्यम से गोविन्द मिश्र ने ईश्वर की सत्ता को नकार दिया है–“गलत हैं वे लोग जो कहते हैं कि ईश्वर होता है।। होता तो संसार सञ्चालन में न्याय साफ़-साफ़ दिखाई देता। और वे तो निरे अन्धविश्वासी हैं जो कहते हैं कि ईश्वर का रूप करुणामय है।”[24] उन्होंने ‘धीरसमीरे’ उपन्यास में इसी अफीम को केंद्र में रखा है। पैंतालिस दिनी ब्रजयात्रा में भारतीय परंपरा की खोज की ओर लेखक बढ़ता है। उसे वहाँ आज का बाज़ार, पाश्चात्य संस्कृति की विकृतता के साथ भारतीय संस्कृति और धर्म के ठेकेदारों का भी परिचय मिलता है।
शैलजा ने धर्म को ढोंग का अड्डा माना है - “यह धर्म-अरम सब ढोंगबाजी है। मंदिर जाइये और पंडों से घिर जाइए फिरकापरस्ती। बस एक ही चिंता- पंडों से कैसे छुटकारा पायें। ध्यान प्रार्थना सब ख़ाक होता होगा? आरती बाकायदे बिकती है। आपके पास मोटी रकम हो तो सोते हुए भगवान् को उठा दिया जाय। सेठ साहब के लिए जब कहिये विशेष आरती, जहाँ यह नहीं हैं, वहाँ एक बड़ी ही गहरी उदासी होती है जैसे चर्च में तबीयत घबड़ाने लगती है। धर्म तुम्हें जीने की ताकत देने को है या कि मारने को”[25] इसी तरह धर्म के अड्डों पर आधुनिक समय में बाज़ार बड़ा योगदान निभा रहा है।   
मल्टीनेशन कम्पनियाँ भगवान् की मूर्ति से लेकर भक्तों की मनोकमना तक का प्रबंध करके रखती हैं, साथ ही धार्मिक स्थलों पर शोषण के रास्ते भी आधुनिक होते जा रहे हैं। गुजरात की सेठानियाँ, बम्बई के बिल्डर्स जैसे आधुनिक भक्त काली कमाई को भगवान् के ऊपर न्योछावर कर पुण्य लाभ कमाना चाहते हैं, कुछ लोग घरों के झगड़े-झाँसों से ऊबकर मन बहलाव के लिए इस यात्रा में शरीक हुए थे। दूसरी ओर विदेशी भक्तों के लिए यह पिकनिक का अड्डा के जैसा लगता है। उन विदेशी लोगों को आज के महंत दीक्षा देकर डालरों में कमाई कर रहे हैं। भक्ति की भावना तो गरीब, बेसहारा, मजलूम, सताए हुए लोगों के लिए है।   
 धर्म के इस संस्थान में स्त्रियों का शोषण भी अनेक विधि से होता है। बलात्कार, हत्या, चोरी, छिनैती, लूटपाट, गुंडागर्दी का खुला मंच धार्मिक अड्डे बन गए हैं। पुजारियों के चंगुल में विधवाओं की जिन्दगी नरक हो जाती है, बंगाल की विधवाएँ इन संस्थानों में रहकर महंतों के शोषण का शिकार होती हैं। सुनंदा जैसी पढ़ी-लिखी अध्यापिका भी नंदन के प्रेम में पड़कर ब्रजभूमि में बेटे किशोर को ढूँढ़ती फिर रही है। वहाँ कितनी सुनंदायें काल के गाल में समाहित हो गयीं, ब्रजभूमि की परिक्रमा के दौरान बीच रास्ते में ही गुंडों के द्वारा अपहरण एवं बलात्कार सामान्य सी घटना होती है। गोविन्द मिश्र ने लिखा है “कुछ दिनों पहले ही खबर उड़ी थी कि एक गुजराती सेठानी को पंडे घाट के किसी तहखाने में ले गये। बलात्कार के बाद उसका सारा जेवर पार कर दिया। यही नहीं उसके बाद बेचारी की जीवन से भी छुट्टी कर दी। सेठ ने पुलिस को खबर दी और कई पंडे गिरफ्तार हुए थे।”[26]     
