आओ हिंदी सीखें - भाग 1

डॉ. सत्यवीर सिंह

सत्यवीर सिंह

सहायक आचार्य (हिंदी)
ला. ब. शा. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोटपूतली (जयपुर) 303108, राजस्थान, भारत
चलभाष: +91 979 996 4305; ईमेल: drsatyavirsingh@gmail.com

हिंदी क्यों और कैसे

भाषा नितांत सामाजिक वस्तु होती है। वह समाज के रंग में रंग कर ही विकसित होती है। आज के उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्वीकरण के इस दौर में किसी भी भाषा के साहित्यिक रूप के साथ-साथ उसके प्रतियोगितापरक रूपों का विकास भी अनिवार्य है। आज वही व्यक्ति समाज में जीवन यापन कर पाएगा जिसको भाषा के बहुआयामी रूपों की जानकारी है। इसी क्रम में भारत की अधिकृत भाषा हिंदी है, जिसको बोलने, समझने, पढ़ने, लिखने वालों की संख्या लगभग 75 से 80 करोड़ है। इतनी बड़ी संख्या में हिंदी लोगों की ज़ुबान (व्यवहृत भाषा) है। इससे स्वतः ही इसकी उपयोगिता बढ़ जाती है। हिंदी आज राजभाषा, संपर्क भाषा एवं वैश्विक बाजार संचालन की भाषा के रूप में प्रमुखता प्राप्त किए हुए हैं। हिंदी का केवल साहित्यिक रूप ही नहीं बल्कि प्रयोजनपरक रूप भी इस समय सर्वाधिक चर्चित है। इसका (हिंदी) अध्ययन, अध्यापन अब केवल साहित्यिक सेवा के लिए ही नहीं बल्कि आजीविका के लिए भी सामने है। इसके अध्येता अब अनेक क्षेत्रों में अपने भविष्य का निर्धारण कर सकते हैं।

वर्तमान काल का भयावह सच है- बेरोजगारी। वैश्वीकरण और बाजारीकरण के बढ़ते प्रभाव ने रोजगार के अनेक अवसर प्रदान किए हैं; इसके प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता है। ऐसे माहौल में सबसे ज्यादा अवसर भाषा के अध्येता के लिए हैं। इसके साथ मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण मुद्रित एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में भी हिंदी भाषा के अध्ययन के लिए रोजगार की अनेक संभावनाएं दावत दे रही हैं।

रोजगार के विभिन्न क्षेत्र एवं हिंदीः
हिंदी अब दोहों, साखियों, गजलों, पदों, कहानी, उपन्यास आदि की भाषा न रहकर इसने अपना एक प्रयोजनमूलक रूप भी अख्तियार कर लिया है। हिंदी भाषा और साहित्य का अध्ययन करने वाले व्यक्ति अब केवल अध्यापक की नौकरी तक ही सीमित नहीं रहेगा। इसे हम यूँ कहें कि अब हिंदी पढ़ने तथा उसका ज्ञान अर्जित करने के बाद केवल सरकारी नौकरी और वह भी अध्यापकीय नौकरी तक ही सीमित नहीं रहेगा। मीडिया तथा बाजार के बढ़ते प्रभाव से हिंदी अध्येता के लिए रोजगार की अनंत संभावनाएँ हैं। इसे दो भागों में विभक्त करके देख सकते हैं। एक तो सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार तथा दूसरा निजी क्षेत्र में रोजगार के प्रमुख अवसर। सरकारी नौकरियों में प्रवेश के लिए सभी जगह प्रतियोगी परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। इन परीक्षाओं में भाषा दक्षता की एक परीक्षा होती है। इस प्रतियोगी परीक्षा में किसी पद के लिए तो अलग से ही एक प्रश्न पत्र होता है, तो किसी पद के लिए कुछ अंकों का भाषा परीक्षण होता है।

