बार बार बुलाती बिनसर की राहें

आरती स्मित

यात्रा वृत्तांत - आरती स्मित

वर्ष 2016, जून का अंतिम सप्ताह! पहाड़ के लिए यह ऑफ सीज़न माना जाता है। मगर हमने पहाड़ के बुलावे को सुना, स्वीकारा और चल पड़े ...! बेटे के स्वास्थ्य को लेकर परेशान मैं चाहती थी, वह दिल्ली के दमघोटू वातावरण से निकले, खुली हवा में साँस ले, प्रकृति की गोद में कुछ लम्हे गुज़ारे।

 रिज़र्वेशन मिला और फिर हमने कुछ भी सोचने की गलती नहीं की। कभी- कभी अधिक तैयारी यात्रा का रोमांच ख़त्म कर देती है। यों भी वर्षों बाद हम बिना किसी काम के, बिना किसी लक्ष्य-पूर्ति का बोझ सिर पर लिए पहली बार साथ रहने, साथ को महसूसने और साथ-साथ जीने जा रहे थे। हम यानी मैं और मेरे दोनों बच्चे।
 बेटी अधिक ख़ुश थी। बेटा मेरे समझाने पर मान गया था, शायद उसके स्वास्थ्य में परिवर्तन आ जाए। हमारे साथ अभिभावक की भूमिका में थे, हमारे ट्रस्ट के अध्यक्ष ब्रजेंद्र त्रिपाठी। सुबह के 5 बजे तैयार होने की शगल में बच्चों को रात भर नींद नहीं आई। शताब्दी की चेयरकार में खिड़की के पास बेटी ने कब्ज़ा जमाया, दूसरे किनारे मैं थी। हमारे बीच बैठा बेटा प्रकर्ष अपनी सोच में डूबा रहा, कभी-कभी मेरे कंधे से सिर टिकाकर मुस्कुरा देता। बीमारी ने उसे भीतर से बेहद कमज़ोर कर दिया था, मेरा ध्यान उसपर टँगा रहा। काठगोदाम स्टेशन के बाहर निकलते ही पहाड़ी ने पुन: स्वागत किया। बच्चों की पिछली यात्रा शरद की थी, अभी गर्मी की। हालाँकि मानसून अपने आने की ख़बर बिना दिए ही कई जगह पहुँच चुका था। मौसम के अंतर और छह माह के अंतराल ने हमारी स्मृतियों के दरवाज़े खोल दिए। हमारी गाड़ी इंतज़ार में खड़ी थी। मौसम सुहावना था। ड्राइवर ने सामान रखा, हम बैठे और रानीखेत की यात्रा शुरू हुई। वह उल्लास में भरी आसपास के दृश्यों को निहारती, पेड़-पौधों से बातें करती बीच-बीच में आँखें बंद कर लेती और अपनी बहिर्यात्रा के साथ ही अंतर्यात्रा पर निकल जाती। बेटा शांत था, कभी-कभी तस्वीरें खींच लेता। मैं उन्हें प्रकृति से जोड़ने की भूमिका में लगी रही। चीड़ के पेड़ मुस्कुराने लगे थे। ड्राइवर ने बताया, चीड़ के पेड़ में आग बहुत जल्दी पकड़ती है, जबकि देवदार की प्रकृति शीतल होती है, इसलिए उसमें आग नहीं पकड़ती। देवदार अधिक ऊँचाई पर मिलेंगे। रास्ते भर एक-एक चीज़ के बारे में बच्चों को बताता ड्राइवर गाड़ी चलाता रहा। लगभग तीन बजे रानीखेत पहुँचकर हमने मनपसंद होटल देखना शुरू किया, होटल मून का परिसर हमें भा गया। यह मुख्य बाज़ार की भीड़ में होकर भी, भीड़ से दूर प्रतीत हुआ। उसके कमरे के सामने खुला परिसर था जहाँ हम चाँदनी रात का आनंद ले सकते थे।

 ड्राइवर की सलाह पर हमने बिना समय गँवाए घूमने की तैयारी शुरू की। सबसे पहले मिलेट्री के मंदिर में गए। वहाँ के घंटे की गूँज अबतक कानों में बसी है। अष्टधातु से बना घंटा मस्तिष्क को कुछ देर विचारशून्य रखकर अपनी ही प्रतिध्वनि से बाँधे रखता है।

