काव्य: रेखा भाटिया

रेखा भाटिया
1) ज़िन्दगी मेरी स्वच्छंद यात्रा


दिल के किनारे बैठ आज
सोचती मैं जीवन की भाषा।

ज़िन्दगी  मेरी स्वच्छंद यात्रा
रुकती संभलती फिर चलती।

कभी थपेड़ों से निपटती
कभी यूँ ही पलों अलसाती।

कभी कस लेती दामन  मेरा
कभी पहेली बन जाती।

मैं भी बूझूँ, मैं भी जानूँ
व्यक्तित्व कैसा है तुम्हारा।

कहानियाँ कई कह गई
रिश्ते कई बना गई।

कुछ कहानियों के पात्र हम
कुछ रिश्ते निभाना सिखा गयी।

कई मौसम, वर्षों का असर
बिना थमे वक्त सी बढ़ती रही।

दुखों-सुखों के जुए में
एकांकी स्वामिनी जीतती रही।

तेरे  सदके झुके हम
न झुके तो भी परिपक्व बना गयी।

लम्हों, यादों पर सवार होकर
कब अपनी से अपनों की हो गयी।

कभी अनुभवों, स्वप्नों से
बतियाती तृप्त भी रही।

मिलना बिछुड़ना भी भाग्य में
सिखाई मोह माया खेल-खेल में।

उम्मीदों की डोली चढ़ निष्ठुर
प्रेम दर्शन में उलझा गयी।

धुआँ  बन पवित्र अग्नि का
जाना उस पार फिर भी हावी रही।

कभी चलने भी दो मेरी
आगे आगे ही तुम चलती रहीं ...

***


2) क्या रोक पाओगे यह खेल

सिपाही रोज बनते हैं,
रोज मरते हैं, मिटते हैं,

नया क्या है यह सदियों का खेल,
हाड़-माँस का शरीर ही है मूर्त रूप!

देश का नाम रोशन करेगा,
देश के लिए एक दिन जान देगा,

नया क्या है यह सदियों का खेल,
माँ-बाबा की अभिलाषा देशप्रेम!

मात्र वक्त है जो आगे सरकता,
इतिहास के पन्नों में नये पृष्ठ जोड़ता,

नया क्या है यह सदियों का खेल,
सीमाएँ सिकुड़ती चौड़ी होती जातीं!

गाँव क़स्बे उजड़ जाते,
मानवता छलनी हो जाती,

नया क्या है यह सदियों का खेल,
ताकतों की होड़ में भूख बढ़ जाती!

बच्चे अनाथ हो जाते,
चूड़ियाँ-शृंगार भी बदरंग होते,

नया क्या है यह सदियों का खेल,
किसी झंडे में छिपा छलनी शरीर!

कई दिन रातें बिलबिलाते,
नेताओं से सवाल पूछ-पूछ चिल्लाते,

नया क्या है यह सदियों का खेल,
राजे, रजवाड़े गये प्रजा की वही लड़ाई!

हथियारों के पहाड़ों के नीचे खोदो,
कहीं घायल पड़ी  मिलेगी मानवता,

नया क्या है यह सदियों का खेल,
शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान से रोशन है जहान!

अग्रसर है मानव सब दिशाओं में,
सभ्यताएँ, धर्म, देश सीमाएँ बढ़ी-चढ़ी,

नया क्या है यह सदियों का खेल,
नया धर्म भी जन्मा है आतंकवाद!

आग के गोले से धरती बदली,
उपजाऊ, पालक प्रकृति बदली,

नया क्या है यह सदियों का खेल,
पाषाण युग से मानव भी बदल रहा!

फिर बार-बार पूछो वही सवाल,
धरने, आंदोलन, विरोध, प्रतिक्रियाएँ,

नया क्या है यह सदियों का खेल
कर्म का प्रतिफल, भविष्य का प्रतिबिम्ब!