सर्वप्रथम सार्वजनिक क्षेत्र यानी सरकारी सेवाओं में हिंदी विषय के प्रश्न पत्र की बात करें तो निम्नलिखित परीक्षाओं में हिंदी का प्रश्न पत्र होता है। जैसे- भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) राज्यों के राज्य लोक सेवा आयोगों में प्रशासनिक पदों के लिए संयुक्त परीक्षा में अलग से एक प्रश्न पत्र होता है। न्यायिक सेवाओं में भी हिंदी के सामान्य प्रश्न पूछे जाते हैं। साथ ही नेट, सेट, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर, स्कूल व्याख्याता, नवोदय स्कूल में अध्यापक से लेकर व्याख्याता तक, दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड, केंद्रीय विद्यालय संगठन के सभी स्तर के अध्यापकीय पदों का हिंदी परीक्षण होता है। रेलवे, प्री-बीएड परीक्षा, लिपिक, हिंदी अधिकारी, राजभाषा अधिकारी, जनसंपर्क अधिकारी आदि पदों पर चयनित व्यक्ति की परीक्षा में हिंदी का ज्ञान (पढ़ना, लिखना, बोलना) आवश्यक माना गया है। इन सरकारी सेवाओं में अनिवार्य हिंदी जिसमें मूलतः व्याकरण आधारित प्रश्न वस्तुनिष्ठ तथा विषयनिष्ठ किए जाते हैं। यदि प्रतियोगी हिंदी विषय में ही अध्यापकीय, जिसमें ग्रेड द्वितीय से व्याख्याता तक सम्मिलित है, में अपना भविष्य निर्माण चाहता है, तो भाषा, व्याकरण के साथ ऐसे प्रतियोगी की साहित्य संबंधित जानकारी की भी परीक्षा होती है। इन प्रश्नों का स्तर बहुत गंभीर होता है क्योंकि अध्यापक हिंदी का बनने जा रहा है। इसके अतिरिक्त पदों के लिए हिंदी परीक्षा का स्तर बेहतर और सामान्य होता है।

सरकारी क्षेत्र के अतिरिक्त आज निजी क्षेत्र में हिंदी के बल पर रोजगार के अवसर सरकारी क्षेत्र से कहीं अधिक है। यह बेहतर अवसर है। अर्थ (धन) उपार्जन के साथ-साथ सम्मानीय भी है। अर्थात् धन और यश दोनों एक साथ प्राप्ति। जन संचार माध्यमों के बढ़ते प्रभाव से हिंदी अध्येता के लिए अनंत अवसर हैं। इसकी प्राप्ति हेतु एक शर्त है, वह है- योग्यता की। योग्य व्यक्ति के लिए एक से बढ़कर एक नौकरी अग्रिम दस्तक देती है। भूमंडलीकरण के नाम पर भूमंडलीकरण में बदलते विश्व ने संचार माध्यमों के विविध रूपों को जन्म दिया है। बाजार ने इन रूपों का बखूबी प्रयोग किया है। यह सच है कि बाजार अपने संप्रत्यय (मूल विचार, अर्थात् मुनाफा कमाने) से विलग नहीं होने वाला। यदि यह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वर्तमान में हिंदी मीडिया बाजार की आवश्यकता बन गया है। आज हिंदी का नीति नियंता केंद्र सरकार का राजभाषा विभाग ही नहीं बल्कि मीडिया को भी कहना चाहिए। वेबसाइटों का तेजी से होता हिंदीकरण; इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर हिंदी के नए प्रभाव को दर्शाता है। भारत का फिल्म उद्योग दुनिया का सर्वाधिक बड़ा उद्योग है। एक वर्ष में संसार के सभी देशों में भारत में सर्वाधिक फिल्में बनती हैं। मुंबई का फिल्म उद्योग पूर्णत: हिंदीमय है। ऐसे में हिंदी के अध्येता के लिए अपनी रुच्यनुसार नौकरी प्राप्त करनी है; जैसे- पटकथाकार, संवाद लेखक, गीतकार अनुवादक, अनाउंसर, विज्ञापन लेखन, प्रूफरीडर, टंकक आदि।

