इंडिया, भारत, हिन्दुस्तान

जीतेन्द्र भटनागर

- जीतेन्द्र भटनागर


आजकल कहा जाने लगा है कि इंडिया और भारत दो अलग अलग देश हैं। इंडिया शहरों में बसता है और भारत कस्बों और ग्रामों में। मतलब शायद यह है कि शहरी नागरिक संभ्रांत परिवारों के अँग्रेज़ी में पारंगत एवं सभ्य होते हैं जबकि ग्रामों के नागरिक अधिकतर कम आय वाले अँग्रेज़ी न जानने वाले व असभ्य। इंडिया और भारत के बीच का फासला इतना अधिक है कि उसे पार कर पाना कठिन है। फिर भी, कोशिश तो करनी ही है और की भी जा रही है। दोनों ओर के निरंतर प्रयास से किसी हद तक सफलता मिली भी है।

जैसा कि हर आंदोलन में होता है, इस ओर भी पहला कदम युवा वर्ग ने अपने शिक्षकों के नेतृत्व में पाठशालाओं से प्रारंभ किया। शहरी छात्र कॉनवेंट पब्लिक स्कूलों में पढ़ कर फ़र्राटेदार अँग्रेज़ी बोलने लगते हैं जबकि ग्रामीण स्कूलों में पढ़ने वाले पौना, सवाया, ड्योढ़ा आदि के पहाड़े रट कर अंकगणित में भले ही माहिर हो जाते हों, अँग्रेज़ी समझना या बोल पाना उनके बूते में नहीं होता। इस दूरी को पाटने के लिए दोनों ही फ्रंट पर लड़ना ज़रूरी था जो हमारे शहरों और ग्रामों के शिक्षाविदों ने बखूबी किया। सबसे पहले तो गाँव गाँव में कॉनवेंट पब्लिक स्कूल खोले गये। मेरे अपने गाँव में भी जैहिन्द स्कूल के स्थान पर सेंट एस. आर. कॉनवेंट पब्लिक स्कूल स्थापित किया गया - सेंट एस. आर. यक़ीनन संत सीता राम रहे होंगे - जिसमें बच्चों के लिए स्कूल की यूनिफॉर्म, मई जून की उबलती गर्मी में भी, टाई सहित पहनना अनिवार्य था। इस प्रकार गाँव और शहर के बीच की दूरी पर प्रहार किया गया। शहरी कॉनवेंट की तर्ज़ पर यहाँ भी गिनती हिन्दी के स्थान पर अँग्रेज़ी में सिखाई जाने लगी और पहाड़ों का स्थान ले लिया टेबल्स ने। नतीजतन बच्चे उनसठ और उनहत्तर समझना भूल गये। अब समझने लगे फिफ्टी-नाइन और `सिक्सटी-नाइन। दो ईकम दो के स्थान पर टू वंज़ा टू तो सीख लिया पर यह न जान पाए कि 'वंज़ा' होता क्या है। मम्मी, पापा, अंकल, आंटी सीख कर भी इंडिया और भारत के बीच की दूरी कम करने में अच्छी ख़ासी सफलता प्राप्त की।

इस दिशा में शहरी शिक्षकों का योगदान भी सराहनीय रहा। उन्होंने अपने शिक्षण का स्तर गाँव के शिक्षकों के स्तर पर ला खड़ा किया। अब शहर का छात्र फख्र के साथ कह सकता था कि 'बेटा, ये मत सोचना कि सिर्फ़ तू ही अँग्रेज़ी के एक वाक्य में चार ग़लतियाँ कर सकता है। पीछे हम भी नहीं हैं'। चिंता का विषय सिर्फ़ यह है कि कुछ नागरिक इस राष्ट्रीय लक्ष्य से भटक कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दुस्तान व पाश्चात्य देशों का अंतर मिटाने में व्यस्त हैं। क्या उनका कर्तव्य यह नहीं है कि इन्फर्मेशन टेक्नॉलॉजी व अंतरिक्ष जैसे विषयों पर व्यर्थ समय नष्ट ना करके वे भारत के समीप जाने के प्रयास में जुट जाएँ?

गाँव के वयस्कों ने उत्साह के साथ अपने बच्चों का साथ दिया। पुरुषों ने सदियों से चला आने वाला भारत के मौसम के अनुकूल पहनावा धोती-कुर्ता त्याग कर कमीज़-पतलून पहनना शुरू कर दिया। महिलाएँ भी कहाँ पीछे रहने वाली थीं। वे लहंगा-चोली छोड़ सलवार-कमीज़ पहनने लगीं। उनसे भी बड़ा योगदान उनकी बेटियों का रहा। वे सलवार कमीज़ से आगे निकल कर जीन्स व टॉप पहनने लगीं। भारत इंडिया के थोड़ा और करीब आ गया।

इंडिया के युवाओं के भारत के नज़दीक जाने की मुहिम में कपड़ा व्यापारियों ने खूब साथ दिया। विदेशों से अथाह संख्या में चीथड़े आयात कर बड़ी सफाई से उन्हें धोकर नाम दिया 'स्टोन वॉश'। इन कपड़ों को इंडिया के सभ्य युवक युवतियों ने नये से कई गुना अधिक कीमत दे कर हाथों हाथ उठाया। अब सभ्य भी फटे कपड़े पहनने लगे। इंडिया भारत के करीब आ पहुँचा।

रही-सही कसर टीवी ने पूरी कर दी। गाँव का युवा वर्ग, जो पैसे खर्च करके हॉल में सिनेमा देखने में असमर्थ था, अब दिन भर टीवी पर हिन्दी और अँग्रेज़ी (समझ में क्या खाक आएँगी) फिल्में देख कर, अपने शहरी भाई-बहनों की तरह, नित नये फैशन करने के लिए लालायित हो उठा।

आज़ादी के बाद इंडिया को बड़ी-बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इनमें सबसे बड़ी चुनौती थी सड़कों की जिसका बड़ी कुशलता से सामना करते हुए इंडिया की नगरपालिकाओं ने सत्तर वर्ष के अल्प समय में ही अपनी सड़कों को भारत की सड़कों के मुक़ाबले में खड़ा कर दिखाया। अब इंडिया और भारत दोनों की सड़कें समान रूप से गड्ढों से लैस व गंदगी से भरी हुई हैं। साफ सुथरी नदियों को बदबूदार नालों में बदलने जैसा कठिन कार्य भी बड़ी आसानी से पूरा करके एक अंतर और मिटा दिया।

भारत और इंडिया के बीच का अंतर दूर करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाया इंडिया के सभ्य संभ्रांत परिवारों की महिलाओं और बेटियों ने। मेरे बचपन में गाँव में पुलियों पर बैठना बुरा माना जाता था। बुजुर्ग कहते थे कि पुलियों पर शोहदे बैठते हैं। अब इंडिया के शहरों में महिलाएँ और उनकी बेटियों ने पुरषों के अन्य कर्मक्षेत्रों में सेंध लगाने के साथ साथ यह काम भी, यक़ीनन भारत के करीब जा पाने के लिए, अपने ऊपर ले लिया है।

निश्चय ही हमारी अगली पीढ़ी भारत और इंडिया को पूर्णतया एक करने में सफल होगी।

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