काव्य: चन्द्रगत भारती

1
इधर उधर बेचैन घूमता,
गीत विरह के गाता है!
ढाई आखर के उलझन में,
पागल मन घबराता है!
**
आस मिलन की उससे करता,
पर कोई उम्मीद नहीं!
 जिधर देखता हूँ छवि उसकी
दूर तलक है नींद नहीं!
पल पल उसकी यादों का बस,
झोंका आता जाता है!
ढाई आखर  ... .
**
भावों में विह्वल हो जाता,
धड़कन ये बढ़ जाती है!
हृदय चूमता उसकी छवि को
वो मुझको तड़पाती है!
उसमें ही दिल खोया रहकर
दिल को ही समझाता है!
ढाई आखर ...
**
बैठी दोनों भोली आँखे
रात रात भर रोती हैं!
घात लगा जिसमे पीड़ायें
अपना आँचल धोती है
जाने किस दुनिया से चलकर
आँसू राह बनाता है।।
*****

2
व्यथा किसी से कुछ भी अपनी,
कब कह पाती रे
आती है जब याद तुम्हारी,
बेहद आती रे।।

देख तुम्हारी छवि को ही ये,
सूरज आँखे खोले!
सोंच तुम्हे बेसुध हो जाती,
जब कोयलिया बोले!
पनघट पर नयनो की गागर,
मै छलकाती रे।। 
आती है जब ...

मै हूं प्रियतम प्रेम दिवानी,
जबसे सबने जाना!
बुलबुल मोर पपीहा निशदिन,
कसते मुझपर ताना!
मुई चाँदनी देख मुझे बस,
मुह बिचकाती रे।।
आती है जब ...

आ जाओ हरजाई वरना,
तुमको दूंगी गाली!
बिना तुम्हारे जग लगता है,
बिल्कुल खाली खाली!
और मस्त पुरवायी दिल मे,
आग लगाती रे।। 
आती है जब ...

मुझे गुलाबी भी दिखता है,
तुम बिन बिल्कुल काला!
तुम दीपक हो इस जीवन के,
आओ करो उजाला!
तुम बिन साजन जली जा रही,
जैसे बाती रे।।
आती है जब ...
*****

3
आहट आते ही फागुन की,
याद तुम्हारी आयी है
खुशबू जैसे आज तुम्हारी
यह पुरवायी लायी है
**
खूब मचानों पर हम दोनो,
पंछी बैठ उड़ाते थे!
और कभी तो बेमतलब ही 
आपस मे लड़ जाते थे! 
सच मे गुजरा वक्त सोचना
मीत बहुत सुखदायी है।।
**
डूबा रहता सिर्फ तुम्ही मे
मन कुछ समझ न पाता है!
तन्हाई मे विह्वल होकर,
गीत प्रेम के गाता है!
बिना तुम्हारे यहाँ उदासी
बदली बनकर छायी है।।
**
मुद्दत से हम नही मिले पर 
प्यार आज भी जिन्दा है!
निभा न पाये कसमें वादे
दिल बेहद शर्मिन्दा है!
आज मचलकर इन आँखों में
जैसे नदी समायी है।।
*****

4
*दुनिया का हर रतन छुपा है,*
*हिन्दुस्तानी माटी  मे।*
*सुभाष, उधम,भगत सिंह, जन्मे*
*इस बलिदानी माटी में।*
**
इसी देश के ॠषि मुनियों  ने,
ज्ञान दिया विज्ञान दिया!
इस  धरती  ने शून्य दशमलव,
दे जग में अहसान किया!
ईश्वर की हर कला मिलेगी,
इस कल्याणी माटी मे।
**
जननी, जन्मभूमि औ' गुरु की,
घर-घर पूजा होती है!
यहीं पे पावन गंगा बहती ,
पाप सभी के धोती है!
जियें  मरें हम देश की खातिर
लिखें  कहानी माटी मे।
**
जग जननी ने इसी धरा पर,
आकर के अवतार लिया!
मानवता के हर दुश्मन का,
गिन गिन कर संघार किया!
कण -कण में हैं आदि शक्ति माँ
इसी पुरानी माटी में ।
**
वक्त आ गया देश हमारा,
योग का पाठ पढ़ायेगा!
दर्शन आकर करेगी दुनिया,
भारत राह दिखायेगा!
अब भी जीवित हर विद्या है


इस विज्ञानी माटी में।

5 comments :

  1. मनमोहक भावपूर्ण गीत बधाई हो

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय

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  2. बहुत सुन्दर गीत।
    हार्दिक बधाई 💐

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  3. बहुत बहुत बधाइयाँ सुन्दर सरस काव्य

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  4. Bahut hi acha feelings se bhara hua.

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