 ''कितना सुकून है यहाँ पर। कोई आपाधापी नहीं, कोई भागमभाग नहीं। काश! हम कुछ दिन यहाँ रह पाते!" मैं आत्मविभोर सी बोल पड़ी। बेटी ने हामी भरी। हमने आँखें बंद की और उस सुकून को आत्मसात करने लगे। मंदिर के बाहर टीले पर खुली जगह थी। हमने वहाँ डेरा जमाया। कुछ बच्चियाँ पहले से मौजूद थीं, उन्होंने हमें रानीखेत के दर्शनीय स्थलों के बारे में और उस जगह की ख़ासियत बताई। बेटा चहलकदमी करने लगा, उसे ख़ुश और सक्रिय देखकर हमने चैन की साँस ली। साँझ घिर आई, सूरज का सुनहरा रूप देखते ही देखते उसी के आलोक से कभी नारंगी, तो कभी हल्का तांबई रंग धारण करते श्वेत बादल विचरने लगे। आसपास घूमते हुए हम गाड़ी से वापस होटल आ गए।

 रात छिटकती चाँदनी से भीगी, तारों से सजी-धजी नायिका लग रही थी। आसमान साफ़ था। 'ओ! कितने सारे तारे!' बेटी चहककर बोली। "हाँ, और ये रंग-बिरंगे भी हैं।" मैंने उनका ध्यान खींचा। "दिल्ली में तो इतने तारे कभी नहीं दिखे, रंग-बिरंगे तारों की बात तो छोड़ ही दो।" बेटा बोला। हम आसमान से छन-छनकर आती चाँदनी में नहाते घंटों बैठे रहे। हवा की शीतलता तन-मन को गुदगुदा रही थी। पहाड़ के कुछ फूल और पत्ते मैदानी इलाकों से भिन्न स्पंजी, अलग-अलग आकार लिए खिले रंगों से मन मोह रहे थे। चाँदनी में उनका सौंदर्य निखर आया था। रात का दूसरा पहर बीतने लगा, हवा में ठंडक भरने लगी, कंपकपाहट तो नहीं मगर सिहरन महसूस होने लगी तो हमने तारों से विदा माँगी, चाँदनी को खिड़की से अंदर आने का न्योता दिया और कमरे में आ गए। बिस्तर पर आते ही मीठी नींद ने बाँहों में भर लिया। सुबह तड़के आँख खुली तो शरीर में ताज़गी और मन में स्फूर्ति का एहसास हुआ। उषा अपनी स्वर्णिम आभा को शीशे के पार धकेलती, हमारे दरवाज़े पर दस्तक देने लगी। चिड़िया की चहचहाट प्रात: संगीत से कम न था। हमने दरवाज़ा खोला और उषा का स्वागत किया। बाहर निकलकर फूलों से शुभ प्रभात कहा और घाटी को निहारा, जहाँ पेड़ों के बीच मकान खिलौने से दिख रहे थे। हरी भरी वादियों ने हमारे लिए बाँहें फैला दीं और हम सिमट चले उसके आगोश में।

