व्यंग्य: आदमी के बच्चे

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

सदियों पुरानी बात है तब धरती लोक नहीं था। इंद्र राज्य बढ़ाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई। वहाँ दसों दिशाओं से आए चमचे जमा थे। चमचे दैनिक भत्ता लेने और हाँ जी, हाँ जी करने आए थे। इन्द्र धरती को विकसित करना चाहते थे। उन्होंने हजारों देवताओं के तबादले धरती लोक में कर दिए थे पर देवता लावारिस संतान नहीं थे, उन्होंने तिकड़में भिड़ाईं और तबादले रद्द करवा लिए। एक बेचारे मनु ही ऐसे थे, जिनकी कोई एप्रोच नहीं थी। उनके पास दो-चार लाख रुपए भी नहीं थे। सो उनको बोरिए-बिस्तर समेत ‘पैराशूट’ से नीचे पटक दिया गया था।

बैठक शुरू हुई। गृहमंत्री ने निवेदन किया कि धरती के विकास के लिए देवताओं को सजा न दी जाए। धरती घरेलू साधनों से विकसित हो यानि वहाँ के निवासी वहीं बने। दरबारी प्रसन्न हो गए। उन्होंने प्रसन्नता में डमरू बजाए। विधाता ने सुझाव दिया, सरकार कहे तो दस-बीस लाख आदमी ठेके में बनवा लें। धरती पर जाएंगे तो भी इन्द्र के गुण गाएंगे। यह प्रस्ताव सुन कर वहाँ के सार्वजनिक निर्माण वालों को नानी-दादी याद आ गईं। उन्होंने आदमी की जगह हैरतअंगेज़ नमूना बनाने की योजना रखी। उन्होंने प्रस्तावित आदमी का ऐसा मॉडल बनाया कि वह ऑटोमेटिक आदमी पैदा कर सके। इस तरह हमेशा आदमी बनाने की झंझट से वे बच गए। अपनी सत्ता का वर्चस्व रखने हेतु विधाता ने आदमी को मारने के लिए यमदूतों की भरती का सुझाव रख दिया।

सारी बहस में एक जोकरनुमा बड़बोले देवता उपेक्षित हो रहे थे। उन्होंने ढोल पर थाप मार कर सब देवताओं का ध्यान आकर्षित किया और कहा, “भगवन् आदमी एक मुश्त में नहीं बनना चाहिए। वह पहले एक बालिश्त का हो, फिर दो बालिश्त का, फिर तीन का। वह टुकड़ों-टुकड़ों में बड़ा बने। बड़ा मजा आएगा भगवन्। इससे देवता और आदमी में कुछ अन्तर भी रहेगा। भगवान उनकी बात मान लेंगे तो वे अपनी दाढ़ी कटा कर बाल देवी के चरणों में अर्पित कर देंगे।”

एक युवातुर्क देवता खड़े हुए। उन्होंने कहा दस साल की उम्र तक आदमी बच्चा रहेगा। फिर किशोर कहा जाएगा। सत्रह साल में युवा हो जाएगा और अठारह साल के बाद वोट देने के काम आएगा। साथ ही कुछ आदमी सदाबहार युवा रहेंगे और कुछ सदा बाहर रखे जाएंगे। वे विपक्ष और पक्ष की तरह बच्चा और आदमी दो समूह चाहते थे। इंद्र ने बीच-बचाव करते हुए कहा, बच्चे आदमी को रात-दिन परेशान रखेंगे। सुख-चैन नहीं लेने देंगे। बड़ी आफ़त हो जाएगी उसकी। विपक्षियों ने नगाड़े बजाए और कहा, यही चाहिए, यही चाहिए, आदमी आफ़त का मारा ही होना चाहिए। उसके बच्चे होना चाहिए। रोबीली मूँछों वाले देवता ने कहा बच्चों की मूँछें नहीं होना चाहिए, तो पहलवान छाप देवता ने कहा बच्चे दुबले-पतले होना चाहिए, ताकि वे बड़ों से डर सकें। बड़े लोग उन्हें मार-पीट सकें। दरवाज़े की डेरी में दचक सकें। चुनाव आयुक्त ने कहा, बच्चे होंगे तो धरती पर बड़े-बड़े जुलूस निकलेंगे। भाषण के लिए भीड़ जुट जाएगी। चुनाव प्रचार में बच्चे वाहन और भोंगों का काम करेंगे। बच्चे आन्दोलन करने के काम आएंगे। बड़े लोग बच्चों के नाम पर काम करवा लेंगे। बच्चे होंगे तो क़ानून और व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी।

