लघुकथा: बँटवारा

- अक्षय मेहता

सूक्ष्मजैविकी विभाग, राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय, अजमेर; चलभाष: +91 958 727 0844

आज का दिन हर दिन जैसा नही था। पूरे घर में शोर मचा हुआ था, अंदर से चीज़ें बाहर लाई जा रही थी और उनका आँगन में ढेर किया जा रहा था। आज दोनों भाइयों में बँटवारा होने वाला था। बच्चों का उत्साह देखते बनता था। जो होने जा रहा था, वो उनकी समझ से तो बाहर था लेकिन उनको चीजों का ढेर करने में बड़ा मज़ा आ रहा था। होड़ लगी हुई थी कि सबसे पहले कौन आँगन में पहुँचता है? देवरानी और जेठानी मन की ख़ुशी बाहर नहीं आने दे रही थी। छोटी बहू सोच कर खुश थी कि अब उसे जेठानी के और ताने नहीं सहने पड़ेंगे। अब वो अपने घर की मालकिन खुद होगी, सारा पैसा उसके हाथ में दिया जायेगा और हर चीज़ का सही हिसाब रखा जाएगा। वो सोच कर खुश थी कि अब उसके ओढ़ने-खाने के दिन आयेंगे। अब उसके दूध के भगोने के पास जेठानी नहीं बैठी होगी और वो खुद उबले दूध से गाढ़ी मलाई उतार के अपनी थाली में डालेगी।

दूसरी ओर जेठानी की भी कम योजनाएँ नही थी। सिनेमा जाने की उसकी बरसों पुरानी इच्छा अब पूरी होगी। इस इच्छा के आड़े पहले उसके खुद के माँ बाप आये, शादी के बाद सास और उसके बाद बड़ी बहू की जिम्मेदारियाँ। लेकिन अब ऐसा नही होगा, अब वह जो चाहेगी, करेगी। अब वह हर तीसरे महीने पीहर जायेगी और अपनी माँ को उसकी पसंदीदा गोटे वाली साड़ी लेकर देगी।

बँटवारे में किसी के हिस्से में कम या ज्यादा ना आये इसका ध्यान रखने के जीजाजी को बुलाया गया था। आंगन में जीजाजी दोनों हाथ बांधकर खड़े थे और एक-एक चीज़ का बँटवारा इस तरह कर रहे थे जैसे कि वह सोने की हो, आखिर जिम्मेदार आदमी जो ठहरे। इस समय जीजाजी का महत्त्व मोहिनी से कम नही था कि वो जो भी दे, देवताओं और दानवों दोनों को स्वीकार है। लेकिन जीजाजी ने मोहिनी की तरह पक्षपात नही किया। अगर एक भी चीज़ किसी की हिस्से में ज्यादा चली गयी तो उनकी इज़्ज़त में दाग लग जायेगा। आखिर ईश्वर से भी ज्यादा भरोसा है उन पर, दोनों भाइयों को। छोटे भाई के हिस्से में दूसरा मकान आया था, जो कस्बे के आखिरी छोर पर था। ये मकान उन्होंने करीब दो साल पहले खरीदा था और तभी से छोटे भाई ने तय कर लिया था कि बँटवारा होने के बाद वह यहीं आकर रहेगा, क्योंकि यहाँ वैवाहिक जीवन का सुख संभव है जिससे वह अब तक लगभग वंचित ही रहा था।

लगभग सभी चीजों का सफलतापूर्वक बँटवारा हो गया था। दोनों भाइयों ने दो-दो बार मुआयना करके सुनिश्चित किया कि सब चीज़े बँट गयी है और बराबर बँटी है। छोटे भाई ने अपना सामान एक गाड़ी में लाद लिया था और जाने को तैयार था, इतने में ही बाहर के नीची छत वाले पुराने कमरे का टूटा-सा दरवाजा खोलकर हाथ में पोटली लिए लाठी टेकती बूढी माँ बाहर आई और बोली, "बेटा, मेरा बँटवारा हो गया? मैं किसके हिस्से में हूँ?"

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