वर्तमान समय मीडिया का है। मीडिया की शक्ति का लोहा नहीं मानने वाला कदाचित ही कोई दिखाई दे। जिस तरह मीडिया में वातावरण और व्यवस्था के निर्माण ताकत होती है, उसी प्रकार ध्वंस करने की भी। मीडिया वह अद्भुत ज्वाला है जो अपने अंदर जीवनदायिनी और संहारिणी दोनों शक्तियों को पाले हुए है। यह हास्य और रुदन, सृजन और संहार, या शोला और शबनम जैसे अंतर्विरोधी शब्दों की सामूहिक अभिव्यक्ति है। इसका प्रयोग मानव जाति के कल्याण के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है। इसलिए आज हिंदी की उपेक्षा के अरण्य रोदन की अपेक्षा संचार संचार माध्यमों के परिप्रेक्ष्य में उसकी सामर्थ्य और सीमाओं तथा दिशाओं एवं संभावनाओं को जानना अधिक उचित होगा। बस, समय की नज़ाकत को समझें और कूद पड़े इस क्षेत्र में। जिसने समय के साथ कदमताल नहीं मिलायी वह बहुत पीछे रह जाएगा। यह समय कछुआ चाल का नहीं है, तो खरगोश चाल का भी नहीं, बल्कि दोनों के साथ मिलकर चलने का है।कभी खरगोश को अपनी पीठ पर कछुए को बिठाकर तो कभी कछुए को अपनी पीठ पर खरगोश को बिठाकर इस दौड़ को एक साथ जितना है अर्थात् समय है- मध्यम मार्ग अपनाने का।

निजी क्षेत्र में संचार माध्यमों जिनमें- टीवी, रेडियो, अखबार, पत्रिकाएँ, फिल्में, इंटरनेट, विज्ञापन आदि के साथ-साथ पर्यटक मार्गदर्शक, हिंदी अधिकारी, कॉलसेंटर-संचालक आदि भी सम्मिलित हैं। इनके साथ अन्य निम्नांकित पदों के लिए भी हिंदी के सक्षम ज्ञान वाला व्यक्ति चाहिए। यह पद एवं पदनाम है- विज्ञापन निर्माता, निवेदक (अनाउंसर), अनुवादक, हिंदी अधिकारी, राजभाषा अधिकारी, पटकथाकार, संवाद लेखक, गीतकार, संपादक, समाचार लेखक, रिपोर्टर, संवाददाता, प्रूफरीडर, पर्यटक मार्गदर्शक, डॉक्यूमेंट्री (वृतचित्र) लेखक, कॉमेंटेटर, जनसंपर्क अधिकारी, न्यूजरीडर, दुभाषिया, कॉलसेंटर, प्रश्नोत्तर कर्ता, टंकक (टाईपिस्ट) आदि। उपर्युक्त इन पदों के लिए सामान्य हिंदी का सामान्य ज्ञान; जिसमें लिखना, पढ़ना, बोलना आना चाहिए। इसके लिए सूर, तुलसी, कबीर, जायसी, मीरा, प्रसाद, पंत, निराला, अज्ञेय या प्रेमचंद, मंटो, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, देवकी नंदन खत्री आदि के गंभीर अध्येता की आवश्यकता नहीं। साहित्य का विवेचन, विश्लेषण, मूल्यांकन की नहीं। आवश्यकता है, तो केवल हिंदी भाषा के बुनियादी नियमों की जानकारी की।उच्चारण और लेखन की शुद्धता। इस कार्य को करने में कुछ महीनों की साधना है न कि वर्षों की। कुछ महीनों की साधना और फिर धन तथा यश प्राप्ति की अनंत संभावनाएँ। चयन युवा पीढ़ी को करना है। लंबे तथा कष्टप्रद रास्ते पर चले या शॉर्टकट (सीधे) तरीके से अधिक प्राप्ति वाले रास्ते पर। वैसे दोनों ही रास्तों के लिए मेहनत, लगन, परिश्रम अत्यावश्यक है।

यह बात थी आलेख के शीर्षक में आए शब्द क्यों की। 'हिंदी की तैयारी क्यों?', इस प्रश्न का उत्तर उपर्युक्त बातों को पढ़ने के बाद मिल गया होगा। अब 'कैसे?' के प्रश्न पर आते हैं; जिसमें क्षेत्र में आने वाली परेशानियों, कमियों तथा उसके निवारण के उपायों के संबंध में बात की जाएगी। सबसे महत्वपूर्ण है विषय प्रवेश के साथ संबंधित विषय की संक्षिप्त एवं सारगर्भित जानकारी। हिंदी के अध्ययन के समय हम बहुत ही सामान्य अशुद्धियाँ कर देते हैं। हमारे लेखन तथा उच्चारण स्पष्ट होने चाहिए। हिंदी की विशेषता है कि इसका लेखन एवं उच्चारण एकरूप है। लोप की प्रवृत्ति हिंदी में नहीं है। इसलिए हिंदी एक वैज्ञानिक भाषाओं में से एक है। इस आलेख में सामान्य त्रुटियों की तरफ इशारा है। अगले आलेखों में आलोच्य विषय की विस्तृत विस्तृत जानकारी संभव है। इस आलेख में विभिन्न प्रकार की सामान्य त्रुटियाँ और उनके शुद्ध रूपों को दिया जा रहा है।