मंदिरों में धर्म के नाम पर जिस तरह का अत्याचार होता है वह किसी से छिपा नहीं है, एक वर्ग सदियों से एकछत्र मंदिरों पर अधिकार करके मुफ्त की रोटी तोड़ता रहा है। भारतीय भक्त उनकी सेवा में प्राणोंपण से आज भी लगे हैं। ‘धूल पौधों पर’ उपन्यास का युवागुरु आधुनिक धार्मिक ठेकेदार है।     तकनीकी की शिक्षा प्राप्त ब्राह्मण अन्ततः मंदिर की शरण ही ग्रहण करता है। उसकी पत्नी की शिकायत है कि “एक गुप्पा सा व्यक्ति, जिसके पास न ज्ञान है न वाक्पटुता ही, स्वामी होने के लायक कुछ भी विशेष नहीं, वह भारतीय जनता की उस प्रवृत्ति का फायदा उठाये जा रहा था जिसमें आदमी औरतें रास्ते पड़ते किसी भी मंदिर को सड़क से ही शीश नवाते चले जाते हैं।”[27] लोगों की भावनाओं का गलत इस्तेमाल करते हुए मंदिर में वह वो सब दुष्टता का कार्य करता है जो सामन्य जीवन में नहीं कर सकता था।   
धर्म की आड़ में वह दलाली, सेक्स, प्रापर्टी डीलिंग, एवं उन्मुक्त सेक्स सम्बन्ध का उपयोग करता है। पति-पत्नी के बीच सेक्सुअल संबंधों के चलते दूरियाँ बन जाती है वह पति और बेटे से दूर शहर में अकेले रहकर जीविका चलाने का उद्योग करती है। सामंती मानसिकता का युवागुरु स्त्री पर तरह-तरह के प्रतिबन्ध लगाकर उससे जबरन यौन सम्बन्ध बनाना चाहता है, नायिका की अपनी स्वतन्त्र सत्ता की सोच के बरक्स युवागुरु की सामंती सोच की टकराहट साफ़ देखी जा  सकती है।   
          गोविन्द मिश्र ने ‘धीरसमीरे’ उपन्यास में धर्म के साथ वहाँ के भूगोल, राजनीति, संस्कृति, आस्था, अंधविश्वास, रीतियों-कुरीतियों एवं स्त्री शोषण, विधवाओं का जीवन एवं लेखकों में व्याप्त गुटबाजी को भी लेखन में चित्रित किया है। ‘धूल पौधों पर’ कृति में दाम्पत्य जीवन में धार्मिक हस्तक्षेप और उससे उत्पन्न सामाजिक विकृतियों पर प्रकाश डाला है।

          रीति-रिवाज- गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में व्यक्त रीति-रिवाजों पर दृष्टिपात किया जाय तो यह तथ्य सामने आते हैं, उनके उपन्यास ‘हुजूर दरबार’ में सामंती जीवन शैली या रीति का प्रभाव मुख्यतया है। उनकी जीवन शैली में आधुनिक अंग्रेजी जीवन शैली का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। महाराज रुद्रप्रताप की जीवन शैली सामान्य जन की अपेक्षा जुदा है, मंत्री-सामंत एवं सैनिकों की जीवन शैलियाँ भिन्न हैं। उनके आचार-विचार, रहन-सहन में भी पर्याप्त भिन्नता है। इन सब के बावजूद परम्पराएँ एक हैं, रिवाज एक हैं। देवपूजन का रिवाज यदि राजघरानों में है तो सामान्य जन भी देव पूजन करता है। स्वास्तिक का प्रचलन, ज्योतिष का प्रभाव, शकुन-अपशकुन आदि राजा से लेकर प्रजा तक में प्रचलित हैं। रूढ़ियों और परंपराओं का निर्वहण राजा हो या रंक दोनों जगह समान रूप से पाया जाता है।   

