नागार्जुन की काव्यकला

- नीरज

“नागार्जुन की कविता को कैसे समझा जाए? यह सवाल उनकी कविता के संदर्भ में कुछ अटपटा सा लग सकता है। क्योंकि आम तौर पर उनके बारे में प्रचलित धारणा यही है कि वे बेहद सरल और सीधी होती हैं और इसलिए अलग से किसी टिप्पणी या व्याख्या की अपेक्षा नहीं रखती। इसका एक परिणाम यह हुआ कि नागार्जुन की कविता को गम्भीरता से समझने तथा सही परिप्रेक्ष्य में रखकर उसका मूल्याँकन करने की कोशिश बहुत कम हुई है।”[1]  ऐसा कहते हुए- कवि केदारनाथ सिंह बिलकुल सही थे क्योंकि समय-समय पर हिंदी के तमाम आलोचक एवं विद्वान उन्हें किसी न किसी वाद या प्रवृति में बाँधने की कोशिश करते रहे है। किसी ने उपयुक्त शब्द के अभाव में उनकी कविता को ‘तात्कालिक कविता’ कहा तो किसी ने ‘अख़बारी कविता’, किसी ने ‘राजनीतिक चेतना’ का कवि कहा तो किसी ने ‘मूलतः ग्रामीण चेतना’ का कवि ही कह डाला। मेरा मानना है कि किसी भी कवि के काव्य परिसर का निर्धारण करते हुए हमें इस तरह की जल्दबाज़ियों से बचना चाहिए। दरअसल, नागार्जुन का काव्य क्षेत्र इतना सीमित नहीं है, कि उसे किसी एक पंक्ति के द्वारा परिभाषित करने का जोखिम उठाया जाए। नागार्जुन की कविता की दुनिया बहुत व्यापक है। उनकी यह व्यापकता न केवल काव्य विषय बल्कि उनकी काव्य भाषाओं में भी दिखाई देती है। यहाँ उनकी इसी व्यापकता पर थोड़ी नज़र डालने की कोशिश की गयी है।

नागार्जुन के काव्य को समझने के क्रम में उनके जीवन को समझना कुछ हद तक सहायक हो सकता है। नागार्जुन जीवन भर अन्याय, दरिद्रता, भूख और अभावग्रस्तता जैसी चीज़ों से लड़ते रहे। अपने जीवन में उन्होंने ख़ूब यात्राएँ की- बौद्ध भिक्षु के रूप में श्रीलंका तक गए। मार्क्सवादी पार्टी एवं प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुड़े। कई बार जेल भी गये। उनके जीवन की इस अभावग्रस्तता, यात्रीपने एवं बौद्ध तथा मार्क्स की विचारों की छाया को उनके काव्य में भी दूर तक देखा जा सकता है। अकबर के समाज में रहते हुए तुलसी ने जीवनसम्बंधी अभाव और अपमान के संदर्भ में लिखा था--

“मातु-पिता जग जाइ तज्यो विधिहूँ न लिखी कछू भाल भलाई
नीच, निरादर भाजन, कादर, कूकर-टूकन लागि ललाई।
...
बारे तें ललात- बिललात द्वार-द्वार दीन...[2]

इसके बाद बीसवीं सदी में- नेहरु के स्वतंत्र भारतीय समाज में रहते हुए कवि नागार्जुन लगभग इसी अभाव और अपमान को फिर से लिखते है—

मानव होकर मानव के ही चरणों में मैं रोया!
दिन बाग़ों में बीता रात को पटरी पर मैं सोया !
कभी घुमक्कड यार-दोस्त से मिलकर कभी अकेले—
एक-एक दाने की ख़ातिर सौ-सौ पापड़ बेले ![3]

किंतु दोनों के लिखने में फ़र्क़ है। तुलसी जहाँ दुःख का कारण विधि के विधान को मानते है वहीं नागार्जुन इसे राजनीतिक- सामाजिक चालबाज़ियों से जोड़ कर देखते है। जीवन का यह दुःख और अभाव नागार्जुन के यहाँ बार बार उभरता है— सामाजिक तथ्य के रूप में नहीं बल्कि सघन अनुभव के रूप में। 