विभिन्न प्रकार की त्रुटियाँ तथा उनका निवारण:
हिंदी के अध्ययन से पूर्व व्याकरण तथा भाषायी नियमों का ज्ञान जरूरी है। इसके अभाव में विभिन्न प्रकार की सामान्य सी लगने वाली गलतियाँ भी भयंकर बन जाती हैं। जब उनका अर्थ निकलेगा तो कहीं अलग ही जाकर गिरेगा। अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। छात्र की समस्त प्रकार शुभ्र छवि धूमिल हो जाएगी। इसलिए आवश्यकता है सचेत रहकर अध्ययन करने की। इन गलतियों (त्रुटियों) के निम्न प्रकार है-
1. संधि संबंधी त्रुटियाँ
2. समास संबंधित त्रुटियाँ
3. वाक्य निर्माण संबंधित त्रुटियाँ
4. शब्द या वर्तनी संबंधी त्रुटियाँ
5. अन्य अशुद्धियाँ (त्रुटियाँ)

संधि संबंधी त्रुटियाँ तथा निवारण-
इसके लिए कुछ ऐसे शब्द दिए जा रहे हैं, जिनके संधि या विच्छेद को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रहती है, जिनकी सही संधि तथा संधि-विच्छेदित रूप दोनों दिए जा रहे हैं।

सर्वप्रथम ध्यातव्य रहे कि संधि दो या दो से अधिक वर्ण तथा ध्वनियों के परस्पर मेल से उत्पन्न विकार (परिवर्तन) को कहते हैं; न कि दो या दो से अधिक शब्दों के मेल को। दो या दो से अधिक शब्दों का परस्पर मेल समास रचना कहलाता है।

शब्द (संधि) = संधिच्छेद (संधि-विच्छेद)
विश्वामित्र = विश्व+मित्र
मूसलाधार = मूसल+धार
सुखार्त = सुख+ऋत
अक्षौहिणी = अक्ष+ऊहिनी
महौषध = महा+औषध
महर्ण = महा+ऋण
कुलटा = कुल+अटा
वाचस्पति = वाच:+पति
स्वैर = स्व+ईर
अष्टावक्र = अष्ट+वक्र
दशार्ण = दश+ऋण
वनौषधि = वन+ओषधि
नीरोग = नि:+रोग
उज्ज्वल = उत्+ज्वल
मार्तंड = मार्त+अण्ड
सारंग = सार+अंग
प्रौढ़ = प्र+ऊढ़

समास संबंधी त्रुटियाँ-
सम (अच्छी तरह परस्पर) + आस (बैठाना) समास कहलाता है। अतः दो या दो से अधिक शब्दों, पदों, अवयवों का परस्पर मेल समास कहलाता है। सामासिक शब्दों को अलग-अलग करने का नाम विग्रह है। मुख्य रूप से समाज के चार रूप है, तत्पुरुष समास के दो भेद हैं। इस प्रकार कुल भेद-प्रभेद छह है। कुछ सामासिक पदों के अशुद्ध विग्रह करने पर दूसरा समास बन जाता है। अतः उनके मानक या प्रामाणिक रूप यहाँ दिए जा रहे हैं-


सामासिक पद
मानक विग्रह
अशुद्ध विग्रह
हथकड़ी
हाथ के लिये कड़ी
हाथ की कड़ी
देवबलि
देवता के लिये बलि
देवता की बलि
देशभक्ति
देश के लिये भक्ति
देश की भक्ति
कन्या विद्यालय
कन्याओं के लिये विद्यालय
कन्याओं का विद्यालय
हवन सामग्री
हवन के लिये सामग्री
हवन की सामग्री
राष्ट्रपिता
राष्ट्र का पिता
राष्ट्र के लिये पिता
हरिहर
हरि और हर
हरि, हर, आदि


