दो कविताएँ: शशांक पाण्डेय

शशांक पाण्डेय

(1) माई का गहना

संदूक के
सबसे नीचले हिस्से में
माई ने छुपा रखा है
अपना सबसे बेशकीमती गहना,
माई सजती बहुत कम थी
अपने जीवन में
मैंने जब तक उसे देखा
हमेशा वह बस सिंदूर की एक चुटकी
अपने माथे पर
लगाये रहती थी
हालांकि बिंदी, इत्र सब कुछ थे उसके पास
लेकिन उन्हें छुपाकर रखती थी
कि कहीं देख न ले उसे
इन सब के अतिरिक्त
सजने के लिये शीशा-कंघी भी उसी बक्से के
किसी कोने में पड़ा रहता था
लेकिन माई ने उसे कभी उठाया ही नहीं
माई का बहुत सीमित संसार था
उसी में खुश रहती थी
किसी से भी बहुत नहीं बोलती थी
किसी से कुछ माँगती भी नहीं थी
बस दिन में कई बार
अपने गहनों को उलट पलट कर देख लेती थी
और अपने शृंगारदान को छुपाकर
फिर उसी बक्से के किसी कोने में रख देती थी
जिससे कई वर्षों तक
सुरक्षित बचा रहता था
माई का गहना।।

(2)  अपने शहर की याद में

(बनारस के लिये)

जब मैं लौटा इस शहर की ओर
यह शहर ठीक वैसा नहीं रह गया था
जैसा पहली बार मैंने इसे देखा था
बिल्कुल अलग ही था
इस शहर का मिज़ाज
और शहरों की तुलना में
यह शहर पहले इतना उन्मादी भी नहीं था
झरनों की बारिश भी
खून की तरह कभी नहीं होती थी
इस शहर में,
इस शहर में रहते हुये
न जाने हमारे कितने पुश्तों ने
जाने गँवा दी,
बाबा ने अंतिम साँस तक
इस शहर को
पहले की तरह पाना चाहा
उसके बाद पिताजी ने अनुभूत किया
इस शहर को
उन्होंने भी इसे बदला-बदला पाया
उन्हीं के मुँह से मैंने पहली बार सुना था
कि इसकी मिट्टी में अब वह सुगंध नहीं रह गयी है
माँ, बुआ, चाचा, चाची सभी ने
इस शहर को भाँपा
उन्हें भी इस शहर की हवा में कुछ बदलाव दिखा
जैसे पिताजी के जाने के बाद
पूरा परिवार पहले की तरह कभी न हो सका
ठीक वैसे ही
इस शहर में भी कुछ भी
पहले की तरह नहीं रह गया
हर साल सरकारों ने
बूढ़े मज़दूरों के लहू से अपने को सींचा
उनके गर्दनों पर तलवारें रख
अपने को रोज-रोज नया किया,
अपने शहर की याद में
मैं पिछली सभी पीढ़ियों को बताना चाहता हूँ
यह शहर खौफनाक हो गया है
यह शहर खौफनाक बन गया है
या इस शहर को खौफनाक बनाया गया है
पहले से कहीं ज्यादा
यह शहर डरा हुआ है
यह अपने शहर की बस एक याद थी
जिसे जानना होगा आने वाली पीढ़ियों को।।

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