          अंधविश्वास- विश्वास में अतिशय श्रद्धा ही अंधविश्वास का रूप ले लेती है। जहाँ पर तर्क-वितर्क की गुंजाईस न रह जाय अथवा किसी के प्रति इतनी ज्यादा सामाजिक आस्था आ टिके कि उस पर किसी प्रकार की टीका या टिप्पणी न की जा सके वहाँ अंधविश्वास का जन्म होता है। अंधविश्वास का बड़ा क्षेत्र धर्म का होता है, इस क्षेत्र में व्याप्त अंधविश्वास या अंधश्रद्धा का कोई ओर-छोर नहीं मिल सकता। ‘धूल पौधों पर’ कृति में युवागुरु का वर्णन भी रहस्य से परिपूर्ण है –“पूजापाठ रोज करने, उसमें रोज सम्मिलित होने से श्रद्धा बनती है। जैसा श्रद्धाभाव चाहती है आ जायेगा। पूजापाठ चलते रहना चाहिए”[28] इसी तरह देवता से लेकर दानवों तक में घोर अंधश्रद्धा देखी जा सकती है। भारतीय जनमानस बहुत पहले से शास्त्रों से बंधा रहा था जिसमे ऐसी अंधश्रद्धा का विवरण भरा मिलता है। राजाओं को ईश्वर की उपाधि देना, वृक्ष में, पत्थर में देवता ढूँढ़ लेना, नदियों में, पहाड़ों में, पशुओं में, पक्षियों में, यहाँ तक कि मरे हुए इंसान की कब्र में भी श्रद्धा खोज ली जाती है, कालान्तर में वही अंधश्रद्धा का रूप ग्रहण कर लेती है।  
 
          पर्व एवं त्यौहार- गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में मेले एवं त्योहारों का उल्लेख कई जगह हुआ है। ‘पाँच आंगनों वाला घर’ में मेले, त्योहारों आदि का बखूबी चित्रण मिलता है। जोगेश्वरी का घराना साहित्य, संगीत, कला का कद्रदान है। वकीली के पेशे के साथ जोगेश्वरी के पुत्र मुंशी राधेलाल इन शौकों को भी पालते हैं, उनके यहाँ बनारस की कोठे और मुजरेवालियों का भी कद्र किया जाता है। इस रचना में सन्नी के माध्यम से प्रयाग कुम्भ मेले का वर्णन भी किया गया है। दुनिया का सबसे बड़ा मेला प्रयाग में लगता है, हर बारवें वर्ष में महाकुम्भ का आयोजन किया जाता है। सन्नी घर से जब भागे तब उन्होंने साधुओं की मंडली का पीछा किया और प्रयाग के कुम्भ में जा पहुँचे।
          मिश्र जी ने कुम्भ मेले की अराजकता का वर्णन प्रगतिशील होकर किया है –“इलाहाबाद के कुम्भ के लिए एक टोली जा रही थी। सन्नी चुचाप साथ लग लिए। संगम के रेतीले मैदान पर साधुओं के ठहरने के लिए अखाड़े थे। हर अखाड़े में मुख्य स्थान गुरु महाराज का। आसपास चारों तरफ एक एक खेमा गुरु की फ़ौज के लिए।”[29] आगे सन्नी के बहाने गोविन्द मिश्र ने धर्म के इस बड़े अड्डे के बारे में लिखते हुए दिखाया है - “सन्नी आसपास बहुत गौर से देखते।। क्या था जो लोगों को यहाँ लाया? वहीं संसार छोड़ देने वाले इन साधु-महात्माओं में भी घोर सांसारिकता, टुच्चापन, अभिमान। जिसे देखो गाँजा चढ़ाकर खों-खों कर रहा है। जो पीठासीन हैं, महंत हैं। उनमें से कुछ शारीरिक रूप में खासे गंदे थे, क्या वे मन से साफ हो सकते हैं? एक मठाधीश दूसरे के लिए ईर्ष्या-द्वेष में सुलगता रहता है। उस महंत के अखाड़े के लिए अच्छी जमीन दे दी गयी और उन्हें यह मिली!
