गौरैया का जोड़ा

बीना जैन

- बीना जैन

हमारे काम्प्लेक्स में सोलह घर हैं। सभी घरों के बाहर छोटे छोटे बगीचे हैं जिनके किनारे बाउंडरी वाल बनी हुई है। पर मेरे घर के बगीचे के एक ओर ईंटों की दीवार बनी हुई है और बाकी दो किनारों पर पेड़ लगे हुए हैं। वो ही बाउंड्री वाल का काम करते हैं।दरअसल वो पेड़ कम पौधे ज्यादा लगते हैं। उनके तने तो  पतली-पतली डंडियों-से हैं पर हरी पत्तियों से लदी उनकी शाखाएं इतनी ऊंची हो जाती हैं मानो आसमान छू लेने को तैयार हों। मेरी रसोई की खिड़की के ठीक आगे ही उन पेड़ों की कतार खड़ी है। बारिशों के दिनों में वो पेड़ खूब ऊंचे हो जाते हैं। मेरी रसोई की खिड़की भी उनकी घनेरी पत्तियों से ढक जाती है और उनकी मुलायम कच्ची हरी पत्तियाँ झूल-झूल कर खिड़की से अंदर घुसने की कोशिश करने लगती हैं। हवा का एक छोटा-सा झोंका भी सारी रसोई का मौसम बदल देता है।

अप्रैल माह से ही मेरी  रसोई तपने लगती है। सारी रसोई  चौन्धियाती धूप के उजाले से भर जाती है। रसोई में खाना बनाना बड़े जीवट का कर्म बन जाता है। तिस पर गैस की आंच की तपन! सूरज देवता और अग्नि देवता मानो दोनों मिलकर मेरी परीक्षा लेने लगते हैं। उस समय वो पत्तियाँ सूरज की तीखी धूप के आगे छतरी बन मेरी रसोई और मेरी आँखों को ठंडक प्रदान करती हैं।

गृहिणी के लिए पूरे घर में एक ही स्थान ऐसा है जिससे उसे अपनी पहचान मिलती रही है। वह है उसकी रसोई। आज स्त्री ने भले ही रसोई को छोड़ कर अपने कदम दफ़्तर की ओर बढ़ा लिए हैं लेकिन रसोई ने कब उसको  छोड़ा है! घर- बाहर की जद्दोज़हद में थकी-मांदी,  गर्मी से तपती  मैं जब रसोई में काम करते हुए उन पेड़ों को अपनी पत्तियाँ हिलाते हुए देखती हूँ तो तन-मन की सारी थकान भुल जाती है। लगता है जैसे वो पत्तियाँ झूम-झूम कर  मुझसे न सिर्फ हैलो बोल रही हों बल्कि अपनी संवेदनशीलता से मेरी थकन भी सांझा कर रही हों। उन पेड़ों की पत्तियों से टकराकर आने वाली हवा की ठंडक सारा पसीना सुखा देती है। पवन देवता तब अग्नि देवता और सूरज देवता को हराने पर तुल जाते हैं और मैं अन्नपूर्णा का अवतार बनी तन्मयता से खाना बनाने में लग जाती हूँ।

हालांकि यह प्रश्न कई बार उठाया गया कि मैं ही क्यों? तब मेरा यही उत्तर होता है कि सब अपनी सामर्थ्य के अनुसार काम कर देते हैं।दिनभर ऑफिस में काम करके और ट्रैफ़िक के शोर-शराबे से थके घर आकर बच्चों के लिए पढ़ाई करना भी आसान नहीं। आज के कॉम्पिटीटिव समय में बच्चों का खुद का जीवन ही चुनौतियों और संघर्ष से भरा हुआ है। उनका जीवन  किसी और अच्छे मुकाम पर पहुँच जाय, यही इच्छा मुझे बल प्रदान करती है। सच है, एक माँ ही बिना शिकायत किये सारा दिन आठ हाथों वाली दुर्गा बनी रहती है।

रसोई में काम करते हुए मेरे साथी होते हैं वो पेड़ और उनपर रहने वाला गोरैया का जोड़ा। उनकी उपस्थिति ही मेरे होंठो पर मुस्कुराहट और गुनगुनाहट लाने का सबब बनती है। उन पेड़ों के अनस्तित्व की कल्पना भी मेरे लिये दूभर है।

इस बार माली ने उन पेड़ों की सारी पत्तियों की  छँटनी कर दी। अपनी समझ में तो उसने शाबाशी का काम किया था। पर उस अबोध को नहीं मालूम था कि हर वर्ष आने वाला गौरैय्या का जोड़ा उन्हीं पेड़ों की शाखाओं में अपना बसेरा बनाया करता है। माली नया था। उसका कुसूर न था। पर मेरी चिंता का कोई ओर-छोर न था। मेरी सारी चेतना का केंद्र बदल गया था। प्रश्न यह था कि अब वह जोड़ा घर कहाँ बनाएगा।

