चार कविताएँ

राधा इन्दु राणा

लेखिका फिल्ममेकर और सिनेमेटोग्राफर हैं, बच्चों और बड़ों दोनों ही के लिए कहानियाँ, कवितायें-गीत लिखती और कंपोज़ करती हैं

धूप के टुकड़े

करती हूँ
अपनी ही
परछाईं का पीछा... मैं,
धूप रस्तों पर
उतर आती है
सेमल के गिरे
फूलों की तरह,
क्या देखती हो
आज भी तुम
गौर से झिलमिलाती
झाँकती धूप के रंग...
बॉगनवेलिया से छनती
धूप सा तुम्हारी याद का
रंग आज भी गहरा है..
तुम बर्फ़ की फ़ैली
वादियों में गिरती
धूप के टुकड़ों सी
पिघलती बर्फ़ की
बूंदों में ढल जाती हो!
.......................................

तुम चिड़िया सी मेरी

दोपहर में
उठती धूप में गिरती हवा
सीढियों से उतर
गई बिखर... और दिनभर
खेलती रही मेरी टेबल पर
फैले कागज़ों से...
मेरी यादों से...
और तुम चिड़िया सी मेरी...
कहते हो हँसते हुए
थाम मेरे हाथों को -
तुम चिड़िया सी मेरी...
मेरी प्यारी सी चिड़िया...
पर शोर बहुत करती है!
........................................

एक सीढियों वाला दिल

 मै उस ढलती दोपहर में
चढ़ रहा था सीढियाँ
उसके घर की...
और उतर रहा था
सीढियाँ अपने दिल की...
'क्या होगी वो अभी
घर में... या होगी कहीं और..
क्या कहूँगा उससे... क्या
बनाऊंगा बहाना... क्यूँ आया..
क्या बोलूँगा... क्या दूंगा
उसे कोई सही ज़वाब...'
अपने ख्यालों में डूबा
तैरता हुआ जा रहा था
आज मै उसके घर
जहाँ से मै लौट आया था
एक दिन कह कर
'हम नही हैं एक दूसरे के लिए
हैं हमारी दुनिया
एक दूसरे से अलग और
बहुत... बहुत दूर...'
कह कर हो गया दूर
और चला आया उससे दूर,
दरवाज़े पर दस्तक दूँ
या नही... सोच में डूबा
और मेरा दिल धड़क रहा था
दे रहा था दस्तक... और
उतर रहा था सीढियाँ
अपने ही दिल की...
कौन? अंदर से आयी
आवाज़ और खुला दरवाज़ा
जाने कौन थी और देखती
मुझे हैरान नज़रों से...
'जी वे मिस्टर प्रधान,
वे हैं क्या?' इतना ही बोल
पाया और वो बोल गई
सारे जवाब... जी नहीं हैं
पता मुझको... बेच चले
गये यह घर अपना.. और
हम हैं किरायेदार उनके
जिनका है अब यह घर...,
कह कर बंद कर दिया
दरवाज़ा घर का... और
मै खड़ा सोचता... देखता
सुनता आहट अपने ही
दिल की... जो अब
बैठ गया था सीढियों पर
अपने ही दिल की,
जाने के लिए मुड़ा
तो कोई खड़ा था
पीछे... बोला वो
'कुछ समय पहले तक
रहते थे वे पास ही में
हाल ही में अपनी
बेटी की शादी विदेश में
कर वो भी लौट गये है
दार्जलिंग... वहाँ उनका घर है
जमीनें है... बाग़ हैं शायद..
आप कौन... अगर कभी
आया तो फ़ोन... बता दूंगा
मै उन्हें कि कोई आया था
उन्हें पूछता हुआ...'
मैं देखता सुनता उस
मेरी यादों के बुरी खबर
लाने वाले डाकिये को
दे रहा था वो कितना
बुरा पैगाम... काश होती
ये चिठ्ठी बैरंग... लौटा देता
उसी पल... जो बीत रहा था
मेरे सीने में दर्द की तरह,
'जी कोई नही, ऐसे ही पहचान थी
पास से गुज़र रहा था तो...'
कह न पाया कुछ और
सीढियाँ उतर रहा था मै
वापस धीरे धीरे... और
आ रही थी आवाज़
मुझे दरवाज़े के खुलने और
फिर बंद होने की...
'एक दिन तुम आओगे लौट कर
तब यहाँ कोई नहीं होगा
तुम्हारे लिए... तुम खुश रहो पर'
पलट कर देखा याद करते
प्रभा की आखरी याद बात को...
कोई नहीं हवा थी शायद
मैं मुड़ा और फिर
उतरता चला गया
सीढियाँ मुझसे छूटीं उसके
पिछले घर की... !
...........................................

चश्मा
                                                   
सोचता रहा मैं
कई दिन तक
कौन छोड़ गया है
चश्मा अपना
मेरी ही मेज़ पर,
धुंधला दिखा
अपना ही अक्स
जब आईने में
तब ख्याल आया
मेरा ही है, उम्र
में याद रहती नही...
कहते हैं लोग,
पर तुम
आज भी हो
याद मुझे!

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