          गोविन्द मिश्र ने आगे लिखा है यह तो धर्म नहीं धंधा है।”[30] सन्नी कुम्भ मेले के बाद दूसरे सबसे बड़े तीर्थ स्थल चित्रकूट का रुख करते हैं, जहाँ पर वे कुछ दिन रुककर देश की हालात के बारे में जानने की कोशिश करते हैं। लेखक ने इस तीर्थस्थलों की सामाजिक, साँस्कृतिक और भौगोलिक परिवेश का भी वर्णन  किया है।   
गोविन्द मिश्र के कई उपन्यासों में दशहरा, होली दिवाली, पूर्णिमा जैसे त्योहारों का वर्णन किया गया है। ये त्यौहार लोक में प्रचलित हैं जिनका अपना क्षेत्र है और उस त्यौहार की सामाजिक महत्ता है ‘हुजूर दरबार’ उपन्यास में महाराज रूद्रप्रताप सिंह के साम्राज्य में इसके लिए राज्य की और से प्रबंध किया जाता है - “होली और दशहरा दो ऐसे सार्वजनिक त्यौहार थे जिन पर स्टेट की तरफ से खर्च किया जाता था और महाराज अपने तरीके से उनमें हिस्सा लेते थे। दोनों ही मौकों पर महाराज का एक भव्य जुलूस रियासत की मुख्य सड़कों से गुजरता था होली के लिए पच्चीस हजार का बजट था। उस जमाने के हिसाब से यह भारी रकम थी”[31] इन त्योहारों पर राजा या प्रजा का भेदभाव मिट जाता था। यह बात और है कि इसके लिए भले ही स्टेट की तरफ से अलग से कर्ज चढ़ा दिया जाय। भारत के कई सारे ऐसे इलाके हैं जहाँ होली के त्योहारों का प्रचलन  नहीं है। कथाकार की भूमि के आसपास इन त्योहारों का प्रचलन है। ब्रज की होली में कान्हा को याद किया जाता है। बुंदेलखंड की होली और दिवाली, इलाहाबाद का मेले का आयोजन। चित्रकूट दर्शन ये सब मिलकर भारतीय संस्कृति का निर्माण करते हैं।  लेखक के दृष्टिकोण के लिए एवं  साहित्य रचना की दृष्टि से संजीवनी का कार्य करते हैं।   

          खान-पान एवं वेशभूषा- उपन्यासों में अभिव्यक्त समाज और उसकी बनावट के बारे में यथार्थवादी नजरिये का प्रयोग करते हुए गोविन्द मिश्र ने गरीबी, भुखमरी, अमीरी का वर्णन किया है।  ‘कोहरे में कैद रंग’ जैसे उपन्यास में ‘मैं’ के परिवार की आर्थिक तंगी एवं जीवन में आने वाले बदलाव का वर्णन करते हैं। मुल्लूमामा एवं अजब, भैयाबाई एवं टाईप बाबू दोनों को आमने-सामने रखकर गरीबी-अमीरी, भुखमरी और मस्ती का उल्लेख किया गया है। ‘मैं’ के पिता के सम्मुख जीविका चलाने के लिए कोई साधन न होने के कारण प्राइमरी अध्यापकी से लेकर मंगौड़े लगाने तक का संघर्ष करते दिखाया गया है। पिता जी को काम से किसी प्रकार की शर्म नही आती थी। साथ ही ‘मैं’ के नाना की पल्लेदारी करके जीविका चलाने का वर्णन किया गया है। इस बहाने लेखक ने ठेठ बुंदेलखंड की गरीबी का खाका खींच दिया है “भूख वह बुनियादी चिंता जो दादा से चलकर पिता तक आयी थी, दोनों ने जीवन में भूख देखी थी इसलिये। चाहे गाँव का वह रसखीरवाला दिन हो या बोर्डिंग हाउस में भेजने वाला दिन। भूख का इन्तिजाम करके ही पिता मेरे लिए अपना स्नेह दिखाते थे।”[32] दादा गरीबी में ही जिए थे, अंतिम दिनों में वे मोतियाबिंद के शिकार हो जब चारपाई पर पड़े तो कोई उनकी चिंता करने वाला नहीं था - “कभी-कभी घर के लोग उन्हें खाना देना ही भूल जाते तो दादा कराहते हुए अपनी पूरी ताकत लगाकर परछतिया से गुहार लगाते, ‘भैया रोटी न मिल्हये का आज?’ और तब घर के सामने से बाख खुचा जो कुछ होता, उसे एक थाली में डालकर कोई ले आता और दादा के पास पटककर चला जाता। दादा थथोल-थथोलकर खा लेते, अपनी कुटिया में पानी पी लेते और चारपाई पर पड़े रहते।”[33]     
