कहानी: फाँस

बीना जैन

- बीना जैन


दरवाज़े की घण्टी की किर्र-किर्र की तीखी आवाज़ ने सांझ की मीठी नींद में ख़लल डाल दी। सुबह के पाँच बजे से उठकर उसकी दिनचर्या जो रेल की तरह सरपट भागती है तो दोपहर में आकर ही थोड़ा थमती है। नाश्ता-लंच, बच्चों और पति को ऑफिस भेज कर खुद जल्दी-जल्दी तैयार होकर कॉलेज भागना और दोपहर को घर आकर भी कुछ-कुछ बचे काम समेट कर सांझ जब बेहोशों की तरह बिस्तर पर पड़ती है तो किसी भी तरह का विघ्न उसे कतई बर्दाश्त नहीं। उस समय बज तो जाए किसी का फोन। उठाना तो बहुत दूर की बात है। किसका फोन है, देख भर लेना भी मानो फोन पर अहसान करना होता है उसके लिए। ऐसे में एक ही कविता जो स्कूल में पढ़ी थी और कुछ टूटी-फूटी पंक्तियाँ आज भी याद हैं, दोहराना और करवट पलट कर सो जाना वह चरम और परम कर्तव्य मानती है।" जब सुख की नींद भरा तकिया सर के नीचे आ जाता है…। ओफ़्फ़ोह और यह घण्टी है कि इसकी आवाज़ रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।

"आई बाबा आई, पता नहीं इस वक्त कौन आ गया। जब- तब कोई भी मुँह उठाकर चला आता है", झुंझलाते हुए सांझ लगभग भागती-सी दरवाज़े तक पहुँची। "कौन है" के प्रश्न के साथ ही सांझ ने दरवाज़ा खोला। अचानक उसे पीछे हटना पड़ा जिससे वह हड़बड़ा गईऔर गिरते-गिरते बची। वह जो घर में घुसी ही चली जा रही थी।

"अरे-अरे, कौन हो तुम, और घर में क्यों घुसी चली आ रही हो?" एक तो भर दोपहर की नींद में व्यवधान जो सांझ को कभी गवारा नहीं होता, और ऊपर से यह अनजान औरत, झुंझलाते हुए ऊँची आवाज़ में वह लगभग चिल्ला ही पड़ी।

चक गोरा रंग, माथे पर चवन्नी के आकार की सुर्ख लाल बिंदी, चुटिया उमेठ कर बनाया हुआ टेढ़ा-मेढ़ा जूड़ा, मुसी-तुसी पर साफ़ सूती धोती पहने वह घर में घुसकर सीधी रसोई की ओर बढ़ी। अभी सांझ की जिज्ञासा का शमन होना शेष था। लेकिन शायद वह समझ गई थी अतः अधिक समय न लेते हुए बोली, "अंटी ने कहा है, पहले ऊपर काम करके आओ" सांझ समझ गई। जब से कामवाली गाँव गई थी जैसे जिंदगी नरक बन गई थी। थकान शाश्वत रोग बन कर देह में पसर गई थी। कॉलेज जाते समय नीचे वाली आंटी से बड़ी चिरौरी की थी तब आज उन्होंने शायद इसे भेजा था।

सारी नींद काफ़ूर हो गई। चेहरा खिल उठा। अचानक मौसम खुशनुमा हो उठा। पड़ोसियों से ज्यादा पैसे देकर सांझ ने शारदा को काम पर रख लिया। आंटी के चार कमरों के स्थान पर दो कमरों की सफ़ाई और छह मेम्बर के स्थान पर चार मेंबर का काम ज्यादा पैसों के साथ शारदा को खुश कर गया। वह भी मन लगाकर काम करने लगी।

उसकी ईमानदारी ने सांझ का विश्वास जीत लिया। शारदा काम करती रहती और वह बेफिक्र हो दोपहर में सो जाती। जाते समय शारदा पैर का अंगूठा हिला कर सांझ को जगाती, "जाय रहे भाभी, दरवाजा लगाय लो।"

कभी सांझ ज्यादा थकी होती तो उठने पर वह पाती कि आटा गुंधा हुआ है, सब्जी कटी हुई है, प्याज़-लहसुन सफ़ाई से बारीक-बारीक काटकर डिब्बी में बन्द कर रख दिया गया है, पानी भर दिया गया है। सांझ का मन खुश हो उठता। वह भी कोई कमी नहीं करती। हर बार उसे बढ़ाकर तनख़्वाह देती। दोनों संतुष्ट। घरवाले भी सांझ की दिनभर की किलकिल से निज़ात पाकर और अंततः उसके थकान से मुरझाये चेहरे पर हँसी देखकर सुकून महसूस करते।

