पुस्तक समीक्षा: रावण-वध (खण्ड काव्य)

समीक्षक:  दिनेश पाठक ‘शशि’ 

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 941 272 7361; ईमेल: drdinesh57@gmail.com


पुस्तक: रावण-वध (खण्ड काव्य) 
लेखक: श्री शीलेन्द्र कुमार वशिष्ठ,   
ISBN:  978-81-7408-969-4
संस्करण: 2016; मूल्य: ₹ 250 रुपये; पृष्ठ: 128
प्रकाशक: अयन प्रकाशन, महरौली, नयी दिल्ली

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ से जयशंकर प्रसाद नामित पुरस्कार प्राप्त पुस्तक रावण-वध खण्ड काव्य श्री शीलेन्द्र कुमार वशिष्ठ द्वारा पूर्ण अविकल और उज्ज्र्वसित भाव से लिखा गया खण्ड-काव्य है।

रावण-वध की रचना का विचार, रचनाकार के मन में क्योंकर पैदा हुआ जबकि वाल्मीकि कृत रामायण, तुलसीदास कृत रामचरित मानस और वेद व्यास जी द्वारा अध्यात्म रामायण की रचना पहले ही की जा चुकी थीं और रावण-वध का वर्णन भी इन सभी में किया जा चुका था।

उक्त तीनों रामायणों के गहन अध्ययन के परिणाम स्वरूप तुलसीदास कृत रामचरित मानस में वर्णित विभीषण के चरित्र ने सम्भवतया रचनाकार श्रीशीलेन्द्र कुमार वशिष्ठ जी के दिल में कहीं कसक पैदा की और उन्होंने रावण-वध की रचना कर डाली।

पुस्तक की भूमिका में वशिष्ठ जी स्वयं लिखते हैं कि वाल्मीकि रामायण में रावण द्वारा विभीषण पर पद-प्रहार किए जाने, विभीषण द्वारा रावण की नाभि में अमृत के रहस्य का उद्घाटन किए जाने और रावण-वध के लिए उस अमृत को नष्ट करने की सलाह श्रीराम को दिए जाने का कोई उल्लेख नहीं है। वह आगे लिखते हैं कि इसी प्रकार वाल्मीकि रामायण में रावण द्वारा विभीषण पर पद प्रहार किए जाने अथवा खड्ग लेकर मारने के लिए दौ़ड़कर आने का उल्लेख भी नहीं है इसलिए यह आश्चर्यजनक है कि जब रामकथा पर सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण में ये दोनों प्रसंग हैं ही नहीं तो फिर भारतीय जन-मानस में ये जन-श्रुतियाँ इतनी गहराई के साथ क्यों बैठ गईं हैं?

दिनेश पाठक ‘शशि’

विद्वान रचनाकार श्री शीलेन्द्र कुमार वशिष्ठ जी ने अपने जिज्ञासु मन को सन्तुष्ट करने के लिए कई ग्रन्थो का अध्ययन किया और पाया कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। साहित्यकार समाज में घटित घटनाओं से अवश्य ही प्रभावित होता है। वाल्मीकि जी ने राजा रामचंद्र जी के समय त्रेता युग के सामाजिक न्याय और व्यवहार को दृष्टिगत करते हुए रामायण में घटनाओं का वर्णन किया किन्तु उसके बाद द्वापर में वेद व्यास जी ने महाभारत कालीन राजन्य वर्ग के पारिवारिक छल-कपट को निकट से देखा था। कौरव-पाण्डवों के रूप में एक भाई के विनाश में दूसरे भाई को षड़यन्त्र करते देखा था अतः अध्यात्म रामायण की कहानी में भी उन्हें भ्रातृ-द्रोह का दुष्परिणाम दिखाना था। एक साहित्यकार होने के नाते वेद व्यास जी को अपने समय की विसंगतियों का चित्रण करना उनका साहित्यिक धर्म था।
गोस्वामी तुलसीदास जी, वेदव्यास जी से भी दो कदम आगे बढ़ गये और उन्होंने रामचरित मानस में जो लिखा वह वाल्मीकि कृत रामायण से कहीं अधिक वेद व्यास जी कृत अध्यात्मरामायण से प्रभावित होकर लिखा।

