कहानी: फ़ैण्टम लिम्ब

निधि अग्रवाल
- निधि अग्रवाल

अनजानी… अनिश्चित डगर पर सशंकित कम्पित धडकनों के साथ चलना बहुधा अधिक सुगम होता है, बनिस्बत उसी राह के जर्रे-जर्रे से वाकिफ हो जाने के बाद उस पर वापसी के सफर को तय करने के! जाते समय एक रोमांच का अनुभव होता…। कुछ अनदेखा... अनचाहा, अकल्पित-सा पा जाने की एक आस जो होती है। लगता है क्षितिज पर बने कोण पर मनहर, सिंदूरी आकाश और धानी चुनर लहराती धरती के मध्य फैला होगा एक गुलाबी रोमांस… आने वाले पथिक के स्वागत में मधुर स्वागत गान गा… उसके क्लांत तन को आलिगन में भर स्नेह नीर से नव उर्जा का संचार करने को आतुर!

इसे आप दिवास्वप्न भी कह सकते हैं या एक उर्वरा मन की कोरी कल्पना भी… लेकिन अगर आरम्भ में ही स्याह बादलों की आशंका मन में बिठा ली जाय तो एक पग भी चलना सम्भव न हो, शायद…! अनिष्ट की आशंका हमें मंजिल पर तो पहुँचने ही न देगी बल्कि रास्ते के खूबसूरत नजारों से भी वंचित रखेगी।

कुछ ऐसी ही धारणा ले मैं भी चल पड़ी थी इस सफर पर, लेकिन जब लगा कि मंजिल पा ली है, तब अहसास हुआ कि शायद राह ही गलत पकड़ ली थी। अब फिर से लौट कर नई डगर तलाशना ही होगा, जबकि दिल कहता है कि नहीं, यही तो सही मंजिल है नियति प्रद्दत! दूर पश्चिम दिशा में सूर्य अस्त होने को जा रहा है। शायद अमावस की रात है… बादलों से ढक कर न चाँद दिखता है न टिमटिमाते तारे… और तो और वह अवलंबन जिस के सहारे खड़ी हूँ, वह भी छूटता-सा प्रतीत होता है।

सुखद सपनों का टूटना दुखदाई होता है। कितना अजीब है न कि नरम फाये सी कोमल कल्पनाएँ जब निष्प्राण हो जाती हैं तो इतनी बोझिल हो जाती हैं कि उनकी मृत देह को कांधे पर लाद डग भर भी नहीं चल पाता इंसान। यही कारण है कि वह अभी भी इस अनिश्चय में हूँ कि इस निर्जनता में रुक भोर की प्रतीक्षा करूँ, या फिर वापसी के सफर का विकल्प अपनाना बेहतर होगा।

... डायरी बंद कर एक नजर समिधा ने मोबाइल पर डाली। रात्रि के ठीक बारह बजे थे। यही वह समय था जब अंबर की शुभरात्रि आया करती है... या आया करती थी। कुछ समय पहले तक तो वह कोई न बहाना बना कर उससे बातें करते ही रहता, फिर बातें कम हुई, फिर अनियमित फिर बची सिर्फ स सुप्रभात और शुभरात्रि। सम्बोधनों की औपचारिकता तक सीमित वार्तालाप अब संकुचन के दायरे में आ गये थे। अब व्हाटसप्प पर उभरता श्वेत पटल समिधा की श्याम रंगत को और भी बेरंग कर देता। फोन उठाया ‘हाय’ टाइप किया, लेकिन न जाने सेंड क्यूँ नहीं किया। यूँ तो इस अमिट मौन को सदा वही भेदती आई है, कभी दिनों तो कभी हफ्तों के बाद जब दिल और दिमाग इतना बोझिल हो जाता है कि लगता है कि अब जिया ही नहीं जा सकता और वह टूटने की कगार पर होती है तब एक छोटे से ‘हाय’ के भेजने पर एक बड़ी सी कविता चली आती थी जो समिधा के अनुताप को और बढ़ा देती थी। पश्चाताप की ग्लानि लिए वह फोन करने पर बाध्य हो जाती और कुछ गिले-शिकवे और निर्मल परिहासों के बाद पूर्व की भांति सब चलायमान हो जाता। एक नए अल्पविराम या पूर्ण विराम के आने तक।

