चंद्रमोहन भण्डारी की कविताएँ

चंद्र मोहन भण्डारी
अभिशप्त और अभिशाप
           
हरित-भरित, वनाच्छादित
‘शस्य श्यामला’ वसुंधरा
गिरि-श्रंखलाओं का अतुल विस्तार
पोषित हिमनदों से विपुल ऊर्जस्वित
उमड़तीं बह चलीं नदियां;
उतरती डगर, आवेग चढ़ती उमंगों का
फेनिल तरंगों में उफनते झरने
मचलते, बिखरते भी, खिलखिलाते।
सृष्टि का अपरिमित वैविध्य
अकल्पित वनस्पति-प्रारूप
चीड़ों-देवदारों से घिरे गिरि-पार्श्व
सजग प्रहरी से गगनचुम्बी सिकोया
शाख से वृक्ष उगाते अप्रतिम वट-प्रारूप;
कहीं छिटके लजाते से फर्न,
कहीं कैक्टसी विन्यास में पुष्प का बाहुल्य;
वैविध्य अनुपम, सहस्रों प्रजातियों में
आकृतियों, हजारों रूप, गंधों में
पुष्प-दल खिलते, सजाते धरा को
धरा जैसे सजती-सजाती स्वयं को
खुद नाचती-गाती, लजाती आप
प्रफुल्लित धरा का वह रूप
जिस पर वह स्वयं भी मुग्ध
मुस्करा बोली स्वयं से –
नहीं नीलाकाश में अन्यत्र
जैव-मंडल, जैविक-सृष्टि का आधार
जहाँ तक जानती मैं, नहीं ऐसा
नहीं कोई अन्य इस ब्रह्मांड में;
और मुझसे ही, मेरे जीव के जो अंश
धरा आबाद करती करोड़ों प्रजातियां
विश्व का वैविध्य व विस्तार
मिले कैसे अप्रतिम उपहार मुझको
धन्य  हूँ मैं धन्य -
प्रभु तुम्हारी कृपा अपरम्पार।

एक ही चाहत रही अब शेष
मिले मुझको एक अपना
करे जो मुझे संबोधित,
शिशु -- पुकारे आप जननी को
चेतना के पंख लेकर चले
नयन बन मेरे दिखाये मेरा फलित संसार,
करे जो चित्रित धरा निज लेखनी से
शब्दों में समाये विश्व का विस्तार।

सच हुआ सपना धरा का
वह सब मिला उसको
नवजात शिशु, सघन चेतना का पुंज
धरा का स्वयं का जो अंश;
दीर्घ उसका बालपन, पल्लवित होता पुष्प
समय के साथ वह बढ़ चला
चेतना के पंख लेकर उड़ा
गुंजित धरा का अप्रतिम घर-संसार।

बालपन बीता, विलक्षण बुद्धि
युवा-मानव ज्ञान-अर्जन-निपुण
अति महत्वाकांक्षी, उसने देर ना की
अहं-पंखों के सहारे दूर वह उड़ चला
विजय-अभियान पर निकला।
समय का फेर, अनोखा बदलाव उसमें
धरती माँ नहीं थी अब, न वह पुत्र
स्वामी बन गया वह धरा का ;
‘बेकनी प्रारूप’ (*) उसका बन गया आदर्श
प्रताड़ित-प्रकृति, उसके रहस्य-उद्भाषित
‘देकार्ती-विज्ञान’ (*) बन गया यंत्र, उसका अस्त्र;
अब वह शक्तिशाली, स्वामी धरा का
उपभोक्ता भी, कौन उसको रोकता?
जीवनदायिनी धरती, सारे जंतु एवं जीव
जुड़ा जिनसे जैविक-विकास-क्रियाओं में
आज उसके दास, उपभोग की हैं वस्तु,
स्वामी बन गया वह उस जगत का
जिसका स्वयं ही वह अंश।

