करोना: तीन पहलू (काव्य)

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी


1. करो ना गलती दोबारा

ताज्जुब है इतनी देर लगी
उसकी पहचान करने में,
गनीमत है पहचाने तो!
पर बंधु, वह तुम्हें देखते ही जान गया
लिफाफा देखते ही मजमून भाँप गया;
तुम्हारी रग-रग से वाकिफ निकला वो
जैसे कोई पुराना करीबी हो।

फिर देखो जरा गौर से
जैविक विकास - शुरूआती दिन
कोशिश करो, पहचानो वह जगह
जहाँ आज है वह
वहीं आस-पास कहीं थे तुम भी;
अरे पुराना करीबी जो है
तुम्हारे डी एन ए से मिलता-जुलता
वो भी एक डी एन ए ही तो है।
यकीन नहीं होता न
शर्म महसूस होती है शायद
डारविन के लफ्जों, और
जैविक-विकास की बारीकियों में;
इंसान को शेष जंतु-जगत से जोड़ती
रिश्तेदारियों में।

लेकिन तुम भी क्या करो?
तुम्हारा दिमाग कुदरत ने
बड़ा कर दिया, जरूरत से ज्यादा
और खुद मुसीबत मोल ली है
उसकी कीमत चुका रही वह भी।

और तुम! उठ गये ऊपर इतना
कि बाकी सब – बंदर औ चिंपांजी
चूहा, चमगादड़, उसके भी बहुत पहले
अमीबा भी, वाइरस भी
तुच्छ दीखते सभी, उन्हें
अब देख नहीं पाते हो।

कुदरत से जन्मा, वहीं पला-बढ़ा
लूट लिया उसको, किया उसे शर्मसार
कुदरत रोए जार-जार
फितरत देख इंसानी, कर लेती तौबा वह।

करोना की क्या बात करें?
सोचो, जरा सा वह छुटकू
क्यों हो गया इतना असरदार?
रग-रग तु्म्हारी नाप लिये बैठा वह।

अरे, अब तो तौबा करो
कसम लो, करो ना दोबारा
गलती जो की पहले
उठना क्यों इतना कि जड़ें
नजर नहीं आ पायें।
कुदरत पर इतना जुल्म किये जाते हो
उपभोक्ता संस्कृति का पाठ पढ़े जाते हो;
करोना ने आज तुम्हें औकात दिखाई है
छेड़छाड़ कुदरत से आज यहाँ लाई है।

इतिहास से सबक सीखो
करो न गलती दोबारा;
हवाओं की लिखावट में, सूक्ष्म कण की बुनावट में
संदेश छुपा करता, समझा करो इशारा!
करोना को जरा समझो
करो ना गलती दोबारा।
***


2. विश्व एक परिवार

देखते-देखते सिमट गई दुनिया
चार सदियों में बदल गई दुनिया
विज्ञान-प्रौद्योगिकी ने पसारे पाँव
और धरती बन गई – एक गाँव।

उसके बाद की कहानी
एक सूक्ष्म-जीव ने देखते-देखते
कितना सिमटा दिया वह गाँव
मात्र एक इंसानी परिवार में।

उसके आगे लाचार सभी
नहीं डरता किसी से,
आम हो या खास, मामूली या कद्दावर
एटमी पावर हो या सुपर पावर;
उसका आतंक सारी धरती पर,
वीरान नगर औ महानगर।

सबने देखा, जाना सूक्ष्म जीव का दम-खम
और आज समझ आ गया सभी को
हमारे मनीषी क्यों कहा करते थे?
वसुधैव कुटुम्बकम।
***


3. एकता सूत्र

मानव का सांस्कृतिक विकास
जुडने और जोड़ने का इतिहास
बँटने और बाँटने का इतिहास
आगे कभी, कभी पीछे जाने का संत्रास।
कभी मौसम की मार,
अक्सर अपनी करतूतों का शिकार
जिस डाल पर बैठता, काट देता उसे ही
अनवरत स्वार्थसिद्धि में लिप्त
जुगाड़ूपन अपनी पहचान बनाता,
आज कुछ तो डगमगाया है
जुगाड़ू का खुद पर अजेय विश्वास।

खंड-खंड बँटता और बाँटता रहा वो
सिलसिला चलता रहा अविराम -
नस्ल, धर्म, देश, संप्रदाय
जातियाँ-उपजातियाँ – अंतहीन बिखराव
अमीरी के शिखर, गरीबी के दलदल
अहंकारी आज बेबस निरुपाय;
उस छुटकू ने मचा दिया धमाल
चला दिया तबाही का खंजर
उभाड़ सामने रख दिया
इंसानी अहं का खोखला मंजर
उसकी ताकत का, अर्थव्यवस्था का
घिनौना, डरावना पंजर।

सुना करते छिपी होती बुराई में भी अच्छाई
तबाही के साथ एक खास बात नजर  आई --
 नस्ल, धर्म, जाति, राष्ट्र,
साक्षर, निरक्षर, ज्ञानी औ अज्ञानी -
भेदभाव सारे लगा जैसे भुला दिये
लगातार बँटते रहने के इतिहास में
कुछ समय के ही लिये ही
सारे मानव एक हो गये।
***

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