स्टडी टेबल से उठ समिधा फ्रिज तक गई। रात भर जागने से सूजी आंखों पर टी बैग रख वह कुछ देर लेट गई, हालांकि घड़ी की सुइयाँ कह रही थी कि अब लेटने का वक्त नहीं है उसके पास। ऐशबर्न से वाशिंगटन जाने में लगभग एक घंटे का समय लगता है। जाहिर है उतना ही वापस आने में भी। कभी लगता कि नौकरी बदल ले... कभी लगता है वही वाशिगटन में घर ले ले।

वाशिंगटन के सिनर्जी अस्पताल में फिजिशियन के पद पर तीन साल का अनुभव। अब वहाँ से ऐशबर्न के किसी अस्पताल में काम करने का मतलब है नए सिरे से अपनी पहचान बनाना। फिर, इस घर से पिछले दो साल में मन इस कदर जुड़ गया है कि उसे छोड़ने का अर्थ अपनी सांसों से जुदा होना-सा होता है। समिधा बे-मन से उठकर तैयार हुई। मार्च आने वाला था लेकिन फरवरी की बर्फबारी अभी तक थमी नहीं थी। हवाओं की ठंडक मन के ताप को बुझाने को प्रयासरत प्रतीत हो रही थी। ऐसे में अंबर के स्नेहिल स्पर्श कितने सुखकर प्रतीत होते थे, समिधा ने कार शुरू करते हुए सोचा। अकेले सफर करो तो रास्ता और मंजिल दोनों ही नहीं लुभाते, फिर चाहे कितना भी मधुरिम संगीत हो पर किसी प्रिय के अभाव में वह कुछ समय बाद मात्र शोर ही प्रतीत होने लगता है।

अस्पताल की बहुमंजिली इमारत के बेसमेंट में कार नियत स्थान पर खड़ी कर वह अपनी ओ पी डी की तरफ बढ़ गई थी। इसी ओ पी डी में तीन साल पहले अंबर से मुलाकात हुई थी। भारतीय और एशियाई-अफ्रीकन समुदाय के लिए प्राइवेट डॉक्टर का खर्च वहन करना संभव नहीं है। सभी प्रायः इस अस्पताल की ही सेवा लेते हैं। कभी-कभी तो बुखार के लिए भी एक हफ्ते बाद की तारीख मिलती लेकिन अंबर के लिए कोई चिंता का विषय नहीं था क्योंकि वह बिना किसी बीमारी के ही समिधा की ओ पी डी में हर तीसरे-चौथे दिन आ जाता।

तीन-चार विजिट के बाद समिधा ने कहा, “अंबर, आप की बीमारी आपके दिमाग में है, सो, मैं आपको साइकॉलाजिस्ट को रेफर कर रही हूँ।”

“नहीं आप समझी नहीं डॉक्टर समिधा! मेरी बीमारी दिल की है। मैं सही डॉक्टर के ट्रीटमेंट में हूँ।”

अंबर ने इतनी मासूमियत से कहा था कि एक बार कि वह सोच में ही पड़ गई और फिर जो हंसना शुरु किया तो वर्किंग वुमन हॉस्टल से होती हुई उसकी हंसी अंबर के इस बंगलेनुमा घर में आकर ही रुकी। डेढ़ साल अंबर के साथ पलक झपकते ही बीत गए थे। फिर अंबर ने एक दिन बताया कि उसे इंग्लैंड जाना होगा। कंपनी का हेड ऑफिस शिफ्ट हो रहा है। समिधा तो सब छोड़ उसके साथ भी चल देती लेकिन अंबर चाहता था कि वह दोनों ही पहले अपने कैरियर पर ध्यान दें।

तब से वह ना जाने कितनी नौकरी और शहर बदल चुका था। समिधा को समझता नहीं कि वह आखिर क्या पाने के लिए भाग रहा है। कुछ समय पहले रुशा ने बताया कि फेसबुक पर अंबर की फोटो थी दोस्तों के साथ। तब समिधा ने भी अपना फेसबुक पर अकाउंट बनाया। इससे पहले भारत में सब दोस्त कितना कहते थे लेकिन उसने कभी जरूरत नहीं समझी। अंबर का टाइमलाइन खोला तो लगा ही नहीं कि उसने कभी समिधा को मिस भी किया है। सभी फोटो देख कर उसकी नजर बार-बार अंबर और डायना की फोटो पर रुक जा रही थी। क्या था उन फोटो में ऐसा? कुछ भी तो नहीं शायद! कुछ फोटो में अन्य मित्र भी साथ थे। एक में बस वह दोनों।