शारदा का पति लिपाई-पुताई का काम करता था। प्रॉपर्टी चढ़ान पर थी। उसी सिलसिले में ठेकेदार के साथ शारदा के पति को कई दिनों के लिए दूसरे शहर भी जाना पड़ता था। इस बार जो वह गया तो लौटा ही नहीं। ठेकेदार को भी कुछ बोलकर नहीं गया। मज़बूरन शारदा को घर से बाहर कदम रखने पड़े।

एक बार शारदा का इकलौता पुत्र चन्दन ठण्ड खा गया। अंधेरे ठंडे घर में वह ठीक ही न हो पा रहा था। बुखार बार-बार चढ़ जाता।सांझ की बालकनी में खूब धूप आती थी और वह कवर की हुई थी।

"शारदा, कल से तू चन्दन को यहाँ ले आया कर। तेरे सब काम इसी बिल्डिंग में हैं।मैं तुझे घर की चाबी दे दूंगी। चन्दन धूप में रहेगा तो जल्दी ठीक हो जायेगा। वैसे भी बालकनी में तख़्त पड़ा है। एक कम्बल और निकाल दूंगी। उसे यहीं रसोई में कुछ बना कर खिला भी देना, और हाँ, खुद भी खा लेना।" सांझ ने अपना सुझाव सुझाया।

शारदा की आँखें भर आईं। सन्तोष से उसने सिर हिलाया और उसके माथे पर छाई चिंता की लकीरें तिरोहित हो उठीं। लेकिन "कर भला हो भला" की कहावत चरितार्थ हुई। सांझ की सद्भावना खाली नहीं गई। शारदा न सिर्फ़ चन्दन और अपने लिए खाना बनाती बल्कि सांझ के लिए भी खाना बनता।ऐसा सुख विवाह के पश्चात बरसों में नसीब हुआ था। सिर्फ माँ के राज में गरम-गरम खाना मिलता था।

अब शारदा ने खाना बनाने का काम भी पकड़ लिया और सांझ की शारदा पर निर्भरता कभी-कभी उसे डराने लगती जब उसके पति उससे कहते, "सारे अंडे एक ही टोकरी में नहीं रखते। बड़े-बूढ़े यूहीं नहीं कह गए हैं। दो कामवाली रखो तो बेहतर होगा।एक छुट्टी करेगी तो आधा काम ही करना पड़ेगा।" लेकिन दो-दो माईयों से काम लेना सांझ को आफ़त लगता था। शारदा ने तो परिवार की सदस्या की तरह सारा घर संभाल लिया था।

"अरे, लेकिन शारदा छुट्टी कहाँ करती है? फिर इस जैसी ईमानदार कहाँ से लाऊंगी। देखते नहीं, चार-चार घरों की चाबियां लटकाये रहती है कमर पे। और कितनी मुश्किल से तो यह मिली है। इसके बल पर तो थोड़ा लिखना-पढ़ना हो पाता है। पति को टका-सा जवाब देकर वह निरुत्तर कर देती।

लेकिन एक दिन वह डराने वाला समय आ ही गया। शारदा के पिता बहुत बीमार थे।बचने की कोई उम्मीद न थी। शारदा ने गाँव जाने का निश्चय किया। कोई चारा तो था नहीं। "पता नहीं, कितने दिन लगेंगे भाभी। आप अपना ख्याल रखना।" सांझ के दिए पैसों को संभालती शारदा सांझ को समझाने लगी।

"तू भी अपने पिता का ध्यान रखना। वो ठीक हो जाएंगे। खूब सेवा करना।" सांझ भी शारदा को समझने लगी। नमस्ते करके शारदा चल दी। जैसे-जैसे शारदा एक-एक सीढ़ी उतरती गई, सांझ का दिल भी एक-एक काम सोचकर डूबता गया।

सांझ के कान सांझ को बहुत कुछ सुन रहे थे, "तुमने उसे आठ हज़ार रुपये दे दिए? अगर वो वापिस नहीं आई तो? किसी पर इतना भरोसा ठीक नहीं।" पति के वाक्यों ने मन थोड़ा सशंकित कर दिया।

"नहीं, शारदा ऐसी साबित नहीं होगी", सांझ का मन इस कठोर सत्य को न सुनना चाहता था और न मानना।
"और अगर हुई तो?" "तो परोपकार और मानवीयता भी कुछ अस्तित्व रखते हैं या नहीं इस संसार में? या इस संसार से ऐसे ही विदा होना है?" शायद स्वयं सांझ इस धार्मिक तर्क के आगे खुद को तसल्ली देना चाहती थी। अपनी दयालुता का नगाड़ा बजा उसने एक लम्बी चुप्पी धारण कर ली जिसके आगे किसी का बस न चला और सब निरुत्तर हो गए।

