मनुष्‍य और प्रकृति प्रेम की कविताएँ

समीक्षक: जय जान


हमारे बीच का मौन (काव्य संग्रह)
कवि: संतोष अलेक्‍स
ISBN 978-93-86722-35-5
पृष्ठ संख्या: 119, पेपरबैक
मूल्य: ₹ 295 रुपये
प्रकाशक: ऑथर्स प्रैस, नई दिल्ली


'हमारे बीच का मौन' (2017) युवा कवि संतोष अलेक्‍स की दूसरी कविता संग्रह है। उनका पहला कविता संग्रह 'पांव तले की मिटटी' (2013) हिन्‍दी काव्‍य जगत में काफी लोकप्रिय रहा था। इस कविता संग्रह का अनुवाद कन्‍नड, असमिया, तुर्की एवं सेरबियाई भाषा में हुआ है।
'हमारे बीच का मौन' संग्रह से गुजरते हुए अनुभव होता है कि ये अपने आसपास की कविताएँ हैं। तमाम वादों, परिवादों और वैचारिक अतिवादों से इतर, इस संग्रह की कविताओं को जीवनानुभवों का निचोड़ कहना गलत नहीं होगा।
संतोष अलेक्‍स की कविताओं में संवेदना के अनेक रंग हैं। सामाजिक मूल्‍यों  में आई गिरावट के प्रति कवि का आक्रोश संग्रह की कविताओं में दृष्टिगोचर होता है। 'हमारा मोहल्‍ला', 'अलग होना' आदि कविताएँ इस दृष्टि से पढ़ी जा सकती हैं।
संतोष अलेक्‍स

हमने अलग होने का निर्णय लिया 
मैंने प्रेशर कुकर लिया
उसने कड़ाही  
                     
                       *    *    *   *    *   *   *  
कभी कभार
वह मेरे घर पर चाय के लिए आती 
और मैं उसके घर 
डिनर के लिए जाता (अलग होना) 

'मैं सीरियाई शरणार्थी हूँ' कविता में मानववादी विचारधारा को बखूबी प्रस्‍तुत किया गया है 

अब पाँच साल होने को हैं
तंबुओं में रहते हुए 
हमारे बच्‍चे खेलना भूल गए हैं 
स्‍कूल उनके लिए सपना है 
महिलाएँ महीनों से सोई नहीं 
तंबुओं के अं‍दर की जगह जितनी 
सिमटी है दुनिया हमारी 

इस काव्‍य संग्रह की एक खासियत इसमें शामिल यात्रा कविताएँ हैं। हिंदी में यात्रा कविताएँ कम मात्रा में ही लिखी गई है। यात्रा इतिहास में जाना होता है और वर्तमान में लौट आना भी। यात्रा-लेखन यात्रा का वृतांत है, कुछ अंशों में डायरी भी। लेकिन यात्रा कविताएँ इनसे अलग होती हैं जिसमें रहकर कवि को अपनी बात कहनी पड़ती है। इस कारण से यात्रा कविताएँ आकर्षक और कौतूहल पैदा करती हैं। संतोष अलेक्‍स यात्रा कविताओं में पाठक को अलग दुनिया में ले चलते हैं। 

मुंबई में 
सुबह के वक्‍त केवल स्‍त्री पुरूष होते हैं (मुंबई)

'इंफाल वार सिमेट्री' शीर्षक कविता में इतिहास और प्रकृति का सम्मिश्रण दृष्‍टव्‍य है 

कब्र के आगे 
दीवार पर यूं लिखा था 
देर नेम लिवेथ फार एवर 
गुलदस्‍ता वहां रखकर 
मैं दो मिनट के लिए खड़ा रहा मौन 
लेकिन मौन नहीं था मेरा मन 
जो युद्ध जनित चीखों और चिल्‍लाहटों के बीच फंस गया 
*  * * * * *  * * * * * * * 

बारिश होने लगी 
दूर पहाड़ों को बादल चूम रहे थे 
बारिश में इम्‍फाल 
पहले से भी ज्‍यादा सुंदर दिख रहा था 

समीक्षक: जय जान
संतोष अलेक्‍स की कविताओं में प्रकृति चित्रण का अलग अंदाज है। 'बनारस गंगा तट', 'गांव की गलियां', 'आना', 'स्‍थान देवता' आदि में प्रकृति अलग अलग रूप में मौजूद हैं। संतोष अलेक्‍स ने कविताओं के माध्‍यम से उन शब्‍दों को पुन: जीवन दिया है जो हिंदी कविता में सालों से नदारद थे। कविता में उन्‍होंने नदी, नाले, नारियल, भुटटा, गोटी, गोला, बेर, बोहनी, लुकमा, गडेरिया, हैंड पंप, तोरी, लौकी, खपरैल, बीज, मिटटी, गिल्‍ली डंडा, पतलून, नाड़ा आदि शब्‍दों का उपयोग किया जो उनके लोकधर्मी होने का सबसे बडा सबूत हैं।  
संक्षेप में कहा जा सकता है कि संतोष अलेक्‍स की कविताओं के केंद्र में प्रकृति एवं मनुष्‍य है और 'हमारे बीच का मौन' एक पठनीय संग्रह है। 

जय जान - 

उभरती हुई बहुभाषी कवयित्री। अंग्रेजी एवं हिंदी आलेख प्रकाशित। कोचिन में सॉफ़्टवेयर कंपनी में कार्यरत।

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