मात्र “चालीस साला औरतें” ही नहीं हैं इन कविताओं में!

कविता संग्रह: चालीस साला औरतें 
अंजू शर्मा 

प्रकाशक: अधिकरण प्रकाशन, दिल्ली 
पृष्ठ : 112
सजिल्द (हार्ड बाउंड)  मूल्य : 335/-  (छूट के बाद रु 280/-)
पेपरबैक संस्करण मूल्य रु 150/-

समीक्षा: राजगोपाल सिंह वर्मा

अंजू शर्मा को मैं एक कहानीकार के रूप में पहले से जानता था। उनकी कहानियां प्रभावित करती हैं मुझे। फिर, “दस्तक” साहित्य समूह की एडमिन के नाते भी परिचय हुआ, पर “चालीस साला औरतें” पुस्तक के प्रकाशन की खबर से पहले उनकी कविताओं से मेरा कोई परिचय नहीं था, यह मानने में मुझे कोई असहजता नहीं है। हालांकि मुझे अब पता चला कि अंजू उसी शिद्दत से कवितायेँ भी लिखती रही हैं, जैसे कहानियाँ और लेख तथा रिपोर्टें आदि लिखती आई हैं। उनका एक कविता संग्रह ‘कल्पनाओं से परे का समय’ वर्ष 2014 में प्रकाशित हो चुका है।

आज इन पचास कविताओं के संग्रह की प्रति जब प्रकाशक के पास से मुझे मिली, तो थके होने के बावजूद तुरंत पढने का मोह नहीं छोड़ पाया। दरअसल मैं इसे 21 जुलाई या उससे पूर्व ही चाहता था, ताकि इसके लोकार्पण के आसपास ही अपनी प्रतिक्रिया दे सकूँ, पर किन्हीं कारणों से प्रति प्राप्त न हो सकी, इसलिए यह सम्भव नहीं हो सका।

यह पचास कविताएँ  पढकर आप अंजू शर्मा की रचनाधर्मिता से आसानी से स्वयं को सम्बद्ध कर सकते हैं। फिर भूमिका में अमिताभ मिश्र जी ने भी बहुत साफगोई से उस अंजू शर्मा से हमें परिचित करा दिया है जो उनके ही शब्दों में, “यहाँ पर महज़ रस्म अदायगी या महज कुछ जुमलों में स्त्री विमर्श नहीं आता या फैशन के तौर पर नहीं आता बल्कि वह सहजता से उनकी जीवन शैली से होता हुआ कविता में आता है।”

अंजू का स्त्री विमर्श सहजता से उपजी हुई उनकी इस विषय पर एक ऐसी चिंता है, जो आपकी और हम सब की है, और जिसे वह स्वयं बेबाक तरीके से प्रस्तुत करती हैं, जब वे कहती हैं,


राजगोपाल सिंह वर्मा
“इन अलसाई आँखों ने
रात भर जाग कर खरीदे हैं
कुछ बंजारा सपने
सैलून से पोस्टपों की गयी
उम्मीदें उफान पर हैं
कि पूरे होने का यही वक्त
तय हुआ होगा शायद…”
 
और दूसरी कविता में वह लिखती हैं,

“नामालूम सी जिम्मेदारी से
झुकने लगे उसके नाजुक कंधे
एक ही पल में हो गई है
वो कितनी सयानी
और समझदार
आज सुबह ही एक लड़की
पहली बार रजस्वला हुई है”

कविता क्या है, इसके लिए वह कहती हैं,

“कोई तो बताये,
कैसे जानूं कि ये कहानियां
किस रेगिस्तान की प्यास हैं,
कभी पूरी क्यों नहीं होतीं?
ये किस ब्रह्मांड का छोर है,
कि जिसकी यात्रा अनंत, निस्सीम, निरंतर है…”

दरअसल यह एक लम्बी कविता है जो कविता और कहानी के बीच के फर्क को रेखांकित करते हुए यूँ सिमटती है…

“जाने क्यूँ लगता है
कविता और कहानी दोनों में सौतिया डाह है,
दोनों को ही चाहिए कलम का बलम-रंगरसिया
और इनकी कलम मेरी रातों की लोरी है…”

आम आदमी की व्यथा को परिभाषित करती हुई वह कहती हैं,

“मेरा चेहरा मिलता है बुद्ध से
और हर बार दांव पर लगती है
मेरी ही निर्लिप्तता
मैं गांधी-सा मानवीयता का पुजारी हूँ
बार-बार उठाता हूँ अहिंसा का श्वेत ध्वज
फिर भी कातिलों के हाथ कपोत-सा फड़फड़ाता हूँ…”

और इस कविता के अंत में,

“जाने दो मुझे,
मुझे क्या लेना तुम्हारे अल्लाह और राम से,
चले जाओ, मैं कल इंतज़ार में हूँ नई सुबह के,
जाओ, कि मुझे कुछ देर सोना है …”

धर्म पर अंजू की व्याख्या भी मन को स्पर्श करती है जब वह लिखती हैं,

“जानवर दीन से नावाकिफ थे
किसी ने सिखाया ही नहीं
न भौंकने की कोई बोली हुई
न मिमियाने का कोई धर्म
कूंकने, चहचहाने, हिनहिनाने तक की भाषा
अनजान रही धर्म की पाबंदी से”

पुस्तक का नाम भले ही “चालीस साला औरतें” हो पर लेखिका की चिंता शब्दों में लिपटी अभिव्यक्तियों, धर्म और समाज के मतभेदों, मां, वैलेंटाइन डे, या फिर फेक आई डी और अच्छे दिनों की उम्मीदों के लिए भी है। सभी कविताएँ अपने आसपास के परिवेश से उपजी हैं, और आम भाषा में लिखी गई हैं। अंजू ने भारी भरकम और क्लिष्ट शब्दों के उपयोग से परहेज़ किया है, यह उनकी कविताओं का एक प्रबल पक्ष है। परन्तु हिंदी कविताओं में जिस बहुतायत से अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग किया गया है, वह अखरता है।

यदि आप भी मेरी तरह अंजू शर्मा को एक बेहतर कवियित्री के रूप में जानना चाहते हैं, तो आपके अंतर्मन को स्पर्श करने योग्य उनकी बेहतर रचनायें पढने को मिल सकती हैं। उनके इस काव्य संग्रह को पढने की एक तात्कालिक हानि भी मुझे हुई, पर मैं मैं उसे सकारात्मक रूप से एक लाभ भी कह सकता हूँ। मैंने अपनी चुनींदा कविताओं के प्रकाशन की पांडुलिपि तैयार की थी। पर, अब उनकी कविताएँ पढ़कर मुझे अपनी कविताएँ बिलकुल साधारण और बचकानी लग रही हैं। मेरे स्वयं के विचार से उन पर फिर से काफी काम किये जाने की आवश्यकता है। उनकी यह पुस्तक मेरे लिए संदर्भ का काम करेगी।

यह पुस्तक अधिकरण प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है, जिसे 150 रूपये में मंगाया जा सकता है। अंजू शर्मा से anjuvsharma2011@gmail।com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

1 comment :

  1. संतुलित, सारगर्भित समीक्षा ।

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