काव्य: पुनीता जैन

पुनीता जैन
समय 

खाली दिन खाली ही होते हैं
वे भरते हैं तब
जब इनमें सुख दुख आते हैं
सुख में मग्न मनुष्य बंद करके आँखें
करता है जीवन की जुगाली
दुख के दिन अक्सर लदे भरे होते हैं
पीठ पर ऐसे भारी कि कमर जितना झुकती है
आँखे उतनी ही खुलती जाती हैं
हाँ, सुख में आँखे फाड़ते हैं हम
दुख भरे दिन आँखें खोलते हैं
बिन ऐनक निर्मल मलिन सब देखते हैं

ये अब के पल दिन
दुख के ही हैं दिन
मानव रहित सुनसान शहर
सुनसान सड़कें
स्याह रात से सुनसान दिन
सूने महल सूने बाजार
सूनी आँखें निराहार
कितना अजीब है पर इनके साथ भी
हम जिंदा हैं
वो जो हरी डालियों में चहक रहा है
कागज का नहीं असली परिंदा है

बिल्कुल यह बेचारगी भरे दुख
वीरानगी और संकट का समय है
सत्ताएँ हैं खुश
हर मनुष्य पर उसकी नजर है
वक्त है कुछ सोचने का
रूकने का
खुद को दिए जो धोखे
उन्हें परखने का
बहुत दूर निकल गये थे हम
लौटने समझने का समय है
हमारे दुख का यह समय
हवा जल परिंदों की साँसों का समय है

हमारे सुख जो बन गये थे उनके दुख
यह समय अतिक्रमणों पर प्रश्न ही नहीं
सही जवाब लिए जाने का समय है...।
***

ये हम ही थे

शब्द जंगल के हरे भरे पेड़ थे/ जिनकी जड़ें थी गहरी पत्तियाँ थी हरी-भरी /
फल-फूल से वे लदे हुए
ये हमारी ही जमात थी
जिसने काट दी शाखाएँ/ तने /जड़ें/और जलाया ले जाकर उन्हें शहर के बीचोंबीच

घिसा और बनाया नुकीला
तैयार किया युद्ध के शस्त्र की तरह

यह हमारी ही जमात थी
जिसने उन हरे-भरे शब्दों को
बदल दिया तीर-भाले में
डूबे थे जो अपनी हरियाली में

ये हमारी ही जमातें थी
जिन्होंने दिखाया भय /आक्रांताओं का...
शब्दों के उपवन / जो सूखने को तैयार नहीं थे/
भय से सूख गये वे/ जले /और करने लगे
हथियारों संग हमजोली...

ये हमारी ही जमाते थीं
जिसने खोदी अपनी ही जमातों की जड़ें...
शब्दों में भर भरकर गहरे विष...।

1 comment :

  1. बहुत अच्छी सामयिक कविताएं हैं पुनीता जी

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