 रानीखेत और आसपास घूमते हुए, बिनसर की यात्रा पर हम निकल पड़े। हॉकी का मैदान! अहा! एक ओर मखमली घास का विस्तार, दूसरी ओर चीड़-वन। मैं तो उस मखमली घास के बिस्तर पर यों लुढ़की, एकबारगी बचपन याद आ गया। ये बचपन की वे इच्छाएँ थीं, जिनके कभी पूरे होने का अनुमान न था। शायद इसलिए ऐसी जगहों पर मेरे अंदर का बच्चा पूरी साँस जीता है और परिपक्वता को मुझसे परे हटा देता है। हमने आइसक्रीम का मज़ा लिया। मैदान में, वन में खूब घूमे। फिर बढ़ चले हवा के साथ बातें करते हुए, शूटिंग स्थल, देवदार वन आदि घूमते हुए हम बिनसर प्रवेश कर गए। हमने कुमाऊँनी विकास मंडल के गेस्ट हाउस में कमरों की बुकिंग कारवाई थी। यह गेस्ट हाउस 'बर्ड सेंक्चुअरी क्षेत्र' के अंतर्गत है जो काफ़ी ऊँचाई पर है और पहाड़ को बीच में से काटकर कमरे बनाए गए हैं। ऊपरी तल पर यह सामान्य,मगर खूबसूरत होटलनुमा है, मगर अंदर से नीचे उतरकर कमरे में आने पर रोमांच हो आता है। कमरे से निकलते ही चारों से पेड़ों से भरी गहरी खाई है। 85,000 फीट की ऊँचाई पर बसा यह स्थल शाम ढलने के बाद जंगल की खौफ़नाक खामोश चीख से भर उठता है, जबकि टेरेस पर बने कमरे में इसका आभास नहीं होता। जंगल में रहने का वास्तविक अनुभव यहाँ रहकर पाया जा सकता है। बर्ड सेंक्चुअरी के अंदर बसा होने के कारण यहाँ बिजली की व्यवस्था नहीं की गई। रात मोमबत्ती में गुज़ारना होता है। शाम 7 से 9 जेनरेटर की सुविधा दी जाती है, उसी बीच रात्रि भोजन, मोबाइल चार्ज करना होता है। केंटीन की व्यवस्था ऊपर टेरेस के पास है जहाँ से बाहर खूबसूरत नज़ारा दिखता है। रात को आसमान का नज़ारा मन मुग्ध करने वाला होता है। ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता, रात तारों की रंग-बिरंगी दुनिया में हमें साथ ले जाने को हाथ बढ़ाते तारे आसमान से नीचे उतरते प्रतीत होते, गुलाबी, पीले, नीले - भिन्न-भिन्न रंग के वे सितारे क्या थे? तारे या कोई ग्रह? उड़ते-फिरते बादल भी कभी बैंगनी, कभी गुलाबी प्रतीत होते। हाँ, यदि रंग-बिरंगे बादलों के दर्शन करने हों तो यहाँ के सूर्यास्त को देखना अनिवार्य है। इस गेस्ट हाउस से लगभग आधे किलोमीटर से कुछ अधिक दूरी पर, वन विभाग के गेस्ट हाउस से सूर्यास्त का अनुपम नज़ारा दिखता है। खुली आँखों से सूर्य से निकलती नारंगी, गुलाबी, बैगनी - सतरंगी आभा से आभासित बादल को देखना कितना रोमांचित करता है, इसे अभिव्यक्त कर पाना कठिन है। यों भी कहीं-कहीं प्रकृति के अद्वितीय सौंदर्य के समक्ष नि:शब्द हो जाती हूँ मैं।

 मैं वहाँ बिताई पहली रात नहीं भूल सकती, जब जंगल के शोर से भयभीत मैं मोमबत्ती की रोशनी में भी बुरी तरह डर रही थी, जबकि मेरे बच्चे मज़ा ले रहे थे। संयोगवश उस तल पर प्राय: सभी कमरे खाली थे और द्वार को हवा दरवाजे को धक्का देती प्रतीत होती। महानगर के जंगलराज से भयभीत मैं किस तरह बुरी आशंकाओं से घिर गई थी, उफ! शुक्र है, वहाँ जंगल तो है, जंगलराज नहीं। मनुष्य में अबतक पशुता नहीं जागी है; पुरुष स्त्री को घूरते नहीं; किशोरी / युवती वहाँ के वाशिंदों से खौफ़ नहीं खातीं। उन्हें इंसानी शक्ल में भेड़िया नहीं दिखता। जो भी परिचारक थे, बड़े सहज-सरल! दूसरी रात को मैं सामान्य हो चुकी थी - बेखौफ़! आज मैंने जंगल के शोर को आत्मसात किया। दूसरे दिन, सुबह हम टेरेस की ओर भागे-- हिमालय-दर्शन के मोह ने हमें जकड़ रखा था। बादल लुकाछिपी खेलते रहे, हम हिमालय को देखने की ज़िद में बैठे रहे, उसने दर्शन तो दिए, मगर नई नवेली दुल्हन की तरह बर्फ़ वाला हिस्सा बहुत थोड़ा दिखा, मन न माना, उदास मन हम अपने कमरे में आ गए। लगभग 10 बजे फिर टेरेस पर। मौसम साफ़ था। खिली धूप में हिमालय की शृंखला देखकर हम ऐसे खुश हुए मानो क़िला फतह किया हो। मैं जाने कितनी देर अपलक निहारती रही, बेटे ने झकझोरा तो तंद्रा टूटी। सचमुच हिमालय का माहात्म्य ऐसा है जो हमारे अंतस में साधना के बीज बो देता है। उस वातावरण में आध्यात्म का गहन प्रभाव रहता है जिससे संबद्ध होकर असीम आनंद की अनुभूति होती है।