मेरी उदासी का अंत न था। उन पेड़ों के पतले-पतले तने भी जैसे अपने ऊपर से साये को हटा देख रो गये। बसन्त का आगमन हो चला था। इन्हीं दिनों वह जोड़ा आकर उन पेड़ों में अपना घोंसला बनाया करता था। हर दिन मेरे कान उस गौरैये के जोड़े की चींऊ-चींऊ की आवाज़ सुनने को जैसे इंतज़ार करते।

उस जोड़े के आने के बाद घर का माहौल बदल जाता।  सुबह उनकी चहचहाहट से आंख खुलती। उन गौरैयों का कभी अपने घोंसले में आना और कभी उड़ जाना और कभी अपनी डाल पर झूला झूलना देखना, मेरे काम का हिस्सा बन जाता था। खिड़की के ठीक सामने वाले पेड़ पर ही हर साल वो अपना घोंसला बनाते। सब्जी काटते, मसाला भूनते, रोटी बेलते  मेरी निगाह वहीं जमी रहती। बीच-बीच में मैं आटे की गोली खिड़की पर फेंकती और उनका फुर्र से आकर  उन गोलियों कोउठाकर उड़ जाना बेहद सुखद लगता। उनकी चीं-चीं ही मेरा मधुर संगीत था और उनकी उपस्थिति ही मेरे अकेलेपन की साथी।

कितने ही साल ऐसे बीते कि कभी उनके अंडे तो कभी उनके नवजात बच्चे बिल्ली खा गई। उस समय उनका रुदन दिल हिला जाता।  मैं यही सोचती रह जाती कि जब बिल्ली इनके अंडे खा जाती है तो फिर ये हर साल इसी पेड़ पर क्यों अपना घोंसला बनाते हैं। इस बार लगा वो नहीं आएंगे। पेड़ ही जो खाली-से हो गए हैं। लेकिन एक सुबह बड़े शोर से आँख खुली। गौरैया का जोड़ा शोर मचा रहा था। शायद अपनी जगह खाली देख उनका रोष प्रकट हो रहा था। पूरे दिन वे सब पेड़ों के आस-पास और ऊपर-नीचे चक्कर लगाते रहे। चूँकि बसन्त का मौसम था। खाली डालें भी नई फूटती पत्तियों से सज चली थीं। गौरैया  के जोड़े ने एक शाख चुन तिनके ला-ला रखना शुरू कर दिया था। उस फुदकते जोड़े को देख मन एक अजीब-सी खुशी से भर गया।

एक दिन मेरी बड़ी बहन की पोती और नाती आये हुए थे।  सवा बरस के नाती कुश को मैंने खिड़की पर खड़ा कर दिया। उन गोरैयों को देख वह भी बहुत खुश हुआ। सारा समय किचन की स्लैब पर खड़ा कूदता रहा।  इस सुख को वही समझ सकता है जिसने अपने घरों में पशु-पक्षी पाले हों। ऐसे समय में मुझे हमेशा महादेवी वर्मा का स्मरण हो आया करता है और पशु-पक्षियों से उनके स्नेह से मेरा तादात्म्य स्थापित होने लगता है। उनका खिड़की की ग्रिल पर बैठकर अपनी चोंच रगड़ना या चीं-चीं कर अंदर झाँकना रोज का शगल था।वो दोनों भी महादेवी जी के गिल्लू से कम न थे।

लेकिन उन दोनों के सब्र ने तब बांध तोड़ दिया जब उन्होंने एक दिन बिल्ली को अपने पेड़ के नीचे मंडराते देखा और जब रास्ता बना बिल्ली पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करने लगी तो उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया। बाई चांस मैं रसोई में थी। मैंने एक मग्गा पानी तुरन्त बाहर उछाल कर फेंका जिससे बिल्ली भाग गई। खिड़की और उस पेड़ में मात्र डेढ़ हाथ का फ़ासला था और घोंसला भी ज़्यादा ऊंचाई पर नहीं था।पता नहीं  इतनी कम ऊँचाई पर घोंसला क्यों बनाते हैं। एक स्टूल पर चढ़कर हाथ ऊपर उठाओ तो छू लो।आज तक भी उनके घोंसले की वही ऊँचाई होती है। दस बरस से देख रही हूँ। इतने खतरे में भी हर बसन्त में आना और सर्दियों में चले जाना और उनके गमन से आगमन की मैं बेहद शिद्दत से इंतजार करती हूं।

