चित्वा तृणं तृणम् : बालमन की अभिव्यक्ति

डॉ. अरुण कुमार निषाद

अरुण कुमार निषाद

असिस्टेण्ट प्रोफेसर (संस्कृत विभाग), 
मदर टेरेसा महिला महाविद्यालय, द्वारिकागंज, कटकाखानपुर, सुल्तानपुर, उ.प्र.

शोधसार
बालमन को ध्यान में रखकर जो साहित्य लिखा जाता है, वह बाल साहित्य कहलाता है इस साहित्य की प्रमुख विधायें हैं- कविता, कहानी, नाटक, लेख, जीवनी, संस्मरण, पहेली, चुटकुले आदि। भारतवर्ष में बाल साहित्य की परम्परा प्राचीनकाल से रही है। पञ्चतन्त्र और हितोपदेश की कहानियों में पशु-पक्षियों को माध्यम बनाकर बच्चों को बड़ी शिक्षाप्रद प्रेरणा दी गयी है। सिंहासन बत्तीसी, बेताल पच्चीसी तथा जातक कथाएँ भी इसी बाल साहित्य के अन्तर्गत हैं। पहले इसका स्वरूप श्रुति परम्परा पर आधारित था। बच्चों का नानी-दादी से अधिक लगा इन्हीं किस्से-कहानियों के कारण अधिक होता था। आज समाज में बढ़ते एकल परिवार और इंटरनेट की दुनिया ने इस परम्परा में दरार पैदा कर दिया है। बाल साहित्य का उद्देश्य बालपाठकों का मनोरंजन करना ही नहीं, अपितु उन्हें जीवन की सच्चाइयों से परिचित कराना है दिल्ली संस्कृत अकादमी, उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान लखनऊ, राष्ट्रीय बाल भवन जैसी संस्थाएँ समय-समय पर बच्चों के लिए विविध कार्यक्रम कराती रहती हैं। मुम्बई के प्रोफेसर मदन मोहन झा में बच्चों के लिए संस्कृत में कामिक्स लिखना प्रारम्भ किया है। बहुत सारी संस्कृत पुस्तकों का मोबाइल एप  बनाया है। गुजरात के शिक्षक जगदीश डाभी ने बच्चों के लिए संस्कृत अंत्याक्षरी प्रतियोगिता का फेसबुक लाइव प्रसारण शुरू किया है।

चित्वा तृणं तृणम् को साहित्य अकादमी
का बाल साहित्य 2019 सम्मान मिला है
इस विषय में खलील जिब्रान का कहना है-
तुम उन्हें अपना प्यार दे सकते हो, लेकिन विचार नहीं, क्योंकि उनके पास अपने विचार होते हैं। तुम उनका शरीर बन्द कर सकते हो, लेकिन आत्मा नहीं, क्योंकि उनका आत्मा आने वाले कल में निवास करता है, उसे तुम नहीं दे सकते हो। सपने में भी नहीं दे सकते हो। तुम उनकी तरह बनने का प्रयत्न कर सकते हो, लेकिन उन्हें अपने जैसा बनने की इच्छा मत रखना, क्योंकि जीवन पीछे की ओर नहीं जाता और ना ही बीते हुए कल के साथ रुकता ही है
किसी कवि ने लिखा है
बच्चे तो हैं गीली मिट्टी
चाहे जैसे उन्हें बना लो
चाहे सुंदर कलशबना लो
या फिर ढेला उन्हें बना लो।

प्रस्तुत शोधपत्र में संस्कृत बाल साहित्य पर कार्य करने वाले समकालीन रचनाकार डॉ.संजय कुमार चौबे के ‘चित्वा तृणं  तृणम्’ बालगीतिमालिका पर विस्तृत चर्चा की गयी है।

कीवर्ड : बाल साहित्य, तब और अब, संस्कृत रचनाकार।

बाल साहित्य के अन्तर्गत वह शिक्षाप्रद साहित्य आता है, जिसका लेखन बच्चों के मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर किया गया हो। बाल साहित्य में रोचक शिक्षाप्रद बाल कहानियाँ, बालगीत व कविताएँ प्रमुख हैं। संस्कृत साहित्य में बाल साहित्य की परम्परा बहुत समृद्ध है। पञ्चतन्त्र की कथाएँ बाल साहित्य का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। संस्कृत बाल साहित्य लेखन की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। पञ्चतन्त्र और हितोपदेश की कहानियों में पशु-पक्षियों को माध्यम बनाकर बच्चों को बड़ी शिक्षाप्रद प्रेरणा दी गयी है। बाल साहित्य के अन्तर्गत बाल कथाएँ, बाल कहानियाँ व बाल कविताएँ सम्मिलित की गयी हैं।

डॉ. संजय कुमार चौबे
          कवि डॉ. संजय कुमार चौबे का जन्म 19 जनवरी 1984 ई. को बक्सर (बिहार) जिले के राजापुर (गोसाईपुर) गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम शोभनाथ चौबे तथा माता का नाम श्रीमती हीरामुनि देवी है। डॉ. चौबे वर्तमान में दिल्ली में प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक पद पर कार्यरत हैं।   