दिन बीतते गए। लगभग एक महीने से ऊपर हो चला था पर शारदा की कोई खबर न थी। वह बिल्डिंग के सभी घरों से उधार लेकर गई थी। किसी से कम तो किसी से ज़्यादा। उसका विनीत स्वभाव और ईमानदारी से मन लगाकर काम करना ही वास्तव में उसे एडवांस तनख़्वाह का अधिकारी बना पाए थे। वह गोरखपुर के पास किसी गाँव की रहने वाली थी और यहाँ वह अशोक विहार, पानी की टंकी के पास से आती थी। पते के नाम पर सब सिर्फ इतना जानते थे कि वहाँ बहुत सारे बढ़ई रहते हैं। वह सांझ के तवे का हैंडिल वहीं से लगवा कर लाई थी। नीचे वाले अंकल जी को पक्का विश्वास था कि जैसे वह धूमकेतु की भाँति अवतरित हुई थी वैसे ही सबसे पैसे लेकर तिरोहित भी हो गई। लेकिन किसी की ज़िन्दगी में इतनी फुर्सत न थी कि शारदा का घर ढूंढता। और हासिल भी क्या होता। लेकिन मन के किसी कोने को विश्वास था कि शारदा धोखा नहीं देगी।

आखिर एक दिन गली की अन्य कामवाली मालती दौड़ी-दौड़ी आई। चार मंजिल चढ़कर उसकी साँस फूल रही थी। "भाभी, शरदवा आय गई, आज ही देखा, बकसवा उठाय रोड पार कर रही थी।"उसे गए अड़तीस दिन हो गए थे। सहसा विश्वास नहीं हुआ। सोचा कि आज तो थकी होगी, कल ज़रूर आ जाएगी। सांझ कॉलेज जा रही थी। वापिस आते-आते थोड़ी देर हो गई। थोड़ी ही देर में देखती क्या है कि शारदा भी चली आ रही है।

सबके अविश्वास पर सांझ के विश्वास ने विजय प्राप्त की थी। लोगों को पहचानने की अपनी क्षमता पर उसे गर्व हो उठा।

"अरे शारदा! तू कब आई। अब तेरे पिता कैसे हैं?"

सांझ का मुस्कुराने के लिए खुला मुँह उसी स्थिति में जैसे अटक गया। उसे ऐसे रोते देख अनचाहे अनिष्ट की सोच उसका मन काँप उठा।

"हाय.. भाभी…" शारदा भुभाटे दे-देकर रो रही थी।

"अरे हुआ क्या?" अपनी प्रसन्नता में खुले होंठों को जबरन बन्द कर सांझ ने सायास बोलने की कोशिश की।

"बाबू नहीं रहे…" शारदा अपने पिता को बाबू कहकर बुलाती थी।उसके पिता किसी स्कूल में चपरासी थे और यूनिफॉर्म पहनकर ड्यूटी पर जाते थे। थोड़ा बहुत पढ़े-लिखे थे। स्कूल की ओर से रहने को कमरा मिला हुआ था। आगे-पीछे की कच्ची जमीन पर कुछ सब्जियाँ भी हो जाती थीं। सारा गाँव उन्हें "गोपाल बाबू" कहकर पुकारता है, शारदा सबको मुँह मटका-मटका कर बताती थी। "अइसन-वइसन घर की नहीं हैं हम। चंदन के पिता आय जाय तो कभी चौका-बासन न करने दें। उसके लापता हो जाने के कारण भी शारदा सबकी सहानुभूति की पात्र बनी थी। फिर पिता के संस्कारों का असर उसके आचरण में झलकता था। माँ का साया तो बचपन में ही उठ गया था। शायद यही कारण था कि शारदा बहुत सफाई और सलीके से काम करती थी। अकेली बेटी होने के कारण उसे हमेशा भाई की कमी खलती थी। उसने बेटा होने का फ़र्ज़ निबाहने के लिए ही सबसे पैसे लिए थे। चिंता बस यह थी कि उसके बाबू के इलाज़ में कोई कमी न रहे। बाबू के गुज़र जाने की खबर ने उसे हिला कर रख दिया था।

"बा….बू…, और उसका रुदन अब गला फाड़ने लगा था। रोने की आवाज़ सुनकर पास के घर से मिसेज़ सक्सेना भी आ गईं।

"आज ही तो आई। पीछे-पीछे पान वाले भइय्या के इहाँ फोन आई गवा। हाय राम! सुबह ही बाबू ने आखिरी साँस ली। मरते बखत मुझे ही पुकार रहे थे। हाय राम! ये क्या होय गवा। इधर मैं दिल्ली पहुँची, उधर बाबू राम जी के पास चल दिए। आखिरी बखत मुँह देखना भी नसीब न था। मोरी कमबखत किस्मत। एक दिन और रुक जाती तो बाबू को आखिरी बखत तो देख लेती।"