वर्तनी संबंधी अशुद्धियाँ-
आमतौर पर देखा गया है कि वर्तनी संबंधी अशुद्धियाँ सर्वाधिक होती हैं। यह जाने और अनजाने दोनों तरह से हो जाती हैं। हिंदी में प्रवेश लेने से पूर्व सर्वप्रथम भाषा और व्याकरण का अध्ययन आवश्यक है। यह दोष अक्षम्य होता है। इससे अर्थ भी भिन्न निकलता है। इससे व्यक्ति की अक्षमता के साथ उसके बौद्धिक स्तर का पता चलता है। वर्तनी संबंधी अशुद्धि से उच्चारण दोष भी स्वतः ही आ जाता है। इसके लिए हमें शब्दकोश तथा व्याकरण का अध्ययन निरंतर करते रहना चाहिए। भाषा का सतत अध्ययन करने एवं शब्दकोश को निरंतर देखते रहना चाहिये। आलस्य भाव कभी अपने ऊपर हावी न होने देना चाहिए। कुछ ऐसे शब्द जो रोजमर्रा के जीवन में प्रयुक्त हैं और उनमें भयंकर त्रुटियाँ देखने को मिलती है। उत्तर पुस्तिका के मूल्यांकन के समय मूल्यांकनकर्ता को जब इस तरह की गलतियाँ दिखाई पड़ती है तब उसकी कलम करवाल (तलवार) का रूप अख्तियार कर लेती है। अतः ध्यातव्य है कि भाषा तथा व्याकरण के अध्ययन की सदैव दरकार समझे।
कुछ शब्द तथा उनका मानक (सही) स्वरूप दिया जा रहा है-
अशुद्ध रूप
शुद्ध रूप
अशुद्ध रूप
शुद्ध रूप
अहिल्या
अहल्या
कर्त्तव्य
कर्तव्य
अतिथी
अतिथि
श्रीमति
श्रीमती
उज्जवल
उज्ज्वल
चिन्ह
चिह्न
अनुसूया
अनसूया
शुश्रुर्षा
शुश्रूषा
श्रृंगार
शृंगार
सन्यासी
संन्यासी
महात्म्य
माहात्म्य
अधिशाषी
अधिशासी
अनुग्रहीत
अनुगृहीत
अनेकों
अनेक
अपरान्ह
अपराह्न
आशिर्वाद
आशीर्वाद
उपरोक्त
उपर्युक्त
बारात
बरात
कवियत्री
कवयित्री
रचियिता
रचयिता
क्षिती / छिति
क्षिति
गीतांजली
गीतांजलि
छिपकिली
छिपकली
झौंपड़ी
झोंपड़ी
त्यौहार
त्योहार
न्यौछावर
न्योछावर
द्वारिका
द्वारका
ध्वनी
ध्वनि
निरोग
नीरोग
नींबू
नीबू
निरिक्षण
निरीक्षण
निहारिका
नीहारिका
पुरुस्कार
पुरस्कार
पुनरावलोकन
पुनरवलोकन
पूज्यनीय
पूजनीय
प्रज्ज्वलित
प्रज्वलित
प्रतिलिपी
प्रतिलिपि
प्रतिलिप्याधिकार
प्रतिलिप्यधिकार
बाल्मीकी
वाल्मीकि
भारवी
भारवि
मैथलीशरण
मैथिलीशरण
याज्ञवलक्य
याज्ञवल्क्य
रविंद्र
रवींद्र
व्यवहारिक
व्यावहारिक
मृत्यू
मृत्यु
प्रस्तुतिकरण
प्रस्तुतीकरण
हेतु
हेतु
हानी
हानि
मिश्री
मिस्री
सूचिपत्र
सूचीपत्र
स्वातंत्रयोतर
स्वातंत्र्योत्तर
शुद्धिकरण
शुद्धीकरण
शुद्धी
शुद्धि
वापिस
वापस
विधी
विधि
बिभीषन
विभीषण
व्यस्क
वयस्क
शारीरीक
शारीरिक
मानवीयकरण
मानवीकरण
अतिश्योक्ति
अतिशयोक्ति
मारुती
मारुति
मिष्ठान
मिष्ठान्न

वाक्य संबंधी अशुद्धियाँ-
मनुष्य अपने भाव एवं विचारों को प्रकट करने के लिए शब्दों का सहारा लेता है। शब्दों को एक क्रम में रखकर अर्थ की दृष्टि से सही और स्पष्ट प्रयोग हम वाक्य के माध्यम से प्रकट करते हैं। वाक्य के दो अंग (अवयव) हैं - उद्देश्य और विधेय। जिस वस्तु के विषय में कुछ कहा जाता है, वह उद्देश्य तथा उद्देश्य के विषय में जो कुछ कहा जाता है, उसे सूचित करने वाले शब्दों को विधेय कहते हैं।