वातावरण में गर्मी आ गई। आय. जी. ने अपनी थीसिस रखी। उन्होंने कहा मनुष्य शांति से नहीं रह सके, इसलिए हम दानवों की तरह कुछ दुष्ट आदमी बनाएंगे। वे बच्चों को उड़ाएंगे। उनकी ख़रीद फरोख़्त करेंगे। उनको लूला-लंगड़ा, अंधा कर देंगे और उनसे भीख मँगवाएंगे। चोरी करना सिखाएंगे। मैं जानता हूँ अपने डिपार्टमेंट वालों को। दुष्ट आदमियों को पकड़ना उनके बलबूते की बात नहीं है। इसीलिए आदमी हमेशा परेशान रहेगा ख़ुद के बच्चों से। सदन ने तालियों की गड़गड़ाहट से इस प्रस्ताव का भी स्वागत किया।

श्रममंत्री ने घोर आपत्ति की। वे बच्चों के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा आदमी के बच्चे नहीं होना चाहिए। स्वर्ग में छोटे-बड़े सब काम देवताओं को ही करना पड़ते हैं। बच्चे होंगे तो आदमी के छोटे-मोटे काम वे कर लेंगे। मसलन बच्चे कंट्रोल की दुकान पर लाइन लगाएंगे। सब्ज़ी-भाजी और किराना ख़रीद लाएंगे। दूध ले आएंगे, वक़्त-बेवक़्त चाय बना देंगे। मेहमानों का मनोरंजन कर देंगे। ग़रीबों के बच्चे होटलों में कप-बसी धोकर माँ-बाप की मदद करेंगे। बच्चे होंगे तो आदमी राजाओं जैसे ठसके करेगा। सदन की कार्रवाई में श्रममंत्री के विचार भी नोट कर लिए गए।

रसदमंत्री भी खड़े हुए। वे सिर्फ़ बहस में हिस्सा लेकर अख़बार में अपना नाम छपवाना चाहते थे। उन्होंने कहा, अनाज पैदा करने के लिए धरती के लोगों को मेहनत करनी पड़ेगी। हम उन्हें इन्द्र का महत्त्व समय-समय पर समझाते रहेंगे। कभी अतिवृष्टि होगी, कभी सूखा हो जाएगा। आदमी भले ही भगवान के नाम पर बच्चे पैदा करता रहे, उनका पालन-पोषण बराबर नहीं कर पाएगा।

बेचारे शिक्षामंत्री राजनीति के मारे थे। वे सद्भावना मंडल के चेयरमैन भी थे। उन्होंने कहा हम बच्चों को पढ़ाने के बहाने स्कूल खोलेंगे। स्कूलों में मास्टर रहेंगे। वे आलतू-फ़ालतू काम प्राथमिकता के आधार पर करेंगे। गाँव-गाँव में राजनीति करेंगे। इससे राजनेताओं को फ़ायदा मिलेगा। वे स्कूलों का अनुदान जीम जाएंगे। पार्टी फंड बना कर प्रजातंत्र को ज़िन्दा रखेंगे। बच्चे नहीं होंगे तो राजनीति नहीं होगी। फिर शिक्षक बच्चों को चंदा माँगना सिखाएंगे ताकि बच्चे बड़े होकर विदेशों में ग्रांट और फॉरेन करंसी में भीख माँग सकें। वैसे छुट्टियों में बड़े बच्चे टाटपट्टियाँ बनाएंगे और छोटे बच्चे गाजर घास उखाड़ने का काम करेंगे। बच्चे देश की दौलत होंगे, इसलिए बच्चों का प्रस्ताव स्वीकृत किया जाना चाहिए। और इन्द्र सभा ने ध्वनि मत से ‘आदमी के बच्चे’ प्रस्ताव पास कर दिया।
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