 बुंदेलखंड घोर गरीबी में जीने के लिए अभिशप्त है। आज सरकारी योजनायें कागज पर ही सिमट कर रह गयी है। मौसम की और सरकार की मार से बुन्देलखण्ड उबर नहीं सका है। ‘लाला पीली जमीन’ और ‘कोहरे में कैद रंग’ के बरक्स हुजूर दरबार में हिज हाइनेस की खान-पान की होड़बाजी व्यस्था को मुँह चिढ़ाती है। दोनों जगह दिन और रात का अंतर पैदा कर देती है। आमजनता और सामंतों में बुनियादी फर्क भी सामने ला देती है। अन्नदाता हलकान रहता है, और बैठकर हुक्म चलाने वाले छप्पन भोग लगाते हैं। हिजहैनेस की चमकदमक भरी दुनिया के साथ ही गाँधीवादी नेता नर्मदा प्रसाद खरे की उपस्थिति भी है जो व्यवस्था के भीतर लोकतंत्र की आश जगाये हैं। दोनों के रहन-सहन एवं वेशभूषा में बड़ा अंतर है। गाँधीवादी खरे गाँधी टोपी, झोला और खादी पहनते हैं। उन्हें अहिंसा और गाँधी के द्वारा दिखाए रस्ते का अनुकरण करते दिखाया गया है।   
          गोविंद मिश्र एक बड़े फलक के रचनाकार हैं, उनके लगभग सभी उपन्यासों में ऐसे अन्तर्विरोध प्रमुखता से दिख जाते हैं। अपनी यथार्थवादी दृष्टिकोण से उन्होंने धर्म, समाज, संस्कृति, राजनीति और  अर्थ पर पैनी आलोचना करते हैं। गरीबों के प्रति सहानुभूति एवं शोषकों के प्रति उनके लेखन में विद्रोह नजर आता है।   
  
निष्कर्ष
          निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि गोविन्द मिश्र के लेखन में समय के साथ समस्याओं को नए कलेवर में रखने का हुनर प्राप्त है। समाज और संस्कृति उनके उपन्यासों में प्रमुख स्थान पाते हैं, आशावादी गोविन्द मिश्र अपने समाज और उसमें घटित होने वाली हर परिस्थिति का सूक्ष्म अंकन करने की क्षमता रखते हैं, उनके कई सारे उपन्यासों में स्त्री जीवन, गरीबी-भुखमरी, ऊँच-नीच का भेदभाव के साथ परम्परा के प्रति लगाव, संस्कृति और धर्म के प्रति यथार्थवादी मानवीय सोच आदि का समिश्रण विद्यमान है। उपन्यास जैसा कि अपने समय की आलोचना होता है, उसी तरह की ईमानदारी गोविन्द मिश्र ने लेखन में दिखाई है। धर्म पर उनकी यथार्थवादी सोच जिसे वैज्ञानिक सोच भी कह सकते हैं, स्त्रियों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण, मंडल कमीशन जैसी राजनीति प्रेरित व्यवस्था का समर्थन, शिक्षा व्यवस्था की कड़ी आलोचना, सामंती परिवेश और सोच का विरोध एवं समकालीन समय में पल रहे राजनीतिक संकट एवं युवाओं के बहके हुए चरित्र का भी खुलासा किया गया है। गोविन्द मिश्र ने जिस भी कृति को रचा है उसमें वे पूरे ईमानदारी के साथ पेश आये हैं।


*** संदर्भ ***

[1] भारतीय समाज: संरचना एवं परिवर्तन, एस. एल. दोषी, पी. सी. जैन, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, संस्करण 2007, पृष्ठ संख्या-5
[2] पाँच आँगनों वाला घर: गोविन्द मिश्र, राधाकृष्ण प्रकाशन- नई दिल्ली, दूसरा संस्करण 2008  पृष्ठ संख्या 7
[3] पाँच आंगनों वाला घर: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 21
[4] कोहरे में कैद रंग: गोविन्द मिश्र, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004, पृष्ठ संख्या 28
