नवाचार का उद्घोष करती काव्य कृति - 'नव अर्श के पाँखी'

समीक्षक: उर्मिला प्रकाश मिश्र, भोपाल

पुस्तक: नव अर्श के पाँखी
रचनाकार: अनुपमा श्रीवास्तव 'अनुश्री'
प्रकाशक: संदर्भ प्रकाशन, भोपाल
प्रष्ठ संख्या: 152
मूल्य: 250₹

जयशंकर प्रसाद में लिखा है कि कविता करना अनंत पुण्य का फल है। कवि अपनी कविताओं के साथ एक होता है। वह शब्द चुनता है और उसके द्वारा डाले गए शब्द बीजों को जब मिट्टी, पानी और सूरज का स्पर्श मिलता है तो वे शब्द, विचारों के रंगों और भावनाओं की सुगंधियों में भीग जाते हैं और एक अद्भुत काव्य संसार रचते हैं। अनुपमा श्रीवास्तव 'अनुश्री' द्वारा काव्य कृति संज्ञा 'नव अर्श के पांखी' एक बृहतर परिदृश्य का विस्तृत संसार है। कविताओं में मूल्य-दृष्टि, विचारधारा और नैतिक चेतना का विकास है। अनुश्री की जीवन धर्मी कविताएँ अपनी शक्ति और सीमा का अलग-अलग एहसास कराती हैं।

अनुपमा 'अनुश्री'
समय के महत्वपूर्ण सरोकारों और सवालों से टकराती कविताएँ भारतीय आधुनिकता की संश्लिष्ट चेतना का प्रमाण है। कविताओं में समय, समाज और देश की चिंता के साथ भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति भी गहन लगाव है। इस काव्य संग्रह में वैविध्यमय उलझन से भरे, साथ सुनहरे रंग-बिरंगे जीवन दिखाई देते हैं। जहाँ अनुश्री कहती हैं :-

इस सुनहरी आभा को
उतार लेना चाहती हूँ अपने दिल में
और रंग देना चाहती हूँ
धरा को प्रेम के रंग में।

कविताओं में द्वन्दात्मक सामंजस्य एवं जीवन की संलग्न विभिन्न समस्याओं के संकेत हैं और जीवन की गहराइयों में पैठती भावनाओं की अभिव्यक्ति है:-

अमूर्त को मूर्त करती भावनाओं से
कभी पत्थर का बुत जिंदगी
शंख ध्वनि सी गुंजित
 कभी डरी सहमी सी जिंदगी
विरोधाभास से गुजरती
 नए एहसासों से उलझती- सुलझती जिंदगी।

प्रस्तुत काव्य संग्रह में जहाँ कवयित्री के ह्रदय में छुपी हुई भावुक संवेदना है, वहीं प्रकृति की विराटता भी है।
'मीठी सी धूप' कविता में 'अनुश्री' प्रकृति के साथ सुखद मानव जिंदगी के लिए ईश्वर से कुछ इस तरह प्रार्थना करती हैं :-

यह आनंदोत्सव यूं ही रहे ठहरा
तन-मन, धुला-धुला निखरा
परिवेश रहे सजा-संवरा
हो इस तरह खुदा की बंदगी
खिलखिलाती रहें सब की जिंदगी।

 कविताओं में जहाँ जीवन- मृत्यु के दर्शन की निसंग दबंगता है, वहीं उद्दात अध्यात्मिक भाव तक ले जाने का प्रयास भी अनुश्री ने किया है। आधुनिक समस्याओं के झंझावातों के बीच अध्यात्मिकता के फर्श पर खड़े रहना आसान नहीं होता, लेकिन उन्होंने उसका निर्वहन भी बड़ी सहजता से किया है :-

अंधकार की कारा से
नया नूर रोशन हुआ
 ज्योतिर्मय जीवन
 संपूर्ण हुआ।

इस संग्रह की कई कविताएँ नारी जाति के संघर्ष के साथ उनमें आत्मबल जागृत करने की प्रेरणा देती हैं:-

शक्ति स्वरुपा अपनी कमज़ोरियों का दहन करो
अपनी अंतर्निहित शक्तियों का आवाहन करो।

यह काव्य संग्रह में स्त्री सामर्थ्य के जागरण का उद्घोष करने वाली रचनाएँ हैं। नारी जागरण, नारी सशक्तिकरण के युग में नारी शक्ति को पूर्ण रूप चेतन्य करने का कवयित्री ने प्रयास किया है।

अंतरंग की अनुभूतियाओं को प्रतिबिंबित करती कविताएँ ऐसे काफिले के मुसाफिर का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो मंजिल की तलाश में है। प्रथम रचना से लेकर अंतिम रचना तक काव्य यात्रा के सभी पड़ावों में संवेदनाओं का संस्पर्श है। अनुश्री की जीवन दृष्टि में जो वक्रता है वह कविता को बल देती है। सभी रचनाएँ अंतर्मन को छूती है और पठनीय हैं।

भविष्य में लेखन क्षेत्र में नये मुक़ाम हासिल करने हेतु अपने हृदय की गहराइयों से मैं कवयित्री को अनंत शुभकामनाएँ देती हूँ। इति शुभम।

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