लघुकथाएँ: शशांक मिश्र भारती

शशांक मिश्र भारती

हिन्दी सदन, बड़ागांव, शाहजहांपुर 242401 (उत्तर प्रदेश) 
चलभाष: +91 941 098 5048 / +91 963 462 4150

निरुत्तर

आजकल यह बड़ी समस्या है कि कोई चीज मांगने में दे दो तो वापस नहीं मिलती। मेरे समझदार पड़ोसी ने तोड़ निकाला। एक दिन जब उनके मित्र कोई पुस्तक मांगने आये तब उन्होंने कहा देखो भाई मुझे पुस्तक देने में कोई परेशानी नहीं है पर शर्त यह है कि पुस्तक यहीं बैठकर पढ़नी पड़ेगी। मित्र ने कहा कोई बात नहीं। पुस्तक ली, वहीं बैठकर पढ़ी और अपने घर चले गये।

कुछ दिनों के बाद मेरे पड़ोसी को झाड़ू की आवश्यकता पड़ गयी। उन्हीं मित्र के यहाँ मांगने पहुँचे। मित्र ने कहा देखो झाड़ू देने में मुझे कोई ऐतराज नहीं, मित्र ही तो मित्र के काम आता है। पर एक शर्त है कि झाड़ू यहीं इस कमरे में लगानी पड़ेगी।

मेरे पड़ोसी निरूत्तर। कुछ बोलते न बन रहा था।

नहले पे दहला

कवि की मानसिक दशा कुछ ठीक न थी। एक दिन किसी डाक्टर के यहाँ गये अपनी समस्या बतलायी। डाक्टर बोला ठीक है यहां बैठ जाइए और सोचते रहिए कि डाक्टर आया है। हाल चाल पूछ रहा है। दवा दे रहा है।

डाक्टर अन्दर चला गया और अपने मित्रों के साथ गप्प लड़ाने लगा। इधर कवि जी को प्रतीक्षा करते-करते काफी देर हो गयी तो उठे और चलने को हुए। तब तक डाक्टर आ गया और बोला, महोदय मेरी फीस तो देते जाइए

कवि जी ने कहा खड़े होकर सोचते रहिए कि मैं फीस दे रहा हूँ।

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