धरती मौन औ नि:शब्द
शिकायत भी करे किससे और कैसे?
कुल्हाड़ी निज पैर मारी
उसी का अंश उसका शत्रु
कभी जो खुद को समझती धन्य
आज है संत्रास का अहसास
प्रफुल्लित थी जो कभी,
अब खुद पर ही नहीं विश्वास।
उसको पुत्र कहते शर्म आती
जैविक-पुत्र ही अब कहूँगी मैं
नहीं मानस-पुत्र मेरा
इस विड़म्बना को सहूँगी मैं
संबंध उसका और मेरा एक ही अब
यह धरा अभिशप्त, वह अभिशाप।

(*) फ्रांसिस बेकन, रेने देकार्त: आधुनिक विज्ञान की दिशा और दशा तय करने में महत्वपूर्ण योगदान
***


मुश्किल दौर में रिश्तों की खुशबू

खुशबू तो खुशबू है
जूही, चमेली  हो या प्यारी सी चम्पा
तुलसी घर-आंगन की या हो रजनीगंधा
इत्र की बात करें या सोंधी माटी की गंध
महके घर फुलवारी प्यारे रिश्तों के संग।
खुशबू वो रिश्तों की, संगत की, थिरकन की,
हाथों में हाथ बंधे, सुख में या दुख में भी
खुशबू तो खुशबू है कर जाती सराबोर।
रजनीगंधा हो या चंपा हो प्यारी सी
मस्ती केसर की हो या अमवा की डारी
बाहर भी भीगा तन, मन भी भीगा-भीगा
मन-अभ्यंतर तक असर करे सीधा सा;
आज भी महक जाती फूलों भरी  डाली
आज भी खनकती है पंछी की किलकारी।

कुछ तो आज बदला है वायरस के असर जैसा
महक की तासीर होती जा रही है बेअसर
उसकी पहचान आज मुश्किल हो रही
लक्षण एक यह भी, बात समझ में आती।
बात से बात निकल जाती है दूर तलक
बात करें आगे की, प्यार के धागे की
खूशबू की बात करें, खुशबू वो रिश्तों की
कठिन समय की पीड़ा बांट लिये जाने की।
बहुत कुछ बदला है आज, कुछ टूटा भी है
धागा विश्वास का चटक गया लगता है
मुश्किल हालातों में साथ कहीं छूटा है
घर कोई लौटा है लम्बा सफर तय करके
जाना-पहचाना वो घर का दरवाजा
आज बंद होता देख हूम-हूम करता मन,
रिश्तों की, अपनों की बदल रही नजरें जो
सच्चाई जीवन की पहचान रहा होता,
दिल का ही दरवाजा बंद हुवा लगता जब
रिश्तों की खुशबू को काट रहा होता वो।
आज अहसास यह अंदर तक जाता है
मुश्किल दौरों में संबंध बदल जाता है
संक्रमण-दौर में लौट रहा घर-आंगन
देहरी दीवार बनी नहीं कहीं अपनापन।
जूही हो या चम्पा आज भी महकते हैं
रिश्तों-संबंधों की  महक नहीं आ पाती।

युग बदला, रुत बदली, बदल रही दुनिया भी
रिश्तों की परतें भी सुनामी उड़ा ले चली
रिश्ते कुछ बदले हैं आंधी में, हवाओं में
रिश्ते कुछ दरक जाते काली घटाओं में
महक बदल जाती है, खुशबू तब नहीं होती
खुशबू की जब केवल बू ही बची रहती।
ऐसा एक मंजर आज दिखाया है करोना ने
मानव को वक्त ने आईना दिखाया है;
लफ्जों में डारविन के तुच्छ मूलों की बातें हैं
मानव के बड़प्पन की असलियत की भी बातें हैं
कहने को बहुत कुछ है सोचने को भी कुछ तो है
तूफां बाद समझने को, संभलने को बहुत कुछ है
रिश्ता एक इन्साँ का कुदरत संग जाहिर है
हर एक सांस में उसकी कुदरत का असर जो है
रिश्ता वो भुलाना उसकी मुश्किल की वजह तो है
ऐसी एक चुनौती उभर कर आज आई है
देखना है इन्साँ को वो कैसे संभलता है
दोराहे पे तय करना किधर है अब डगर उसकी
अहं में अपने मदमाता टेढ़ी चाल ही चलना
या पीछे मुड़ संभलकर संग कुदरत के चले चलना।

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