वाक्य निर्माण के नियम बने हुए हैं, परंतु उनके अध्ययन के अभाव में हम अनेक प्रकार से अशुद्धियाँ, त्रुटियाँ करते चले जाते हैं, जिनका भाव स्वयं लिखने वाले को भी नहीं होता। इन अशुद्धियों में हैं- संज्ञा संबंधी, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, लिंग, वचन, कारक (परसर्ग) के प्रयोग, अव्यय, पदक्रम, द्विरुक्ति, पुनरुक्ति, अधिक पदत्व, विराम चिह्न आदि के प्रयोग संबंधी त्रुटियाँ। इसके लिए आवश्यक है संपूर्ण व्याकरण का गंभीर अध्ययन।
वाक्य संबंधी अशुद्धियों के कतिपय उदाहरण हैं-
अशुद्ध वाक्य
शुद्ध वाक्य
वृक्षों पर कोयल बोल रहा है।
वृक्ष पर कोयल कूक रहा है।
मैंने गुरु का दर्शन किया।
मैंने गुरु के दर्शन किये।
गाय का दूध गर्म पीना चाहिए।
गाय का गर्म दूध पीना चाहिए।
भीड़ में चार जयपुर के व्यक्ति थे।
भीड़ में जयपुर के चार व्यक्ति थे।
मौर्यकालीन समय में लोग सुखी थे।
मौर्य काल में लोग सुखी थे।
मैं प्रातः काल के समय घूमने जाता हूँ।
मैं प्रातः काल घूमने जाता हूँ।
श्री कृष्ण के अनेकों नाम है।
श्री कृष्ण के अनेक नाम हैं।
कश्मीर में अनेक दर्शनीय स्थल देखने योग्य हैं।
कश्मीर में अनेक दर्शनीय स्थल हैं।
देवता के लिए एक फूलों की माला लाना।
देवता के लिए फूलों की एक माला लाना।
खरगोश को काटकर गाजर खिलाओ।
गाजर को काटकर खरगोश को खिलाओ।

अन्य त्रुटियाँ-
व्याकरण अध्ययन के अभाव के कारण हम आम तौर पर अपने लेखन में उपर्युक्त अशुद्धियाँ करते हैं। इसके अतिरिक्त व्याकरण के विविध पक्षों, यथा- संज्ञा, सर्वनाम, उपसर्ग, प्रत्यय, विराम-चिह्न आदि का प्रयोग संबंधी अन्य अशुद्धियाँ सामान्यतः देखी जा सकती है। इसके विद्यार्थियों को चाहिए कि प्रत्येक अध्याय का एक बारगी अध्ययन करें तथा उसकों व्यवहार में लाते रहे। इससे त्रुटि शोधन होता रहेगा।

सामान्य एवं विशेष हिंदी यानी व्याकरण तथा साहित्यिक हिंदी की यह शृंखला इस आलेख (हिंदी: क्यों और कैसे) से शुरू होकर आगे तक जाएगी, जिसमें भाषा, बोली, लिपि, व्याकरण तथा साहित्य के लगभग प्रत्येक भागों पर आलेख लेखन होगा। यह आलेख प्रतियोगितापरक होगा। अर्थात् विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सम्मिलित हिंदी पाठ्यक्रम को दृष्टिगत रखा जाएगा। तत्पश्चात् पाठ्यक्रम आधारित होने वाली सामान्य जानकारी पाठकों तथा प्रतियोगियों को देना हमारा मुख्य ध्येय होगा।

एक प्रकार से यह प्रयोजनमूलक हिंदी का ही एक रूप है। प्रयोजनपरक हिंदी का यह रूप विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल भी किया गया है। यह समय की मांग और आवश्यकता है जिसे अनेक विश्वविद्यालयों के अनेक शिक्षकों तथा छात्रों ने समझा है। आवश्यकता यह होनी चाहिए कि यह समझ केवल किताबी न रहकर व्यावहारिक हो सके।

इस प्रकार “हिंदी: क्यों और कैसे” शीर्षक का मूल भाव समझ में आ गया होगा। शीर्षक पढ़ते ही उत्तर पाने की जो जिज्ञासा मस्तिष्क में उत्पन्न हुई उसका जवाब स्वतः ही मिल गया होगा। कदाचित हमारी बात दूर तक जाएगी, यही हमारी आशा है और विश्वास भी।

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