नयी दृष्टि देती कहानियाँ

समीक्षक - सीमा शर्मा


प्रवास में आसपास (कहानी संग्रह)
लेखिका: डॉ. हंसा दीप
प्रकाशन: शिवना प्रकाशन, सीहोर मध्य प्रदेश
मूल्य: ₹ 250.00 रुपये
संस्करण: हार्ड बाउंड
पृष्ठ संख्या: 128


डॉ. हंसा दीप के कहानी संग्रह 'प्रवास में आसपास' में कुल पंद्रह कहानियाँ हैं। यूँ तो ये कहानियाँ प्रवास में (कैनेडा) रहकर लिखी गई हैं किन्तु इन कहानियों को केवल प्रवास की कहानियों के रुप में ही नहीं देखा जा सकता। इन कहानियों में जो देश है वह भले भारत न हो लेकिन दृष्टि तो भारतीय है। अधिकांश पात्र भी भारतीय हैं और उनके कार्य व्यवहार भी भारतीय हैं। समीक्ष्य संग्रह की प्रथम कहानी 'हरा पत्ता पीला पत्ता' बड़ी अनूठी-सी कहानी है। कहानी शीर्षक के दो रंग 'हरा और पीला' यदि इन दोनों को मिला दिया जाये तो एक नया रंग बनता है 'तोतई' और यही रंग होता है नव कोंपलों का अर्थात नई ऊर्जा का, जो जीवन में आशा का संचार करती है। इसी तरह दो अवस्थाएं मिलकर 'डॉ. मिलर' के जीवन में नई ऊर्जा का संचार करती हैं। सामान्यतः देखा जाता है कि कोई व्यक्ति अपने जीवन में किसी भी शीर्ष पर क्यों न रहा हो, लेकिन सेवानिवृति के बाद सब की स्थिति न्यूनाधिक एक जैसी हो जाती है।

डॉ. सीमा शर्मा
"अपने ज़माने के जाने-माने कार्डिओलॉजिस्ट, डॉक्टर एडम मिलर। लोगों के दिल से दिल तक पहुँच का चीर-फाड़ करने वाले। नए दिल से नए जोश को भरने वाले, जीवन से हारे लोगों को नया जीवन देने वाले... वही तस्वीर जेहन में रखना चाहते थे जो उनकी पहचान थी, पोस्टरों पर रहती थी, पॉवर पॉइंट की स्लाइड्स पर रहती थी, मरीजों की आँखों में रहती थी, सुप्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. एडम मिलर के मुस्कराते चेहरे के साथ।" वे इस सब से अछूते कैसे रह सकते थे।

यह कहानी आज के यथार्थ को न केवल देखती और समझती है बल्कि उसी सब के बीच एक ऐसा मार्ग भी खोजती है, जो दोनों-तीनों पीढ़ियों के लिए या कहें पूरे समाज के लिए एक आदर्श स्थिति हो सकती है। जहाँ बुढ़ापा, शैशव का साथ पाकर एक नई ऊर्जा से भर जाता है तो वहीं शैशव को और अधिक खिलने और विकसित होने का अवसर मिलता है। इस कहानी की एक पंक्ति, "तुम चलते थे, मैं भी चलना चाहता हूँ, दौड़ना चाहता हूँ, तुम मुझे सिखाओगे?" यह ऐसा समय है जब कई कारणों से संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और इस स्थिति से शैशव, बालपन, युवावस्था और बुढ़ापे; इन सभी अवस्थाओं में संघर्ष बढ़ गया है। यहाँ दोष किसी का नहीं है लेकिन हर वर्ग के सामने अपने तरह के संघर्ष अवश्य हैं। ऐसे में यह कहानी एक नई दृष्टि देती है, जो विचारणीय है।

डॉ. हंसा दीप
संग्रह की दूसरी कहानी 'एक मर्द एक औरत' एक ओर समाज की दूषित मानसिकता को दिखाती है तो दूसरी ओर रिश्तों में पवित्रता और विश्वास को पोषित करती है। 'वह सुबह कुछ और थी' सामान्य से एक दिन के अच्छे अनुभवों की कहानी है तो 'अंततोगत्वा' में एक पूजा के बहाने समाज के मनोविज्ञान को दिखाया गया है। 'रुतबा' कहानी बाल मनोविज्ञान की कहानी है। शैशव में भी 'अहं' का भाव होता है तथा वे अपने 'रुतबे' को बनाने के लिए कितनी बालसुलभ चतुराइयाँ दिखाते हैं इसका सूक्ष्म अंकन यहाँ किया गया है। सामान्यतः मालिक और कामगार के संबंधों को शोषक और शोषित के रूप में परिभाषित किया जाता है लेकिन 'मधुमक्खियाँ' कहानी इसके विपरीत आयाम को दिखाती है। 'उसकी औकात' कहानी में एक शिक्षण संस्थान के माध्यम से विभिन्न संस्थानों में होने वाली उठा-पटक, चालबाज़ियों और राजनीति को समझा जा सकता है। किसी कुर्सी पर बैठने का नशा और उस पर बने रहने की आकांक्षा, मनुष्य को किस स्तर तक गिरा देती है।

संग्रह की छठी कहानी 'मुझसे कहकर तो जाते' में भी लेखिका ने एक विशेष मनोदशा को प्रकट किया है। कहानी की 'नैरेटर' एक भारतीय पात्र है। जो पंद्रह दिन के लिए उसके घर में किराये पर रहने आये उस लड़के को लेकर जिज्ञासा और अपनेपन की अनुभूति करती है, उसके सामान्य मानवीय स्वभाव को दर्शता है लेकिन समय पूरा होने पर उसका बिना बताये चले जाना सामान्य नहीं कहा जा सकता। लेखिका ने इस कहानी के माध्यम से मानव मन की उन परतों को खोलने का प्रयास किया जो मन ही मन चलती तो रहती हैं लेकिन उनकी अभिव्यक्ति नहीं हो पाती। इसके अतिरिक्त तकनीकी के तनावों में डूबी युवा पीढ़ी में अलग-थलग रहने की संस्कृति का पनपना लेखिका की चिंता का विषय है।