नागार्जुन ने देशी से लेकर विदेशी राजनेताओं और उनकी राजनीति पर ख़ूब लिखा है। गांधी, विनोबा, नेहरु, इंदिरा, लालू, माया और जयप्रकाश से लेकर माओ, लेनिन, स्टालिन तक सभी पर लिखा। किंतु उल्लेखनीय यह है कि उन्होंने किसी की भक्ति नहीं की। जहाँ एक तरफ़ ‘शपथ’ कविता में गांधी के प्रति श्रद्धापूर्वक लिखा—

हे भारत के परम पिता, तुम
व्यक्ति-व्यक्ति के मन-मंदिर में विद्यमान हो
निविड तिमिर में देव, तुम्हीं जाज्वल्यमान हो...[4]

वहीं दूसरी तरफ़ नेहरु के प्रति आक्रामक होते हुए लिखते हैं—
वतन बेचकर पंडित नेहरू फूले नहीं समाते हैं
बेशर्मी की हद है, फिर भी बातें बड़ी बनाते हैं।[5]

********************

झुकती स्वराज्य की डाल और
तुम रह जाते दस साल और।[6]

इमर्जेंसी लागू होने पर इंदिरा के प्रति लिखते हैं—
इन्दु जी इन्दु जी क्या हुआ है आपको
बेटे को तार दिया बोर दिया बाप को
क्या हुआ आपको ?[7]

इसी प्रकार माओ तथा जयप्रकाश आदि तमाम राजनेताओं की जन विरोधी नीतियों के विरुद्ध कविताएँ लिखी। उनकी नज़र से कोई भी प्रमुख राजनेता नहीं बच सका, उन्होंने सब कर अपनी आलोचनात्मक क़लम चलाई। 

 रामविलास शर्मा ने प्रेमचंद के उपन्यासों को लेकर कहा था कि, उनके आधार पर बीसवीं सदी के औपनिवेशिक भारत का सामाजिक इतिहास लिखा जा सकता है। इसी बात को प्रो० मैनेजर पांडेय ने नागार्जुन के संदर्भ में लिखा कि, “नागार्जुन की कविता के आधार पर 1940 के बाद के भारतीय समाज की राजनीतिक चेतना का इतिहास लिखा जा सकता है।”[8]  इस कथन में आगे जोड़ते हुए कहा जा सकता है, कि उनके काव्य में राजनीतिक चेतना के साथ-साथ हर वह विषय भी शामिल है जिसका सम्बन्ध आम जनता से है। नागार्जुन स्वयं को जनकवि कहते है। उनकी काव्य पंक्तियाँ हैं—

जनता मुझ से पूछ रही है, क्या बतलाऊँ
जनकवि हूँ मैं साफ़ कहूँगा, क्यों हकलाऊँ ?[9]

आम जनता का दुःख उन्हें काव्य रचना के लिए निरंतर प्रेरित करता था। इस दुःख के पीछे राजनीतिक नीतियाँ हों या पूँजीवादी एवं शहरी वर्ग की मानसिकता— सभी पर नागार्जुन ने तीखे स्वर में लिखा। आज़ादी के बाद के हिंदुस्तान की तस्वीर बनाते हुए नागार्जुन लिखते हैं—

देश हमारा भूख नंगा
घायल है बेकारी से
मिले न रोजी- रोटी भटके दर- दर बने भिखारी से।[10]

इसी हिंदुस्तान में भूख से जूझता दुखहरन मास्टर भी है, जिसके हाथों में आदम के नए साँचे (नई पीढ़ी) गढ़ने की ज़िम्मेदारी दी गयी है—

बरसा-बरसा कर बेबस बच्चों पर मिनट-मिनट में पाँच तमाचे
इसी तरह दुखहरन मास्टर गढ़ता आदम के सांचे।[11]

वर्तमान जीवन में व्याप्त व्यवस्थाजन्य विषमता, दुःख, शोषण, युद्ध, हिंसा, अन्याय और अत्याचार के लिए संभ्रांत वर्ग की आलोचना करते हुए लिखते है—

कैसा लगेगा तुम्हें ?
जंगली सुअर यदि ऊधम मचाए
तहस-नहस कर डाले फ़सलें[12]