 इसके पश्चात हम ट्रैकिंग करते हुए लगभग 2 किलोमीटर दूर ज़ीरो पॉइंट देखने गए। इस पर्वत का शीर्ष! यहाँ से हिमालय की दूसरी शृंखला साफ़ दिखती है। हमें हल्की झलक मिली। मगर वहाँ की शांति ने हमें बाँध लिया। दोपहर को जंगल का स्वर भिन्न होता है। एक मोहक संगीत-सा! हालाँकि संगीत का स्वर अलग-अलग वनों और जंगलों का परस्पर भिन्न होता है। वहाँ बने मचान पर हमने डेरा डाला, ऐसा लगा यहाँ ध्यानमग्न हुआ जा सकता है। हमने यादगार तस्वीरें ली, शीर्ष पत्थर पर खड़े होकर पुलकित हुए, फिर न चाहते हुए भी वापसी को मुड़े। दो किलोमीटर की इस बेराह यात्रा के समय कोई दूसरा पर्यटक न मिला, बस हम चारों ही थे, हर पेड़ से रास्ता पूछते, हर पत्थर से उसका इतिहास पूछते हुए।

 चार घंटे गुज़र चुके थे। दोपहर ढलने के बाद जंगली जानवर निकल आते हैं, इस पूर्वसूचना ने एक माँ के कमजोर मन को समझाया कि शाम होने के पूर्व निकल लो। वैसे भी पथरीले रास्ते पर, कभी ऊपर, कभी नीचे चढ़ते- उतरते चलने में समय लगता, बीच-बीच में सुस्ताते हुए आगे बढ़ना आनंददायक था। हम इसी प्रकार वापसी की इच्छा लिए लौट चले। अब कई पर्यटक आते दिखाई पड़े। हमने उन्हें सहज रास्ता बताया और बिना विलंब के लौट आने की बिन माँगी सलाह दी। शाम के छह बज चुके थे। अब हमने फिर से टेरेस पर अपनी जगह बनाई। और सितारों से बतियाने लगे। हमारे पास इतनी खूबसूरत रात का सान्निध्य पाने का इस बार यह अंतिम अवसर था। मैं इस सुख को अधिक से अधिक भोगना चाहती थी। बच्चों ने मेरी भावना की कद्र की, और मुझे कुछ देर अकेले छोड़ दिया। रात के दस-ग्यारह बजे होंगे या कुछ अधिक। गेस्ट हाउस के परिचारक के निवेदन पर मोबाइल की रोशनी के सहारे नीचे बिना रेलिंग वाली पथरीली सीढ़ियाँ उतरने लगी। हवा के तेज़ झोकों ने मोमबत्तियाँ बुझा दी थीं, मगर आज मुझे भय नहीं, इस परिवेश ने मुझे और मैंने इन्हें अपना लिया था। पहाड़ पर रहने की वास्तविक अनुभूति यहीं आकर हुई और इसी तहखानेनुमा मंजिल में हुई।

 वक़्त आ गया विदाई का। दिल भर आया। प्रकृति का जो रूप यहाँ देखा, महसूसा, आत्मसात किया, वह अभूतपूर्व रहा। वहाँ से बागेसर की यात्रा आरंभ हुई, मगर मैं तो यहीं रह गई --- विदेह! बिनसर की राहें बाँहें पसारे वापस आने की गुज़ारिश करती रहीं और मैं नम आँखों से उन्हें फिर आने का वादा करती रही...। बिनसर पीछे छूट गया है, मगर मैं अब भी सुन रही हूँ उन राहों की आत्मीय पुकार! उनका आमंत्रण!

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