हर ग्रुप फ़ोटो में डायना का अंबर के ही साथ खड़ा होना महज इतेफाक था कि वह कुछ ज्यादा सोच रही थी। ना चाहते हुए भी अंबर से पूछ बैठी। वह उखड़ गया। कई दिन बात नहीं की। वह उसके फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम अकाउंट तलाशती रही, पर कहीं कोई नई खबर नहीं। ना उसने व्हाट्सऐप और फोन पर ही संपर्क किया। समिधा ने डायना की भी टाइमलाइन को छान डाला। कितने ही मित्र थे उसके। सबसे ऐसी ही बेतकल्लुफी। शायद सभ्यता और संस्कृति के अंतर का असर था, फिर से फोटो देखे। क्या स्त्री की छठी इंद्रिय धोखा दे सकती है? वह कुछ जवाब तलाश पाती इससे पहले ही वह एक दिन ओ पी डी के बाहर बैठा मिल गया अंबर । ठीक वैसे ही जैसे पहली बार मिला था। बदन सच में ही तप रहा था। उसने कुछ जांच और दवाई लिखी। पूछा अभी तक क्या इलाज लिया। बोला। क्या लेता? डॉक्टर इतना दूर जो था।

वह खिसिया कर रह गई। अब इसका इल्जाम भी उसी पर। एक मैसेज तक किया नहीं था जनाब ने! किसी तरह अस्पताल से छुट्टी ले घर ले आई। तीन दिन रुका रहा। चौथे दिन कुछ हालत सुधरी तो बोला, जाना जरूरी है, और नहीं रुक सकता। वह रोक भी नहीं पाई। बस प्रिय कवि केदारनाथ जी की पंक्तियाँ स्मरण हो आयी... जाना सच ही हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है।

अस्पताल से वापस लौटी तो सिर भारी था कुछ खाने का भी दिल नहीं हुआ। फोन देखा कोई मैसेज नहीं था। कहीं फिर से बीमार तो नहीं हो गया। रात उहापोह में बीती। कई बार सोचा फोन कर ले। कई बार लगा एक मैसेज ही कर ले। कहाँ उसके साथ के लिए वाशिंगटन छोड़ ऐशबर्न चली आई थी। वह भी सिर्फ दो हफ्ते की जान-पहचान पर! पहचान तो शायद अभी तीन साल बाद भी नहीं पाई उसको, लेकिन अब यह कुछ नंबर मिला, मौन की दूरी भी नहीं लांघी जाती। यह संकोच न जाने कब मध्य उत्पन्न हो गया? उसने फोन उठाया लिखा,

“जानती हूँ तुम नहीं चाहते, पर मैं क्या करूँ! हर पल तुमसे बात करने का दिल करता है और फोन मिलाने में संकोच!”

और अंबर मानो प्रतीक्षा ही कर रहा था ‘टाइपिंग’ दिखने लगा। जवाब आया, “जहाँ संदेह होता है वहाँ संकोच होता है, मैं प्रेम पर विश्वास करता हूँ।”

“लेकिन फोन नहीं करता हूँ”, समिधा ने चिढ़ कर लिखा।

“तुम नहीं कर सकती क्या?”

“नहीं कर सकती”, समिधा ने लिखा, लेकिन अब वह ऑफलाइन था।

समिधा कॉल की प्रतीक्षा करती रही, पर कॉल नहीं आई। जितना समझने की कोशिश करती उतना ही और उलझती जाती।

सुबह आँख बहुत देर से खुली। अस्पताल के लिए तैयार हो जाने के लिए दरवाजा खोला तो ठिठक गई। दरवाजे पर बुरांश के फूल बिखरे थे। वह हर्ष मिश्रित आश्चर्य से भर गई। लगा कि वह ऐशबर्न नहीं उत्तराखंड के गाँव में है। उसके अपने गाँव और देश में। उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई। कहीं कोई नजर नहीं आया। बस सब घरों की सीढ़ियों पर फूल बिखरे थे। पास के बंगले का दरवाजा खुला। एक वृद्धा मुस्कुराती हुई निकली। उसे देख बोली, “हैप्पी फूलदेई!”