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ज़मींदार हैं, साहूकार हैं,बनिया हैं, व्यापारी हैं
अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी हैं[13]

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खादी ने खटमल से अपनी साँठ-गाँठ कर डाली है
बिड़ला, टाटा, डालमिया की तीसों दिन दिवाली है[14]

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वे लोहा पीट रहे हैं, तुम मन को पीट रहे हो
वे पत्थर जोड़ रहे हैं, तुम सपने जोड़ रहे हो[15]

इस प्रकार की कविताओं में उन्होंने असाधारण व्यंग्य शैली का इस्तेमाल किया है, जिसके लिए उन्हें आज तक याद किया जाता है। नामवर सिंह जहाँ नागार्जुन को ‘कबीर के बाद दूसरा सबसे बड़ा व्यंग्यकार मानते हैं’[16] वहीं प्रो० गोबिंद प्रसाद लिखते है कि, “नागार्जुन का व्यंग्य रामबाण है। जहाँ कोई हथियार काम न आता हो या जब सब हथियार चुक जाते हैं तब बाबा अपना व्यंग्य का यह शुदर्शन चक्र चलते हैं और दुश्मन को मंद हास के साथ धराशायी करते हैं। लेकिन ऐसा कतई नहीं है कि विशुद्ध राजनीतिक चेतना से लैस और सत्ता व शासन तंत्र से सम्बंधित कविताओं में ही वे व्यंग्य के अस्त्र का इस्तेमाल करते है। प्रकृति और गाँव-शहर से जुड़ी कविताओं में भी व्यंग्य का यह स्वर दिखाई देता है।”[17]

गाँव और शहर पर लिखी उनकी व्यंग्य कविता का उदाहरण—

दूध-सा धुला सादा लिबास है तुम्हारा
निकले हो शायद चौरंगी की हवा खाने
बैठना है पंखे के नीचे, अगले डिब्बे मैं
ये तो बस इसी तरह
लगाएंगे ठहाके, सुरती फाँकेंगे
भरे मुँह बातें करेंगे अपने देस कोस की
सच सच बतलाओ
अखरती तो नहीं इनकी सोहबत?
जी तो नहीं कुढता है?
घिन तो नहीं आती है?[18]

********************

देर तक टकराए
उस दिन इन आँखों से वे पैर
भूल नहीं पाऊंगा फटी बिवाइयाँ
खुब गईं दूधिया निगाहों में
धँस गईं कुसुम-कोमल मन में[19]

                   यह सही है कि नागार्जुन ने अपने काव्य में सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य का भरपूर इस्तेमाल किया है, किंतु यह उनके सम्पूर्ण काव्य का एक हिस्सा(भले ही बड़ा हो) भर है। उनके काव्य में जहाँ एक तरफ़ सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य है वहीं दूसरी तरफ़ प्रेम, वात्सल्य (दंतुरित मुस्कान), करुणा और सौंदर्य जैसे विषय हैं। नागार्जुन निरे व्यंग्य कवि नहीं है बल्कि वे इससे अधिक कुछ है। “मूलतः नागार्जुन की सम्वेदना का केंद्र गाँव है, जहाँ से उनकी चेतना, रचना में उसके बाहर भी, बार-बार उन्हें शहर की और ले जाती है और फिर शहर से गाँव की ओर; और आवाजाही की यह प्रक्रिया अनेक स्तरों पर निरंतर चलती रहती है।”[20] नागार्जुन के यहाँ गाँव नोस्टेलजिया या भावुकता के रूप में नहीं बल्कि एक जीती-जागती ठोस वास्तविकता के रूप में आता है। अपनी सारी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ। उनके यहाँ प्रकृति के प्रति सजग एवं जागृत इंद्रियों का भाव है—

अब के इस मौसम में
कोयल आज बोली है
पहली बार...[21]

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लेते ही करवट
तेज़ाब की फुहारें छिड़कने लगा सूरज...[22]

एक अन्य कविता जिसमे किसानी बोध का पक्का प्रमाण मौजूद है—
सिके हुए दो भुट्टे सामने आए
तबियत खिल गयी
ताज़ा स्वाद मिला दूधिया दानों का
तबियत खिल गयी
दाँतो की मौजूदगी का सुफल मिला
तबियत खिल गयी [23]