'अपने मोर्चे पर' कहानी में डॉ. हंसा दीप ने जहाँ खोखले नारीवादी आंदोलनों को दिखाया है वहीं यह भी रेखांकित करने का प्रयास किया है कि हर बार स्त्री ही प्रताड़ित हो आवश्यक नहीं, कई बार पुरुष भी प्रताड़ित हो सकता है। इस तथ्य की पुष्टि 'ऊँचाइयाँ' कहानी और अधिक प्रबल ढंग से करती है। कहानी की मुख्य पात्र डॉ. आशी अस्थाना जिसकी आवाज ही जैसे एक आंदोलन है, एक सत्ताधारी दल की अधिकृत प्रवक्ता तथा स्त्री के साथ हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध एक सशक्त आवाज़। "उनकी दबंगई गूंजती सत्ता के चौबारों में भी और समाज के चौराहों में भी।" लेकिन ये एकतरफा दबंगई उसी के परिवार के दो पुरुषों के जीवन का संतुलन किस तरह बिगाड़ देती है; डॉ. आशी स्वयं भी नहीं समझ पाती। डॉ. आशी की ऊँचाइयों के साथ-साथ उसके और परिवार के बीच एक खाई भी बनती जाती है। इस प्रक्रिया में डॉ. आशी के लिए सबसे प्रिय पुत्र 'अलंकार' का सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही छिन्न-भिन्न हो जाता है और वह समझ भी नहीं पाती क्योंकि वह ऐसा जानकर नहीं करती। 'अलंकार' "लड़की से बात करते हुए भी डरता है। एक खौफ है मन में। जैसी पापा की हालत है वैसी अपनी हालत होते देखता है। आये दिन माँ के भाषण समारोहों और टीवी कार्यक्रमों को देख पापा की दहशत और बढ़ती थी।” उन दोनों को लगता कि माँ व पत्नी के इशारों पर नाच रहे हैं।

'फालतू कोना' कहानी को देखें तो कहीं न कहीं 'ऊँचाइयाँ' कहानी की अगली कड़ी के रूप में दिखाई देती है। कैसे सुहास की सारी अच्छाइयाँ बुराइयों में बदल जाती हैं। बहुत कम समय में उसके चरित्र का इतना क्षरण पाठक को परेशान करता है। इन कहानियों के ये पात्र पाठक को सोचने को विवश करते हैं कि पुरुष क्या इतना कमज़ोर है जो थोड़ी सी उपेक्षा से ही टूट जाता है? क्या उसे खड़े रहने के लिए स्त्री का सहारा अनिवार्य है? अन्यथा उसका अंत अलंकार और सुहास जैसा हो सकता है जबकि स्त्री पात्र जैसी भी स्थितियों में हों जमकर सामना करते हैं। 'फालतू कोना' कहानी में एक दृश्य चिकित्सालयों की अमानवीय व्यावसायिक दृष्टि का भी है, जिनके लिए रोगी केवल लाभ का कारक है इससे अधिक कुछ नहीं।

'एक खेल अटकलों का' कहानी में लेखिका ने सिक्योरिटी गार्ड 'पश्तो' के माध्यम से एक बिल्डिंग में रहने वाले विभिन्न लोगों के जीवन में झाँकने का प्रयास किया है। उनकी जीवनचर्या के माध्यम से उनके दुःख-सुख, रहन-सहन के साथ-साथ आकर्षक मुखौटे के पीछे छुपे दुःख-दर्द और अकेलेपन को भी देखा है। इस कहानी में 'मीशा' एक ऐसी पात्र है जो स्वयं को ही धोखा देकर अपने अकेलेपन से बचना चाहती है लेकिन बच नहीं पाती और उसकी नियति उसे एक दुखद अंत तक ले जाती है। 'भिड़ंत' कहानी डॉ. स्वाति के संघर्ष की कहानी है जो एक ओर अपनी माँ के कैंसर जैसी बीमारी से पीड़ित होने से दु:खी है दूसरी ओर समाज के रूढ़िवादी रवैये से परेशान है और इन दोनों से ही कैसे वह जूझती है और सफलता पूर्वक जीतती भी है।

'रोपित होता पल' एक सकारात्मक कहानी है। एक छोटा सा पल कैसे आपके दृष्टिकोण को बदल कर रख देता है आप स्वयं नहीं जान पाते। जैसे आपकी सब धारणाएँ ध्वस्त हो जाती हैं आपके अंदर कुछ नया और सकारात्मक रोपित हो जाता है। इसी तरह समीक्ष्य संग्रह की अंतिम कहानी 'बड़ों की दुनिया' को बच्चों के दृष्टिकोण से लिखा गया है। कई बार बड़े लोग बच्चों की मनोदशा को बिलकुल नहीं समझ पाते या कहें कि समझना नहीं चाहते। इसका प्रभाव बाल मन पर कैसा होता है कहानी यही दिखाने का प्रयास करती है। यदि इस कहानी संग्रह को पूर्णता में देखें तो एक पठनीय कहानी संग्रह है जिसमें समकालीन विविध विषयों को उठाया गया है और उनका निर्वाह भी संतुलित दृष्टि से किया गया है। कहानियों की भाषा सरल एवं विषयानुकूल है।

डॉ. सीमा शर्मा, शास्त्रीनगर मेरठ
ईमेल: sseema561@gmail,com; चलभाष: +91 945 703 4271

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