राकेश खंडेलवाल का काव्य संग्रह ’लेती अँगड़ाई जब एक नीहारिका’

समीर लाल ’समीर’ की नजर से

लेती अँगड़ाई जब एक नीहारिका

काव्य संग्रह
लेखक: राकेश खंडेलवाल
प्रकाशक: बुक रिवर्स (www.bookrivers.com)
ISBN-13: 978-9388727297
पृष्ठ: 278, पेपरबैक
प्रकाशन वर्ष: 2019
मूल्य: ₹ 300/- $25.00


राकेश खंडेलवाल जी अमेरीका, कनाडा, भारत के कवि सम्मेलनों के मंच का एक जाना पहचाना नाम हैं। आप गीत सम्राट के नाम से जाने जाते हैं। करीब डेढ़ दशक पहले राकेश खंडेलवाल जी से याहू ग्रुप ’ई कविता’ के माध्यम से परिचय हुआ। एक बेहद सरल इंसान और उनका अत्यंत आत्मिक स्वभाव, जल्द ही परिचय मित्रता में बदल गया। राकेश जी की गीतों और कविताओं पर ऐसी अद्भुत पकड़ है कि वो बातें भी कविताओं में ही करते हैं। बहुत पहले एक बार अपने घर का पता भी किसी मित्र को उन्होंने गीत के माध्यम से ही लिख भेजा था। गीतों के बारे मे बातचीत करते हुए राकेश जी बताते हैं कि गीत लिखा नहीं जाता, वह तो सहज ही मन से उपजता है। कहानी, उपन्यास और कविता लिखना तो आसान है परन्तु मन मे उठते हुये मौलिक विचारों को मूर्त रुप देने के लिए जो आवश्यक होता है, वह माँ शारदा का आशीर्वाद और अनुकम्पा है।

राकेश खंडेलवाल
राकेश जी के इस काव्य संग्रह के पूर्व भी कई काव्य संग्रह ’अमावस का चाँद’, अंधेरी रात का सूरज’, ’धूप गंध चाँदनी’ और ’बैराग से अनुराग’ आ चुके हैं।

राकेश जी अपने गीत में अपने मन के भाव को उकेरने के लिए जिस तरह बिंबों और उपमाओं का अद्भुत एवं सहज प्रयोग करते हैं वो अपने आप में निराला है। आज के समय में इतने स्तरीय गीत लिखने वाले उंगलियों पर गिने जा सकते हैं।

उनके गीतों मे नूतनता है, सहजता है, प्रेम है तो वहीं आज के समय की छुअन भी है। उसमे जहाँ यशोधरा की बात है तो वहीं इन्टरनेट की झलक भी है। कभी मन की कसक है तो रसोई की महक भी है। कभी गंभीरत है, तो कहीं सहज हास्य भी है। भाव जो भी हों, गीतों का स्तर और शब्द संचयन हमेशा ही उच्च एवं अद्भुत होता है। उनके बिंबों और प्रतीकों में आप ऐसे ऐसे शब्द पायेंगे जो आपने शायद अरसे से नहीं सुने होंगे या शायद भूल चुके होंगे।

उनके गीत पाठकों की भाषा को समृद्ध करते हैं। आपको बताते हैं कि असली गीत क्या होते हैं। एक के बाद एक गीत पढ़ते जाइये और उनका आनन्द उठाते जाइये।

उनका नया काव्य संग्रह ’लेती अँगड़ाई जब एक नीहारिका’ अपने भीतर 175 गीतों के मोती समेटे है। उदाहरण के लिए तो पूरी की पूरी पुस्तक भी पेश कर दें तो भी कम है। कोई भी गीत दूसरे गीत से कम नहीं है। फिर भी गीतों की एक झलक, शब्दों और बिंबो की रवानगी के लिए इस संग्रह से कुछ गीतों के अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।


समीर लाल 'समीर'
लौ सिमट बातियों को रुलाती रही
सारिणी में समय की कहीं खो गई
भावना, साध जिसको सजाती रही

दोपहर की पिघलती हुई धूप आ
याद के रंग मन पर नये ,मल गई
जीर्ण परदे से बादल के छनती हुई
कोई परछाईं आकर ह्रदय छल गई
अत्र कुशलम, तो हो अस्तु भी तत्र ही
रह गये सोचते जितने सम्बन्ध थे
और हम फिर उलझ उस नियम में गये
जिसके कारण हुये मन के अनुबन्ध थे

सूर्य की हर किरण वक्र हो व्योम से
सिर्फ़ परछाईयाँ ही बनाती रही

सारे सन्देश उत्तर बिना खो गये
दृष्टि लेकर गई जो कबूतर बनी
शब्द के,पृष्ठ के मध्य में यूँ लगा
और गहरी हुई, जो हुई अनबनी
था अपरिचय घटा सावनी बन घिरा
और बरसा गया फ़िर से एकाकियत
ज़िन्दगी मौन ही मुस्कुराती रही
हम रहे पूछते क्या है उसकी नियत