 नागार्जुन ने किसानों के साथ-साथ ऐसे लोगों पर भी कविताएँ लिखी, जिन पर दूसरे कवियों ने उस तरह से ध्यान नहीं दिया था । मसलन, आदिवासी समाज से लेकर दलितों एवं स्त्रियों पर भी नागार्जुन ने समान अधिकार से लिखा। उनकी दलित चेतना सम्बंधी कविताओं  में न केवल उनकी यातना एवं पीड़ा का ही वर्णन है बल्कि उस यातना से मुक्ति की अभिव्यक्ति भी है—
दिल ने कहा- दलित माओं के
सब बच्चे बाग़ी होंगे
अग्नि पुत्र होंगे वे, अंतिम
विप्लव में सहभागी होंगे[24]

उपेक्षित वर्ग के साथ-साथ नागार्जुन ने ऐसे विषयों पर भी कविताएँ लिखी, जिन्हें पढ़कर ख़ास तरह के स्वाद वाले लोगों को थोड़ा अटपटा लग सकता है। उनकी एक कविता है ‘पैने दाँतो वाली मादा सूअर’—
धूप में पसरकर लेटी है
मोटी तगड़ी; अधेड़; मादा सुअर...
जमना किनारे मखमली दूबों पर
पूस की गुनगुनी धूप में
पसरकर लेटी है
यह भी तो मादरे हिंद की बेटी है
भरे पूरे बारह थनों वाली[25]

हिंदी कविता में सूअर का प्रयोग अपने आप में नया था और वह भी हिंद की बेटी के रूप में। यह अलग बात है कि यह कविता सूअर पर होते हुए भी सूअर पर नहीं है। इसी तरह के अनेक विषय, जो दूसरे कवियों द्वारा छूट गए या कहें कि छोड़ दिए गए उनको नागार्जुन ने अपने काव्य में स्थान दिया। 

नागार्जुन ने अपनी कविताओं में प्रश्न-उत्तर शैली का अद्भुत प्रयोग किया है। जहाँ वे ऐसा प्रयोग करते हैं, वहाँ अपनी काव्य संबंधी मान्यताओं के अनेक सूत्र भी देते है। नागार्जुन की बेहद प्रसिद्ध पंक्तियाँ है--

जनता मुझ से पूछ रही है, क्या बतलाऊँ?
जनकवि हूँ मैं साफ़ कहूँगा, क्यों हकलाऊँ?

यहाँ एक बात स्पष्ट है की कविता के लिए किसी दूसरे का होना ज़रूरी है। कविता मूलतः एक तरह का संवाद है। जिसे धूमिल ने भी कहा कि, ‘अच्छी कविता पहले एक सार्थक संवाद होती है।’ पहले स्तर पर वह कवि का स्वयं से संवाद है तो दूसरे स्तर पर किसी अन्य व्यक्ति से। किंतु हिंदी कविता में ऐसे कवियों की संख्या कम नहीं, जो कविता को एक तरह की भाषिक कलाबाज़ी या सैद्धांतिक बयानबाज़ी समझते हैं। उनकी कविता का भाव- पक्ष  जहाँ पाठक को बूझो तो जाने के चुनौती देता है, वहीं उनकी काव्य- भाषा सिद्धों की संधाभाषा की तरह आतंक पैदा करती मालूम होती है। नागार्जुन हिंदी कविता के इस संकट से भी परिचित थे, लिखते हैं—

पढ़ते है ऐजरा पाउण्ड- इलियट
बाक़ी सबकी समझते है इडियट[26]

यद्यपि ऐसा नहीं है की विचारशीलता और भाषा के कारण कविता हर बार नीरस और उबाऊ होती है, बशर्ते कि वह विचारशीलता और भाषा जीवन के अनुभवों से उपजी हो, समकालीन संवेदना से जुड़ी हो तथा इतिहास से मुठभेड़ करती हो। नागार्जुन के काव्य के यह सभी पक्ष मौजूद है। 

