कहानी: हँसी

प्रीति गोविन्दराज
मैं उसे देखकर हैरान रह गया-वो तो कारपेट पर लेटी हुई थी, उसकी आँखें बंद थी! इस समय सामान्यता: वह या तो कुछ पढ़ रही होती या कंप्यूटर पर कुछ काम कर रही होती। पता नहीं, उसकी दिनचर्या आज क्यों बदल गई? मैंने ध्यान दिया कि उसके देह पर अब भी कल रात की नाइट गाउन थी। उसे इस तरह बेतरतीब कम ही देखा था, न ढंग के कपड़े, न बाल बनाये और न ही चेहरे पर कोई मेकअप। जीवन से भरी मेरी साथी आज इतनी अजीब क्यों लग रही थी?
अचानक मेरे आसपास होने की आहट से उसने अपनी पलकें खोलीं। मुझे देखकर वह प्यार से मुस्कुरायी, तो मैं उसके समीप जाकर खड़ा हो गया। उसने मुझे प्यार से छूआ तो सदैव की भांति, पुलकित हो उठा। मैं उसी पल उसके साथ बाहर जाना चाहता था, नित्यप्रति की तरह किन्तु वह कुछ अस्वस्थ लग रही थी। उसकी आँखें थकी-थकी प्रतीत हुईं। उसकी प्यारी आवाज़ सुनने को रुका रहा, सोचा शायद कल वो मेरी किसी बात से मुझसे अप्रसन्न हो गई हो। अक्सर कुछ देर बाद हमारे सम्बन्ध की खींचा-तानी स्वयं सुलझ ही जाती। भौंहें उठाकर मैंने प्रश्न सूचक दृष्टि उस पर डाली तो उसने बिना कुछ कहे मेरा  पीठ थपथपा दिया। ये स्पर्श मेरे लिए आश्वासन का काम कर गई। अब मेरा मूड कुछ ठीक हुआ पर शरीर अब भी झटपटा रहा था। उसकी आँखें मुझे ही निहार रहीं थीं। फिर उसकी आँखें बाहर खिड़की से खिली धूप और नीले अम्बर को देखने लगीं। मैं जानता था कि कुछ समय के लिए वह भी हमारे लम्बे सैर की मीठी यादों में खो गई थी।

कुछ समय बाद वह कुछ बेचैन होकर इधर-उधर देखने लगी। अपनी नाइट गाउन के जेब से वो कुछ टटोलने लगी। मैं अपनी आवश्यकता पूर्ति स्वयं न कर पाने के कारण विचलित था पर प्रतीक्षा के बिना कोई चारा नहीं था। अचानक उसने मोबाइल कानों पर लगाया, "हेलो", अब मेरे कान खड़े हो गए, मैं जिज्ञासा की चरम सीमा पर था, आखिर बात क्या है? वह मुझसे कोई बात क्यों नहीं कर रही? हमारे बीच एक सर्द दूरी क्यों जम कर बैठ गई थी?

"हाँ, कैसी हो?"

"मैं कुछ ठीक नहीं हूँ। थोड़ी मुसीबत में हूँ, कल रात बाथरूम जाने के लिए उठी तो आते-आते गिर पड़ी! हाँ, हाँ चोट तो लगी है, पर ज़्यादा नहीं। हाथ-पैर तो हिला पा रही थी, पर दर्द इतना हुआ कि स्वयं उठकर चलने की हिम्मत नहीं हुई। यहीं बाथरूम के आगे कारपेट पर सो गई, बस पता ही नहीं चला कब आँख लगी।"

कुछ पल चुप्पी रही। "गलती हो गई। बिलकुल, तुम्हारी सभी बातें मानूंगी बाबा। पहले कहाँ मना किया?"

"ठीक है, तुम्हारी हर बात सुनूंगी, नाश्ता भी खाऊंगी, इमरजेंसी सेंटर भी चलूंगी। वैसे हड्डी नहीं टूटी"

...

"बस पता चल जाता है, थोड़ी सूजन है पर अधिक नहीं।"

...

"तुम जल्दी से आकर मेरे गमले के नीचे से चाबी उठाकर, घर का दरवाज़ा खोल दो। बाकी सब काम धीरे-धीरे हो सकता है। सबसे पहले मोती को सैर करा लाओ, बेचारा सुबह से इधर-उधर घूम रहा है।"

अंततः उसने मेरा नाम ले ही लिया, मैं ज़ोर-ज़ोर से अपना पूँछ हिलाकर अपनी ख़ुशी जताने लगा। अब तक तनाव के कारण बेहाल हो गया था। विह्वल हो कर मैं उसके हाथ चाटने लगा,  तब वो खिलखिलाकर हँस पड़ी।

विश्व हिंदी सचिवालय की कहानी प्रतियोगिता 2019 में अमेरिका क्षेत्र में प्रथम स्थान पाने वाली प्रीति गोविन्दराज वर्जीनिया में रहती हैं। वे व्यवसाय से मैं कैंसर नर्स हैं और कई वर्षों से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में मूलत: कविताएँ और कहानियाँ लिख रही हैं। उन्होंने अपने कुछ संस्मरण भी कहानियों के रूप में लिखे हैं।

1 comment :

  1. अंत तक सस्पेंस बना रहा - बहुत अच्छी.

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