प्रश्न बन जो ह्रदय से चली भावना
श्याम विवरों में जाकर समाती रही

याद की कुछ खिड़कियाँ खोलें
चलो हम आज फिर से याद की कुछ खिड़कियाँ खोलें

चलो देखें वही बस की प्रतीक्षा का सुनहरा पल
जहां थी उड गई सहसा तुम्हारी चूनरी धानी
गई थी छू कपोलों को मेरे बन पंख तितली के
कहा था कुछ,हुई मुश्किल वे सब बातें समझ पानी

वही इक दृश्य सपना कर नयन में आँज कर सो लें

पलट कर पृष्ठ वे खोलें नदी के रेतिया तट पर
लिखी थी पाँव के नख ने इबारत कोई धुंधली सी
किया इंगित टहोके से मुझे छू कर ज़रा हौले
बदन पर तैरती अब भी छुअन उस एक उंगली की

अधर फिर फिर यही कहते उसी अनुभूति के हो लें

चलो फिर खींच लें हम कैनवस पर गुलमोहर वोही
उगा था जो कपोलों पर तुम्हारे, दृष्टि चुम्बन से
छिड़ी जो थरथराहट से अधर की, जल तरंगों सी
उसे हम जोड़ लें मन कह रहा है आज धड़कन से

इन्हें हम डोरियों में दृष्टि की फिर से चलो पो लें

एक गरिमा भरो गीत में
सरगमों की गली से गुजरते हुये रागिनी बो लो संगीत में
शब्द होठों से खुद ही झरें, एक गरिमा भरो गीत में

दिन के अख़बार की सुर्खियाँ
काव्य होती नहीं जान लो
व्यंग से तंत्र के बन्ध को
ध्यान देकर के पहचान लो
दूर कितना चलेंगी कहो
सामने आई तुकबन्दियाँ
काव्य होती नहीं जान लो
राजनीतिक कसी फ़ब्तियाअँ

शब्द अनुप्रासमय छन्द के हों नहाये हुये प्रीत में
मन के तारों को छू ले तनिक, एक गरिमा भरो गीत में

दिन ढला पीर मन में उगी
ओढ़नी सांझ की ओढ़कर
रात नींदे चुरा ले गई
पास एकाकियत छोड़कर
ये व्यथा कितनी दुहरा चुके
अब सँवारो वे अनुभूतियाँ
शून्य से झांकती जो रहीं
कोई दे पाये अभिव्यक्तियाँ

कुछ मिलन, कुछ विरह, अश्रु कुछ, फिर ना उलझो इसी रीत में
शब्द होठों से खुद ही झरें, एक गरिमा भरो गीत में

रखा एक सिंदूरी पत्थर
शहर की उस वीरान गली में जहां हमारा बचपन बीता
अभी तलक पीपल के नीचे रखा एक सिंदूरी पत्थर

वो पीपल जिसने सौंपी थी उलझी हुई पतंगें हमको
जिसकी छाया में संध्या में रंग भरे कंचे ढुलके थे
जिसकी शाखा ने सावन की पैंगों को नभ तक पहुंचाया
जिसके पत्रों की साक्षी में शपथों के लेखे संवरे थे

उसकी आंखें अभी तलक भी बिछी हुई हैं सूने पथ पर
शहर की उस वीरान गली में नहीं गूंजते हैं अब पद स्वर

उस पीपल की बूढ़ी दाढ़ी में उलझी सूतों की डोरी
जिन्हें मन्नतों ने मावस की छतरी के नीचे बांधा था
तन पर टके हुए लगते हैं धूमिल वे सब स्वस्ति चिह्न अब
नत होते शीशों ने जिनको साँझ सवेरे आराधा था

शेष नहीं है आज किन्तु अब चावल भी आधी चुटकी भर
किंकर्तव्यविमूढ़ा है मन दिन की इस बदली करवट पर

मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूँ कि जब आप राकेश जी के गीत पढ़ेंगे तो आप भी मेरी ही तरह उनकी लेखनी के दीवाने हो जायेंगे। उनकी लेखनी की सही तारीफ करने की शब्द क्षमता कम से कम मुझमें तो नहीं है।
राकेश जी को उनके इस काव्य संग्रह की अनेकानेक बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ।

1 comment :

  1. समीर भाई ,

    आपका अनुराग और लेखन नेरी उपलब्धि है. आप मेरे प्रिय रचनाकों की श्रेणी में प्रथम पृष्ठ पर है. आपसे मिलना एक सुखद अनुभूति और मुझे अभी भी याद आते हैं सुहानी संध्या के वे पल जो हमने साथ साथ बफ़ेलो के कवि सम्मेलन के मंच पर व्यतीत किये थे. आपके व्यंग्य लेख सर्वदा पढता रहता हूँ यद्यपि व्यस्त रहने के कारण उन पर ट्प्पणी कर पाता.

    आपकी लेखनी के नित्य नई ऊंचाईयां छूने की कामना लिये मैं माँ शारदा से प्रार्थना करता हूं

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।