‘सूर्य:’ कविता में डॉ. चौबे लिखते हैं कि सूर्य हमारे जीवन का मूलाधार है। जो हमें अहर्निश कार्य करने की प्रेरणा देता रहता है। वह मनुष्य को यह बतलाता है कि- जिस प्रकार मैं अपने कार्य में आलस्य नहीं करता, उसी प्रकार हे बच्चों! आपको भी आलस्य नहीं करना चाहिए।
निजकार्यमयं नहि विस्मरति।
उदेति नित्यं तमांसि हरति।[1]

 ‘यदा भविष्यत्यवकाशो मे’ कविता में डॉ. चौबे ने बच्चों की स्वाभाविक बातों का वर्णन किया है।  प्रत्येक बच्चे की यह इच्छा होती है कि-जल्दी से स्कूल में अवकाश हो और ननिहाल जाने का अवसर प्राप्त हो, क्योंकि ननिहाल में हम कोई भी शैतानी कर सकते हैं, कारण हम कहाँ नाना-नानी, मामा-मामी, मौसी सबके दुलारे होते हैं।
यदा भविष्यत्यवकाशो मे मातुलगेहे यास्यामि 
                            * *               *
सर्वं   रमणीयं वृत्तान्तं मुदा जीवने ध्यास्यामि।[2]
बचपन से ही बच्चों में अच्छे संस्कार उत्पन्न हों इसके लिए कवि ने अपने काव्य संग्रह में ‘भाति संस्कृतम्’ कविता में डॉ. चौबे कहते हैं कि-यह संस्कृत ही है जो हमें एकता के सूत्र में बाँधती है।
विश्वं प्रगाढसूत्रे बध्नाति संस्कृतम्।[3]

‘चित्वा तृणं तृणम्’ शीर्षक कविता के द्वारा कवि शिक्षा देता है कि परिश्रम के द्वारा ही हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। अकर्मण्य व्यक्ति को जीवन में कुछ नहीं प्राप्त हो सकता। इसलिए बच्चों अगर जीवन में कुछ बनना है तो परिश्रम करना होगा।
यत्नेन सर्वथा लक्ष्यं निजं लभन्ते।[4]

‘बाल जिज्ञासा’ कविता में बालक की स्वाभाविक मनोवृत्ति को दिखाया गया है। बात-बात पर प्रश्न करना बच्चों की आदत है। बात-बात पर वह जिज्ञासा करता है –क्यों? कैसे? कहाँ? कौन? कब?
कथमुज्जवलं दुग्धं मात:?
*  * *  
कदा         शेरते    सुन्दरतारा ।[5]
वृक्षों की संख्या कटाई के कारण धीरे-धीरे कम हो गयी है। इस पर चिन्ता करते हुए डॉ. चौबे कहते हैं कि- हे बच्चों प्रत्येक व्यक्ति को वृक्ष लगाना चाहिए क्योंकि वृक्ष से हमे आक्सीजन मिलती है और आक्सीजन हमारे जीवन के लिए आवश्यक है।
ग्रामस्यायं वृत्तं कथयति
वायुं नित्यं दिक्षु प्रथयति।
हरते श्रान्तिं पथिकजनानां
यथा सीकर: परिशुद्ध:।[6]

स्मितं तदेवं वत्स! कविता में डॉ. चौबे संतान के महत्त्व को बताते हुए लिखते हैं कि संतान का होना जीवन का सबसे बड़ा आनन्द है। जीवन में इससे बढ़कर कोई आनन्द नहीं। दुनिया की सारी खुशी और सारी दौलत इसके सामने बेकार है।
स्मितं तदेवं वत्स निश्छ्लं
शतशो व्याधिं हरते।
लोकवैभवं तुच्छं विदधत्
सततं सौख्यं तनुते।[7]

‘हे पित:!श्रूयताम्’ कविता में कवि ने बच्चों  की इच्छा को दर्शाया है।
श्रूयतां श्रूयतां हे पित: श्रूयतां
मत्कृते यानमेकं महद् दीयाताम्।[8]

‘धूर्तो बक:’ कविता में कवि बच्चों को शिक्षा देता है कि दुर्बल को नहीं सताना चाहिए। किसी को धोखा देना पाप है।
यो हि दुर्बलस्तस्य वञ्चने
अपराधो भवतीह पीडने
करुणायां सेवायां धर्मे
मूलं वसति सुखस्य सखे।[9]

‘रुचिरं रुचिरं क्रीडनकम्’ कविता में डॉ. चौबे ने बच्चों की चेष्टाओं को दिखाया है। 
आपणतश्चानीतवती मे
माता मह्यं क्रीडनकम्
तुभ्यं नैव ददामि सखेऽहं
रुचिरं रुचिरं क्रीडनकम्।[10]

डॉ. चौबे बच्चों से कहते हैं कि हे बच्चों कभी भी व्यर्थ में अपने समय को नष्ट न करो क्योंकि चला गया समय पुनः वापस नहीं आता है।
अपरिमित हि धनं नहि लोके समयक्रयणे क्वचित् क्षमम्
कालक्षेपं कृत्वा देवोऽपीह न लभते महत् पदम्
कालं नत्वा यतोऽन्तरिक्षे यश: पताकां स्थापय।[11]