नागार्जुन की कविता में आत्माभिव्यक्ति के कई रूप दिखाई देते है, एक जगह वे कालिदास से पूछते है— ‘कालिदास सच सच बतलाना! इंदूमती के मृत्यु शोक से, तुम रोए या अज रोया था?’ कुछ ऐसी ही आत्माभिव्यक्ति पंत के यहाँ भी है— ‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। निकलकर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान’। साथ ही नागार्जुन अपनी छोटी कविताओं में भी आख्यान के माध्यम से किस प्रकार नये- नये अनुभवों की अभिव्यक्त करते हैं, इसका एक उदाहरण उनकी यह कविता ‘कालिदास’ है। 

नागार्जुन ने कविताओं के साथ-साथ कुछ प्रगीतों की भी रचना की है, जिनसे यह सिद्ध होता हैं कि उनकी कविता में राजनीतिक व्यंग्यबाणों की सनसनाहट ही नहीं, पायल की मधुर झंकार भी है। दरअसल, नागार्जुन मानव सौंदर्य के जितने बड़े प्रेमी थे, उतने ही बड़े प्रकृति सौंदर्य के भी। वैज्ञानिकों का मानना है कि मनुष्य प्रकृति से ही उत्पन्न हुआ है, इसलिए दोनों का सम्बंध नैसर्गिक है। आचार्य शुक्ल का भी मानना है कि, “मानव लोक से लेकर प्रकृति लोक तक में एक ही वस्तु का प्रसार है, इसलिए प्राकृतिक अव्यवों से यदि मानव अंगों की उपमा दी जाती है तो उसमें एक स्वारस्य है।”[27] भारतीय संदर्भ में, विद्यापति से लेकर रवीन्द्रनाथ ठाकुर तक अनेकों कवियों ने विभिन्न रूपों में गीतों की रचना की है। नागार्जुन के सामने यह पूरी विरासत मौजूद थी, उन्होंने आवश्यकतानुरूप जहाँ से जो चाहा लिया। उनके कुछ प्रमुख प्रगीतों में ‘तन गयी रीढ़’, ‘यह तुम थी’, ‘खुरदरे पैर’, ‘सुबह-सुबह’, और ‘घन कुरंग’ आदि शामिल है। गीतात्मकता की दृष्टि से नागार्जुन को आदिकवि कालिदास(बादलों का कवि) की परम्परा में रखकर देखा जा सकता है। उनके काव्य में भी बादलों के विभिन्न रूप मौजूद है। बादल को घिरते देखने से लेकर उनसे सवाल पूछने तक के सभी रूप दिखाई देते हैं।

नागार्जुन के गीतों में संगीत और सादगी का अद्भुत सौंदर्य भी दिखाई देता है। कहीं कहीं तो काव्यशास्त्रिय तुक, छंद एवं मात्राओं का निर्वाह भी। उनकी इस गीतात्मकता पर नंदकिशोर नवल ने लिखा कि, “नागार्जुन की ये प्रगीत-कविताएँ उनके धू-धू जलते राजनीतिक काव्य-प्रदेशों में हरियाली के टुकड़ों की तरह है, जो उसकी भीषणता में सुंदरता का संचार करती है।”[28]

ऐसी मान्यता है, कि कवि के पास एक सधी हुई भाषा होती है और एक अच्छे कवि के पास भाषा के विभिन्न रूप। किंतु नागार्जुन के पास विभिन्न भाषा रूप भी हैं और तरह-तरह की भाषाएँ भी। नागार्जुन चार भाषाओं- हिंदी, मैथिली, बंगाली एवं संस्कृत, में कविताएँ लिखते थे। यह चार भाषाओं में लिखना हाथ आज़माना भर नहीं था बल्कि उस भाषिक परंपरा व सम्वेदना को समृद्ध करना भी था। ‘नागार्जुन मैथिली में यात्री नाम से कविता लिखते थे, जहाँ उन्हें आधुनिक कविता का प्रवर्तक माना जाता है। बांग्ला में उन्होंने सौ से अधिक कविताएँ लिखी और संस्कृत कविता को भी समकालीन बनाने का प्रयास किया। साथ ही हिंदी कविता भूमि का भी विस्तार किया।’[29] उनकी हिंदी कविता में एक तरफ़ गाँव है तो दूसरी तरफ़ शहर। एक तरफ़ भाषा में व्यंग्य की कसावट है तो दूसरी तरफ़ मधुर गीतों की तरलता। उनके विभिन्न भाषा रूपों को उनकी प्रमुख कविताओं- ‘हरिजन गाथा’, ‘तीन बंदर बापू के’, ‘कालिदास’, ‘चंदू मैंने सपना देखा’, ‘दंतुरित मुस्कान’, ‘नेवला’, ‘गुलाबी चूड़ियाँ’, ‘अकाल और उसके बाद’, ‘बादल को घिरते देखा है’, ‘भारतीय जनकवि का प्रणाम’ आदि में देखा जा सकता है। 