जैसे जीजी की पोती और नाती हमें बेहद प्यारे लगते  वैसे ही गोरैया के होने वाले नन्हे-नन्हे बाल पक्षी भी कम प्यारे न लगते थे। अपनी छोटी-छोटी चोंच फैलाये जब वे भोजन के लिये गुहार लगाते तो मन उतना ही उतावला हो उठता जितना अपने बच्चों के भूखे होने पर हो जाया करता था। तब सब काम छोड़ उनके भोजन की व्यवस्था करना प्रथम कर्तव्य बन जाता। पर उस दिन के बिल्ली के कुप्रयास ने सबको चिंतित कर दिया। गौरैया के अंडे इस बार बिल्ली का निवाला न बनें,  इसी चिंता में सारा दिन निकल गया। मेरी आँखें साक्षी हैं। अपनी इन्हीं आंखों से बिल्ली को कभी उनके अंडों और कभी बच्चों को  अपने पंजों में दबाये पेड़ से उतरते देखा है। और फिर गर्मियों के पहाड़ से दिनों में गौरैयों का सूनापन भी,और उनकी आवाज़ की रोती हुई चहचाहट की भी सबसे अधिक भोक्ता मैं ही रही हूँ।

रात को डिनर के समय सब एकसाथ खाना खाते हैं। लिहाज़ा वही समय उपयुक्त था  इस समस्या के निवारण हेतु विचार करने का। सबके सुझाव आमन्त्रित किये गए। तय किया गया कि पेड़ को जाली से घेर दिया जाए। सुझाव मंजूर हो गया। अगली शाम को ही दो मालियों ने कांटेदार जाली से पेड़ के तने को घेर दिया। सब निश्चिंत थे।

 लेकिन रात को तो तांडव हो गया। बिल्ली तो मज़े-से दबे पाँव उस जाली पर चढ़ रही थी और गोरैयों ने शोर मचा-मचा कर सबकी निद्रा भंग कर दी थी। गोरैयों के शोर ने जुगनू को भी जगा दिया। बिल्ली को देखते ही वह बिल्ली के पीछे सरपट भागी। अब  बिल्ली की जान हलकान हो गई। अपनी जान किसे प्यारी नहीं होती। तेजी से भागकर उसने अपनी जान बचाई।

 हमारा प्रयास भले ही फेल हो गया लेकिन उस खतरे ने समाधान भी दे दिया। जुगनू ही वह समाधान थी। पेड़ को घेरने वाली जाली हटा दी गई और जुगनू को उस पेड़ के नीचे खाना देना शुरू कर दिया गया। जैसे ही बिल्ली आती जुगनू चील-सी झपट्टा मारने को दौड़ती।

जुगनू गली की कुतिया है। एक बार किसी तरह वह इस काम्प्लेक्स में आ गई। तब वह बहुत छोटी थी। सारा ने उसे पाल-पोसकर बड़ा किया। वह कभी भी नहीं भौंकती थी। एक दिन सारा ने बताया कि, ”शी हैज़ लॉस्ट हर वॉइस” और तभी हमें पता चला कि उसके गले में बहुत सूजन आ गई थी। सारा ही उसे हॉस्पिटल लेकर गई। उसके गले का ऑपरेशन करवाना पड़ा जो सारा ने ही  करवाया। तबसे जुगनू हमारी भी प्यारी बन गई।

जब भी वह दरवाज़ा खुला देखती घर में आ जाती। हर कमरे में जा-जा कर सबको देख फिर फ्रिज के पास साधिकार जा लेटती। जब वह अपनी पूँछ लगातार गोल-गोल हिलाने लगती तो उसके मौन संकेत को समझते देर न लगती। पूँछ हिलाकर ही वह  अपनी ज़रूरतें प्रकट कर देती,  फिर चाहे वह पेट की हो या दुलार करवाने की। अब तो जुगनू इसी काम्प्लेक्स का एक मेम्बर स्वीकृत हो गई है। हमारे एक सहकर्मी ने तो उसका नाम अनारकली रखा है।

जुगनू की रात-दिन उसी पेड़ के आसपास की उपस्थिति ने बिल्ली को जैसे तिरोहित कर दिया और उन गोरैयों का एकछत्र राज्य स्थापित हो गया।

एक दिन कुछ ज्यादा शोर हो रहा था। चिऊँ-चीं, चिऊँ-चीं की लगातार ध्वनि ने बरबस ध्यान आकर्षित कर दिया। खिड़की से बाहर देखा तो खुशी का ठिकाना न रहा। घोंसले से दो जोड़ी नन्हीं चोंचें मुँह खोले गला फाड़-फाड़ चिल्ला रही थीं और गौरैया युगल बार-बार अपनी चोंच में भोजन लाकर उन्हें खिला रहा था। यह हमारे आँगन में नए जीवों के आगमन की खुशी थी या उनका इतने बरसों बाद बिल्ली का निवाला बनने से बच निकलने की खुशी। पर दोनों रंग घुल गए थे। इस नए रंग ने घर में सबको रंग दिया था।

सुबह के छह बजे थे। सूरज की लाल किरणें पेड़ों की पत्तियों से छन-छन कर सारे घर-आँगन को नहला रही थीं।

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