सामाजिक सरोकारों का सशक्त दस्तावेज: अच्छा लगता है

समीक्षक- अरुण कुमार निषाद

पुस्तक: अच्छा लगता है (काव्य संग्रह)
लेखक: प्रो. वशिष्ठ अनूप
प्रकाशन: शब्दार्थ अकादमी, वाराणसी
संस्करण: प्रथम संस्करण 2012
मूल्य: ₹ 15 रुपया
पृष्ठ संख्या: 150


काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर वशिष्ठ अनूप का नाम हिन्दी कविता और गजल के क्षेत्र में एक जाना पहचाना नाम है। उनके द्वारा विरचित ‘अच्छा लगता है’ काव्यसंग्रह शब्दार्थ प्रकाशन, वाराणसी से प्रकाशित है। इस काव्यसंग्रह में हिन्दी-भोजपुरी की 39 गजलें हैं साथ-ही-साथ इसमें 37 स्फुट शेर भी हैं। भाषा की प्रांजलता प्रारम्भ से ही पाठक को आकर्षित करती है। इस काव्यसंग्रह में प्रो. वशिष्ठ अनूप ने जीवन के हर पहलू को छूने का प्रयास किया है। भोगा हुआ यथार्थ, प्रेम समर्पण, स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, राष्ट्रीयता, आशा और निराशा जैसे विषयों पर भावों को शब्द देने का कवि ने प्रयास किया है।

अरुण कुमार निषाद


आज के इस मरती हुई संवेदना को अभिव्यक्ति देते हुए कवि कहता है-

जलाते हैं अपने पड़ोसी के घर को 
ये क्या हो गया है हमारे शहर को। 

कीजिएगा अब शिकायत किसकी किससे सोचिए
आज सारा तन्त्र ही डूबा है भ्रष्टाचार में। 
ब्रह्मचारी, धर्म-उपदेशक बड़े मशहूर थे 
एक दिन परदा उठा, पकड़े गये व्याभिचार में। 

जब निराशा के बादल घिरे हों तो कविता ही आशा का संचार करती है-

सर झुकाकर यूँ भजन गाने से कुछ होगा नहीं। 
पत्थरों को ताज पहनाने से कुछ होगा नहीं। 
ग़र दिखाना है तो अपने बाजुओं का बल दिखा
अजगरों को पेट दिखलाने से कुछ होगा नहीं। 

वशिष्ठ अनूप
सियासी लोगों पर तंज कसने में भी वे पीछे नहीं है-
कभी भी झाँकने वादों के व्यापारी नहीं आते 
जहाँ हत्या पे भी थाने के अधिकारी नहीं आते
ये हेलीकॉप्टर वाले वहाँ क्यों पैदल आये हैं 
जहाँ पर बाढ़और सूखा में पटवारी नहीं जाते। 

समझना उसको मुश्किल है बड़ा शातिर शिकारी है 
वो खंजर बेचने वाला अहिंसा का पुजारी है। 

ज़बाने काट कर जब भी कोई हुक्काम होता है
तो चाहे जो भी हो उसका बुरा अंजाम होता है। 
इसी प्रकार एक अन्य ग़ज़ल में वे लिखते हैं-
बजी जब डुगडुगी तो खद्दरधारी फिर चले आए
बहुत से मसखरे लम्पट लबारी फिर चले आए। 

आज जब लोग अपने को गाँवों से दूर होते जा रहे हैं। प्रकृति का अन्धाधुन्ध दोहन कर रहे हैं तब कवि अपने ग्रामीण परिवेश का वर्णन करते हुए लिखता है। 
गाँव-घर का नजारा तो अच्छा लगा
सबको जी भर निहारा तो अच्छा लगा। 

खेलते मिट्टी में बच्चों की हँसी अच्छी लगी
गाँव की बोली हवा की ताजगी अच्छी लगी। 

प्रेम गीत के मामले में भी कवि के गीत किसी से कम नहीं हैं। 
तुम्हें हुस्न का इक समन्दर कहेंगे
बदन फूल सा दिल को पत्थर कहेंगे। 

छेड़ना, छिपना, रिझाना, रिझकर वो देखना
वो नजाकत से भरी बातें बहुत अच्छी लगी। 

हँसी फूल-सी और बदन मरमरी है
किसी जादूगर की तू जादूगरी है। 

कवि बनारस की माटी की सुगन्ध छोड़ नहीं पाया। उनका यह प्रेम काव्य रुप में प्रकट हो ही गया। 
रउरे हर बेर करीले करार नेता जी
कटी कबले बिपतिया हमार नेता जी। 

कुल मिलाकर यह अच्छी कविताओं का इन्द्रधनुषी पठनीय संग्रह है। प्रो.वशिष्ठ अनूप ने अपने समय की नब्ज टटोलने का इस संग्रह में सार्थक प्रयास किया है, इसके लिए वे अनूप बधाई के पात्र हैं।

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