मानव क्या रोक पाओगे यह खेल,
बचा पाओगे मरते सिपाहियों को,

आतंकवाद, मज़हबों, सीमाओं को त्याग,
 प्रेमभरी नयी संगठित सृष्टि रचकर …
***


3) माँ का अन्तर

सूना आँगन धुल-पुँछ गया,
सूना हर कोना चमकने लगा,

तोहफों के ढेर सजे कतारों में,
व्यजनों की महक वातावरण में!

जब जब बच्चे घर आते,
घर का माहौल बदल जाता,

गर्म पराठों पर भीनी घी की परत,
संग हवा में अपनापन घुल जाता!

बतियाते खाने का मज़ा दोगुना आता,
सुख-दुःख का कोई साथी मिल जाता,

कई फ़रमाइशें चाय, चाट पकौड़ी की,
माँ का मन बाग़-बाग़ मुस्कराता!

दाल, कढ़ी, इडली स्वाद जो भाते,
माँ को पद्मभूषण मिल जाता,

उत्साह में माँ नए पैंतरे आज़माती,
यूटूब सर्च कर नए पकवान पकाती!

बच्चों का साथ जादू चलाता,
फिरनी-सी डोलती माँ पूरे घर में,

कब सोती, कब उठती रहस्य बन जाता,
वक्त तेज भागता छूमंतर हो जाता!

माँ के गुड्डे -गुड़िया डीलडौल में बढ़े,
फिर भी माँ के लिए छोटे-छोटे खिलौने,

कभी पुचकारती, डाँटती, कभी खुद रोती,
कभी कटपुतली हँसा पेट में बल देती!

घर में मेला, मेले में घर,
आनंद, उल्लास, खुशियों के पल,

समय गुजरता सन्दूक बंद होते,
बच्चे बिदाई ले मंज़िल प्रस्थान करते!

जीवन में आगे बढ़ने की उम्मीद दे देती,
हृदय कपाट बंदकर आँसू रोक लेती,

हँसता-खिलखिलाता घर हो जाता खाली,
कोने, कमरे खाली, मन भी खाली!

अरमान कई सजे मन गलियारों में,
सज जाये घर-आँगन दोबारा किलकारियों में,

घूम-घूम हर कोना, चुनती कई यादें,
पल जीने की कोशिश कर हार जाती!

क्या तुमने कभी अकेलापन झेला है,
जब अरमान कई हो बतियाने के,

माता-पिता अपने देश, यह परदेस,
चुप्पी है भीतर, बाहर चिड़ियों का शोर!
***


4)  मैं स्त्री बन पैदा हुई

प्रभु मैं यह नहीं पूछती,
मुझे मानव जन्म क्यों मिला,
मैं स्त्री बन पैदा हुई,
क्यों नारी जन्म कष्टों को मैंने भोगा!

प्रभु मैं यह नहीं पूछती,
गौरी, दुर्गा, चंडी में भी रूप मेरा,
सती, सीता, द्रौपदी, मीरा
प्रथाओं ने मुझे क्यों हराया!

प्रभु मैं यह नहीं पूछती,
सरस्वती का आशीर्वाद सब पर समान ,
चिरहरण, अपहरण, अपमान, अग्निपरीक्षा,
युगों से हताश विद्वान पुत्री क्यों!

प्रभु मैं यह नहीं पूछती,
तेरे हर अवतार की जननी माँ,
माँ बनने से अपने अधिकारों को छोड़,
कर्तव्यपरायण नारी वनों में क्यों भटकी!

प्रभु मैं यह नहीं पूछती,
संघर्षों की कहानियाँ लिखी जाती रहीं,
पुरुष उकसाता रहा कमजोर नारी आगे बढ़ो,
आगे कितना आगे बढ़ूँ, किसलिए!

प्रभु मैं यह नहीं पूछती,
पुरुष-नारी किसके बिना समाज अधूरा,
अधिकारों की लड़ाई नारी की पुरुष से,
नौ मास जनने में फिर समान क्यों!

प्रभु मैं यह नहीं पूछती,
मंदिर, शिवालयों में पूजा करती आयी,
आस्था तुझमें समान, धर्म जो कोई मेरा,
कब्र-चिताओं तक चिंता-बोध क्यों!