‘द्वादशमासिकी’ कविता में कवि ने वर्ष के बारहों महीनों के मुख्य-मुख्य त्यौहारों का वर्णन किया है।
श्रीरामो हि ... ... ... भाद्रमासे।[12]

‘उलूक:’ कविता के माध्यम से कवि सन्देश देता हैं कि-हे बच्चों अगर आप आलस्य नहीं करोगे पढाई करोगे तो कोई भी आपको कभी उल्लू नहीं बोलेगा।
भवेयु: कवचिन्नैव बाला उलूका:
अविद्यायुतास्तन्द्रिता नैव मूका:।[13]

‘एहि एहि पिक!’ कविता में डॉ. चौबे लिखते हैं कि व्यक्ति का शरीर कला हुआ तो क्या हुआ मन तो साफ है। संसार में बहुत से ऐसे व्यक्ति होते हैं जो तन से तो गोरे होते हैं पर मन में उनके विष भरा होता है। इसलिए बच्चों कभी भी काले-गोरे के नाम पर किसी से भेदभाव मत करना।
एहि एहि पिक मम उद्याने
श्रावय रे नवगीतिम्
मनो व्याकुलं त्वां विना मे
वर्धय नितरां प्रीतिम्।    
कृष्णो देहस्तेन हि किं रे
भवताद गुणों विशुद्ध:
मधुरभाषणं सुखदं भूय:
लोको वदति प्रबुद्ध:।[14]

कवि बच्चों से कहता है कि –कभी भी भाग्य का रोना नहीं रोना चाहिए, बल्कि व्यक्ति को किसी भी कार्य में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देनी चाहिए। जब सफल न हो जाए।
यदि जायते क्वचिन्नो यत्नेऽपि रम्यसिद्धि:।
दृष्ट्वा स्वदोषजालं भूयोऽपि शोधनीयम्।
कृत्वा सदोन्नतं शिरस्तु शूरवीरवत्
यावञ्जयो न तावद् हृदयेन योधनीयम्।[15]

डॉ. चौबे कहते हैं कि बच्चों हमें सदैव ऐसा कार्य करना चाहिए करना चाहिए जिससे हमारे राष्ट्र की उन्नति हो।
राष्ट्रस्य ... ... ... कैश्चन बन्धनम्।[16]

‘दर्दुरस्य विवाह:’ एक हास्य बाल कविता है।
यौतुकं वर: रुष्टश्च याचते
मुहुर्मुहु: स्वस्य गृहं पलायते
दर्दुरा स्वयं बहु वीक्ष्य नाटकम्
अकरोत् सद्य: विवाहखण्डनम्
भग्नो विवाहस्तस्य त्विदानीम्
दर्दुरो रोदिति प्राप्य हानिम्।[17]

‘वयं बालका भारतभूता:’ कविता में कवि भारत में जन्म लेने वाले यशस्वी बालकों के विषय में बतलाया है।
वयं बालका भारतभूता ... ... ... परंतपा मेधाविन:।[18]

‘आयास:’ नामक अन्तिम कविता में  डॉ. चौबे लिखते हैं कि-बिना परिश्रम के कुछ नहीं हो सकता। इसलिए हे बच्चों अगर सफलता पाना है तो परिश्रम करो।

उत्कर्षं ... ... ... लोके ध्रुवं पावने।[19]

सारांशत: यह कहा जा सकता है कि संस्कृत का जो बाल साहित्य प्राचीन काल से ही अपनी उन्नत अवस्था में था आज भी उसमें कोई कमी नहीं आई है। आज भी प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र, डॉ. रमाकान्त शुक्ल, प्रो. राधा वल्लभ त्रिपाठी, प्रो. राम सुमेर यादव, प्रो. बृजेश कुमार शुक्ल, डॉ. उमाकान्त शुक्ल, डॉ. महेश झा, डॉ. सम्पदानन्द मिश्र, डॉ. वर्षा शरद, डॉ. के. वरलक्ष्मी, डॉ. इच्छाराम द्विवेदी, डॉ. जनार्दन हेगड़े, डॉ. नवलता, डॉ. रेखा शुक्ला, डॉ. कौशल तिवारी, डॉ. राम विनय सिंह, डॉ. वनमाली विश्वाल, डॉ. हर्षदेव माधव, डॉ. अरविन्द तिवारी इत्यादि रचनाकार इसमें श्रीवृद्धि कर रहे हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि समकालीन समय में भी संस्कृत में बाल साहित्य रचनाकारों की कमी नहीं है।

सन्दर्भ-ग्रन्थ-
1.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 26
2.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 28
3.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 32
4.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 34
5.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 38
6.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 42
7.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 44
8.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 46
9.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 48
10.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 50
11.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 52
12.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 56
13.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 60
14.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 63
15.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 66
16.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 76
17.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 79
18.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 82-83
19.चित्वा तृणं तृणम् (बालगीतिमालिका), डॉ.संजय कुमार चौबे, प्रगतिशील प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017 ई., पृष्ठ संख्या 88

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।