काव्य: आरती 'अशेष' चितकारिया

आरती अशेष
- ( 1 ) - 

इस धरा पर हर मनुज का आचरण,
चाह के अनुकूल हो सम्भव कहाँ।
भाव मन के और तन का आवरण,
चाह के अनुकूल हो सम्भव कहाँ।।

भिन्नता होती सदा परिवेश में;
भोर के रवि, सान्ध्य के राकेश में,
मौसमों में, प्रकृति के उन्मेष में;
स्नेह में, अनुराग में, आवेश में,
रात्रि का अवसान, दिन का जागरण।
चाह के अनुकूल हो सम्भव कहाँ।।

व्योम की चारों दिशाएँ भिन्न हैं;
सोम की सोलह कलाएँ भिन्न हैं,
भिन्नताएँ रूप गुण आकार में;
धारणा मत मान्यताएँ भिन्न हैं,
सृष्टि के हर जीव का चिन्तन- मनन।
चाह के अनुकूल हो सम्भव कहाँ।।

कहीं समतल कहीं दुर्गम पथ यहाँ;
कहीं मरुथल कहीं सघन हरीतिमा,
दृष्टि के सीमान्त तक सागर कहीं ;
कठिन पर्वत कहीं उर्वर घाटियाँ,
ओ पथिक! इस यात्रा का हर चरण।
चाह के अनुकूल हो सम्भव कहाँ।।

दुःख कभी सुखमय यही सँसार है;
लोक में सब भाँति का व्यवहार है,
है असीमित हर्ष का सञ्चार तो,
कभी अतिशय वेदना का भार है;
सर्वदा आनन्दमय वातावरण।
चाह के अनुकूल हो सम्भव कहाँ।।

है असम्भव जग हमारी गति बहे;
और स्वागत को सदा आतुर रहे,
जो मिले मन के सदा अनुकूल हो;
यदि कहे कोई अपेक्षित ही कहे,
संप्रेषणा अभिव्यक्ति भाषा-व्याकरण।
चाह के अनुकूल हो सम्भव कहाँ।।

जी लिए हैं चाहतों के पल कई;
ढल रही है साँझ अब तो सुरमई,
हैं हृदय में शेष अभिलाषा अभी;
कुछ अधूरी, कुछ पुरानी, कुछ नई,
किन्तु उर की कामना का प्रस्फुटन।
चाह के अनुकूल हो सम्भव कहाँ।।

- ( 2 ) - 

खो गए अवकाश के दिन, व्यस्तताएँ शेष हैं।
मौन है अभिव्यक्ति मन की, बाध्यताएँ शेष हैं।।

चल रहे हैं हम निरर्थक, ज़िन्दगी की राह पर।
खो गए हैं अर्थ केवल, व्यर्थताएँ शेष हैं।।

मृत हुई संवेदना, सदभावनाएँ मिट गयीं।
मात्र राग विराग, तृष्णा कामनाएँ शेष हैं।।

अब समर्पण का, न कोई मूल्य है अनुराग का।
आस्था विश्वास की, केवल कथाएँ शेष हैं।।

ज्वार उतरा है प्रणय का, भावना के सिन्धु से।
समय तट पर अब विरह की, वेदिकाएँ शेष हैं।।

वह कदाचित जानता, सम्वाद से आगे कभी।
मूक अधरों पर थमी, कितनी व्यथाएँ शेष हैं।।

है बहुत दुष्कर मिटा पाना, किसी भी यत्न से।
हृदय में अब जो असीमित, रिक्तताएँ शेष हैं।।

1 comment :

  1. वाह वाह वाह बहुत ख़ूब
    मूक अधरों पर....वाह
    चाह के अनकूल हो संभव कहाँ .....

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