“जी ...जी हैप्पी फूलद्ई आपको भी… सेम टू यू…”, समिधा के चेहरे पर बड़ी मुस्कान तैर गयी।

फूल देई, छम्मा देई… उन्होंने सुर में गाने की कोशिश की

देणी द्वार, भर भकार,
ये देली स बारम्बार नमस्कार,


समिधा ने पूरा किया। वह भाव विभोर थी। फिर से एक छोटी फुलारी बन गई थी। दो चोटी कर बालों में रिबन डाल सिंगार की टोकरी ले सहेलियों के साथ जंगल से फूल बीनती हुई। उसने आँसू पोंछे,वापिस आ गाड़ी स्टार्ट की। पिछले तीन साल में जिस वृद्धा से कभी हाय हेलो या मुस्कान का भी आदान-प्रदान नहीं हुआ, आज वह उसके गाँव के त्यौहार की शुभकामनाएँ दे रही थी, गीत गुनगुना रही थी। सच ही त्योहारों से ही जीवन में रौनक है इनके बिना जीवन बर्फ की सफेद चादर सा… इकसारता लिए हो जाएगा।

समिधा ने यूटयूब सर्च कर गाना लगाया,

चला फुलारी फूलों को
सौदा-सौदा फूल बिरौला

सुनते हुए समिधा को लगा जैसे वह गढ़वाल की ही वादियों में घूम रही हो।

भौंरों का जूठा फूल ना तोड्यां
म्वारर्यूं का जूठा फूल ना लायाँ

ना उनु धरम्यालु आगास
ना उनि मयालू यखै धरती

उदासी और अकेलापन और गहराने लगा। गाने में खोई वह सोचने लगी। आकाश यहाँ उतना ही साफ है लेकिन लोग अनजान। आज उसे सच ही यह देश यहाँ की धरती यहाँ का आकाश सभी बेगाना-सा लग रहा था। उसने गाड़ी साइड में लगाई और आज महीनों बाद माँ को फोन लगाया। वैसे सदा माँ ही परेशान होकर उसे किसी से कह फोन मिलवाया करती है।

“ओ ईज कैछ छै रे तू?” उसने पूछा।

“भल चेली भल तू कस है रै छै।
बड़े दिन बटी बात ले नई है रछी”,

 माँ की आवाज उसकी खुशी बता रही थी।

“इज़ा आज फूल देइ छो ना”, उसने आँसू रोकते हुए कहा।

“पर अब कैकी फूल देइ कैको त्योहार
अब तो बुरांस भी टैम हेबे पैली।
सब जाण भै गई अब गाँव छोड़ बेर शहर तरब।
को मनाल फूल देइ को गाल माँगव।”

(ईजा कैसी है रे तू? ठीक हूँ चेली… तू कैसी है रे ? हैप्पी फूलदेई माँ। फूलदेई मनाने को ना लोग है न फूल। अब जल्दी खिलने लगा बुरांश का फूल फूलदेई पर खाली ही है पेड़)

माँ ने मायूस होकर कहा। उसे लगा उसके मन का खालीपन गाँव तक भी पहुँच गया है या गाँव से पलायन वालों को देवता ने श्राप दिया कभी भी बसने न देने का! वह भी तो असमय ही पुष्पित हो गई, समिधा ने सोचा! ओ पी डी में पहुँची तो भी मन घर की ओर ही भागता रहा। पिछले कुछ घंटों में ही घर की परिभाषा और पता बदल गए थे। असमय पुष्पित हो गया बुराँश! माँ के शब्द कानों में गूंज रहे थे। समय से होने पर ही चीजों में सौंदर्य और सार्थकता बनी रहती है, समिधा ने सोचा। विकास की दौड़ में शामिल शायद हम समय से भी आगे निकल गए हैं। पैरों तले जमीन छूट गई। सिर से आकाश छूट गया अब थमने का समय है।