वस्तुतः साहित्य में सामयिक सन्दर्भों के समावेश के लिए ही साहित्य का बार-बार पुनर्लेखन होता है। श्री शीलेन्द्र कुमार वशिष्ठ जी ने भी वर्तमान सामाजिक विसंगतियों, धर्म के पतन एवं रूढ़ियों के वशीभूत प्राणियों के अवपतन और श्रीकृष्ण के “यदा-यदा हि धर्मस्य...” की पुष्टि के लिए एक बार पुनः “रावण-वध” जैसे खण्ड-काव्य की रचना कर डाली।

“रावण-वध” खण्ड-काव्य में पाँच सर्ग हैं। प्रथम सर्ग में -”ईश-वन्दना” से प्रारम्भ करने की, भारतीय परम्परा का निर्वहन करते हुए श्री शीलेन्द्र कुमार वशिष्ठ जी ने सर्व प्रथम गणेश जी की वन्दना की है फिर विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती को नमन करते हुए श्री राम, लक्ष्मण, जानकी और हनुमान जी का स्मरण किया है।

सामयिक सामाजिक परिस्थितियों से प्रभावित रचनाकार के मन में कुछ परिवर्तन के लिए आकुलता दृष्टव्य है-
“पाप के विनाश को, पुण्य के प्रकाश को
युद्ध-मग्न राम हैं, धर्म-पुनर्वास को।”  (पृष्ठ-31)

देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, अनाचार और यौनाचार और तत्कालीन आतंकवाद का वर्णन रचनाकार ने रावण-वध के दूसरे सर्ग में माँ सीता के पहरे पर तैनात जन्म से राक्षसी किन्तु मन से पवित्र, त्रिजटा के मुख से कहलवाया है-
“याद करो राक्षसी उपद्रव, नग्न प्रदर्शन, यौनाचार।
लूटपाट, आतंक, बवंडर, जबरन कब्जा, भ्रष्टाचार।
कहर सनातन संस्कृति पर, ये क्रूर निशाचर ढाते हैं।
भारत की सीमा में घुसकर, भीषण आतंक मचाते हैं। (पृष्ठ-37)

परिवर्तन की हवा का आवाहन करते हुए रचनाकार श्री शीलेन्द्र कुमार वशिष्ठ जी ने त्रिजटा के ही मुख से पुनः कहलवाया है कि -
“आज लोकमत साथ राम के, और न्याय भी उनके साथ।
है असत्य का पतन सुनिश्चित, और सत्य का विजय प्रभात।” (पृष्ठ-39)
“रावण की कुकर्म लीला से, फूट रहा नित क्रन्दन था।
इस पल की कर रहा प्रतीक्षा, जाने कब से जन-जन था। (पृष्ठ-44)

परिवर्तन की हवा के साथ रावण-वध के तीसरे सर्ग में राम-रावण युद्ध प्रारम्भ हो चुका है। बहुमत की हवा देखकर रावण रूपी कुशासन मन ही मन कुपित होता है और अपने मन की भड़ास और अपने कुत्सित विचारों को कुछ इस तरह व्यक्त करता है-
“राम को भगवान मैं बनने न दूँगा।
धर्म का व्यापार, यूँ चलने न दूँगा। (पृष्ठ-64)
राम का सिर फोड़ दूँगा, सेतु को मैं तोड़ दूँगा।
और अपने पक्ष में जन-मत समूचा मोड़ लूँगा। (पृष्ठ-65)

