कविता: बुझते दिये

कृष्णकांत तिवारी

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बुझते दिये सी जिन्दगी मेरी चलती रही।
एक नए उत्साह में जिन्दगी कटती रही॥

अर्थाभाव में जिन्दगी की डोर सिमटती रही।
जिसमें हर अपनों की चाह भी सिमटती रही॥

हर ख्वाब को समेटकर जिन्दगी चलती रही।
नए युग की शुरूआत के लिए जिन्दगी तरसती रही॥

क्या कभी अपना भी वह दिन आयेगा।
जब हर कोई मुझे भी गले लगायेगा॥

जिसके लिए यह जिन्दगी चलती रही।
हर स्वांश जिसकी उम्मीद में चलती रही॥

मैं आवारा इस दुनिया की भीड़ में।
ढो रहा अपने को इस जिन्दगी की नीड़ में॥

स्वयं पर विश्वास कम होने लगा।
तब आप पर विश्वास बढने लगा॥

मैं इस भीड़ में भीड़ बनकर दौड़ रहा।
हर कोई अपना भी हमें अपरचित सा देख रहा॥

ऐ मेरे ईश क्या मेरा भी दिन आयेगा।
जिन्दगी का नया सवेरा मुझे हँसायेगा॥

इस स्वर्गिक दुनिया में क्या मैं भी चहक पाऊँगा।
इस घुप अंधेरे से बाहर निकल पाउँगा॥

घुप अंधेरे में जिन्दगी मेरी जा रही।
आश की हर डोर टूटती जा रही।

असहाय सा खड़ा जिन्दगी का तमाशा देख रहा।
घायल पंख से आकाश नापता रहा॥

इस घायल पंख में अब शक्ति नहीं।
इस मरुभूमि में वन उगा सकता नहीं॥

अब और मैं परीक्षा दे सकता नहीं।
न सोच मैं तुमसे लड़ सकता नहीं॥

है हौसला इस घायल पंख से अभी गगन में उड़ जाने का।
हर वह अवरोध तोड़कर आगे बढ़ जाने का॥

अब और मैं जुल्म सह सकता नहीं।
अपने पथ से पग पीछे कर सकता नहीं॥

आश की डोर अभी टूटी नहीं।
बुझते दिये कि लौ अभी टूटी नहीं॥

अब बुझता दिया फिर जल जायेगा।
और तू तमाशबीन बन देखता रह जायेगा॥

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