शारदा विलाप किए जा रही थी। मेरा हृदय भी द्रवित था। संभवतः वह गाँव वापिस जाना चाहती थी पर उसे किसी की हामी और मदद की अपेक्षा थी। उसके रुदन ने ऊपर-नीचे की अन्य आंटियों को भी इकट्ठा कर दिया। अच्छा ख़ासा मजमा इकट्ठा हो गया। सब सहानुभूति तो दे रहे थे पर किसी के मुँह से ये न निकला कि वह तुरन्त शाम छह बजे की गाड़ी पकड़ कर गाँव चली जाये।

"अब तो सारे पैसे भी ख़तम होए गवा। अब कौन देगा दोबारा? अभी तो पुराना उधार ही चुकाना हइ" वह धरती पर बैठकर लगातार रोये जा रही थी। उसकी धोती का पल्लू आँसुओं और बहती नाक पोंछते-पोंछते गीला हो गया था।

उसके दुख से दुखी सांत्वना के दो बोल बोलकर सब चुप थे। शारदा बीच-बीच में रुकती। शायद इस उम्मीद में कि कोई दिलासा देने के स्थान पर कुछ और कहे पर कोई कुछ न बोला। शर्मा आंटी ने पानी दे दिया। नीरजा चाय बना लाई। सांझ ने जबरदस्ती उसे एक परांठा खिला दिया। रो-धोकर शारदा चली गई। उसका अंतर्मन जैसे जान गया था कि अब छुट्टी वो भी लम्बी छुट्टी मिलना नामुमकिन है और वह सबका पैसा लेकर दोबारा जा नहीं सकती। पहले सबका लिया चुकाना है। फिर चन्दन का भविष्य तो शहर से ही जुड़ा है। कितनी मुश्किल से वर्मा जी ने अपने स्कूल में एडमिशन कराया है। उसका खाना, किताबें, वर्दी, बस्ता सभी कुछ तो दिलवा देते हैं वो।

शारदा के जाने के बाद भी काफ़ी देर तक सन्नाटा छाया रहा। पर मन में सबके यही आ रहा था, कि चलो! अब थोड़ा तो आराम आएगा जिंदगी में वापस। मिसेज सक्सेना ने आखिर सन्नाटा तोड़ा, "अरे, हम भी क्या करते। अभी अड़तीस दिन में आई है। इनके यहाँ हमारी तरह तेरह दिन का शोक थोड़ी होता है।"

"फिर?" सांझ ने जिज्ञासावश पूछा।

"अरे ये लोग तो चालीस दिन शोक मनाते हैं। जो अभी इसे भेज देते तो पचास दिन से पहले न आती। तभी तो सब चुप रहे। आखिर कब तक रगड़ें खुद बर्तन। यहाँ कोई और भी तो नहीं मिलती। पहले ही थक गए हैं।" इस सत्य से अवगत होने पर तो सांझ ने भी राहत की साँस ली।

अचानक सांझ के मन में भी कुछ उठा। कुछ ऐसा कि आज तक वह खुद पर विश्वास नहीं कर पाती। आज भी जब भी वह दर्पण में अपना चेहरा देखती है तो लज़्ज़ा से गड़ जाती है। क्या मानवीयता की दुहाई देने वाली सांझ के अंतर्मन में एक और सांझ है जो यह भी सोच सकती है?

"अच्छा हुआ आ गई। जो इसके बाबू इसके सामने मर जाते तो चालीस दिन छोड़, पता नहीं कितने दिनों की और छुट्टी हो जाती।"

सोच तो लिया पर भीतर तक वह ग्लानि से सराबोर हो उठी। "छिः", मैं अपना सुख सोच रही हूँ। शारदा का दुख एक बार भी नहीं। माँ-पिता दोनों मर गए। पति का पता नहीं...। इस दुनिया में अकेली यह हम से आस नहीं लगायेगी तो फिर किससे? और हम इस पर खुश हैं कि अब काम नहीं करना पड़ेगा?

इस बात को तेरह बरस बीत गए हैं। मनुष्य बाहर से कितना अलग दीखता है। शायद वह भी नहीं जानता प्याज़ की परतों की तरह उसके कितने रूप हैं। बहुत मुश्किल से सांझ के मन की फाँस को लिख पाई हूँ क्योंकि मैं जानती हूँ आज भी वह फाँस वहीं गड़ी हुई है। कभी-कभी सही बात के लिए अनिर्णय सारी जिंदगी का पछतावा बन जाता है। आज तक सांझ के यहाँ शारदा काम कर रही है।

आज तक सांझ यही पछताती है। काश! उस दिन शारदा को गाँव भेज देती।

1 comment :

  1. मानव मन के स्वार्थ और दुर्बलता को कितनी भली भांति उकेरा है.

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