ड्यूटी से फ्री होकर वह स्टाफ रूम में आ गई। कुछ काम आज निपटाने जरूरी थे। लैपटॉप बंद करने से पहले उसने सभी काम दिमाग में दोहराए। आश्वस्त हुई कि कुछ छूट तो नही गया और निश्चिंत हो उठ खड़ी हुई। घर आई तो लगा एक बहुत बड़ा बोझ सिर से हट गया हो जैसे! एक मग कॉफी बना आज कई दिनों बाद टेलीविज़न के आगे आ बैठी। भारत के चैनलों पर न्यूज़ आ रही थी कि ऐशबर्न में अमेरिका के बच्चों ने मनाई फूलदेई। कितनी ही बार वह वीडियो यूटयूब पर भी देखती रही। बचपन के वह दिन बुरांश … फ्योंली... बच्चों का समूह... गोगी माँ की पूजा … सब आंखों के आगे घूमता रहा और वह वहीं सोफे पर ही सो गई। सुबह उठी तो देखा अंबर का एक मैसेज था।

तुम अपने अविश्वास पर
विश्वास बनाए रखना
मैं अमावस में उजास
बरसाता रहूँगा

अब वह फिर भ्रमित थी। अंबर को फोन मिलाया तो स्विच ऑफ था।

अस्पताल से फ्री हो डॉ शैल की ओ पी डी में पहुँची। वह भी भारत से थे और उसके अच्छे मित्र बन चुके थे। लौटने से पहले वह सब से मिलना चाहती थी। वह मनोचिकित्सक थे और उसके मन की बात भी बिना कहे ही पढ़ लेते थे। वह गई तो उन्होंने सोफे पर बैठने के लिए इशारा किया। एक मरीज की पत्नी को समझा रहे थे--

“यह फैंटम लिंब का केस है। पैर कट जाने के बाद भी व्यक्ति को लगता है कि उसे शरीर के उस भाग में दर्द हो रहा है। दर्द की तीव्रता अलग हो सकती है।”

“ऐसा कैसे संभव है डॉक्टर?” वह स्त्री अचंभे में थी।

संभव है कुछ तंतु जीवित रह जाते हैं जो उस पैर के दर्द का भान मस्तिष्क तक पहुँचाया करते थे। अब जबकि पैर नहीं है पर तब भी उन तंतुओं के कारण मस्तिष्क यही समझता है कि यह दर्द उस पैर में हो रहा है जिस पैर का अस्तित्व ही नहीं है।

अंबर से उसका रिश्ता भी तो फैंटम लिंब का ही है। वह व्यथित होती है कि कहीं अंबर किसी परेशानी में तो नहीं... बीमार तो नहीं, जबकि असल में अंबर के रिश्ते की डोर कब की कट कर अलग हो चुकी है। बस कुछ अहम के… जिद के भ्रम के तंत्र सक्रिय बने हैं। बहुत कठिन है यह सत्य स्वीकारना कि हमने कोई गलत निर्णय लिया... हम गलत को सही साबित करने का प्रयास करते रहते हैं, समिधा सोचने लगी!

“कोई तो इलाज होगा?”, स्त्री ने कहा

“हाँ बिल्कुल, कुछ दवाइयाँ और थेरेपी से इन तंतुओं को या इनसे उठने वाले आवेगों को निष्क्रिय करने में मदद मिलती है”, वे समझा रहे थे।

‘आवेगों को निष्क्रिय…।’, समिधा ने बुदबुदाया।

“यू रिमेम्बर इट ना! फैंटम लिंब?”, शैल ने उसकी तरफ देख कर कहा।

“हाँ” उसने सिर हिलाया, लेकिन कहाँ याद था उसे। वह सच में भूल चुकी थी। यह किताबों की बातें जिंदगी में कब काम आती है।

मरीज को अगले सेशन का टाइम और कुछ दवाइयाँ लिख उसे भेजने के बाद शैल बोला, “कुछ परेशान हो”

“नहीं… अब सही राह पर हूँ”, वह मुस्कुराई।

“कल इंडिया जा रही हूँ।”

“हमेशा के लिए?” उन्होंने चौंक कर पूछा।

“हाँ”, समिधा ने धीरे से कहा।

“याद बहुत आओगी... पर, काम चला लूंगा”, शैल हँसा, “जाओ, मैं जानता हूँ पहाड़ पुकार रहे हैं। उन्हें अनसुना नहीं किया जा सकता”,

“कीप इन टच”, उसने कहा और उठ खड़ी हुई। कल सुबह जल्दी की फ्लाइट थी, पैकिंग भी करनी थी।

घर लौट कर फोन देखा तो अंबर का मैसेज था।

“तुम्हारे होने का अहसास आत्मिक बंधन हो जैसे... और यह बंधन साधे रखता है इस भीड़ में मेरी अलग पहचान”