प्रभु मैं कुछ कहना चाहती,
नदी, हवा, मिट्टी,  फूल, पेड़-पत्ते,
पंछी, जीव-जन्तु प्रकृति में बहुत भाते ,
किसी भी रूप में जन्मे आदर-पहचान पाते!

प्रभु मैं कुछ कहना चाहती,
हवा ढले तूफ़ान, नदी बने बाढ़,
आत्मत्राण से भय पर विजय पा सकूँ,
सम्मान, मनोबल से जीना सीख सकूँ!
***


5)   जीतकर  दिखा योद्धा

माँ के गले में बाँहें झुलाती
खिली-खिली फूल-सी बेटी ने
लाड़ से  माँ  को चिढ़ाया
मेरे जाने के बाद तुम क्या करोगी!

बुझी मुस्कराहट, बुलंद स्वर
माँ बोली
वही करूंगी जो करती आयी हूँ
काम-धाम, तुम्हारी चिंता!

खिलखिलाती बेटी ने माँ को उकसाया
परन्तु मेरे जाने के बाद काम
तुम्हें काम-धाम कुछ नहीं रहेगा
चिंता तो मैं अपनी खुद कर लूंगी!


चिंतित माँ का  पावन स्वर
उम्र के आधे बसंत पार कर चुकी
मेरी माँ ने मुझे सँवारा, सहेजा
पढ़ा-लिखा आँचल में समेटकर रखा!

मेरी माँ का आँचल ही मेरा आकाश
नन्ही चिड़िया-सी दुबकी छिपी रहती
आंधी-तूफ़ान बाहरी दुनिया से डर
अधूरे सपने, अधूरी आकांक्षाओं संग!

तुम्हारा आकाश देखो कितना विशाल
 निकल बाहरी दुनिया में तुम्हें उड़ना
पँख तुम्हारे हों मजबूत, आत्मबल बुलंद
असंतुलित समाज में, स्वप्नों में रंग भरना!

आंधी तूफानों का सामना तुम्हें करना
 तप-तप कर कुंदन बन निखारना
निष्ठुर समाज का धरातल नुकीला
समाज के आकाश में गिद्ध मंडराते!

स्त्री अत्याचार भूत से मौजूदा
अनपढ़ समाज कभी नहीं बदला
बौराया समाज बेटी रक्षा में असफल
अपितु बेटियाँ उन्नति में अव्वल!

बेटियाँ  मरी-मारी जाएँ कितनी भी
नपुंसक समाज का रोग नाइलाज
राह कठिन डगर ठोस पग तू भर
बन स्वयंभू योद्धा जीतकर  दिखा!

जानती हूँ माँ, तेरी जंग है अब मेरी
समाज बदले न सही, मैं बदलूगीं
समय की धार में बह मैंने सीखा है
निडर आशावादी योद्धा होगी मेरी गति!
***


6)  रिश्ते झरे पत्ते 

रिश्ते दरक जाते दरख्तों से,
शाखों से झड़ सुखी पत्तियाँ से,
हवा के झोकों में बिखरें इधरउधर,
बगीचे की घास पर नितांत अकेले!

ग़मों की आद्रता में सिमटे-सिकुड़े,
झोंकों की आहट से आपस में उलझे,
अज़ीब कर्कश शोर मचाते कितना,
इस शोर में जीवन संगीत बेसुरा!

इस शोर में पंछी दुबक छिप जाते,
उघाड़ टहनियाँ उदास अपने रूप पर,
बदरंग कुम्हलाये पेड़ छाँव रोक लेते,
बेतुकी पत्तियों से रिश्ते उड़ जाते दूर!

अश्रुबूँदों में भीगे फिर भी सूखे,
धूप में सिंके फिर भी राख बने,
कभी हरेभरे यह रिश्ते पेड़ों की शान,
मौसम बदलते ही सूखे पत्तों में ढल जाते!

1 comment :

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।