पुस्तक समीक्षा: पल जो यूँ गुज़रे

समीक्षक: लालचंद गुप्त 'मंगल'

पल जो यूँ गुज़रे - उपन्यास
लेखक: लाजपत राय गर्ग, पंचकूला (हरियाणा)
प्रकाशन वर्ष: 2019
पृष्ठ: 216
प्रकाशक : दिशा प्रकाशन, 138/16, त्रिनगर, दिल्ली-110035
मूल्य: ₹ 450/-
ISBN: 978-93-84713-47-8

        'पल जो यूँ गुज़रे' कि 200 पृष्ठों का एक भरा-पूरा उपन्यास ही तैयार हो गया। लाजपत राय गर्ग उपन्यास लिखें, और उसमें प्यार की पींगें न हों, यह हो नहीं सकता। यहाँ भारत-विभाजन तथा अन्यान्य सम्बद्ध कथा-कहानियाँ तो बहाना हैं, मात्र 'संयोग' रूप में उपस्थित हैं; असली मक़सद तो जाह्नवी-निर्मल की प्रेम-कहानी का वातायन तैयार करना है। शिमला की धनाढ्य जाह्नवी और सिरसा के निम्नमध्यवर्गीय निर्मल के परस्पर प्रेमांकुर से प्रेमतरु बनने की यह गाथा "अगर हम आपसे यूँ ही मिलते रहे, तो देखिये एक दिन प्यार हो जाएगा" गीत को पूर्णतया चरितार्थ करती है। श्लील-स्वस्थ, संयमित-संस्कारित, ऊर्जस्वी-मर्यादित और जीवन्त-आदर्श की ऐसी प्रेम-लीला रची उपन्यासकार ने कि मुझ सरीखी सूखी लकड़ी में भी हरीतिमा का संचार होने लगा और, 'पुनर्मूषको भव' न सही, जवानी के सपने लेने लगा। प्रेम-सागर की गहराई को कौन माप सका है! बिहारी कह ही गये हैं - "अनबूड़े बूढ़े तरे........।"

         छोटे-मोटे प्रकरणों-प्रसंगों के कुलावे भिड़ाने में माहिर उपन्यासकार जब प्रेम-पत्र लिखने बैठता है, तो, सारी शालीनता और मर्यादा के साथ, लक्षणा-व्यंजना के बहाने, सारे गूढ़ार्थ को पाठक के सामने उड़ेल देता है। फिर, रस की जो बूंदें टपकने लगती हैं, उन्हें लपकने-सहेजने से पाठक स्वयं को रोक ही नहीं पाता। मनोविज्ञानवेत्ता हो, तो लाजपत राय जैसा! तह में जाकर अर्थ-रत्न खोज लेना कोई इनसे सीखे! सुष्ठु जीवन-दर्शन और सजीव प्रेम-दर्शन का ऐसा सुमेल अन्यत्र दुर्लभ है।
       प्रस्तुत उपन्यास लेखक के व्यापक जीवन-बोध और दीर्घ अनुभव का भी बाखूबी द्योतन करता है। उनकी ज्ञानगूढ़ता की परिचायक उनकी सूक्तियाँ तो हैं ही, उनकी वर्णन-विश्लेषण क्षमता भी बेजोड़ है। यदि आप दृश्य-अदृश्य जगत् के किसी तत्त्व-विशेष की जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो लाजपत राय गर्ग के 'गूगल' को सर्च कीजिए; सब कुछ रेडीमेड मिलेगा। यह उपलब्धि बहुत कम साहित्यकारों के पास है। प्रागैतिहास से लेकर प्रकृति-पर्यावरण तक की स्थूल-सूक्षय जानकारी का ऐसा अद्भुत भण्डार है उपन्यासकार के पास कि दाँतों तले उंगली दबानी पड़ती है।

      कुल मिलाकर, परिस्थिति-परिवेश का रोचक-रोमांचक बिम्बन, सजीली-सपनीली भाषा का मनोहारी संयोजन, पूर्वदीप्ति शैली तथा संस्मरण-बहुलता का गठजोड़ प्रस्तुत उपन्यास की गुणवत्ता को द्विगुणित कर देता है। साहित्यिक उपन्यास-कला से भरपूर इस पठनीय-संग्रहणीय उपन्यास का स्वागत करते हुए मैं स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहा हूँ। नयी पीढ़ी को तो इस उपन्यास का पारायण करना ही चाहिए। बधाई! बधाई! बधाई! चरैवेति-चरैवेति।

1 comment :

  1. पुस्तक को पढ़ने के लिए प्रेरित करती समीक्षा।
    पुस्तक के लेखक का फोटो कौन सा है और समीक्षक का कौनसा, यह समीक्षा देखकर पता नहीं चल रहा। संपादक मण्डल द्वारा फोटोज के नीचे नाम न दिए जाने के कारण।

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।