समिधा ने एक गहरी सांस ली। फेसबुक खोला। अंबर का कोई अपडेट नहीं था। पता नहीं क्या सोच कर डायना का अकाउंट खोल लिया। डायना ने नया कवर पेज डाला था। ‘नेवर लेट यू गो’ कैप्शन के साथ चित्र में डायना खड़ी थी और पीछे किए हुए उसके कोमल हाथ को एक सुदृढ़ हाथ थामे था। इस हाथ को समिधा बंद आंखों से भी पहचान सकती थी। उसने फेसबुक बंद करके कुछ जरूरी फोन किए। पैकिंग की, व्हाट्सऐप खोला और अंबर को लिखा,

“इस इतवार बाजार गई तो बुक स्टोर पर तुम्हारी कहानियों की किताब जंगल में उठते शहर लगी थी... सोचा ले लूँ। फिर लगा जितना घातक जंगल मे शहरों का उगना है उतना ही शहर का जंगल बनना भी है न? और जंगल और शहर के अर्थ भी तो निश्चित नहीं, संदर्भ के साथ बदलते रहते हैं। इन जंगलों की पगडंडियों पर मंजिल तलाशते और शहरी सड़कों पर सिग्नल की प्रतीक्षा … दोनों से ऊब चुकी हूँ। अब एक छोटे कस्बे में एक छोटा आशियाँ चाहती हूँ... जहाँ अनिश्चितता और संशय के बादल न मंडराते हों। सुकून के सूरज की अरुणिमा दस्तक दे रही है। नया सवेरा… नया उजाला… नया अध्याय!”

ब्लू टिक नहीं आया था, न उसने प्रतीक्षा की।

सालों बाद वह एक निश्चिन्त नींद सोई थी। सुबह उठी। मकानमालिक के निर्देशानुसार चाभी बाहर लगे लेटर बॉक्स में डाल दी और एयरपोर्ट के लिए निकल गई। जैसे-जैसे टैक्सी आगे बढ़ रही थी मन पीछे भाग रहा था। इतना आसान होता है क्या सब डोर काट देना! और फिर क्या डोर थी उसके और अंबर के बीच? कोई कानूनी रिश्ता भी नहीं। बस एक आवरण था प्रेम का, जिसमें दोनों एक साथ लिपटे थे। वह कब तार-तार हुआ, कब अंबर ने नये पैरहन धारण कर लिए, वह जान ही नहीं पाई। वह उस क्षीण हो चुके आवरण को ही रफू करती रह गयी, और समय रेत की तरह उसकी मुट्ठी से फिसलता गया।

यूँ लग रहा था जैसे कोई कलाकार अपने जीवन की सबसे खूबसूरत देव प्रतिमा बनाए और फिर पाए कि यह सुर नहीं असुर है। अब अपने ही हाथों मूर्ति को खंडित करना मानो हथौड़े की हर चोट अपने ही सीने पर पड़ती प्रतीत हो रही थी। एयरपोर्ट पर टैक्सी रुकी तो वह ख्यालों से बाहर आई। आगे बढ़ी तो शैल को खड़ा देख हैरान रह गई।

“तुम?”, वह चौंक कर बोली।

“हाँ, मैं! मुझे भी पहाड़ बुलाने लगे।”

“अरे! ऐसे कैसे?”, वह हँसी। समझ नहीं आ रहा था कि मजाक कर रहा है या सच!

“अरे क्या… कुछ दिन अपना गाँव घुमा दो, फिर भेज देना चाहे वापस…। पसंद न आऊँ तो!, शैल ने हाथ जोड़े।

भंवरे का जूठा फूल ना तोड़ो …। समिधा के कानों में गूंजा।

“आई एम प्रेग्नेंट विद अंबर्स चाइल्ड”, समिधा ने स्वर संयमित रखना चाहा पर कुछ नमी आँखों और शब्दों में घुल गई। आँसू छुपाने के लिए उसने चेहरा दूसरी ओर घूम लिया।

“भंवरे की नासमझी के लिए फूलों का सम्मान नहीं छीना जा सकता न?”, शैल ने समिधा का हाथ थामते हुए कहा।

 … कहीं दूर पहाड़ों पर बुरांश फिर खिल उठे थे!

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