आज के समय और समाज में जब कविता संकट के दौर से गुज़र रही है। जहाँ कवियों के मुख्य रूप से दो वर्ग बन चुके है। पहले वालों के लिए कविता लिखना शतरंज खेलने जैसा है तो दूसरे वर्ग वालों के लिए कविता मदारी की बंदरिया की तरह है, जिससे वे पैसा बटोरते है। ऐसे में नागार्जुन की कविता की तरफ़ ध्यान जाना स्वाभाविक ही है। जहाँ इस तरह की अतिरंजनाओं से बचने और उनके बीच संतुलन तथा सामंजस्य के अनेकों सूत्र मौजूद है। 

संदर्भ
[1] केदारनाथ सिंह, ख़तरनाक ढंग से कवि होने का साहस (लेख), आलोचना पत्रिका - अप्रैल-जून’81, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ० सं०-13
[2] रामेश्वर राय, कविता का परिसर- एक अंतर्यात्रा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, सं०- 2014, पृ० सं०- 75
[3] वही, पृ० सं०- 76
[4] वही, पृ० सं०- 81
[5] वही, पृ० सं०- 81
[6] नामवर सिंह, ज़मीन की कविता और कविता की ज़मीन(लेख), आलोचना पत्रिका - अप्रैल-जून’81, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ० सं०-1
[7] kavitakosh.org
[8] रामेश्वर राय, कविता का परिसर- एक अंतर्यात्रा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014, पृ० सं०- 80
[9] kavitakosh.org
[10] kavitakosh.org
[11] kavitakosh.org
[12] शिवकुमार मिश्र, नागार्जुन: व्यक्ति और कविता (लेख), आधुनिक कविता और युग दृष्टि , प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, 2012,पृ० सं०-84
[13] प्रभाकर माचवे, नागार्जुन, राजपाल एंड संस, दिल्ली, 1982, पृ० सं०- 11
[14] वही, पृ० सं०- 12
[15] शिवकुमार मिश्र, नागार्जुन: व्यक्ति और कविता (लेख), आधुनिक कविता और युग दृष्टि , प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, सं०- 2012,पृ० सं०-86
[16]   नामवर सिंह, ज़मीन की कविता और कविता की ज़मीन (लेख), आलोचना पत्रिका - अप्रैल-जून’८१, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ० सं०-3
[17] गोबिंद प्रसाद, कविता के सम्मुख, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ० सं०- 73
[18] घिन तो नहीं आती, kavitakosh.org
[19] खुरदरे पैर, kavitakosh.org
[20] केदारनाथ सिंह, ख़तरनाक ढंग से कवि होने का साहस (लेख), आलोचना पत्रिका - अप्रैल-जून’81, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ० सं०-13
[21] kavitakosh.org
[22] kavitakosh.org
[23] kavitakosh.org
[24] मैनेजर पांडेय, नागार्जुन काव्य की भूमि और भूमिका का विस्तार (लेख), नागार्जुन और समकालीन विमर्श, सं.- डॉ. रमा, स्वराज प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2012, पृ० सं०-20
[25] वही, , पृ० सं०- 22
[26]  नामवर सिंह, ज़मीन की कविता और कविता की ज़मीन (लेख), आलोचना पत्रिका - अप्रैल-जून’ 81, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ० सं०-3
[27] नंदकिशोर नवल, नागार्जुन की प्रयोगधर्मिता (लेख), शताब्दी की कविता, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, 2009, पृ० सं०138
[28] वही,146
[29]  मैनेजर पांडेय, नागार्जुन काव्य की भूमि और भूमिका का विस्तार (लेख), नागार्जुन और समकालीन विमर्श, सं.- डॉ. रमा, स्वराज प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2012, पृ० सं०-19

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