इसी सर्ग में रचनाकार ने भाई विभीषण के द्वारा रावण पर गदा के द्वारा प्रहार कराया है जिससे रावण का मस्तक फट जाता है और उसकी सेना में भगदड़ मच जाती है-
“किया विभीषण ने क्रोधित, हो ऐसा गदा-प्रहार कराल।
गूंजा शोर गगन में भारी, और फटा दशमुख का भाल।
मूर्छित होकर गिरा दशानन, राक्षस-दल में भगदड़ घोर।
रथ में डाल सारथी भागा, प्राण बचा लंका की ओर। (पृष्ठ-87)

रावण-वध के चतुर्थ सर्ग में रावण की मूर्छा टूटने पर वस्तुस्थिति का ज्ञान होने पर रावण द्वारा विभीषण पर क्रोध करना और अपने गुप्त रहस्यों को बताये जाने की शंका से ग्रसित होकर रावण द्वारा विभीषण के वध के लिए उद्यत होना, मन्दोदरी द्वारा समझाया जाना और फिर रावण द्वारा मन ही मन यह सोचना कि यदि सबसे पहले राम के द्वारा उसका ही वध हो जाता तो उसके सम्पूर्ण कुल का उद्धार कैसे होता, रचनाकार के मन पर द्वापर में हुए महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण द्वारा अपने ही सारे परिवार को नष्ट करने के बाद स्वयं पदार्पण करने के भाव का कहीं न कहीं स्मरण को दर्शाता है।
“राक्षस-कुल के परिणामों का, था उसको गहरा अहसास।
श्राम विमुख सबको लड़वाया, सद्गति का लेकर विश्वास।
था उसका मन्तव्य अगर, मैं ही पहले मर जाऊँगा
ते राक्षस-कुल को पापों से, कैसे मुक्ति दिलाऊँगा (पृष्ठ-94)

और उसके बाद राम-रावण के बीच घमासान युद्ध का वर्णन करते हुए सर्ग का समापन।
पंचम सर्ग में युद्ध में सभी हाथ-पैर और सिर कट जाने के बाद रावण का पुनः जीवित हो उठना, राम द्वारा हताष होना और फिर विभीषण द्वारा रावण की मृत्यु का रहस्य राम को बतलाना -
“शीशों के कटकर फिर उगने, का रघुनन्दन सुनो रहस्य।
नाभिकुण्ड में वलयाकृति का, अमृतकुंभ है रखा अदृश्य। (पृष्ठ-111)

फिर रावण द्वारा लंका भेदी विभीषण को दुत्कारने के बहाने रचनाकार श्री शीलेन्द्र कुमार वशिष्ठ जी ने छोटे-छोटे प्रलोभनों के वशीभूत हो अपने देश के गुप्त रहस्यों का खुलासा कर देने वाले/बेच देने वाले गद्दारों को खूब लताड़ा है-
“कुलघाती! भ्राताघाती!!, तूने कर डाला पाप जघन्य।
देश-द्रोह से बढ़कर होता, जग में दारुण पाप न अन्य। (पृष्ठ-119)

इस सर्ग में रचनाकार ने वेद व्यास की अध्यात्म रामायण, तुलसीदास जी की राम चरित मानस और वाल्मीकि की रामायण तीनों के भावों का समावेश करते हुए युद्ध में विभीषण द्वारा नाभि अमृत रहस्य बताना, अगस्त्य मुनि द्वारा आदित्य हृदय स्तोत्र का जाप और मातलि के संकेत पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग राम से कराया है।

निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि रावण-वध के बहाने रचनाकार  वशिष्ठ जी ने एक ऐसे खण्ड-काव्य की रचना की है जिसे पढ़कर मन भाव विभोर हो उठता है। विशेष बात यह भी है कि रचनाकार ने रावण-वध काव्य की रचना में जितना श्रम किया है उससे कहीं अधिक श्रम इसकी सारगर्भित भूमिका लिखने से पहले ग्रन्थों के अध्ययन में भी किया है।

हिन्दी साहित्य जगत में पुस्तक का सदा, सर्वत्र स्वागत होगा ऐसी आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास भी है।

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