[5] पाँच आँगनों वाला घर: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या-52
[6] पाँच आँगनों वाला घर: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या-51
[7] आदमी की निगाह में औरत:राजेन्द्र यादव, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, चौथा संस्करण 2015, पृष्ठ संख्या 22
[8] भारतीय ग्रामीण समाजशास्त्र: ए. आर. देसाई, अनुवादक- हरिकृष्ण रावत, रावत पब्लिकेशंस- हैदराबाद, पुनर्मुद्रित संस्करण 2012, पृष्ठ संख्या-37
[9] कोहरे में कैद रंग: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 27
[10] कोहरे में कैद रंग: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 37
[11] कोहरे में कैद रंग: गोविन्द मिश्र  पृष्ठ संख्या-31
[12] भारतीय ग्रामीण-समाजशास्त्र: ए० आर० देसाई, पृष्ठ संख्या 37
[13] समाजशास्त्र: अवधारणाए एवं सिद्धांत, जे पी सिंह, पृष्ठ संख्या-233
[14] कोहरे में कैद रंग: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 115
[15] कोहरे में कैद रंग: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 156 
[16] कोहरे में कैद रंग: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 97
[17] कोहरे में कैद रंग: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 113
[18] कोहरे में कैद रंग: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 111
[19] कोहरे में कैद रंग: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 156
[20] तुम्हारी रोशनी में: गोविन्द मिश्र, राजकमल प्रकाशन- नई दिल्ली, पहला संस्करण-1985, पृष्ठ संख्या-71
[21] कुछ विचार: प्रेमचंद, मालिक एन्ड कंपनी, जयपुर, प्र सं 2009
[22] संस्कृति और समाजवाद: सच्चिदानंद सिन्हा, वाणी प्रा। नई दिल्ली, संस्करण, 2004, पृष्ठ संख्या- 5
[23] धर्म, संस्कृति और राजनीति: अरुण माहेश्वरी, अनामिका पब्लिशर्स एवं डिस्ट्रीब्यूटर (प्रा) लिमिटेड,नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2015, पृष्ठ संख्या- 14
[24] धीरसमीरे: गोविन्द मिश्र, वाणी प्रकाशन- नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2012, पृष्ठ संख्या-10
[25] धीरसमीरे: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या-107
[26] धीरसमीरे: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या-37
[27] धूल पौधों पर: गोविन्द मिश्र, वाणी प्रकाशन- नई दिल्ली, आवृत्ति संस्करण-2014, पृष्ठ संख्या- 15
[28] धूल पौधों पर: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या- 35
[29] पाँच आँगनों वाला घर: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या-42
[30] पाँच आँगनों वाला घर: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या-42
[31] हुजूर दरबार: गोविन्द मिश्र, किताबघर- नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2011, पृष्ठ संख्या-28
[32] कोहरे में कैद रंग: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या-27
[33] कोहरे में कैद रंग: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या-69  

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